शनिवार, 4 जनवरी 2014

विज्ञान व्रत की ग़ज़लें


      बस अपना ही गम देखा है।
तूने कितना कम देखा है।
 
17 जुलाई 1943 को मेरठ के टेरा गाँव में जन्मे विज्ञान व्रत का नाम हिन्दी ग़ज़ल में किसी परिचय का मोहताज नहीं है जो इस अलग कहन के साथ ग़ज़ल कहने का हुनर रखते हैं। एक बेहतरीन चित्रकार होने के साथ साथ विज्ञान व्रत का नाम उन ग़ज़लकारों में उल्लेखनीय है जिन्होने समुचित छान्दसिक अनुशासन और परिपक्व शिल्प के साथ छोटी बहर की ग़ज़लें कहीं जिनके शेर गागर में सागर के समान हैं। शब्दों की ये मितव्ययता और फिर भी समुचित अर्थवत्ता विज्ञान व्रत की ग़ज़लों की ख़ासियत है। विज्ञान व्रत का नाम उन ग़ज़लकारों में शामिल किया जाता है जिन्होने दुश्यंत कुमार के बाद हिन्दी ग़ज़ल को एक ऊँचाई प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके चार ग़ज़ल संग्रह अब तक आ चुके हैं - बाहर धूप खड़ी है, चुप कि आवाज, जैसे कोई लूटेगा, तब तक हूँ, इसके साथ उनका एक दोहा संग्रह भी है - खिड़की भर आकाश
तत्सम पर इस बार विज्ञान व्रत की कुछ ग़ज़लें....
1
तपेगा जो
गलेगा वो
गलेगा जो
ढलेगा वो
ढलेगा जो
बनेगा वो
बनेगा जो
मिटेगा वो
मिटेगा जो
रहेगा वो
2
 मैं था तन्हा एक तरफ़
और ज़माना एक तरफ़

तू जो मेरा हो जाता
मैं हो जाता एक तरफ़

अब तू मेरा हिस्सा बन
मिलना-जुलना एक तरफ़

यूँ मैं एक हक़ीकत हूँ
मेरा सपना एक तरफ़

फिर उससे सौ बार मिला
पहला लमहा एक तरफ़!
3
 आग, हवा, पानी का डर था
हाँ
, बेचारा कच्चा घर था

उसका अंबर ही अंबर था
एक दिशा थी और सफ़र था

आज यहाँ है एक हवेली
और यहीं
'होरी' का घर था

पाग़ल आँधी की नज़रों में
एक वही बूढ़ा छप्पर था

दोनों की ही मज़बूरी थी
मैं प्यासा था
, वो सागर था !
4
आज समन्दर है बेहाल
फेंक मछेरे अपना जाल

थम जाएगा यह भूचाल
ऐसा कोई वहम न पाल

जिसको दुनिया पहचाने
ख़ुद की वो पहचान निकाल

तू भी ढूंढ़ न पाएगा
अपने जैसी एक मिसाल

मेरे वापिस आने तक
रखना मेरी साज-सम्भाल
5
बच्चे जब होते हैं बच्चे
ख़ुद में रब होते हैं बच्चे

सिर्फ़ अदब होते हैं बच्चे
इक मकतब होते हैं बच्चे

एक सबब होते हैं बच्चे
ग़ौरतलब होते हैं बच्चे

हमको ही लगते हैं वरना
बच्चे कब होते हैं बच्चे

तब घर में क्या रह जाता है
जब ग़ायब होते हैं बच्चे!
6
 और सुनाओ कैसे हो तुम।
अब तक पहले जैसे हो तुम।

अच्‍छा अब ये तो बतलाओ
कैसे अपने जैसे हो तुम।

यार सुनो घबराते क्‍यूं हो
क्‍या कुछ ऐसे वैसे हो तुम।

क्‍या अब अपने साथ नहीं हो
तो फिर जैसे तैसे हो तुम।

ऐशपरस्‍ती। तुमसे। तौबा।
मजूदरी के पैसे हो तुम।
7
मैं कुछ बेहतर ढूँढ़ रहा हूँ
घर में हूँ घर ढूँढ़ रहा हूँ

घर की दीवारों के नीचे
नींव का पत्थर ढूँढ़ रहा हूँ

जाने किसकी गरदन पर है
मैं अपना सर ढूँढ़ रहा हूँ

हाथों में पैराहन थामे
अपना पैकर ढूँढ़ रहा हूँ

मेरे क़द के साथ बढ़े जो
ऐसी चादर ढूँढ़ रहा हूँ
8
बस अपना ही गम देखा है।
तूने कितना कम देखा है।

उसको भी गर रोते देखा
पत्‍थर को शबनम देखा है।

उन शाखों पर फल भी होंगे
जिनको तूने खम देखा है।

खुद को ही पहचान न पाया
जब अपना अल्‍बम देखा है।

हर मौसम बेमौसम जैसे
जाने क्‍या मौसम देखा है।
9
सीधी सादी बात इकहरी।
हम क्‍या जाने लहजा शहरी।

एक सभ्‍यता गूंगी बहरी
आकर मेरी बस्‍ती ठहरी।

जबसे बैठा बाहर प्रहरी
और डरी है घर की देहरी।

मैदानों में सिर्फ कटहरी
रातों उडकर थकी टिटहरी।

कौन दिखाता ख्‍वाब सुनहरी
अब तक जिंदा बूढी महरी।

जाने किसकी साजिश गहरी
मुझमें लगती रोज कचहरी।

सर पर ठहरी भरी दुपहरी
हाथ न आये छांव गिलहरी।
10
आज निशाने जिन पर हैं
वो सब ज़द से बाहर हैं

पिंजरों में महफ़ूज़ रहे
जितने पंछी बेपर हैं

फूलों की तक़दीरों में
क्यों काँटों के बिस्तर हैं

जीकर ये अहसास हुआ
मरने वाले बेहतर हैं

आँगन में है अँधियारा
चाँद-सितारे छत पर हैं
 !

11
जुगनू ही दीवाने निकले
अँधियारा झुठलाने निकले

ऊँचे लोग सयाने निकले
महलों में तहख़ाने निकले

वो तो सबकी ही ज़द में था
किसके ठीक निशाने निकले

आहों का अंदाज नया था
लेकिन ज़ख़्म पुराने निकले

जिनको पकड़ा हाथ समझकर
वो केवल दस्ताने निकले
12
अपने मुँह पर ताले रखना
खुद को आज संभाले रखना

शहर बहुत हैं सूरज तनहा
अपने पास उजाले रखना

खुद से दूर न होना
, अपनी
बाँह गले में डाले रखना

देख तुझे उलझाएंगे वो
तू भी प्रश्न उछाले रखना

कल ये पिंजरा ही न रहेगा
कुछ पंछी पर वाले रखना
13
मुझको अपने पास बुलाकर
तू भी अपने साथ रहा कर

अपनी ही तस्वीर बनाकर
देख न पाया आँख उठाकर

बे-उन्वान रहेंगी वरना
तहरीरों पर नाम लिखाकर

सिर्फ़ ढलूँगा औज़ारों में
देखो तो मुझको पिघलाकर

सूरज बनकर देख लिया ना
अब सूरज सा रोज जलाकर