गुरुवार, 11 अगस्त 2016

प्यासी धरती की कोख में दुबके हुए बीज की प्रार्थना - मणिमोहन की कविताएँ

कोई भूमिका नहीं, तत्सम पर इस बार युवा कवि छोटी-छोटी कविताओं के बड़े चर्चित कवि मणिमोहन, युवा कवि प्रदीप मिश्र की टिप्पणी के साथ.....
-प्रदीप कान्त
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पाठ के बाद की कविता 
मणिमोहन हमारे समय के उन चुनिन्दा कवियों में से हैं, जो अपने शिल्प और कथ्य दोनो ही स्तरों पर अलग पहचान अर्जित करते हैं। इनकी कविताएं आकार में बहुत छोटी हैं, कई बार तो क्षणिका का तरह हमारे समाने आतीं हैं। आकार के बरक्स इन कविताओं में जीवन का जो रंग उभरता है, उसका कैनवास आकाश होता है। यानि जीवन के बड़े फलक को रेखांकित करती इन कविताओं के अनकहे में बहुत बड़ी कविता से मुलाकात होती है। यह कवि के सामर्थ्य को दर्शाता है। मणि की कविता - एक छोटा सी प्रेम कविता में प्रेम में भाषा के लुप्त होने के स्थापित प्रसंग से हमारे समय के जीवन की भाषा के डूबने की व्यंजना मुखर है। प्रेम शीर्षक से लिखी गयी कविता माँसल और भाव में डूबे अंधेपन से आगे निकलते हुए जीवन संघर्ष और हार से उबरने की ताकत प्रेम में तलाशती है। उनकी कविता एक दिन हमारे जीवन में विकास के दौड़ में जन्म लेती दूरियों को प्रकाशवर्ष के पैमाने में रख कर जीवन की यात्रा को अन्नत में ले जाती है। यहाँ पर भी वह अपनी प्रेमिका से संवाद करता है। रूपान्तरण कविता में हरे पत्ते के बीच से पीले पत्ते के टूटकर धरती पर गिरने और धरती के रंग में रूपांतरण देखते हैं। वस्तुतः घरती का ही रंग है, जो जब तक पेड़ पर जीवन्त था, हरा था। जीवन के समाप्ति पर पीला पड़ा और धरती में समाकर धरती के रंग का हो गया। फिर किसी पेंड़ की जड़ों में प्रवेश करेगा और बहुत सारे रंगों में रूपांतरित होते हुए वापस धरती तक आएगा। यह जीवन के चक्रीय स्वरूप की बेहतरीन अभिव्यक्ति है। बारिश कविता एक संवाद है। जिसमें दुबके हुए बीज का स्वर है। कवि की नज़र हमेशा ही, अपने समय के बीजों पर होनी चाहिए। बीजों से वे किसान तक पहुँचते हैं और एक आंदोलित करने वाली पंक्ति उनके हाथ लगती है - अभी-अभी लौटा है वो / अपने खेतों में / सपने बोकर|  यह किसान वस्तुतः समग्र सर्जक समाज का प्रतिनिधि है। जो अगली कविता में समुद्र की रेत पर कविता लिखता है, और समुद्र की लहरें से बहा ले जातीं हैं। अगली कविता में प्रतिरोध से लय प्राप्त करने की वकालत करता है कवि। लय और श्रम की जुगलबंदी दुनिया को सुन्दर और रहने लायक बनाती है। यह कवि की पक्षधरता है, जो संवेदना और लय से भरे मजदूरों और दलितों की श्रेष्ठता को रेखांकित करता है। कवि दरअसल कविता लिखता नहीं है। वह शब्दों और भावों का अपना एक निज संसार रचता है। जिसमें उसके साथ शब्द चलते-फिरते, शोत जागते हैं। तभी तो वह अगली कविता में लिखता है - कविता के शरणार्थी शिविर में / सब आये / कवि के पीछे पीछे / भाषा के बीहड़ में । यहां पर भाषा के बीहड़ का प्रयोग करके कवि ने अपने समकाल पर दस्तक दी है। वह समय के राजनीति और सत्ता का भाषा से अन्तर्सम्बन्ध खूब समझता है।

मणि की कविताओं को पढ़ते समय पाठक का स्व जागृत हो जाता है। वह उन अनुगुंजों में चला जाता है। जहाँ जाने का इशारा करके कविता, पाठक की उँगली छोड़ देती है। यानि कविता जब शुरू होती है, तो पाठ में पूरी हो चुकी होती है। मणि पाठ के बाद की कविता के कवि हैं।

-प्रदीप मिश्र
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मणि मोहन
जन्म  : 02 मई 1967, सिरोंज (विदिशा) म. प्र.
शिक्षा : अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर और शोध उपाधि

प्रकाशन : देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्र - पत्रिकाओं (पहल, वसुधा, अक्षर पर्व,  समावर्तन, नया पथ, वागर्थ, जनपथ, बया, आदि) में कवितायेँ तथा अनुवाद प्रकाशित।
वर्ष 2003 में म. प्र. साहित्य अकादमी के सहयोग से कविता संग्रह 'कस्बे का कवि एवं अन्य कवितायेँ' प्रकाशित। वर्ष 2012 में रोमेनियन कवि मारिन सोरेसक्यू की कविताओं की अनुवाद पुस्तक  ' एक सीढ़ी आकाश के लिए' प्रकाशित। वर्ष 2013 में  कविता संग्रह  "शायद" प्रकाशित। इसी संग्रह पर म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा वागीश्वरी पुरस्कार। कुछ कवितायेँ उर्दू, मराठी और पंजाबी में अनूदित।
इसके अतिरिक्त  "भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास", "आधुनिकता बनाम उत्तर आधुनिकता" तथा "सुर्ख़ सवेरा" आलोचना पुस्तकों का संपादन ।
सम्प्रति: शा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गंज बासौदा (म.प्र) में अध्यापन ।
संपर्क: विजयनगर, सेक्टर - बी, गंज बासौदा म.प्र. 464221
मो. 9425150346
ई-मेल : profmanimohanmehta@gmail.com
एक छोटी सी प्रेम कविता

कुछ कहा मैंने
कुछ उसने सुना
फिर धीरे - धीरे
डूबती चली गई ...भाषा
साँसों के समंदर में -
हम देर तक
मनाते रहे जश्न
भाषा के डूबने का ।
000

प्रेम

अक्सर लौटता हूँ घर
धुल और पसीने से लथपथ
अपनी नाकामियों के साथ
थका - हारा
वह मुस्कराते हुए
एक कप चाय के साथ
सिर्फ थकान के बारे में पूछती है
और मैं भूल जाता हूँ
अपनी हार ।
000

एक दिन

देखना ! एक दिन
बस हम दोनों ही रह जायेंगे
इस घोंसले में
देखना ! एक दिन
मैं कहूँगा तुमसे -
अच्छा हुआ न
जो घोंसला बड़ा नहीं बनाया हमने
देखना ! एक दिन
इसी घोंसले की देहरी से
हम देखेंगे
दूर आसमान में
सितारों के तिनकों से बना
हमारे बच्चों का घोंसला
देखना ! एक दिन
अपनी नम आँखों से
मेरी तरफ देखते हुए
तुम ज़िद करोगी
वहां चलने की
और मैं कहूँगा -
उड़ सकोगी
इतने प्रकाश वर्ष दूर ...
000

रूपान्तरण

हरे पत्तों के बीच से
टूटकर बहुत ख़ामोशी के साथ
धरती पर गिरा है
एक पीला पत्ता
अभी - अभी एक दरख़्त से
रहेगा कुछ दिन और
यह रंग धरती की गोद में
सुकून के साथ
और फिर मिल जायेगा
धरती के ही रंग में
कितनी ख़ामोशी के साथ
हो रहा है प्रकृति में
रंगों का यह रूपान्तरण ।
000

बारिश

यह रेनकोट पहने हुए
आदमी का
एकालाप नहीं
प्यासी धरती की कोख में
दुबके हुए
बीज की प्रार्थना है ।
000

उसकी बारिश

हम तो
सिर्फ इंतज़ार करते हैं
बारिश का
वो तो बादलों के बीच

घटा तलाशता है
अभी-अभी लौटा है वो
अपने खेतों में
सपने बोकर
हमारे पास
कुछ भी नहीं
बोने को
कुछ भी तो नहीं
खोने को
सिवा इंतज़ार के ।
000

खाली हाथ

समुद्र के किनारे
रेत पर लिखता हूँ
कविता
लहरें आती हैं
और बहाकर ले जाती हैं
मेरे शब्द
लौटता हूँ घर
खाली हाथ
रोज़ बरोज़
रोज़ हंसते हैं
मछुआरे मुझ पर .
000

बस एक लय

वे पूछते हैं
क्या हासिल होगा
इस प्रतिरोध से ... ?
मैं कहता हूँ
बस एक लय
प्रतिरोध की ...
जो रूठ सी गई थी
कहीं कहीं से
टूट सी गई थी ...
बस एक लय !
000

शरणार्थी शिविर

अपने सिर पर
बचे - खुचे अर्थ की
गठरी उठाये
कुछ शब्द आये
सहमते - सहमते
आया कुछ विस्थापित सौंदर्य
कुछ विस्थापित सत्य आये
कविता के शरणार्थी शिविर में
सब आये
कवि के पीछे - पीछे
भाषा के बीहड़ में ।
000

(चित्र: गूगल सर्च से साभार)

1 टिप्पणी:

Sudhir kumar Soni ने कहा…

बहुत ही सुंदर ,लाजवाब सीधे सरल शब्दों की कवितायेँ मन को के गहरे तक उतर गई|