शनिवार, 7 नवंबर 2009

डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाएँ

जन्म : 30 अप्रैल 1954, अबोहर (जिला: फिरोज़पुर), पंजाब।
शिक्षा : एम.बी.बी.एस., एम.डी. (कम्युनिटी मैडीसन), एम.. (समाज विज्ञान पंजाबी), एम.एस-सी. (एप्लाइड साइकोलॉजी)

प्रकाशित पुस्तकें मौलिक : ‘बेड़ियाँ’, ‘इक्को ही सवाल’(लघुकथा संग्रह, पंजाबी में), तथा विभिन्न विधाओं से संबंधित 33 और पुस्तकें।
संपादित : 27 लघुकथा संग्रह (पंजाबी हिंदी में) तथा 10 अन्य पुस्तकें।
संपादन : पंजाबी त्रैमासिकमिन्नीका वर्ष 1988 से तथा पत्रिकाचिंतकका वर्ष 2000 से निरंतर संपादन।
संप्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, मैडीकल कॉलेज, अमृतसर।
संपर्क : 97, गुरु नानक एवेन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर (पंजाब)-143004
दूरभाष : 0183-2421006 मोबाइलः 09815808506
ईमेलः
-->drdeeptiss@yahoo.co.in ____________________________________________________________________

लघुकथा के सशक्त हस्ताक्षर बलराम अग्रवाल के ब्लॉग जनगाथा पर हिन्दी पंजाबी लघुकथा के हस्ताक्षर डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की ये लघुकथाएँ पढ़ने को मिली। पढ़ कर लगा कि ये तो तत्सम के पाठकों को भी पढ़वानी चाहिये। डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाओं में संवेदनाओं की गहनता बहुत ही शिद्धत के साथ महसूसी जा सकती हैं। बलराम अग्रवाल के शब्दों मेंपंजाब के श्याम सुन्दर अग्रवाल डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति, दोनों ही कथाकारों की लघुकथाओं सेलघुकथा कहने की ( कि लिखने की) कलाको जाना जा सकता है।

आस्था मजहब, मानव मन की एक बेहद जटिल संवेदना है। तत्सम में इस बार इसी की जद्दोजहद में उलझी डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाएँ...
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दूसरा
किनारा
काफिला चला जा रहा था। शाम के वक्त एक जगह पर आराम करना था और भूख भी महसूस हो रही थी। एक जगह दो ढाबे दिखाई दिए। एक पर लिखा था–‘हिंदु ढाबा’ और दूसरे पर ‘मुस्लिम ढाबा’। दोनों ढाबों में से नौकर बाहर निकल कर आवाजें दे रहे थे। काफिले के लोग बँट गए। अंत में एक शख्स रह गया, जो कभी इस ओर, कभी उस ओर झांक रहा था। दोनों ओर के एक-एक आदमी ने, जो पीछे रह गए थे, पूछा, “किधर जाना है? हिंदु है या मुसलमान? क्या देख रहा है, रोटी नहीं खानी?”
वह हाथ मारता हुआ ऐं…ऐं…अं…आं करता हुआ वहीं खड़ा रहा। जैसे उसे कुछ समझ में न आया हो और पूछ रहा हो, ‘रोटी, हिंदु, मुसलमान।’
दोनों ओर के लोगों ने सोचा, वह कोई पागल है और उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए।
कुछ देर बाद दोनों ओर से एक-एक थाली रोटी की आई और उसके सामने रख दी गईं। वह हलका-सा मुस्काया। फिर दोनों थालियों में से रोटियां उठाकर अपने हाथ पर रखीं और दोनों कटोरियों में से सब्जी रोटियों पर उँडेल ली। फिर सड़क के दूसरे किनारे जाकर मुंह घुमाकर खाने लगा।
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मूर्ति

वह बाज़ार से गुजर रहा था। एक फुटपाथ पर पड़ी मूर्तियाँ देख कर वह रुक गया।
फुटपाथ पर पड़ी खूबसूरत मूर्तियाँ! बढ़िया तराशी हुईं। रंगो के सुमेल में मूर्तिकला का अनुपम नमूना थीं वे!
वह मूर्तिकला का कद्रदान था। उसने सोचा कि एक मूर्ति ले जाए।
उसे गौर से मूर्तियाँ देखता पाकर मूर्तिवाले ने कहा, “ ले जाओ, साहब, भगवान कृष्ण की मूर्ति है।”
“भगवान कृष्ण?” उसके मुख से यह एक प्रश्न की तरह निकला।
“हाँ साहब, भगवान कृष्ण! आप तो हिंदू हैं, आप तो जानते ही होंगे।”
वह खड़ा-खड़ा सोचने लगा, यह मूर्ति तो आदमी को हिंदू बनाती है।
“क्या सोच रहे हैं, साहब? यह मूर्ति तो हर हिंदू के घर होती है, ज्यादा महँगी नहीं है।” मूर्तिवाला बोला।
“नहीं चाहिए।” कहकर वह वहाँ से चल दिया।
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हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
“साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।”
“तुम इस बारे में कुछ कहना चाहते हो?” मजिस्ट्रेट ने पूछा।
“मैने क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी देकर बैठा था। ‘हीर’ के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नज़र नहीं आई।”
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6 टिप्‍पणियां:

भगीरथ ने कहा…

ये लघुकथाएं पहले पढ चुका हूं लेखक की दृष्टि साफ़ और तेज है
निश्चित ही रचनाएं अच्छी है

kamal ने कहा…

badia, kam sabdoun main badi gahari baatein kah dee hain kathakaar ne.....aaj yahi tau chal raha hai yeh falan ka esleye sayad esake mayane alag...hum bhul jaate hain kee ek bhuke-pet ke liye roti,roti hoti hai wah use kisi vishesh chasme se naheen dekhta yaa dekh sakta yeh tau hum bhare pet wale.......... fir chahe yeh houn ya woh
kamal,indore

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अच्छी कहानियां हैं।

अजेय ने कहा…

सुन्दर कथाएं. दूसरी, तीसरी ज़्यादा अच्छी हैं.

vijay gaur/विजय गौड़ ने कहा…

आपका चुनाव पसंद आया प्रदीप भाई। रचनाकार को बधाई। रचनाकार को और पढ़ने एवं जानने की भूख बढ़ा दी है इस पोस्ट ने।

Kumar Ajay ने कहा…

sarthak lekhan ke liye badhaai...