मंगलवार, 7 फरवरी 2012

ये अधूरी जिन्दगी की बात है


सुधीर साहु

न्म - 9 मार्च, 1962, रजवाडीह, डालटनगंज (झारखंड) में

शिक्षा - एम ए (हिंदी), एम ए (अंग्रेजी), पीएच डी (हिंदी- डॉ रामविलास शर्मा के आलोचना निकष)

आजीविका - यूको बैंक में वरिष्‍ठ प्रबंधक (राजभाषा)

प्रकाशन - विभिन्न समाचार पत्रों (नवभारत, नई दुनिया, दैनिक भास्कर आदि) एवं पत्रिकाओं (राग भोपाली, राजभाषा भारती, संकल्प रथ, शिवम, प्रेसमेन, वसुधा, साक्षात्कार, वागर्थ, हंस, बया, शुक्रवार आदि) में रचनाऍं प्रकाशित

प्रसारण - आकाशवाणी (भोपाल, इंदौर), दूरदर्शन (भोपाल, कोलकाता, रॉंची) एवं विभिन्न टीवी चैनलों से कविताऍं एवं वार्ताएँ प्रसारित

रचना पाठ - अनेक शहरों के कवि सम्‍मेलनों, मुशायरों, कविता शिविरों, साहित्यिक अधिवेशनों, सेमिनारों, समारोहों आदि में आमंत्रित

विशेष – साक्षात्‍कार, राजभाषा

दर्पण (इंदौर) अनुगूँज (कोलकाता), स्‍पंदन (रॉंची) आदि में सम्पादन सहयोग व कई सेमीनारों के आयोजन में सहयोग

सम्‍मान - अभिव्यक्ति सम्मान (भोपाल), फैज अहमद फैज सम्‍मान (रॉंची)

वर्तमान पता - यूको बैंक, अंचल कार्यालय, सैनिक बाजार, मेन रोड, रॉंची-834001

संपर्क - ०९९७३३९९६३२


प्रगतिशील लेखक संघ इन्दौर द्वारा आयोजित एकल काव्य पाठ में सुधीर साहु की कविताएँ व ग़ज़लें सुनने को मिली। हालांकि वे कुछ समय तक इन्दौर में भी रहे किंतु मुझे याद नहीं आता किंतु कभी उनसे मेरी मुलाकात हुई है। तत्सम के लिये कविताओं पर मेरे अनुरोध पर उन्होने कुछ ग़ज़लें भेजी। यहाँ ग़ज़ल साबित करती है कि मुहब्बत वुह्ब्बत से उबर कर अब वह सामाजिक विसंगतियों की बात करती है - जैसे ये शेर - देख बेटों का चलन सुन दहेज के किस्‍से/ बेटियॉं कहती हैं शहनाई से डर लगता है या जिस पालने में झूलझूल कर बड़े हुए/फिर अपने पालने में कमी ढूँढ़ते रहे। तत्सम में इस बार सुधीर साहु की ग़ज़लें....

- प्रदीप कांत


1

बनी बनायी लीक चले पर्वत के पार गये

अब लगता है जीवन के ये दिन बेकार गये


बाँस उगाये मगर वक्‍त पर लाठी नहीं मिली

सारे रिश्‍ते अपने-अपने कर्ज उतार गये


नाम अभी भी प्रेम गली पर राहें बदल गयीं

प्रियम से मिलने निकले पहले बाजार गये


हाल पूछ कर रस्म अदा की और बढ़े आगे

मन के ठहरे पानी में एक कंकड़ मार गये


जहाँ मिली बेबस लाचारी कुछ सिक्के फेंके

और भरी पापों की गठरी वहीं उतार गये


नहीं मिले तो हमें रहा अफसोस न मिलने का

और मिले तो भूले बिसरे दर्द उभार गये


दर्द हार जाने का किना तीखा होता है

जब ये जान गये हम जीती बाजी हार गये

***


2

शाख से झरती सदी की बा है

ये अधूरी जिन्दगी की बा है


बढ़ रही आबादियों के प्यास की

सूखती जाती नदी की बा है


अपने घर में आग लगने की खबर

और अपनी बेखुदी की बा है


फिंक गये खाने में दाने ढूँढ़ना

हाय कैसी त्रासदी की बा है


डूबती साँसों पे सौदेबाजियाँ

कोखसे होती ठगी की बा है


अस्मतें लुटने के ब्योरे चटपटे

पढ़ के होती गुदगुदी की बा है


कुछ दिखाने के लिए नेकी भी है

और बाकी सब बदी की बा है


दिल अगर टूटे तो रोना सुधीर

आजकल ये दिल्लगी की बा है

***


3

हम उनके नाचने में कमी ढूँढ़ते रहे

वो मेरे ऑंगने में कमी ढूँढ़ते रहे


चेहरे पे अपने ऐबार इना था हमें

हम अपने आईने में कमी ढूँढ़ते रहे


अपनी कमाई जिनके बीच बाँटता रहा

वो मेरे बाँटने में कमी ढूँढ़ते रहे


जिस पालने में झूलझूल कर बड़े हुए

फिर अपने पालने में कमी ढूँढ़ते रहे


बेटी का हाथ थाम लिया बिन दहेज के

सब लोग पाहुने में कमी ढूँढ़ते रहे


वो प्यार के सिखाके गये हमको मायने

हम उनके मायने में कमी ढूँढ़ते रहे

***


4

कैसे हँस दूँ तेरी परछाईं से डर लगता है

कैसे रोऊँ तेरी रुसवाई से डर लगता है


जब वो आऍंगे घर खुश दिखना जरूरी होगा

वो न सोचें हमें महँगाई से डर लगता है


जब भी टकराई नजर झुक गईं उनकी ऑंखें

उनको शायद अभी गहराई से डर लगता है


देख बेटों का चलन सुन दहेज के किस्‍से

बेटियॉं कहती हैं शहनाई से डर लगता है


कल ये दम था कि सितारे भी तोड़ लाओगे

आज तुमको मेरी अँगड़ाई से डर लगता है


डर नहीं लगता है तूफानों बियाबानों से

साथ रहना मुझे तन्‍हाई से डर लगता है


दिल में ही रहने दो पलकों पे मत बिठाओ मुझे

जमीं का टुकड़ा हूँ ऊँचाई से डर लगता है

***


5

होश में कैसे रहते आपकी नजर में रहे

किया तो कुछ भी नहीं फिर भी हम खबर में रहे


गरीब गॉंव का दुख हमसे तो देखा न गया

तमाम जिन्‍दगी हम इसलिए शहर में रहे


जिन्‍हें न तुक का पता है न खबर लय की है

वो कह रहे हैं गजल को कि वो बहर में रहे


हमको मंदिर में न मस्जिद में नींद आती है

इसलिए रात को हम अपने-अपने घर में रहे


किसी की एक तीली से घरों में आग लगी

हमारे डर में तुम और हम तुम्‍हारे डर में रहे


किसी के दिल में अपना एक घर बना न सके

कभी अगर में रहे हम कभी मगर में रहे


राह मिलती जरूर ढूँढ़ते अगर मंजिल

हम उम्रभर न जाने कौन से सफर में रहे


हमको नफरत है फासले से किनारे से नहीं

तुम्‍हारे साथ रहे जब भी हम लहर में रहे

***

बुधवार, 25 जनवरी 2012

एक कविता यह भी...


शुभकामनाएँ


शुभकामनाएँ
उस गणतंत्र दिवस की जो 63 साल से मनाया जा रहा है
उस संविधान के लिये जिसमें कई संशोधन हो चुके हैं

उस संविधान के लिये...

जिसका पालन हम सीधे सादे लोग लगातार करते हैं
और कुछ सरफिरे उडाते हैं
धज्जियाँ उसी की स्वछन्दता पूर्वक

उस गणतंत्र के लिये
जिसके हम अधिकारी हैं

और सही मायने में
जिसका इंतज़ार है अब भी

- प्रदीप कान्त



(फोटो: प्रदीप कान्त)

शनिवार, 31 दिसम्बर 2011

कहने को ही साल नया है

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ तत्सम में इस बार आपनी ही एक ग़ज़ल दे रहा रहा हूँ|
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हमारा हाल नया है
कहने को ही साल नया है

कहता है हर बेचने वाला
दाम पुराना माल नया है

बड़े हुए हैं छेद नाव में
माझी कहता पाल नया है

इन्तज़ार है रोटी का बस
हाथ हमारे थाल नया है

लोग बेसुरे समझाते हैं
नवयुग का सुर-ताल नया है

नहीं सहेगा मार दुबारा
गाँधी जी का गाल नया है

- प्रदीप कान्त
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सोमवार, 12 दिसम्बर 2011

बृजेश कानूनगो की कविताएँ

बृजेश कानूनगो

25 सितम्बर 1957 को मध्य प्रदेश के देवास में बृजेश रसायन विज्ञान तथा हिन्दी साहित्य मे स्नातकोत्तर हैं और 1976 से देश की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओँ मेँ आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो रही है।
अब तक आपके प्रकाशनों में एक व्यंग्य संग्रह-पुन: पधारेँ (1995), एक कविता पुस्तिका-धूल और धुएँ के परदे मेँ (1999), बाल कथाओँ की पुस्तक- फूल शुभकामनाओँ के (2003) बाल गीतोँ की पुस्तिका- चाँद की सेहत (2007) शामिल है।
बृजेश की कविताएँ पाठकों को गहरे तक झकझोरने की क्षमता रखती हैं। एक और उनके पास रेडियो की स्मृति जैसी स्मृति की कविता है दूसरी और किवज जैसी वर्तमान की कविता। भूकम्प के बाद कविता में वे कविता की हमेशा की प्रासंगिकता पर बात करते हैं – कविता ही है/जो खिलाती है मलबे पर फूल/बिछुड़ गये बच्चों के चेहरे पर/लौटाती है मुस्कान। यह आश्वस्ति है कि कविता है तो कुछ सार्थक कहेगी ही। तत्सम में इस बार बृजेश कानूनगो की तीन कविताएँ......।

-प्रदीप कांत

1

रेडियो की स्मृति


गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों

बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह


कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर
फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें

न जाने क्या सुनते रहते हैं

छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका

जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश

आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही


स्मृति मे सुनाई पडता है

पायदानों पर चढता

अमीन सयानी का बिगुल

न जाने किस तिजोरी में कैद है

देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक

हॉकियों पर सवार होकर

मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह


स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं

फसलों के बचाव के तरीके

माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता

अपने समय का महत्वपूर्ण कवि

सारंगी रोती रहती है अकेली

कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू


याद आता है रेडियो

सुनसान देवालय की तरह

मुख्य मन्दिर मे प्रवेश पाना

जब सम्भव नही होता आसानी से

और तब आता है याद

जब मारा गया हो बडा आदमी


वित्त मंत्री देश का भविष्य

निश्चित करने वाले हों संसद के सामनें

परिणाम निकलने वाला हो दान किए अधिकारों की संख्या का

धुएँ के बवंडर के बीच बिछ गईं हों लाशें

फैंकी जाने वाली हो क्रिकेट के घमासान में फैसलेवाली अंतिम गेंद

और निकल जाए प्राण टेलीविजन के

सूख जाए तारों में दौडता हुआ रक्त

तब आता है याद

कबाड में पडा बैटरी से चलनेवाला

पुराना रेडियो


याद आती है जैसे वर्षों पुरानी स्मृति

जब युवा पिता

इमरती से भरा दौना लिए

दफ्तर से घर लौटते थे।


2

भूकंप के बाद कविता


भूकंप के बाद

एक और भूकंप आता है हमारे अंदर।


विश्वास की चट्‌टानें

बदलती है अपना स्थान

खिसकने लगती है विचारों की आंतरिक प्लेटें

मन के महासागर में उमड़ती है संवेदनाओं की सुनामी लहरें

तब होता है जन्म कविता का।


भाषा, शिल्प और शैली का

नही होता कोई विवाद

मात्राओं की संख्या

और शब्दों के वजन का कोई मापदंड

नहीं बनता बाधक

विधा के अस्तित्व पर नहीं होता कोई प्रश्नचिन्ह्‌

चिन्ता नहीं होती सृजन के स्वीकार की।


अनपढ़ किसान हो या गरीब मछुआरा

या फिर चमकती दुनिया का दैदीप्य सितारा

रचने लगते हैं कविता।


कविता ही है जो

मलबे पर खिलाती है फूल

बिछुड़ गये बच्चों के चेहरों पर

लौटाती है मुस्कान

बिखर जाती है नई बस्ती की हवाओं मे

सिकते हुए अन्न की खुशबू।


अंत के बाद

अंकुरण की घोषणा करतीं

पुस्तकों में नहीं

जीवन में बसती है कविताएँ।


3

क्विज


प्रतियोगिता में होने के लिये सफल

इतना मालूम होना चाहिए

कि पूरब से निकलकर सूरज डूब जाता है पश्चिम में,

किस देश की धरती पर पडती है पहली किरणें

और कहाँ होता है सबसे बाद में अंधकार।


ठीक-ठीक क्रम देना है आपको

कि कौन किसके बाद आया इस संसार में,

गाँधी, मार्क्स, लेनिन और बुद्ध को खडा करना है

एक के पीछे एक


कतई आग्रह नहीं है यहाँ कि पढा जाए इनके दर्शन को

बडी सुविधा है कि जीवनी की पुस्तकों में

सबसे पहले छपी होतीं हैं जन्म तिथियाँ।


किसने लगाया था निशाना मछली की आँख में

तेल से भरी हुई परात में देखते हुए,

पत्नी को जुए में लगाने वाले किस युवराज को कहा गया था धर्मराज,


जरूरी तो नहीं कि सीखें आप भी धनुर्विद्या

और जीत कर लाएँ कोई पदक खेल महोत्सव से,

कोई ठेका नही ले रखा प्रायोजकों ने

कि सिखाते फिरें सत्य बोलने का सबक,


दौड-दौडकर बनाई जा सकती है भले ही सेहत

लेकिन पलट सकती है जीती हुई बाजी

विस्मृत है यदि

दुनिया के सबसे तेज धावक का नाम

आपकी स्मृति से।

पुस्तकों के महासागर में गोता लगाकर

मोती निकालने की आवश्यकता नहीं है अब,

मालिक हो सकते हैं आप खजाने के

यदि बता सकेँ पुस्तक के लेखक का सही नाम,


रवीन्द्रनाथ नोबेल पुरस्कार से जाने जाते हैं,

प्रेमचंद कथाकार हैं जो हो गए अमर 'गोदान ' लिखकर

'गोदान' के मर्म को समझने का कष्ट नहीं है अब,

पुरस्कार के चेक का वजन काफी अधिक होता है

उपन्यास की आत्मा के वजन से।


घोषित हो सकते हैं विजेता

बगैर लडे कोई युद्ध,

अगर बता सके विश्वयुद्ध के खलनायकों के नाम।


किसने जाना भाप की ताकत को सबसे पहले,

किसने बनाया टेलीफोन,

किसने किया आविष्कार पहिये का

किसने देखा गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त जमीन पर गिरते सेब में

कौन भटकता रहा समुद्र की छाती पर नई दुनिया की खोज में,


किसको मिला सम्मान और कहलाया राष्ट्ररत्न

कौन बना करोडपति अपनी मेहनत से,

कोई जरूरी तो नहीं कि हम भी करें कोशिश

कर दिखाएँ कोई करिश्मा

व्यर्थ की खोज में

यूँहीं गँवा दें यह प्यारा जीवन।


जरा से खर्च में खरीदी जा सकती है कुंजी

जो करवा सकती है दुनिया भर की सैर

तोडकर लाए जा सकते हैं

आसमान के चमकते सितारे

जीतने के लिए जान लें सिर्फ इतना कि

सुनहरी चिडिया के आखेट के लिए

कौन से शिकारी और चिडिमार कब-कब आए,

क्या करेंगे जानकर कि चिडिया के आकाश में

कैसी सुहानी हवा बहा करती थी उन दिनों।


जरूरी नही कि आप भी बहाएँ पसीना

और बनाएँ कोई यादगार,

पुरस्कार पाने के लिये रखें याद केवल इतना

दुनिया के अजूबे की रचना के बाद

किस शहंशाह ने कटवा दिये थे हाथ कुशल कारीगरों के ।


कब किया गया विध्वंस आस्था की इमारतों का ,

किसने गिराई प्रलय की बारूद धरती पर

किस तारीख को जहरीली हो गई

घनी गरीब बस्तियों की हवा,

इतना ही काफी है आपकी याददाश्त के लिए

मत करिए चिन्ता

कि किस घडी में समाप्त होगा

प्रकृति और मानवता से यह खिलवाड ?


छोटी सी पगडंडी जाती है इस चमकदार नए बाजार में,

वस्तुओं की तरह जानकारियों का हो रहा है लेन-देन

ज्ञान का लेबल लगे खाली कनस्तरों के इस व्यापार में

बेच रहें हैं चतुर सौदागर अपना माल

पूरे सलीके के साथ,


एक भीड है बाजार में आँखों पर पट्‌टी बाँधे

जो ठगे जाने के बावजूद बजा रही है तालियाँ

बार-बार लगाताऱ !

बृजेश कानूनगो

503, गोयल रिजेंसी, कनाड़िया रोड़, इन्दौर-18
मो. नं. 09893944294

(चित्र: गूगल सच से साभार)

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