| अमेय कान्त
जन्म: १० मार्च १९८३ शिक्षा: एम ई (इलेक्ट्रानिक्स ) प्रकाशन: ज्ञानोदय, साक्षात्कार, परिकथा, कथाचक्र आदि पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित. किताबें पढना, संगीत आदि में रूचि सम्प्रति: इंजीनियरिंग कॉलेज में व्याख्याता सम्पर्क: एल आई जी, मुखर्जी नगर देवास-455001, (म प्र) फोनः 07272 228097 ई मेल: amey.kant@gmail.com | आज, जब युवा पीढ़ी का केवल एक ध्येय है - किसी तरह भी पैसा कमाने की मशीन बन जाना। सामाजिक सरोकारों से शायद ही कुछ लेना देना हो। स्कूल भी मैनेजर, डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनाने की फैकट्री बन गये हैं, नागरिक बनने के संस्कार बिरला ही कोई स्कूल दे रहा हो। ऐसे में यदि युवतम पीढ़ी से कोई कवि मिल जाए तो…, अमेय कान्त युवतम पीढ़ी की ऐसे कवि हैं जिनकी कविताएँ युवा पीढ़ी में बची सामाजिक सरोकारों की चिन्ता के बारे में आश्वस्त करती हैं। अमेय की कविताओं में जहाँ बचपन की स्मृतियाँ हैं वहीं वर्तमान और भविष्य की चिन्ताएँ भी। उनके कविता संसार में संवेदनाओं की गहनता भी दिखाई देती है तो विचारों की गम्भीरता भी। अतीत को सहेजती और कोहरे के पार देखने की कोशिश करती उनकी कविताएँ मन को सीधे सीधे कचोटती हैं।
- प्रदीप कान्त
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पन्नों के बीच
पुराने दोस्त से
मैं, तुम और रामप्रसाद
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शनिवार, २८ नवम्बर २००९
कोहरे के पार देखने की कोशिश...
शनिवार, १४ नवम्बर २००९
बाल दिवस पर बच्चों की खुशी के लिये…

आज बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू का जन्म दिवस यानि बाल दिवस है। बहुत दिनों से कक्षा चार में पढ़ती छोटी बेटी गिन्नी (प्रख्या) कह रही थी उसके कमप्यूटर पर बनाऐ चित्र कहीं भेजूँ और मैं ठहरा आलसी, टाले जा रहा था। आज लगा कि बाल दिवस पर उसके कुछ चित्र डाल ही दूँ। बच्ची भी खुश, पापा भी संतुष्ट और पाठक भी एक छोटी बच्ची की कल्पनाओं को महसूस कर पाऐंगे। यानि बाल दिवस पर बच्चे भी खुश और इस खुशी से बड़े भी प्रसन्न। ये सब उसने Adob Photoshop बनाई। मैंने उससे इन चित्रों के बारे में पूछा तो उसने मुझे कुछ कुछ बताया। जो समझ में आया उसे शीर्षक के तौर पर चित्रों के साथ लिख रहा हूँ। किन्तु बिना पूर्वाग्रह के आप उसकी इन कल्पनाओं से अलग सोच सकें तो मज़ा आए।
शनिवार, ७ नवम्बर २००९
डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाएँ
प्रकाशित पुस्तकें
मौलिक : ‘बेड़ियाँ’, ‘इक्को ही सवाल’(लघुकथा संग्रह, पंजाबी में), तथा विभिन्न विधाओं से संबंधित 33 और पुस्तकें।
संपादित : 27 लघुकथा संग्रह (पंजाबी व हिंदी में) तथा 10 अन्य पुस्तकें।
संपादन : पंजाबी त्रैमासिक ‘मिन्नी’ का वर्ष 1988 से तथा पत्रिका ‘चिंतक’ का वर्ष 2000 से निरंतर संपादन।
संप्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, मैडीकल कॉलेज, अमृतसर।
संपर्क : 97, गुरु नानक एवेन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर (पंजाब)-143004
दूरभाष : 0183-2421006 मोबाइलः 09815808506
ईमेलः drdeeptiss@yahoo.co.in
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लघुकथा के सशक्त हस्ताक्षर बलराम अग्रवाल के ब्लॉग जनगाथा पर हिन्दी व पंजाबी लघुकथा के हस्ताक्षर डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की ये लघुकथाएँ पढ़ने को मिली। पढ़ कर लगा कि ये तो तत्सम के पाठकों को भी पढ़वानी चाहिये। डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाओं में संवेदनाओं की गहनता बहुत ही शिद्धत के साथ महसूसी जा सकती हैं। बलराम अग्रवाल के शब्दों में ‘पंजाब के श्याम सुन्दर अग्रवाल व डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति, दोनों ही कथाकारों की लघुकथाओं से ‘लघुकथा कहने की (न कि लिखने की) कला’ को जाना जा सकता है।’
आस्था व मजहब, मानव मन की एक बेहद जटिल संवेदना है। तत्सम में इस बार इसी की जद्दोजहद में उलझी डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाएँ...
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दूसरा किनारा
काफिला चला जा रहा था। शाम के वक्त एक जगह पर आराम करना था और भूख भी महसूस हो रही थी। एक जगह दो ढाबे दिखाई दिए। एक पर लिखा था–‘हिंदु ढाबा’ और दूसरे पर ‘मुस्लिम ढाबा’। दोनों ढाबों में से नौकर बाहर निकल कर आवाजें दे रहे थे। काफिले के लोग बँट गए। अंत में एक शख्स रह गया, जो कभी इस ओर, कभी उस ओर झांक रहा था। दोनों ओर के एक-एक आदमी ने, जो पीछे रह गए थे, पूछा, “किधर जाना है? हिंदु है या मुसलमान? क्या देख रहा है, रोटी नहीं खानी?”
वह हाथ मारता हुआ ऐं…ऐं…अं…आं करता हुआ वहीं खड़ा रहा। जैसे उसे कुछ समझ में न आया हो और पूछ रहा हो, ‘रोटी, हिंदु, मुसलमान।’
दोनों ओर के लोगों ने सोचा, वह कोई पागल है और उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए।
कुछ देर बाद दोनों ओर से एक-एक थाली रोटी की आई और उसके सामने रख दी गईं। वह हलका-सा मुस्काया। फिर दोनों थालियों में से रोटियां उठाकर अपने हाथ पर रखीं और दोनों कटोरियों में से सब्जी रोटियों पर उँडेल ली। फिर सड़क के दूसरे किनारे जाकर मुंह घुमाकर खाने लगा।
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मूर्ति
वह बाज़ार से गुजर रहा था। एक फुटपाथ पर पड़ी मूर्तियाँ देख कर वह रुक गया।
फुटपाथ पर पड़ी खूबसूरत मूर्तियाँ! बढ़िया तराशी हुईं। रंगो के सुमेल में मूर्तिकला का अनुपम नमूना थीं वे!
वह मूर्तिकला का कद्रदान था। उसने सोचा कि एक मूर्ति ले जाए।
उसे गौर से मूर्तियाँ देखता पाकर मूर्तिवाले ने कहा, “ ले जाओ, साहब, भगवान कृष्ण की मूर्ति है।”
“भगवान कृष्ण?” उसके मुख से यह एक प्रश्न की तरह निकला।
“हाँ साहब, भगवान कृष्ण! आप तो हिंदू हैं, आप तो जानते ही होंगे।”
वह खड़ा-खड़ा सोचने लगा, यह मूर्ति तो आदमी को हिंदू बनाती है।
“क्या सोच रहे हैं, साहब? यह मूर्ति तो हर हिंदू के घर होती है, ज्यादा महँगी नहीं है।” मूर्तिवाला बोला।
“नहीं चाहिए।” कहकर वह वहाँ से चल दिया।
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हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
“साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।”
“तुम इस बारे में कुछ कहना चाहते हो?” मजिस्ट्रेट ने पूछा।
“मैने क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी देकर बैठा था। ‘हीर’ के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नज़र नहीं आई।”
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शुक्रवार, १६ अक्तूबर २००९
दीपोत्सव की शुभकामनाएँ

आज हमारी परम्परा का एक महत्वपूर्ण दिवस है - दीपोत्सव यानि दीपावली। यह पर्व हमारे लिये मुफ्त में हषोल्लास का कारण नहीं है। इसके पीछे बुराई पर अच्छाई की जीत की चिरपरिचित कथा है। और वही सबसे बड़ा सत्य भी है, कम से कम उन लोगों की नज़र में जिनका काम केवल अच्छाइयों को कहीं से भी तलाश करके आत्मसात करते हुए जीना होता है। सत्य के पक्ष में बोलना होता है। जैसा कि कृष्ण बिहारी नूर ने अपने एक शेर में कहा भी है -
चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
आइना झूठ बोलता ही नहीं
अब त्योहार तो है हषोल्लास का और आप सभी को दीपोत्सव की शुभकामनाएँ भी। बावजूद इसके कि बढ़ती जा रही महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है। ग्लोबलाइजेशन की लम्बीऽऽ ट्रेन छोटे दुकानदारों को रोंद रही है। भ्रष्टाचार का मुँह सुरसा की तरह खुलता ही जा रहा है। और सुरसा का मुँह तो वापस छोटा भी हो गया था, ये तो बन्द होने का नाम भी नहीं लेता। स्त्रियों की असुरक्षा दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। बलात्कार के मामलों में देश में राज्यों की रेंकिग होती है। और शायद ही कोई राज्य बुराई की इस रेंकिग में अपने आप को पीछे करने का प्रयास कर रहा हो। समस्याएँ बहुत गम्भीर हैं और ऐसे में हमारे समय के महत्वपूर्ण शायर निदा फाज़ली याद आते हैं -
वही हमेशा का आलम है क्या किया जाए
जहाँ से देखिये कुछ कम है क्या किया जाए
मिली है ज़ख्मों की सौगात जिसकी महफिल से
उसी के हाथ में मरहम है क्या किया जाए
और हम है कि बावजूद इसके कि बहुत कुछ बुरा हो रहा है, अच्छे की उम्मीद बनाए रखे हुऐ है। क्यों कि किसी भी चीज़ की अति बहुत देर तक कायम नहीं रह सकती। एक ना एक दिन उसे खत्म होना होता है। ठीक वैसे ही, जैसे दीपोत्सव के पीछे की कथा का खलनायक माना जाने वाला रावण। और सबसे बढ़िया दृष्टांत तो भस्मासुर का है। घोर तप के बाद शिवजी से वरदान पाकर, शिवजी के ही सर पर हाथ रख उन्हे भस्म करने चला था। बचा तो वो भी नहीं। हालांकि ग़लत अपने आप खत्म नहीं होगा, उसके खिलाफ़ बोलना होगा। इसलिये आप भी ग़लत के खिलाफ़ सही के लिये संघर्ष करते हुए सकारात्मक रहें, मस्त रहें और स्वस्थ रहें।
पुनश्च:
दीपोत्सव की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ
-प्रदीप कान्त
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चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार
शुक्रवार, २ अक्तूबर २००९
गाँधी की प्रासंगिकता पर सवाल क्यों?
न्यूटन का तीसरा नियम है - प्रत्येक क्रिया की विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया होती है। विज्ञान के ज़्यादातर नियम आम जीवन में भी लागू होते हैं। इनमें से यह नियम भी एक है। यदि आप किसी को मारने दौड़ोगे तो वह भी लठ्ठ लेकर आपको मारने आऐगा, यह एक सामान्य सी बात है, यानि प्रत्येक क्रिया की विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया। किन्तु गाँधी ऐसे शख्स़ थे जिन्होने इस नियम को नकारा। यानि केवल सामने वाला ही क्रिया करता जाऐ, आप विपरीत प्रतिक्रिया मत करिये। अर्थात् हिंसा के जवाब में प्रतिहिंसा नहीं, अहिंसा। होता है ना आश्चर्य, लेकिन तभी तो कहने वालों ने गाँधी को उनके जीवन काल में ही महात्मा बना दिया।
पिछले सालों एक फिल्म आई थी लगे रहो मुन्ना भाई, इसने बापू की गांधीगिरी को कुछ दिनों के लिए ही सही, लोकप्रिय तो कर दिया था। वैसे तो सही शब्द गाँधीवाद है, गाँधीगिरी नहीं। किन्तु यदि सही ही इस्तेमाल करेंगे तो फिर फिल्म वाले फिल्म वाले कैसे कहलाएंगे? युवा वर्ग इससे खासा प्रभावित होता नज़र आया। भ्रष्ट कर्मचारियों को फूलों के गुच्छे भेंट किये गए।ये ठीक है कि फिल्मों का असर आखिर कितने दिन रहता? धीरे धीरे हम सब भूल गए। किन्तु इसको देखते हुऐ बापू की प्रासंगिकता पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। सच बात तो यह है कि बापू भी पहले एक साधारण आदमी ही थे। महात्मा तो उन्हे उनके कर्मों ने साबित किया। और ऐसा भी नहीं है कि अहिंसा की परिकल्पना सबसे पहले बापू ने ही की। यह तो सदियों पुरानी अवधारणा है जो गौतम बुद्ध ने की थी। यही महावीर स्वामी भी मानते थे। अपनी जिद के कारण सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध जीत तो लिया किन्तु उसमें हुई मारकाट और जन हानि को वह बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसका हृदय परिवर्तन हो गया तथा वह अहिंसावादी हो गया। उसने बोद्ध धर्म के प्रचार के द्वारा इसे फैलाया भी। किन्तु अहिंसा के इतने सशक्त उपयोग बापू से पहले शायद ही किसी ने किया हो।
इस बात को समझने के लिये हमें भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास जाना पड़ेगा जहां दो तारिखें बहुत महत्वपूर्ण हैं - २९ मार्च १८५७, जहाँ गरम दर्जे का विरोध होता है और ११ सितम्बर १९०६ जहाँ नरम विरोध की नींव बनती है जब बापू ने पहली बार दक्षिण अफ्रीका में बने खूनी बिल के सामने सर झुकाने से साफ साफ इन्कार कर दिया था। गरम दर्जे का पहला विरोध यानि १८५७ का स्वतन्त्रता संग्राम इसलिये असफल नहीं हुआ था कि उसमें ताकत नहीं थी, वरन् इसलिये असफल हुआ था कि ताकत तो थी पर संघटित नहीं थी। दूसरा, एक सामान्य से सिद्धान्त के तहत लोहे को लोहा काटता है जिसका बापू ने उपयोग नहीं किया। उन्होने तो पत्थर को रस्सी से काटने वाला नियम अपनाया, जैसे पानी खींचते खींचते रस्सी कुँऐ की मुंडेर पर पत्थर को काटने लगती है। ये ठीक है कि इसमें समय लगता है किन्तु शत प्रतिशत एक निश्चित समय बाद पत्थर कटने लगता है। रास्ता लम्बा था किन्तु बापू ने यही किया क्योंकि वे समझ गये थे कि हिंसा के प्रभाव अल्पकालिक होंगे। बापू की महानता इसमें नहीं थी कि उन्होने हिंसा के ख़िलाफ अहिंसा के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया वरन् उनकी महानता इसमें थी कि उन्होने अहिंसा को ही हिंसा के ख़िलाफ सबसे शक्तिशाली हथियार बनाया। सामान्यतया लोगों को मारकाट नहीं पसन्द होती और इस बात को बापू ने सबसे पहले समझा। उन्होने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया तो लोगों ने इसे मारकाट से ज़्यादा सही समझा और वे संघटित हो गये और यही बापू की सबसे बड़ी सफलता थी। संघटन की यही ताकत १८५७ में नहीं मिलती। वहाँ कहीं न कहीं सबके अपने अपने स्वार्थ थे जिसके कारण सबका अपना अपना विरोध शुरू हुआ। शायद यही वजह थी कि इस शुरूआत को गदर का नाम देकर अंग्रेजों ने लगभग ५० सालों तक भारतीय जनता को भरम में रखा जबकि अन्तत: वह स्वतन्त्रता आंदोलन ही था न कि गदर। लेकिन बापू के अहिंसा वाद के आह्वान से जो संघटन पैदा हुआ वह अंग्रेज सरकार को भारी पड़ गया।
बापू के दर्शन में केवल अहिंसा नहीं है, वहाँ सत्य है, सादगी है, स्वदेशी है, प्रकृति की और लौटने की अभिलाषा है और एक और महत्वपूर्ण बात कि जो स्वयं न कर सको औरों को भी न कहो। इस सन्दर्भ में ज़रा बापू की वेशभूषा को भी याद करें। उसके पीछे एक नहीं कई दर्शन थे - पहला कि इस देश के कई गऱीब लोगों के पास कपड़ा नहीं है तो वे अपने तन पर केवल एक धोती पहनते थे। दूसरी, स्वदेशी की धारणा कि यहाँ की कपास मेनचेस्टर चली जाती थी और कपड़े वहाँ से बन कर आते थे। वह नहीं पहनना ताकि स्वदेशी के माध्यम से देशप्रेम की प्रेरणा प्राप्त हो। और तीसरा प्रकृति की और लौटना और स्वस्थ रहना।शायद बापू के सत्य और अहिंसा के दर्शन को देख कर ही महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन ने एक बार कहा था कि आने वाली पीढियां शायद ही यकीन कर पाएं कि हाड मांस का कोई ऐसा पुलता इस धरती पर कभी हुआ था। एक और दिलचस्प बात यह भी है गांधी जयंती के आसपास ही हर बार नोबेल पुरस्कारों की घोषणा होती है। दुनिया के सबसे बड़े सम्मान देने वाली नोबेल समिति को इस बात का हमेशा अफसोस रहा कि दुनिया को सत्य और अहिंसा का बेमिसाल दर्शन देने वाले और इसे अपने जीवन में उतारने वाले व्यक्ति को वह सम्मानित नहीं कर सकी. नोबेल शांति पुरस्कार के लिए गांधी जी तीन बार नामांकित हुए थे. १९४८ में जब उन्हें यह पुरस्कार मिलना तय था तो उनकी हत्या हो गई और नोबेल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिया जाता।
कौन नहीं जानता कि दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला के प्रेरणा स्रोत भी बापू ही थें। यहाँ तक कि अफ्रीका का तो संविधान भी गाँधीवादी मूल्यों पर आधारित ही बनाया गया है। गाँधीवाद के कतिपय समर्थक तो ये आज भी मानते हैं कि आज के तमाम् सवालों का हल भी गाँधीवाद में मिलता है। अब अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा को ही लें। स्कूली छात्राओं के एक प्रश्न के जवाब में कि वे किस महान हस्ती के साथ भोजन करना पसन्द करते तो उन्होने गाँधी का ही नाम लिया। बराक ओबामा के अनुसार उनके आदर्श हैं महात्मा गाँधी, नेल्सन मंडेला एवं अब्राहम लिंकन। इसी से आप बापू के नैतिक मूल्यों की वर्तमान प्रासंगिकता के बारे में सोच सकते हैं। वैसे भी बापू ने जिन नैतिक मूल्यों पर ज़ोर दिया है वे बुद्ध, महावीर और ईसा के नैतिक मूल्यों से अलग नहीं हैं। जैसे इसा भी सूली पर चढ़ते हुए भी कह रहे थे कि हे ईश्वर इन्हे क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहें हैं? और जब बुद्ध और ईसा की प्रासंगिकता पर कोई सवाल नहीं उठता तो फिर गाँधी पर ही प्रासंगिकता का सवाल क्यों? हमें तो उनकी प्रासंगिकता को समझते हुऐ उस तमाम बाज़ारवाद का विरोध करना चाहिये जो बापू का उपयोग करके वस्तु बेचने कि बात करता है। इसका उदाहरण है आज ही नई दुनिया की एक खबर - गाँधी की सादगी और ११ लाख का पेन, इसके अनुसार एक विदेशी कम्पनी गाँधीजी के नाम पर ११ लाख ३९ हज़ार के २४१ सोने के पेन बाज़ार में उतारे हैं जिसे गाँधीजी की २४१ मील लम्बी दांडी यात्रा से जोड़ा गया है। सोचने की बात है जो आदमी तमाम उम्र सादगी से जीता रहा उसका उपयोग निर्मम बाजारवाद कर रहा है और हम ख़ामोश हैं। ऐसे में क्या हमें दुश्यन्त कुमार नहीं याद आने चाहिये -
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये
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शुक्रवार, २१ अगस्त २००९
चाँद तनहा है
1 अगस्त, 1932 को जन्मी मीना कुमारी का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। उनका असल नाम महज़बीन बानो था। उनकी सफल फिल्मों में परिणीता, शारदा, मिस मेरी, साहिब बीवी और गुलाम, आरती, मैं चुप रहूँगी, दिल एक मंदिर, काजल, फूल और पत्थर जैसी कई बेहतरीन फिल्में शामिल थीं। 1962 में उन्हें ’साहिब बीवी और गुलाम’, ’आरती’ और ’मैं चुप रहूँगी’ के लिये सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के सम्मान के लिये नामांकित किया गया जो अपने आप में एक रिकार्ड है। मीनाकुमारी ने 1952 में कमाल अमरोही से शादी की। परंतु यह शादी सफल न हो सकी। मीनाकुमारी ने खुद को शराब में डुबो दिया और एक ज़माने की सफलतम अभिनेत्री अपने ही अंधेरों में खोती चली गई। 1972 में अपनी आखिरी फिल्म "पाक़ीज़ा" की रिलीज के तीन सप्ताह बाद 31 मार्च, 1972 को उनका इंतकाल हो गया।
नई पीढ़ी तो शायद ही जानती हो कि मीनाकुमारी सशक्त अभिनेत्री होने के साथ शायरा भी थीं और "नाज़" तखल्लुस का इस्तेमाल करतीं थीं। कारण जो भी रहा हो पर उनकी शायरी एक लम्बे समय तक लोगों के सामने नहीं आ पाई । उनकी मौत के बाद उनकी डायरियाँ मशहूर गीतकार और निर्देशक गुलज़ार को वसीयत में मिलीं जिन्होंने इनमें से कुछ गज़लों और नज़्मों को बाद में छपवाया। इससे पहले खुद उनकी आवाज़ में उनकी कुछ रचनाओं का एक एलबम "I Write, I Recite" ज़रूर आया था जिसमें संगीत दिया था मशहूर संगीतकार खैयाम ने।
तत्सम मे इस बार मीनाकुमारी की गज़लें..... । मीनाकुमारी की शायरी में उनके अपने नाखुशगवार जीवन का दर्द शिद्दत से महसूस होता है। इन्तज़ार रहेगा कि इन गज़लों की खलिश आपको भी मह्सूस हुई कि नहीं?
1
चाँद तनहा है आस्माँ तन्हा
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तनहा
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआँ तन्हा
जिन्दगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तनहा है और जाँ तन्हा
हमसफर कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हा
जलती-बुझती-सी रौशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा इक मकाँ तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे यह जहाँ तन्हा
2
रिमझिम- टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली
रिमझिम बूँदों में, जहर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दी दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली
जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली
मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली
होंठों तक आते-आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा-सी जो बात मिली
3
आगाज तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता
जब जुल्फ की कालिख में गुम जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता
हँस-हँस के जवाँ दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स की किस्मत में ईनाम नहीं होता
बहते हुए आँसू ने आँखों से कहा थमकर
जो मय से पिघल जाए वह जाम नहीं होता
दिन डूबे हैं या डूबी बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता।
4
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है
रात खैरात की सदके की सहर होती है
साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब
दिल ही दुखता है न अब आस्तीं तर होती है
जैसे जागी हुई आँखों में चुभें काँच के ख्वाब
रात इस तरह दीवानों की बसर होती है
गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है
एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती खुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है
दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है
काम आते हैं न आ सकते हैं बेज़ाँ अल्फ़ाज़
तर्ज़मा दर्द की खामोश नज़र होती है
5
आबलापा कोई इस दश्त में आया होगा
वरना आँधी में दिया किस ने जलाया होगा
ज़र्रे ज़र्रे पे जड़े होंगे कुँवारे सज्दे
एक एक बुत को ख़ुदा उस ने बनाया होगा
प्यास जलते हुये काँटों की बुझाई होगी
रिसते पानी को हाथेली पे सजाया होगा
मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा
ख़ून के छींटे कहीं पोछ न लें रहरौं से
किस ने वीराने को गुलज़ार बनाया होगा
6
यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो
रोओ मत, न रोने दो
ऐसी भी जल थल क्या हो
बहती नदी की बाँधे बाँध
चुल्लू में हलचल क्या हो
हर छन हो जब आस बना
हर छन फिर निर्बल क्या हो
रात ही ग़र चुपचाप मिले
सुबह फिर चंचल क्या हो
आज ही आज की कहें-सुने
क्यों सोचें कल, कल क्या हो
शनिवार, ११ जुलाई २००९
कैफ़ी आज़मी की गज़ले
कैफ़ी आज़मी का नाम हिन्दुस्तान के आलातरीन शायरों में शुमार किया जाता है. उत्तरप्रदेश के आज़मगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव में सन १९१९ में जन्मे कैफ़ी साहब का मूल नाम अख्तर हुसैन रिज़वी था. कैफी आजमी के पिता उन्हें एक मौलाना के रूप में देखना चाहते थे लेकिन कैफी आजमी को उससे कोई सरोकार नहीं था और वह मजदूर वर्ग के लिए कुछ करना चाहते थे। 1942 मे कैफी आजमी उर्दू और फारसी की उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ और इलाहाबाद भेजे गए। लेकिन कैफी ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की सदस्यता स्वीकार कर पार्टी कार्यकर्ता के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया और फिर अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हो गए। समाजवादी विचारधारा के पक्के समर्थक कैफ़ी साहब की रचनाओं में मज़लूमों का दर्द पूरी शिद्दत से उभर कर सामने आता है।मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली के अनुसार - दूसरे कम्युनिस्टों की तरह उन्हें नास्तिक कहना मुनासिब नहीं, उनका साम्यवाद भी उनके घर की आस्था का ही एक फैला हुआ रूप था। वह जब से कॉमरेड बने हमेशा इसी रास्ते पर चले और देहांत के वक़्त भी उनके कुर्ते की जेब में सीपीआई का कार्ड था।
http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2006/08/060815_nida_column3.shtml)
तत्सम में इस बार कैफी आजमी की गज़लें …
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
इक तुम कि तुम को फ़िक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े
साकी सभी को है गम-ए-तिश्न: लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पडे
मुद्दत के बाद उसने की तो लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
2
हाथ आ कर लगा गया कोई
मेरा छप्पर उठा गया कोई
मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई
वो गए जब से एसा लगता है
छोटा मोटा खुदा गया कोई
ये सर्दी धूप को तरस्ती है
जैसे सूरज को खा गया कोई
मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई
3
पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाये
हम चाँद से आज लौट आये
दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं
क्या हो गया मेहरबाँ साये
जंगल की हवायें आ रही हैं
लैला ने नया जनम लिया है
है कैस कोई जो दिल लगाये
है आज ज़मीन का गुसल-ए-सहत
जिस दिल में हो जितना ख़ून लाये
सहरा सहरा लहू के ख़ेमे
फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आये
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शोर परिंदों ने यु ही न मचाया होगा
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा
पेड़ के कांटने वालो को ये मालूम तो था
जिस्म जल जायंगे जब सर पे न साया होगा
मानिए जश्न-ऐ-बहार ने ये सोचा भी नहीं
किसने कांटो को लहू पाना पिलाया होगा
अपने जंगल से घबरा के उडे थे जो प्यासे
हर सेहरा उनको समंदर नज़र आया होगा
बिजली के तार पे बैठा तनहा पंछी
सोचता है की यह जंगल तो पराया होगा
5
मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमाँ भी मिल जाये
नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता
वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता
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कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है
मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़ज़ा
कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा है
मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ
कि आज दामन-ए-यज़दाँ भी तार-तार-सा है
सजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किए
उसी पे ख़ालिक़-ए-कोनैन शर्मसार सा है
तमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है
सब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार सा है
जिसे पुकारिए मिलता है इस खंडहर से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी के इश्तेहार सा है
हुई तो कैसे बियाबाँ में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरे मज़ार सा है
कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है
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शनिवार, १३ जून २००९
कुमार विकल की दो कविताएँ
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फर्क़
एक छोटी सी बात को लेकर
मैं बहुत रोया
रोने के बाद बहुत सोया
सोकर उठा तो बहुत सोचा
क्या हर आदमी रोता है?
मार्क्स एंगिल्स और लेलिन भी रोये थे ?
हाँ ज़रूर रोये थे
लेकिन, रोने के बाद कभी नहीं सोये थे
अगर वे इस तरह सोये रहते
तो दुनिया के करोड़ों लोग कभी न जाग पाते।

चिड़ियों के बारे में कविता
लिखना एक सहज बात नहीं है
परिंदों के बारे में कविता
ल्खिने से पहले
सालिम अली से मिलना
या उनकी पुस्तकें पढ़ना बहुत ज़रूरी है
क्योंकि वही आपको बता सकता है
कि कौन-सी चिड़िया आपसे
दोस्ती करती है
और कौन-सी दुश्मनी
वरना साधारण आदमी की
उम्र यह बात जानने में बीत जाती है
कि कौन-सी चिड़िया दोस्त होती है
कि कौन-सी चिड़िया दुश्मन होती है
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शनिवार, ९ मई २००९
संसद या सड़क
एक आदमी रोटी खाता है
एक आदमी रोटी बेलता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है
न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटियों से खेलता है
मैं पूछता हूँ
यह तीसरा आदमी कौन है
मेरे देश की संसद मौन है।
- धूमिल
तीसरे आदमी के बारे में संसद भले मौन है लेकिन सत्ता की मदहोशी और विपक्ष की फालतू तिलमिलाहट के लिये संसद केवल मुखर ही नहीं जूता मारो संस्कृति को बेहिचक अपना लेती है। संसद है या सड़क?
खैर, सत्ता पक्ष का ये हाल केवल हमारे यहाँ ही नहीं अन्य देशों में भी है। अब यह आप पर है कि फोटो देख कर आप खुश भी हो सकते हैं और दुखी भी। खुश इसलिये कि एक हम ही नहीं, और भी हैं हमारे जैसे। और दुखी इसलिये कि सत्ता हो विपक्ष, दोनो का चरित्र हमेशा एक जैसा रहा है- सत्ता के लिये लालायित, निहायत स्वार्थी, फालतू मुद्दों की आड़ में, जनता जाऐ भाड़ में।
इसे हँसी में न टालिये, आपकी गम्भीर टिप्पणियों की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी।
फोटो: मित्र संजय लिखार द्वारा भेजे एक इमेल से साभार
शनिवार, २५ अप्रैल २००९
लिख सकूँ तो -
नईम : 01 अप्रैल 1935 - 09 अप्रेल 2009
पिछले दिनों नवगीत के शीर्ष ह्स्ताक्षर नईम हमारे बीच नहीं रहे. हालांकि वे अपने नवगीतों के माध्यम से हमारे बीच हमेशा रहेंगे. तत्सम में इस बार प्रभु जोशी के आत्मीय आलेख के साथ नईम जी का एक नवगीत....
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ये कैसी है, सहर कबीरा? - प्रभु जोशी
साठ के दशक के सर्वाधिक ख्यात नवगीतकार 'नईम' की तीन महीने की लंबी अस्वस्थता के बाद निधन हो गया। वे रोमान के विरुद्ध जीवन के यथार्थ के प्रटिबद्ध कवि थे, जिन्होंने बुंदेलखंड से आकर मालवा को न केवल अपनी कर्मभूमि, बल्कि रचनाभूमि बताया और अपनी कविता में मालवा के शब्दों को बहुत प्रीतिकर बनाया। उनके निधन से निश्चय ही हिन्दी कविता के एक युग पर पूर्णविराम लगा है।
वह भी मृत्यु का एकाएक किया गया लगभग अचूक-सा ही वार था, पर वे संभल गए थे- पक्षाघात ने उनके दाएँ गाल को अपना निशाना बनाया था और वे गाड़ी में मृत्यु से जूझते हुए सीधे अस्पताल के बजाए मेरे घर आ गए थे। मेरे प्रश्न के उत्तर में वे बोले थे- "मौत को पता था कमबख्त मास्टर है, बहुत बोलता है इसलिए गाल पर तमाचा मारा है, वह तो जीभ ही खींचना चाहती थी।" एक पीड़ाग्रस्त हँसी। ऐसे आसन्न क्षण में भी उनके भीतर का हास्यबोध उसी तरह का था, जबकि मृत्यु हँसियों को छीनना अपना पहला हक समझती है। मैं दहल गया था।
इसके बाद यह दूसरा वार था, उसका। इस बार उसने उनसे वह सब कुछ छीन लिया था, जिसको जोड़कर 'नईम' बनता था। वे लगभग तीन महीने से जीवन और मृत्यु के बीच धीमे-धीमे लगातार थरथराते क्षीण से पुल पर खड़े थे। हम उनके जीवन की ओर लौट आने की उम्मीद में थे, क्योंकि जब भी उनसे अस्पताल में मिलने गए, वहाँ डबडबाती भाषा से भरी गीली आँख में जैसे 'नईमाना' अंदाज में सवाल हो, 'ये कौन-सा संसार है?' ... शब्द नहीं, सिर्फ एक आद्य-भाषा थी, जिसके हर्फों को पढ़ने की कुव्वत किसी में नहीं थी- पर, घर के सभी लोग उनकी पीड़ा को ही पहचानते थे और रोज-रोज उसका अपनी इस दुनिया की भाषा में तर्जुमा कर रहे थे।
जबकि, मुझे तो जीवनभर जब भी पहली बार मिले- सवाल करते हुए ही दिखे। उनकी हर शुरुआत सवाल से होती थी और आज फिर वे अपने पीछे मेरे ही नहीं, सबके लिए सवाल छोड़ गए हैं। सिर्फ, हम अपनी तरफ से उसमें 'कबीरा' जोड़ सकते हैं। पिछले दिनों में उन्होंने ' कबीरा' में अपनी, जैसे एक बहुप्रतीक्षित अन्विति पाली थी। जैसे पश्चाताप भी व्यक्त हो तो वे कबीरा से कह रहे हों।
जब से पक्षाघात हुआ था, वे लकड़ी का सहारा लेकर घर-बाजार के बीच घूम भी आते थे। एक दफा मैंने कहा, ' लिए लुकाटी हाथ' आप कहाँ जा रहे हैं? बाजार में। हँसने लगे : कबीर के लिए ये मुमकिन रहा होगा कि लुकाटी हाथ में लेकर बाजार में खड़े हो जाएँ, अब तो बाजार में बटुए के साथ ही जाया जा सकता है। हमारे बटुए में भी रुपए कहाँ, जर्दे की पुड़िया भर मिलेगी। 'और लुकाटी तो अब लट्ठ में बदल गई है, और उन्हीं के बूते पर चुनाव जीत रहे हैं' एक बहुत क्षीण-सा संकेत। लुकाटी। लट्ठ। लकड़ी।
मुझे याद आ रहा है, आपातकाल में एक दिन बोले थे- 'लोग अंडरग्राउंड' हो रहे हैं, ...राजनीति के डर से। हमें तो मौत ही 'अंडरग्राउंड' करेगी। सचमुच ही वे आज 'अंडरग्राउंड' (दफनाए) हो गए। उस मिट्टी की पर्त के नीचे एक कभी न जागने वाली नींद के लिए तैयार कर दिया उन्होंने अपने जिस्म को।
तीन महीने लगे, उन्हें। बोलते होते तो कहते : ' मालवे की मेरी यही कमाई है।' वे बुंदेलखंड से आए थे, लेकिन मालवा की मिट्टी को ही उन्होंने अपना गोत्र बना लिया था, और इससे मालवा की भी पहचान बनी। ...उन दिनों वे 'धर्मयुग' के रंगीन पृष्ठों पर छपने वाले गीतकार की तरह ख्यात थे। एक ईर्ष्या पैदा करने वाला यश प्राप्त था उन्हें। मालवा देश में उनके भी संदर्भ से जाना जाता था।
मुझे याद है, उनकी आखिरी आवाज। मैंने भोपाल के लिए की जा रही यात्रा में यों ही चुहुल के लिए मोबाइल किया। कहा, ' साँस-साँस में दिक्कत-दिक्कत, घुला हवा में जहर कबीरा' । ठहाके के साथ उत्तर- 'तो मियाँ, भोपाल में हो' , लौटते समय उनकी आवाज थी। ' बहुत मलिन है, शक्ल सूरज की, ये कैसी है, ' सहर" (सुबह) कबीरा।' अरे तुमने मजाक-मजाक में मतला दे दिया। गजल पर काम कर रहा हूँ।
आज, ऐसा ही लग रहा है, जैसे सूरज बिना किसी तैयारी के आसमान में आ गया है। धूप धुँधली है। या सूरज ही कहीं आसमान में भटक गया है। धूप को प्यार करने वाले नईम की बिदाई की सोचकर ऐसा ही लग रहा है। कुछ लोगों के जीवन में उनकी उपस्थिति ऐसी ही थी। रौशनी से भरी। लेकिन, वे तो पिछले तीन महीने से अपने ही अँधेरे में धीरे-धीरे उस पुल को पार करते हुए जीवन की तरफ लौटने का उपक्रम कर रहे थे- उनके लिए अब यह दुनिया नहीं रही है। उनकी वापसी की कोशिश पर एक आखिरी पूर्ण-विराम...। शब्द, वाक्य, सभी पूर्ण-विराम पर चुप रहते हैं।

मैंने पिछले दिनों शब्द नहीं, रंग में उनकी इस स्थिति को लेकर एक 'चार बाय छः फुट' की एक पेंटिंग तैयार की थी, जिसमें नजरुल इस्लाम और नीत्शे की तरह 'नईम" के लिए भी, ' टाइम फ्रैक्चर्ड' और ' टाइम-डिस ज्वाइंटेड' की स्थिति थी। उनके लिए मस्तिष्काघात के बाद वक्त टुकड़े-टुकड़े हो गया था। जब वे बड़ी-बड़ी पनीली और पीड़ाग्रस्त आँख से देखते तो मुझे लगता है, वे वक्त के उन टुकड़ों को ढूँढ रहे हैं,... और, अब हम उन्हें ढूँढेंगे- उनके अस्तित्व के टुकड़े-टुकड़े।
लोगों में, जगहों में, शब्दों में- और, हाँ मालवी की मिट्टी के उन कणों में भी, जो अप्रैल की धूप नहीं, किसी ज्वालामुखी के लावे से बने थे। एक ज्वालामुखी उनके भीतर था, जो सिर्फ कविता में ही धधकने की कोशिश करता था, लेकिन वह अंततः देह में फूट पड़ा। वे मालवा की मिट्टी के भीतर दफ्न रहते हुए, अपने कान उस तरफ जरूर खोल लेंगे, जहाँ कभी कुमार गंधर्व मालवा को गाते रहे। नईम देवास में 'घर' बनाते हुए खुद घराना बन गए। उनके इस घराने में सैकड़ों नाम हैं, जिनकी अवसादग्रस्त स्मृति में नईम अपनी हँसियों के साथ हमेशा किलकिलाते रहेंगे। उन्हें मेरा ही नहीं, उन सबकी ओर से भी नमन, जो उस नईम-घराने के हैं।
(आलेख नई दुनिया से साभार)
लिख सकूँ तो—
प्यार लिखना चाहता हूँ,
ठीक आदमजात सा
बेखौफ़ दिखना चाहता हूँ।
थे कभी जो सत्य, अब केवल कहानी
नर्मदा की धार सी निर्मल रवानी,
पारदर्शी नेह की क्या बात करिए-
किस क़दर बेलौस ये दादा भवानी।
प्यार के हाथों
घटी दर पर बज़ारों,
आज बिकना चाहता हूँ।
आपदा-से आये ये कैसे चरण हैं ?
बनकर पहेली मिले कैसे स्वजन हैं ?
मिलो तो उन ठाकुरों से मिलो खुलकर—
सतासी की उम्र में भी जो ‘सुमन’ हैं
कसौटी हैं वो कि जिसपर-
नेह के स्वर
ताल यति गति लय
परखना चाहता हूँ।











