शनिवार, 31 दिसंबर 2011

कहने को ही साल नया है

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ तत्सम में इस बार आपनी ही एक ग़ज़ल दे रहा रहा हूँ|




कहाँ हमारा हाल नया है

कहने को ही साल नया है

कहता है हर बेचने वाला
दाम पुराना माल नया है

बड़े हुए हैं छेद नाव में
माझी कहता पाल नया है

इन्तज़ार है रोटी का बस
हाथ हमारे थाल नया है

लोग बेसुरे समझाते हैं
नवयुग का सुर-ताल नया है

नहीं सहेगा मार दुबारा
गाँधी जी का गाल नया है


- प्रदीप कान्त

7 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Sundar rachana!
Naya saal bahut mubarak ho!

brajesh kanungo ने कहा…

बहुत सार्थक गजल . बधाई.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

फिर भी नए साल की शुभकामनाएं।
*
गुलमोहर में मैंने भी कुछ इस तरह के भाव व्‍यक्‍त किए हैं। देखें।

बलराम अग्रवाल ने कहा…

पूरी ग़ज़ल आम आदमी की हताशा को प्रकट करती है। लेकिन,
'नहीं सहेगा मार दुबारा
गाँधी जी का गाल नया है'
कहकर आपने माना कि कुछ 'नया' है। इस सकारात्मकता को नमन करते हुए--
बीत गया वो जैसा भी था
बेशक सर, ये साल नया है।
बधाई!

अजेय ने कहा…

sahee kahaa, fir bhee mubaaraq......

Arun Aditya ने कहा…

sahi kaha hai...

Arun Aditya ने कहा…

sahi kaha hai
sahi kaha hai...