मंगलवार, 14 जुलाई 2020

एक बंदर को नचाते सौ मदारी देखिए – वीरेन्द्र खरे ‘अकेला’ की गज़लें


आख़िरश करते भी क्या, जब क्लास में टीचर न था
सारे बच्चे-बच्चियाँ ऊधम मचा कर ख़ुश हुए

एक दम सीधी बात, स्कूल के बचपन का दृश्य, यह शेर है वीरेन्द्र खरे ‘अकेला’ का| तो तत्सम पर इस बार वीरेन्द्र खरे 'अकेला' की ग़ज़लें...

-प्रदीप कान्त

1
लोग भी क्या हैं, किसी का दिल दुखा कर ख़ुश हुए
फूल पर बैठी हुई तितली उड़ा कर ख़ुश हुए

प्यास हम अपनी बुझा लें, ये इजाज़त है कहाँ
फिर भी ऐ दरिया तेरे नज़दीक आकर ख़ुश हुए

मर्ज़ को पाले हुए रखना समझदारी नहीं
लोग फिर भी ख़ामियाँ अपनी छुपा कर ख़ुश हुए

शक्लो-सूरत देखने लायक़ थी तब सय्याद की
क़ैद पंछी जब परों को फड़फड़ा कर ख़ुश हुए

आख़िरश करते भी क्या, जब क्लास में टीचर न था
सारे बच्चे-बच्चियाँ ऊधम मचा कर ख़ुश हुए

बोझ दिल का एक ही झटके में हल्का हो गया
हम तुम्हारी याद में ख़ुद को रुला कर ख़ुश हुए 

'अकेला' और क्या होना था, बस इतना हुआ
सरफिरे झोंके चराग़ों को बुझा कर ख़ुश हुए 
000

2 
इस दास्ताँ को फिर से नया कोई मोड़ दे 
टूटा हुआ हूँ पहले से कुछ और तोड़ दे 

अब दे के ज़ख़्म मेरे सितमगर खड़ा है क्यों 
मिर्ची भुरक दे ज़ख़्म पे नींबू निचोड़ दे 

बर्बाद हम हुए कि तेरे मन की हो गई 
अब जा के नारियल किसी मंदिर में फोड़ दे 

उकता गया क़फ़स में है सय्याद अब तो दिल 
ऐसा न कर कि तू मेरी गर्दन मरोड़ दे 

तुझको भी पत्थरों से रहम की उमीद है 
नाहक पटक पटक के न सर अपना फोड़ दे 

कातिल ही ऐअकेलाअचानक पलट गया 
मैंने कहाँ कहा था मुझे ज़िन्दा छोड़ दे
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3 
कोई बेज़ुबाँ फिर मुखर हो रहा है
शरीफ़ों में उत्पन्न डर हो रहा है 

मुझे देख कर मुस्कुराने लगे वो
मुहब्बत का कुछ तो असर हो रहा है

ज़रा देखिए तो तरक़्क़ी का आलम
कि पानी, हवा सब ज़हर हो रहा है 

जिसे देखिए बाँटता मुफ़्त नुस्ख़े
हरिक शख़्स अब चारागर हो रहा है

जुटा कर करेगा भी क्या इतना पैसा
जुटा ले अगर तू अमर हो रहा है

धरे रह गए हैं सभी धर्म-दर्शन
कि आदम सतत जानवर हो रहा है 

बुढ़ापा छुपाने की कोशिश है जारी
सफ़ेदी पे जमकर कलर हो रहा है

अदालत में घुसकर दरोग़ा को धमकी
गुनहगार कितना निडर हो रहा है

हुई चूक तुझको समझने में कैसे
मुझे दुख इसी बात पर हो रहा है

सवालात अब बस भी कर ऐअकेला
पसीने से वो तर-ब-तर हो रहा है 
000 

वो चलाये जा रहे दिल पर कटारी देखिए 
हँस रहे हैं फिर भी हम हिम्मत हमारी देखिए 

पायलागी सामने और पीठ पीछे गालियाँ 
आजकल के आदमी की होशियारी देखिए 

एक हरिजन दर्द अपना क्या बयां कर पाएगा 
सामने शुक्ला, दुबे, चौबे, तिवारी देखिए 

सारे अपराधों पे है हासिल महारथ आपको 
आप संसद के लिए उम्मीदवारी देखिए 

मैकशों के साथ उठना-बैठना अच्छा नहीं 
मौलवी जी आप अपनी दीनदारी देखिए 

कब तलक लटका के रक्खेंगे ये दिल का मामला 
सामने वाले की कुछ तो बेक़रारी देखिए 

काम हो पाया नहीं तो घूस लौटा दी गई 
बेईमानों की ज़रा ईमानदारी देखिए 

अकेलाइक तमाशा बन गई जम्हूरियत 
एक बंदर को नचाते सौ मदारी देखिए
 000

5
कुछ ऐसे ही तुम्हारे बिन ये दिल मेरा तरसता है
खिलौनों के लिए मुफ़लिस का ज्यों बच्चा तरसता है 

गए वो दिन कि जब ये तिश्नगी फ़रियाद करती थी
बुझाने को हमारी प्यास अब दरिया तरसता है 

नफ़ा-नुक़सान का झंझट तो होता है तिज़ारत में 
मुहब्बत हो तो पीतल के लिये सोना तरसता है

न जाने कब तलक होगी मेहरबानी घटाओं की
चमन के वास्ते कितना ये वीराना तरसता है

यही अंजाम अक्सर हमने देखा है मुहब्बत का
कहीं राधा तरसती है कहीं कान्हा तरसता है

पता कुछ भी नहीं हमको मगर हम सब समझते हैं
किसी बस्ती की खातिर क्यों वो बंजारा तरसता है 

कि आख़िर ऐ 'अकेला' सब्र भी रक्खे कहाँ तक दिल
बहुत कुछ बोलने को अब तो ये गूंगा तरसता है 
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6
वास्ता हर पल नई उलझन से है
फिर भी हमको प्यार इस जीवन से है

किस ग़लतफ़हमी में हो तुम राधिके
मेल मनमोहन का हर ग्वालन से है

दिल दिया मानो कि सब कुछ दे दिया
और क्या उम्मीद इस निर्धन से है

यार उसको भूलना मुमकिन नहीं
उसका रिश्ता दिल की हर धड़कन से है

माफ़ करना आप हैं जिस पर फ़िदा
सारी रौनक़ उसपे रंग रोगन से है

जो सही उसने दिखाया बस वही
क्यों शिकायत आपको दरपन से है

ये कहाँ मुमकिन कि लिखना छोड़ दूँ
शायरी का शौक़ तो बचपन से है

अकेलामन में हैं जब सौ फ़साद
फ़ायदा फिर क्या भजन.पूजन से है
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7 
पुराना मोथरा खंजर अचानक धार पर आया
तेरा इक़रारे-उल्फ़त आख़िरश इन्कार पर आया

सितम ढाये गए यूँ तो मुसल्सल, फिर भी मैं चुप था
मैं तब भड़का किसी का हाथ जब दस्तार पर आया

गज़ब है किस अदा से वो किसी को क़त्ल करते हैं
लहू का एक भी धब्बा नहीं तलवार पर आया 

यक़ीनन ग़फ़लतें मल्लाह की कश्ती को ले डूबीं
तमाशा देखिए इल्ज़ाम बस पतवार पर आया

ये देखा है, धरी ही रह गई सब उसकी फ़नकारी
ग़ुरूरे-फ़न कभी भी जब किसी फ़नकार पर आया

तुम्हारी याद आने पर ये दिल कुछ इस तरह ख़ुश है
कि जैसे कोई सैनिक अपने घर त्यौहार पर आया

अधूरा है 'अकेला' तू अधूरा हूँ 'अकेला' मैं
ज़रा सोचें हमारा प्यार क्यों तकरार पर आया 
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वीरेन्द्र खरे 'अकेला' 
: जन्म : 18 अगस्त 1968 को छतरपुर (म.प्र.) के किशनगढ़ ग्राम में 
शिक्षा :एम०ए० (इतिहास), बी०एड०
*वागर्थ, कथादेश,वसुधा सहित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं रचनाओं का प्रकाशन ।
                                
प्रकाशित कृतियाँ : 
1. शेष बची चौथाई रात 1999 (ग़ज़ल संग्रह), [अयन प्रकाशन, नई दिल्ली]
2. सुबह की दस्तक 2006 (ग़ज़ल-गीत-कविता), [सार्थक एवं अयन प्रकाशन, नई दिल्ली]
3. अंगारों पर शबनम 2012(ग़ज़ल संग्रह) [अयन प्रकाशन, नई दिल्ली] 

*लगभग 25 वर्षों से आकाशवाणी छतरपुर से रचनाओं का निरंतर प्रसारण ।
*आकाशवाणी द्वारा गायन हेतु रचनाएँ अनुमोदित ।
*ग़ज़ल-संग्रह 'शेष बची चौथाई रात' पर अभियान जबलपुर द्वारा 'हिन्दी भूषण' अलंकरण ।
*मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं बुंदेलखंड हिंदी साहित्य-संस्कृति मंच सागर [म.प्र.] द्वारा कपूर चंद वैसाखिया 'तहलका ' सम्मान 
*अ०भा० साहित्य संगम, उदयपुर द्वारा काव्य कृति सुबह की दस्तकपर राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान के अन्तर्गत 'काव्य-कौस्तुभ' सम्मान तथा लायन्स क्लब द्वारा छतरपुर गौरवसम्मान ।
सम्प्रति :अध्यापन
सम्पर्क : छत्रसाल नगर के पीछे, पन्ना रोड, छतरपुर (म.प्र.)पिन-471001
मोबाइल: 09981585601, ईमेल: Virendraakelachh@gmail.com


शनिवार, 30 मई 2020

मैं नहीं चाहता मेरे बच्चे मुझे किसी वीडियो में भीख मांगता हुआ देखें – सतीश राठी की लघुकथाएँ


मैं नहीं चाहता मेरे बच्चे मुझे किसी वीडियो में भीख मांगता हुआ देखें

यह हमारे समय की सबसे भयावह पंक्तियों में से एक है, एक मजबूर किन्तु स्वाभिमानी गरीब का दर्द| सतीश राठी की इन लघुकथाएँ कहीं खाए पिए अघाए वर्ग का ऐसा व्यक्ति है जिसने कभी गेंहूं ही नहीं पिसवाया था (रोटी की कीमत), कहीं भ्रष्टाचार के लिए अपने आप को जस्टिफाई करता ठेकेदार (पेट का सवाल), कहीं एक चतुर ग्रहिणी है जिसके २५ रूपये के नाश्ते पानी के एवाज़ में मेकेनिक 1500 के बजाए 1200 रूपये ले लेता है| और तो और आज़ाद भारत के वे लोग हैं जो किसी इंतज़ार में अपने सोचने समझाने की शक्ति और यहाँ तक छीन लेने की हैसियत यानी हाथ भी गवां चुके हैं (जिस्मो का तिलस्म) | तो तत्सम पर इस बार सतीश राठी....
- प्रदीप कान्त

रोटी की कीमत

आटा चक्की पर भीड़ लगी हुई थी। सभी लोग गेहूं पिसवाने के लिए आए हुए थे  उसी समय एक महंगी कार में से एक सूटेड बूटेड व्यक्ति ने उतर कर आटा चक्की वाले से पूछा ,'भाई! गेहूं  पीस दोगे।
आटा चक्की वाले ने कहा,' इसीलिए तो बैठे हैं। थोड़ा समय लगेगा। भीड़ काफी है। बैठिये आप।'- इतना कहकर एक कुर्सी उस व्यक्ति की ओर बढ़ा दी।
कसमसाता  हुआ व्यक्ति उस कुर्सी पर बैठ गया और अपना मोबाइल देखने लगा। उसकी बेचैनी बार-बार उसके चेहरे पर परिलक्षित हो रही थी।  चक्की वाला लगातार लोगों के डिब्बे के गेहूं चक्की में डालकर उन्हें पीसता जा रहा था।  तकरीबन बीस मिनट इंतजार के बाद उसने पूछा,' हो जाएगा ना!' चक्की वाले ने कहा,' अब आपका ही नंबर है और उसका गेहूं चक्की में पीसने के लिए डाल दिया। वह व्यक्ति बड़ा असहज महसूस कर रहा था।
उसने आटा चक्की वाले को लगभग सफाई देने की भाषा में बोलते हुए कहा,' अपने जीवन के इतने बरसों में आज पहली बार गेहूं पिसाने के लिए आया हूं। कभी मुझे तो आने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
आटा चक्की वाले ने उससे कहा,' चलिए अच्छा है भाई साहब !आज आपको रोटी की कीमत तो समझ में आई।'
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राशन

इक्कीस दिन की तालाबंदी ने उसके झोपड़े में सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया था । घर से बाहर निकला तो देखा  कि  एक स्थान पर कुछ लोग राशन का वितरण कर रहे हैं । वह वहां पर जाकर खड़ा हो गया।
एक व्यक्ति ने उससे पूछा," राशन चाहिए क्या?"
उसने कहा," चाहिए तो सही लेकिन आप वीडियो तो नहीं बनाओगे।"
उस व्यक्ति ने पूछा," क्यों वीडियो से  भला क्या दिक्कत है।"
उसने बड़े ही विवशता भरे स्वर में जवाब दिया," मैं नहीं चाहता मेरे बच्चे मुझे किसी वीडियो में भीख मांगता हुआ देखें।"
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पेट का सवाल

"क्यों बे! बाप का माल समझ कर मिला रहा है क्या?" गिट्टी में डामर मिलाने वाले लड़के के गाल पर थप्पड़ मारते हुए ठेकेदार चीखा।
" कम डामर से बैठक नहीं बन रही थी ठेकेदार जी। सड़क अच्छी बने यही सोचकर डामर की मात्रा ठीक रखी थी।मिमियाते हुए लड़का बोला।
 "मेरे काम में बेटा तू नया आया है। इतना डामर डाल कर तूने तो मेरी ठेकेदारी बंद करवा देनी है।" फिर समझाते हुए बोला," यह जो डामर है इसमें से बाबू ,इंजीनियर, अधिकारी, मंत्री सबके हिस्से निकलते हैं बेटा। खराब सड़क के दचके तो मेरे को भी लगते हैं । चल! इसमें गिट्टी का चूरा और डाल।मन ही मन लागत का समीकरण बिठाते हुए ठेकेदार बोला।
 लड़का बुझे मन से ठेकेदार का कहा करने लगा। उसका उतरा हुआ चेहरा  देखकर ठेकेदार बोला," बेटा ,सबके पेट लगे हैं। अच्छी सड़क बना दी और छह माह में गड्ढे नहीं हुए तो, इंजीनियर साहब अगला ठेका किसी दूसरे ठेकेदार को दे देंगे । इन गड्ढों से ही तो सबके पेट भरते हैं बेटा।"
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 गणित

दीपावली का समय था । यह तय हुआ कि निहाल को बुलाकर उससे बिजली की सारी बंद लाइट बदलवा दी जाए तथा और भी बिजली के जो छोटे-मोटे काम बचे हैं, वह करवा कर घर के बाहर की झालर लाइट भी लगवा ली जाए।
वैसे तो बिजली मैकेनिक को बुलाना ही बड़ा टेढ़ी खीर होता है ,लेकिन हमारी धर्मपत्नी की आदत है कि, जब भी कोई कारीगर आता है तो, वह उसकी खातिरदारी अच्छे से कर देती है और वह बड़ा खुश होकर जाता है । इसलिए जब निहाल को फोन लगाया तो निहाल ने तुरंत दोपहर में आने की हामी भर दी।
निहाल ने सारा काम तकरीबन एक घंटे में पूरा कर दिया । जब मैंने उससे पूछा कि ,भाई कितने हुए तो, निहाल ने तुरंत जोड़कर बताया सर पंद्रह सौ रुपए दे दीजिए ।
तभी धर्मपत्नी चाय और उसके साथ नाश्ते की एक प्लेट निहाल के लिए लेकर आ गई । निहाल ने मना किया ,लेकिन मेरी पत्नी ने बड़े आग्रह के साथ उसे नाश्ता भी करवाया और चाय भी पिलाई । 
निहाल जब जाने के लिए तैयार हो गया तो मैंने उससे पूछा,' हां निहाल भाई ! कितने दे दूं।'
अब सर, आपका तो घर का मामला है । आप तो सिर्फ बारह सौ रुपए दे दीजिए |” मैंने उसे तुरंत 12 सो रुपए निकाल कर दे दिए।
उसके जाने के बाद पत्नी ने कहा 'देखा मेरी चाय और नाश्ते की प्लेट का कमाल!  आपके ₹300 बच गए  । मेरी  चाय और नाश्ते की लागत  सिर्फ ₹25  ही थी।'
 मैं मौन रह गया ।पत्नी का गणित मेरी समझ से बाहर का था।
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घर में नहीं दाने

विमला देवी ने सुरेंद्र कुमार से कहा," घर चलाने के लिए पैसे  समाप्त हो गए।"
सुरेंद्र ने कहा," पिताजी के जमाने के पीतल के घड़े पड़े हैं ,उन्हें बेच दो।"
 विमला ने कहा," वह तो पिछले साल ही बेच दिए थे।"
"अरे तो पुराने समय के जो जेवरात पड़े हैं, उन्हें बेच दो।" सुरेन्द्र बोला।
"वह भी बेच दिए थे ।विमला ने दुखी मन से जवाब दिया।
"तो फिर हमारे इस हवेली जैसे प्राचीन  घर में जितनी भी पुरानी एंटीक चीजें हैं, अब उन्हें बेचने की बारी आ गई है। ऐसा करो  अब धीरे धीरे उन्हें बेचने का काम शुरू कर दो। आखिरकार  किसी तरह घर तो चलाना है ना।" सुरेन्द्र बोला।
विमला मौन हो गई। उसे तो सुरेंद्र का कहना मानना ही था।
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जिस्मों का तिलिस्म

वे सारे लोग सिर झुकाकर खड़े थे। उनके कांधे इस कदर झुके हुए थे कि पीठ पर कूबड़-सी निकली लग रही थी। दूर से उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे सिरकटे जिस्म पंक्ति बद्ध खड़े हैं। 
मैं उनके नजदीक गया। मैं चकित था कि ये इतनी लम्बी लाईन लगा कर क्यों खड़े हैं?
"क्या मैं इस लम्बी कतार की वजह जान सकता हूं?" नजदीक खड़े एक जिस्म से मैंने प्रश्न किया।
उसने अपना सिर उठाने की एक असफल कोशिश की। लेकिन मैं यह देखकर और चौंक गया कि उसकी नाक के नीचे बोलने के लिए कोई स्थान  नहीं है।
तभी उसकी पीठ से तकरीबन चिपके हुए पेट से एक धीमी सी आवाज आई, "हमें पेट भरना है और यह राशन की दुकान है।"
"लेकिन यह दुकान तो बन्द है। कब खुलेगी यह दुकान?" मैंने प्रश्न किया।
"पिछले कई वर्षों से हम ऐसे ही खड़े हैं। इसका मालिक हमें कई बार आश्वासन दे गया कि दुकान शीघ्र खुलेगी और सबको भरपेट राशन मिलेगा।" आसपास खड़े जिस्मों से खोखली सी आवाजें आईं।
"तो तुम लोग... अपने हाथों से क्यों नहीं खोल लेते यह दुकान?" पूछते हुए मेरा ध्यान उनके हाथों की ओर गया तो आंखें आश्चर्य से विस्फरित हो गई।
मैंने देखा कि सारे जिस्मों के दोनों हाथ गायब थे।
000

सतीश राठी।
जन्म :23 फरवरी 1956 को इंदौर में जन्म। 
शिक्षा: एम काम, एल.एल.बी ।
लेखन: लघुकथा ,कविता ,हाइकु ,तांका, व्यंग्य, कहानी, निबंध आदि विधाओं में समान रूप से निरंतर लेखन । देशभर की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में सतत प्रकाशन। 
सम्पादन: क्षितिज संस्था इंदौर के लिए लघुकथा वार्षिकी 'क्षितिज' का वर्ष 1983 से निरंतर संपादन । इसके अतिरिक्त बैंक कर्मियों के साहित्यिक संगठन प्राची के लिए 'सरोकार' एवं 'लकीर' पत्रिका का संपादन। 
प्रकाशन:पुस्तकें  शब्द साक्षी हैं (निजी लघुकथा संग्रह), पिघलती आंखों का सच (निजी कविता संग्रह)
संपादित पुस्तकें - तीसरा क्षितिज(लघुकथा संकलन), मनोबल(लघुकथा संकलन), जरिए नजरिए (मध्य प्रदेश के व्यंग्य लेखन का प्रतिनिधि संकलन), साथ चलते हुए(लघुकथा संकलन उज्जैन से प्रकाशित), सार्थक लघुकथाएँ( लघुकथा की सार्थकता का समालोचनात्मक विवेचन), शिखर पर बैठकर  (इंदौर के 10 लघुकथाकारों की 110 लघुकथाएं संकलित)
साझा संकलन- समक्ष (मध्य प्रदेश के पांच लघुकथाकारों की 100 लघुकथाओं का साझा संकलन) कृति आकृति(लघुकथाओं का साझा संकलन, रेखांकनों सहित), क्षिप्रा से गंगा तक(बांग्ला भाषा में अनुदित साझा संकलन),
शिखर पर बैठ कर (दस लघुकथाकारों का साझा संकलन)
अनुवाद: निबंधों का अंग्रेजी, मराठी एवं बंगला भाषा में अनुवाद । लघुकथाएं मराठी, कन्नड़ ,पंजाबी, गुजराती,बांग्ला भाषा में अनुवादित । बांग्ला भाषा का साझा लघुकथा संकलन 'शिप्रा से गंगा तक वर्ष 2018 में प्रकाशित।
विशेष: लघुकथाएं दो पुस्तकों में,( छोटी बड़ी कथाएं एवं लघुकथा लहरी ) मेंगलुर विश्वविद्यालय  कर्नाटक के  बी ए प्रथम वर्ष और बी बी ए के पाठ्यक्रम में शामिल।
 लघुकथाएं विश्व लघुकथा कोश, हिंदी लघुकथा कोश, मानक लघुकथा कोश, एवं पड़ाव और पड़ताल के विशिष्ट खंड में शामिल।
शोध: विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में एम फिल में मेरे लघुकथा लेखन पर शोध प्रबंध प्रस्तुत । कुछ पी एच डी के शोध प्रबंध  में  विशेष रूप  से शामिल । 
पुरस्कार सम्मान: साहित्य कलश, इंदौर के द्वारा लघुकथा संग्रह' शब्द साक्षी हैं' पर राज्यस्तरीय ईश्वर पार्वती स्मृति सम्मान वर्ष 2006 में प्राप्त। लघुकथा साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए मां शरबती देवी स्मृति सम्मान 2012 मिन्नी पत्रिका एवं पंजाबी साहित्य अकादमी से बनीखेत में वर्ष 2012 में प्राप्त । सरल काव्यांजलि, उज्जैन से वर्ष 2018 में सम्मानित। 
विशेष:  एक लघुकथा संग्रह एक गजल संग्रह एक व्यंग्य संग्रह वर्ष 2020 में प्रकाशनाधीन।
सम्प्रति:भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इंदौर शहर में निवास, और लघुकथा विधा के लिए सतत कार्यरत।
संपर्क: सतीश राठी, त्रिपुर ,आर- 451, महालक्ष्मी नगर, इंदौर 452010 
मोबाइल नंबर 94250 67204, लैंडलाइन नंबर 0731 4959 451, Email : rathisatish1955@gmail.com