मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

मस्त लेखक के हृदय की सरलता: कबतरों से भी खतरा है


एन उन्नी


जन्म: 23-04-1943, मवेली करा, एल्लपी, केरला में

शिक्षा: एम ए (अंग्रेजी)

प्रकाशन: मलयालम में 40 कहानियाँ व दो उपन्यास और हिन्दी में 30 कहानियाँ व 60 लघुकथाएँ प्रकाशित-प्रसारित। लघुकथाएँ विभिन्न संग्रहों में शामिल, लघुकथा संग्रह कबूतरों से भी खतरा है (2010)।

सम्मान: हिन्दीतर भाषी हिन्दी कथाकार के रूप में मध्य प्रदेश सहित्य परिषद से पुरुस्कृत-सम्मानित।

पता: 91, नीर नगर, ब्लू वाटर पार्क, बिचौली मर्दाना रोड़, इन्दौर 452016

मोबाइल: 98930 04848

मूलत: मलयाली भाषी एन उन्नी हमारे समय के एक महत्वपूर्ण लघुकथाकार हैं। वे समान रूप से मलयालम और हिन्दी में लिखते हैं। कई बार तो उनकी भाषा मूल हिन्दी भाषी लेखकों के लिए चुनौती की तरह उपस्थित हो जाती है। उन्नी की लघुकथाएँ हिन्दी के हाल के बहुत से तथाकथित लघुकथाकारों के लिये चुनौती है।

हाल ही में उन्नी का एक लघुकथा संग्रह कबूतरों से भी खतरा है प्रकाशित हुआ है। तत्सम में इस बार इसी संग्रह पर युवा कवि प्रदीप मिश्र की इस संग्रह पर टिप्प्णी के साथ कुछ लघुकथाएँ.....

-प्रदीप कांत

सिखा दिया तो तोता भी आदमी जैसी बात करता है। ठीक से नहीं सिखाया तो आदमी भी आदमी की तरह बात नहीं करते। (भावुक होना मना है। पृ.15)

लच्छू ने सोचा, डरकर भागने के लिए ही हैं पैर तो किस काम के...... जड़ जमाकर डटे रहना इससे बेहतर हैं। (उम्मीदों का कटहल पृ.17)

पिताजी ने बोझिल स्वर में कहा, बेटे जब प्रजा आजादी की तीव्र इच्छा से जाग उठती है तो बड़े से बड़ा तानाशाह भी घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। (कबूतरों से भी खतरा है पृ.29)

इस तरह के हजारों सूत्र वाक्यों से भरी पुस्तक " कबूतरों से भी खतरा है" हमारे हाथ में है। 136 पृष्ठों की इस पुस्तक में 59 लघुकथाएं संग्रहित हैं। इन लघुकथाओं के लेखक एन उन्नी मूलतः मलयालम भाषी हैं। उनकी लगभग आधी सदी की हिंदी रचना यात्रा की प्रतिनिधि रचनाओं से इस पुस्तक का जन्म हुआ है। लेखक के बारे में लघुकथा आंदोलन के प्रतिनिधि हस्ताक्षर और हिंदी कथा के प्रतिष्ठित कथाकार बलराम लिखते हैं कि - "एन उन्नी की लघुकथाएं ऐसी हैं कि बीसवीं सदी के श्रेष्ठ लेखकों की सूची बनानी पड़े तो एन उन्नी का नाम किसी भी कीमत पर रखूंगा। लघु कथा को एक विशिष्टता प्रेमचन्द्र ने सौंपी तो दूसरी राजेंद्र यादव ने, तीसरी चित्रा मुद् गल और चौथी सुदर्शन वशिष्ठ ने तो पांचवीं विष्णु नागर एवं चैतन्य त्रिवेदी ने और छठी एन.उन्नी, मुकेश वर्मा तथा मालचंद्र ने। हिंदी लघुकथा को भाषा और भाव की जो गरिमा और ऊंचाई एन.उन्नी ने सौंपी है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। " बलराम के इन दावों की पुष्टि करतीं कई लधुकथाएं इस संग्रह को न केवल पठनीय बनातीं हैं, बल्कि पाठ के बाद पाठक के अंदर एक जिम्मेदार नागरिक का सृजन भी करतीं हैं। इस संदर्भ में शीर्षक कथा-कबूतरों से भी खतरा है के साथ भीमसेन पटेल और अयोध्या, सर्कस, तबाही, फसल बयानवे, आजादी,लंकेश डाट काम, राम-राज्य, राहें समाजवाद की, गुलाम, खबरदार और गेहूँ आदि कथाओं को देखा जा सकता है। इन कथाओं मे हमारे समय को एक जागरूक नागरिक की तरह से देखते हुए जिस जीवन-दृष्टि का अर्जन लेखक करता है वह उर्जा से भरपूर है।

एकदम साफ वैचारिक समझ और समाज, वर्ग और मूल्यों के अस्तित्व से खूब परिचित एन उन्नी के गहन विश्लेषण के सार के रूप में ये लघुकथाएँ जन्म लेती हैं। पात्रों का चयन, संवाद और लेखकीय वक्तव्य का सठीक प्रयोग और किस्सागोई की कलात्मकता की रक्षा एन उन्नी के लघुकथाओं की विशेषता है जिसका उदाहरण ऊपर संकलित अंशों में देखा जा सकता है। वे आज की चुटकुलेनुमा, स्थूल व्यंग्य और करूणा की मसालेदार दाँचे से अलग अपनी संरचना तैयार करते हैं। वे दैनिक जीवन से एक सरल प्रतीक उठाते हैं और आम बोलचाल की भाषा में उसे कथा की पोषाक पहनाते हैं। जिसे पहनते ही रचना विवेक से भर जाती है और जटिल से जटिल पहलुओं का रेशा-रेशा उघाड़ कर रख देती है। पितृत्व कथा में जब एक पिता अपनी पुत्र से कहता है - तेरे पास रूपया नहीं है तो फिर रात भर कुत्ता क्यों भौंका? तो इस छोटे से वाक्य में समाज का एक बहुत ही त्रासद पहलू उभर कर सामने आता है। जहाँ अपनी गरीबी की विवशता में एक पिता चुपचाप पढ़ा कसमसाता रहता है। और उसके बेटी के पास आनेवाले ग्राहकों को देख कर कुत्ते भौंकते रहते हैं। अंत में विवशता के प्रहार से पिता की संवेदना मर जाती है। इस तरह के सूत्र वाक्यों से भरी एन उन्नी की इन लघुकथाओं को पढ़ना आसान है लेकिन पढ़ने के बाद की मानसिक बेचैनी और दायित्वबोध पाठक को थोड़ा और जागरूक तथा मनुष्य बना देतीं हैं। रचनाकार की यह बड़ी सफलता है। सभी तरह के दांव-पेंच से दूर एवं बिना किसी नाम-दाम के लालच में पड़े, अपने रचना संसार में मस्त लेखक के हृदय की सरलता इन कहानियों से टपकती है। इस महत्वपूर्ण कथाकार की अगली रचना की प्यास जगाने में सफल यह पुस्तक हमारे समय की संग्रहणीय कृति है।


पुस्तक का नाम - कबतरों से भी खतरा है

लेखक एन उन्नी

प्रकाशक - मित्तल एण्ड सन्स, -32 आर्यानगर सोसायटी दिल्ली-92,

मूल्य - 200 रूपये


-प्रदीप मिश्र, 72ए, सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड, इन्दौर-09 मो: 0919425314126


समय

बचपन से ही पापाजी अपने बच्चों को कहानी सुनाया करते थे। बच्चे चाव से सुनते थे। बाद में गर्व से सुनने लगे थे। एक कहानीकार के रूप में पापाजी की सफलता में बच्चों का भी हाथ था, ऐसा पापाजी धन्यवाद स्वरूप महसूस करते थे।

अब बच्चे बड़े होकर नौकरी पेशा हो गये हैं। बड़े घर से रिता जोड़ लिया हैं। जिंदगी के बहुरंगी चकाचौंध में डुबकी लगा रहे हैं। किसी अन्जान ऊँचाईओं को छूने की फिराक में हमेशा परेशान रहते हैं।

पिताजी अब भी कहानी लिखते हैं। बच्चों को सुनाते हैं। उद्वेग से पूछते हैं

कैसी हैं ?

ठीक हैं !

सिर्फ ठीक ?

अच्छी हैं। कहकर बच्चे पापाजी के तरफ देखते हैं। पापाजी का उदासीन चेहरा देख कर बच्चे चिड़ जाते हैं, और असहिष्णुता से पूछते हैं -

अब क्या जान लोगे क्या ?............

शेर

बारबार समझाने पर भी काम नहीं करने वाले बच्चों के निकम्मेपन पर गुस्सैल मिश्राजी आखिरी चेतावनी स्वरूप बच्चों से चिल्लाकर कहा करते थे अब मैं दस तक गिनूंगा। इस बीच काम शुरू होना चाहिए। एक........ दो........

इस पर बेशर्त बच्चे अपना काम करते थे !

अब बच्चे बड़े हो गये हैं। परिदृश्य बदल गये हैं पर मिश्राजी में बदलाव नदारद हैं। अब भी मिश्राजी गुस्से में आकर आखिरी चेतावनी स्वरूप बच्चों पर चिल्लाते हैं अब में दस तक गिनूंगा! .. और बच्चों की तरफ देखते हैं तो बच्चे निर्विकार से पापाजी से आँख मिलाकर पूछते हैं फिर क्या करोगें ? .......

मिश्राजी चुप ! वे प्रश्न दोहराते हैं दस तक गिनने के बाद आप क्या करोगे?

यह सुनकर बाहर से आये छोटे बेटे को प्रश्न बहुत भाता है ! और अवज्ञा से पापाजी की तरफ देख कर कहते हैं ! और क्या करेंगे, आगे गिनेगें..... ग्यारह .... बारह ......तेरह..... और गिनते रहेंगे !

मिश्राजी दोनों बेटों के तरफ देखकर स्तब्ध रह जाते हैं|

गेहूँ

बांध के उद्घाटन के लिये अब सिर्फ तीन दिन ही बाकी है। रात दिन काम चल रहा है। मजदूरों को ऊचें आवाज में डाटते फटकारते ठेकेदार इधर से उधर एक बॉल की तरह लु़ रहा है। हमेशा स्कॉच की बदबु बहाने वाला आदमी

स्वागत समारोह के लिए आवश्यक वस्तुओं की तालिका में सिर्फ शराब की कई किस्मों के नाम देखकर लगा कि उद्घाटन मंत्री शराब की दुकान खोलने जा रहे है। फिर कई तरह के माँसका भी इंतजाम है।

उन्माद से भरे उस वातावरण में अशुभ सी सिर्फ एक ही बात है। एक बच्चे का रोना कांक्रीटींग हो रहे ट्रेंच के बाहर बैठकर जाने कब से वह रो रहा है।

मना कर सकूँ उससे पहले गुस्से से ट्रेंच के बाहर आये पिता ने बच्चे को बेरहमी से मारा, और सफाई के रूप में कहा उसको भुख लग रही है। साला हरामी राशन की दुकान में गेहूँ नहीं आया, उसको एक हजार बार समझा चुका हूँ।

क्यों गेहूँ नहीं मिल रहा है। यह मैनें नहीं पुछा क्योंकि मुझे यकीन है कि जिस दिन वह जान पायेगा, नालों में नदी की ओर बहने वाला पानी नहीं खून होगा।

लेकिन

स्थानीय अख़बार में चेतन को नौकरी मिलने से सबसे ज्यादा खुश तो मम्मी थी। बच्चे को कहीं बाहर गाँव जाने की जरूरत नहीं पड़ी। उपसंपादक होने से दफ़तर में बैठ कर काम करना है। तंख्वा भी अच्छी है।

बाल गंगाधर तिलक जैसे क्रांतिकारी देशभक्तों को याद करके अखबार की नौकरी एक आदर्श मानकर चेतन ने कार्य की शुरूआत की । अख़बार में ध्यान देने वाली बहुत सी बातें है। समाचार और विज्ञापन में एक संतुलन। अब विज्ञापनों की बा़ में समाचार लुप्त होते जा रहे है। पहले पॄनीय सामग्री इतनी अधिक थी कि अख़बार पॄने के लिए कम से कम दो तीन घण्टे लगते थे। अब पाँचदस मिनिटों में निपट जाती है। विज्ञापन की बा़ से आमदनी इतनी बड़ गई कि रोज नयेनये अख़बार निकलने लगे है। प्रचार के लिए उपहार ! बरिश के दिनों में छाता! । जाड़े के दिनों में जेकेट!। गर्मी के दिनों में फ्लास्क । समाचार के बदले आप कुछ भी लीजिए । बस! स्माचार मत मांगिये!....

पहले अख़बार टिकते नही थे । आत्माहूति करने की तैय्यारी करने के बाद ही अख़बार चालू करते थे। अब तो लखपति लोग रातों रात करोड़पति बनने के लिए ही अख़बार निकालते है। उन दिनों छपे हुए समाचारों के बदले कालापानी की सजा मिलती थी क्यों कि अख़बार वाले लोग क्रांतिकारी हुआ करते थे। वो लोगों के लिए लिखते थे। देश के लिए लिखते थे। अब लोग क्या हैं? देश क्या हैं? सिर्फ मुनाफा हैं! जुगाड़ है।

बीच बीच में आकड़ों का खेल चलता हैं। एक आकड़ा बताता है कि भारत में अब पच्चास फीसदी से ज्यादा भुखमरी हैं। मगर यह बात अखबारों से लगती नहीं है। अखबारों में तो पन्ने भरभर के दृश्य है, मादक सुन्दरियों के ! फिल्मी नोक छोकों के । यह सब पॄ पॄकर मनुष्यता मरती है। कविता मरती है। कहानी मरती है। इसके साथसाथ क्याक्या मरता है कोई सोच भी नहीं सकता।

यह सब बदलना हैं । अच्छा हुआ कि पुरानी अख़बारों का बंडल है। तुलनात्मक अध्ययन के लिए उठाकर देख सकता हूँ।

शहर में आजशीर्षक से छपी एक दैनिक कालम ने चेतन को आकर्षित किया । समय के साथ दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची इसका नग्न चित्र! उस समय की ॔शहर में आज॔ कॉलम में अंकित गतिविधियों में राष्ट्र है । राष्ट्रीय आन्दोलन है, राष्ट्र नेताओं के प्रवचन है। साहित्य को समर्पित कार्यक्रम है, कविगोष्ठि है। नाटक मंचन है। राष्ट्र निर्माण की रूप रेखाओं पर चर्चा है। मनुष्य सब एक होकर मनुष्यता के लिए लड़ने का संकल्प है।

वर्तमान के शहर में आज मनुष्य एक होने की बात नहीं करता। लोग मिलकर कोई भी कार्य नहीं करते । अग्रवाल समाज, गुप्ता समाज, मराठी समाज, ब्राम्हण समाज, कायस्त समाज ऐसे अलगअलग समाजों का कार्यक्रम! इन सभी समाजों का महिला समाज अलग से । इज्जददार लोगों का अलग समाज है जैसे कि लायण, लायणस, इन्नर व्हील, औटर व्हील!. . ..

चेतन ने सोचा बहुत हो गया । अब संपादक जी से बात करनी ही पड़ेगी । वर्तमान व्यवस्था से निजा़द पाना बहुत आवश्यक है।

प्रत्येक मुद्दों पर अतिविस्तिृत चर्चा हुई। भविष्य के लिए कार्य योजना तैयार करने पर विचार विमर्श के बाद संपादक ने चेतन को समझाया देखो चेतन! अख़बार में तुम्हारे लिए एक ही कॉलम उपयुक्त लगता है वो है संपादक के नाम चिट्ठी! उसके लिए तुमको ज्यादा कोई तैय्यारी करने की जरूरत भी नहीं हैं ज्यादा से ज्यादा शहरों के नाम रट कर रखना है। अपनी अख़बार के प्रति प्रशंसा लिखते रहना है! गुड़लक!

आश्चर्य चकित चेतन ने पूछा लेकिन सर ! ……

सख्त उत्तर मिला नो लेकिन प्लीस ! …..

छायाचित्र: प्रदीप कांत