शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

भाषा के 'क्रियोलीकरण' के विरोध में

यह एक बहुत बड़ी विडम्बना है सितम्बर में हमारी ही अपनी भाषा हिन्दी के लिये हिन्दी पखवाड़ा, हिन्दी मास आदि आदि आयोजित किये जाते हैं और इस तरह समारोह मना कर इतिश्री कर ली जाती है। जबकि हमारे हिन्दी अखबार ही सुनियोजित रूप से इसे बिगाड़ते हुऐ अपनी ही भाषा को ख़त्म करने में लगे हुऐ हैं। इसी के विरोध में इस साल हिन्दी दिवस पर इन्दौर में हिन्दी अखबारों की एक-एक प्रति जुटाकर उनकी होली जलाई गई। तत्सम में इस बार भाषा के 'क्रियोलीकरण' के विरोध में अनिल त्रिवेदी व तपन भट्टाचार्य द्वारा जारी वक्तव्य......

- प्रदीप कांत

भाषा के 'क्रियोलीकरण' के विरोध में वक्तव्य

- अनिल त्रिवेदी

आज हिन्दी दिवस के अवसर पर हम इंदौर नगर के बुद्धिजीवी गाँधी-प्रतिमा के समक्ष देश भर के लगभग सभी हिन्दी अखबारों की एक-एक प्रति जुटाकर उनकी होली जलाने के लिए एकत्र हुए हैं। आज-हम-सब जानते हैं कि जब निवेदन के रूप में किये जाते रहे संवादात्मक-प्रतिरोध असफल हो जाते हैं, तब ही विकल्प के रूप में एकमात्र यही रास्ता बचता है, जो हमें गाँधीजी से विरासत में मिला है।


आज हिन्दी के अखबारों की प्रतियों को जलाकर प्रतीकात्मक रूप से हम भारतीय समाचार-पत्रों, उनके संचालकों, पत्रकारों, सम्पादकों के साथ ही साथ पूरे देश के हिन्दी-भाषा-भाषियों को इस बात की स्मृति दिलाना चाहते हैं, कि आज हम हिन्दी का जो विकास देख रहे हैं उस हिन्दी को बनाने और बढ़ाने में सबसे बड़ी और ऐतिहासिक भूमिका आजादी की लड़ाई में हथियार की तरह काम करने वाले हिन्दी के समाचार-पत्रों ने ही निभायी थी- लेकिन, दुर्भाग्यवश वही समाचार-पत्र जगत आज विकास के इतने ऊँचे सोपान पर चढ़ चुकी हिन्दी को अंग्रेजी के नव साम्राज्यवाद को नष्ट करने पर उतारू हो चुका है। नतीजतन, स्थिति यह है कि पिछली एक शताब्दी में ब्रिटिश साम्राज्य ने हिन्दी को जितने क्षति नहीं पहुँचायी थी, आज उससे दस गुनी क्षति मात्र दस साल में हिन्दी को हिन्दी के समाचार पत्रों ने पहुँचा दी है।

यहाँ हम यह ऐतिहासिक तथा भाषा-वैज्ञानिक तथ्य याद दिलाना चाहते हैं कि दुनिया भर में भाषाओं के विकास का मुख्य आधार भाषा के बोले गये नहीं, बल्कि लिखित-रूप के कारण होता है। लिखित रूप ही किसी भाषा को अक्षुण्ण रखता है। लेकिन, आज हिन्दी को सबसे बड़ा धोखा उसके लिखित-छपित शब्द की जगह से ही मिल रहा है। चीन की मंदारिन भाषा के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अधिक बोली जाने वाली हिन्दी भाषा को बहत सूक्ष्म और धूर्तयुक्ति से नष्ट किया जा रहा है, जिसे कहा जाता है, भाषा का 'क्रियोलीकरण'। आज का हमारा यह प्रतीकात्मक-प्रतिरोध हिन्दी के अखबारों द्वारा चलाये जा रहे उसी खतरनाक 'क्रिओलीकरण' की प्रक्रिया के विरूद्ध है।

'क्रियोलीकरण' एक ऐसी युक्ति है, जिसके जरिये धीरे-धीरे खामोशी से भाषा का ऐसे खत्म किया जाता है कि उसके बोलने वाले को पता ही नहीं लगता है कि यह सामान्य और सहज प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुनियोजित षड्यंत्र है। जिसके पीछे अंग्रेजी भाषा का साम्राज्यवादी एजेण्डा है। 'क्रियोलीकरण' की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुनियोजित षड्यंत्र है। जिसके पीछे अंग्रेजी भाषा का साम्राज्यवादी एजेण्डा है।

'क्रियोलीकरण' की प्रक्रिया का पहला चरण होता है, जिसे वे कहते हैं स्मूथ डिसलोकेशन आफ वक्युब्लरि अर्थात् मूल भाषा के शब्दों का धीरे-धीरे अंग्रेजी के शब्दों से विस्थापन। इस अवस्था को अखबारों अब अपने सर्वग्रासी सीमा तक पहुँचा दी है।

उदाहरण के लिए यह क्रिओलीकरण ठीक उस समय किया जा रहा है, जब हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सीमित भाषाओं की सूची में शामिल करने के प्रयास बहुत तेज हो गये हैं। हिन्दी के दैनंदिन शब्दों को बहुत तेजी से हटाकर उनके स्थान पर अंग्रेजी के शब्द लाये जा रहे हैं। मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेण्ट्स/ माता-पिता की जगह पेरेण्ट्स/ अध्यापक की जगह टीचर्स/ विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी/ परीक्षा की जगह एक्झाम/ अवसर की जगह अपार्चुनिटी/ प्रवेश की जगह इण्ट्रेन्स/ संस्थान की जगह इंस्टीट्यूशन/ चौराहे की जगह स्क्वायर रविवार-सोमवार की जगह सण्डे-मण्डे/ भारत की जगह इण्डिया। इसके साथ ही साथ पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिन्दी की बजाय अंग्रेजी के छपना/ जैसे आऊट ऑफ रीच, बियाण्ड एप्रोच, मॉरली लोडेड कमिंग जनरेशन/ डिसीजन मेकिंग/ रिजल्ट ओरियण्टेड प्रोग्राम/

वे कहते हैं, धीरे-धीरे स्थिति यह कर दो कि अंग्रेजी के शब्द ७० प्रतिशत तथा मूल भाषा के शब्द मात्र ३० प्रतिशत रह जायें। और इसके चलते हिन्दी का जो रूप बन रहा है, उसका एक स्थानीय अखबार में छपी खबर से दे रहे हैं।

इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गव्हमेण्ट स्कूल लेवल पर इण्ट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एज्युकेशन आफिसर्स की एक अर्जेंट मीटिंग ली, जिसकी डिटेक्ट रिपोर्ट प्रिंसिपल सेके्रटरी जारी करेंगे।

इसके बाद वे दूसरा और अंतिम चरण बताते हैं : फाइनल असालट ऑन लैंग्विज। अर्थात् भाषा के पूरी तरह खात्मे के लिए 'अंतिम हल्ला'। और, वह अंतिम प्रहार यह कि उसे भाषा की मूल लिपि को बदल कर रोमन कर दो। भाषा समाप्त। और, कहने की जरूरत नहीं कि बहुत जल्दी अखबारों को साम्राज्यवादी सलाहकार की फौज समझाने वाली है। कि हिन्दी को देवनागरी के बजाय रोमन में छापना शुरू कर दीजिये। बीसवीं शताब्दी में सारी अफ्रीकी भाषाओं को अंग्रेजी क सम्राज्यवादी आयोजना के तरह इसी तरह खत्म किया गया और अब बारी भारतीय भाषाओं की है। इसलिए, 'हिन्दी हिंग्लिश', 'बांग्ला', 'बांग्लिश', 'तमिल', 'तमिलिश' की जा रही है। हम यह प्रतिरोध हिन्दी के साथ ही साथ तमाम भारतीय भाषाओं के 'क्रिओलीकरण' के विरूद्ध है, जिसमें, गुजराती-मराठी, कन्नड़, उड़िया, असममिया, सभी भाषाएँ शामिल हैं।

बहुत मुमकिन है कि देश भर के हिन्दी भाषा-भाषियों के भीतर अपनी भाषा का बचाने की एक सामूहिक चेतना के जागृत होने के खतरे का अनुमान लगा कर अखबार-जगत हिन्दी के 'क्रियोलीकरण' की प्रक्रिया एकदम तेज कर दें। क्योंकि, जब ५ जुलाई १९२८ को यंग इंडिया में जब गाँधी ने ये लिखा था कि अंग्रेजी उपनिवेश की भाषा है और इसके हम हराकर रेंगे - तब गोरी हुकुमत अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार पर तबके छह हजार पाउण्ड खर्च करती थी- वह खर्च की राशि १९३८ तक ३,८६,००० पाउण्ड कर दी गयी थी। बहरहाल, अंग्रेजी का जो 'नया साम्राज्यवाद अमेरिका और इंग्लैण्ड की रणनीति के चलते बढ़ रहा है - उसमें हमारे यहाँ हाथ बँटाने के लिए देश का प्रिण्ट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया एकजुट हो गये हैं- हम उनकी इस खतरनाक मुहिम के विरोध का संकल्प लेते हैं।

अनिल त्रिवेदी,

३०४/२ए भोलाराम उस्ताद मार्ग,

ग्राम-पीपल्याराव, ए.बी. रोड,

इन्दौर-१७

अंग्रेजी के साम्राज्यवाद का हथियार 'क्रियोलीकरण'

-तपन भट्टाचार्य

आजादी के बाद सत्ता में आते ही पहली भारतीय जनतांत्रिक सत्ता ने अंग्रेजी से लड़ाई लड़ी, इसी का नतीजा यह रहा कि 'उदारीकरण' के साथ अंग्रेजी अब की बार बहुत सुनियोजित और सुरक्षित ढंग से अपना 'नया साम्राज्यवाद' खड़ा कर रही है, जिसमें हमारा मीडिया और सत्ता स्वयं भी शामिल है। याद रखिए, लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी को भाषा से भाषा के स्तर पर चलाने की नीति बनायी, बाद में अंग्रेजी को शिक्षा समस्या बनाकर चलाया, लेकिन नहीं चल पायी। अलबत्ता, इससे उनको एक कटु अनुभव का यह सामना करना पड़ा कि एक मजबूत व्याकरण के आधारवाली मातृभाषा के चलते भारतीयों ने एक किताबी इंग्लिश सीखी और अव्वल दर्जे के आइ.सी.एस. हो गये; लेकिन अंग्रेजी भाषा को रोजमर्रा के जीवन में दूर तक प्रवेश नहीं दिया। बल्कि, बाहर ही रह गयी।

इसलिए, अब नयी नीति तय की गयी है, जिसमें उन्होंने भाषा-संस्कृति का गठबन्धन करते हुए कहा कि अंग्रेजी को 'स्ट्रक्चरली' पढ़ाया जाये, व्याकरण के जरिये नहीं। इसके लिए उन्होंने बच्चों के लिये कॉमिक्स चलाये, कार्टून फिल्में थोक के भाव में भारत के टेलिविजन चैनलों पर चलायी-और, एक मिथ्या 'यूथ-कल्चर' बनाया, जिनका कुल मकसद अंग्रेजी भाषा तथा जीवन शैली को उन्माद की तरह उनसे जोड़ दें- जिसमें भाषा, भूषा और भोजन के स्तर पर वे उनके नये उपनिवेश के शिकंजे में आ जाएँ और कहना न होगा कि, आज के तमाम महाविद्यालयों में अध्ययन कर रही पीढ़ी को उन्होंने 'माडर्न' (?) बना दिया है, जबकि वे 'माडर्न' नहीं हुए, सिर्फ परम्परच्युत हुए हैं। एक 'सामूहिम स्मृति' का शिकार हैं वे और अपनी-अपनी मातृभाषा को न केवल हेय समझते हैं, बल्कि उसे नष्ट करने के अभियान के जत्थों में बदल गये हैं। आज के तमाम हिन्दी अखबार 'यूथ-प्लस' या 'यूथ फोरम' के नाम पर चार-चार चमकीले और चिकने पन्ने छाप रहे हैं - जिसमें एक दो पृष्ठ अंग्रेजी में है और बाकी के दो पृष्ठ हिंग्लिश में, जिसमें, 'लाइफ स्टाइल के फण्डे` सिखाये जा रहे हैं। हमें इसके साथ ही एफ.एम. रेडियो की भूमिका का भी विरोध करते हैं, जो केवल 'क्रियोलीकृत' हिन्दी बनाम हिंग्लिश में ही अपना प्रसारण करते हैं और पूरी की परी युवा पीढ़ी से उसकी भाषा छीन रहे हैं।

हिन्दी के अखबारों की यह भूमिका अंग्रेजी तथा उसके जरिए सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की भारतीय समाज में स्थापना की है। हम इस स्तर पर भी भारतीय समाचार-पत्रों की दृष्टि का विरोध करते हैं कि वे अपने इस एजेण्डे को अविलम्ब रोकें।

तपन भट्टाचार्य

३०१, सुशीला कॉम्प्लेक्स,

१३०, देवी अहिल्या मार्ग,

इन्दौर-३

6 टिप्‍पणियां:

परेश टोकेकर 'कबीरा' ने कहा…

भाषा के समागम से उर्दू-हिन्दी जैसी सुन्दर भाषाओं का जन्म हुआ लेकिन क्रियोलीकरण की प्रक्रिया से विश्व की वर्चस्ववादी भाषा ने अन्य अनेको भाषाओं को निगल लिया हैं।
क्रियोलीकरण दो भाषाओं या संस्कृतियों का ऐतिहासिक समागम नहीं है जैसा की अमूमन होता आया है इसके विपरीत क्रियोलीकरण एक सोची-समझी रणनीति के तहत साम्राज्यवाद को मजबूती प्रदान करने के लिये थोपी गयी बाजारवादी अवधारणा है।
अनिल त्रिवेदी व तपन भट्टाचार्य जी को साधुवाद जिन्होंने इतने सारगर्भीत लेख क्रियोलीकरण जैसे विषय पर लिखे।
अगर हमें अपनी भाषा-विचार-आजादी को बचाना है तो सांकेतिक विरोध के साथ-साथ एक सशक्त समांतार मीडिया तैयार करने की ईमानदार कोशिश भी करना होगी। कई छोटे मोटे प्रयास जारी है लेकिन संगठीत होकर इस 'फाइनल असाल्ट' की जोरदार खिलाफत किया जाना आज की सबसे बडी आवश्यकता है।

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

bahut sundar bhai pradeep ji

बलराम अग्रवाल ने कहा…

इसी विषय पर प्रभु जोशी का भी अत्यन्त उत्तेजक लेख मैंने पढ़ा है। देखना यह है कि रोज़गार से जोड़ दिये गये क्रियोलीकरण को आज का युवा नकारता कैसे है।

KK Yadava ने कहा…

बड़ी विचारोत्तेजक बात कही....साधुवाद.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

इस ऐतिहासिक घटना की जितनी तारीफ़ की जाए कम है...कब तक हिंदी अंग्रेजी की बंदी बन कर रहेगी...???

नीरज

भगीरथ ने कहा…

भूमंडलीकरण के दौर में पूरे विश्व में एक ही जीवन
पद्धति लागू हो रही है विविधता को समाप्त किया जा
रहा है भाषाएं प्रतिदिन समाप्त हो रही है विचारणीय यह कि साम्रज्यवाद के मार्च को कैसे रोका जाय इस के विरोध में खडी वामपंथी ताकतें विश्व स्तर पर संगठित नहीं है। वाम्पन्थियों को इस चुनौती का मुकाबला तीसरा इन्टरनेशनल बना कर करनी चाहिये राष्ट्रीय स्तर भी साझे मन्च की जरूरत है