मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

प्रदीप जिलवाने की प्रेम कविताएँ


प्रदीप जिलवाने


जन्म : 01 जुलाई 1978, खरगोन (म.प्र.) में।
शिक्षा :एम०ए० (हिन्दी साहित्य), पी०जी०डी०सी०ए०।
फिलहाल म०प्र० ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण में नियुक्‍त।

प्रकाशन : आकार, परिकथा, बया, वागर्थ, समकालीन भारतीय साहित्य, प्रगतिशील वसुधा, कथादेश, समावर्तन, कल के लिए, मधुमति इत्यादि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। स्थानीय पत्रों में आलेख प्रकाशित।

सम्पर्क: 112/26, पहाड़सिंगपुरा, मारू मंदिर के पास, खरगोन 451 001 (म.प्र.)
फोन : +91 97559 80001

इमेल: jilwane.pradeep@gmail.com

हाल ही में हिन्दी कविता में एक नया नाम सम्मिलित हुआ है - युवा कवि प्रदीप जिलवाने का। कविता के प्रति सामान्यत: युवा पीढ़ी में विरक्ति के इस दौर में प्रदीप की कविताओं को पढ़ कर आश्वस्ति होती है कि कविता नई पीढ़ी में भी बची रहेगी। हालांकि पिछ्ले दिनो उअंकी नींद और शून्य शीर्षक से खासी चर्चित रही हैं किंतु तत्सम में इस बार उनकी प्रेम कविताएँ ....

- प्रदीप कांत

1

भाषा

प्रेम ही

प्रेम की भाषा।


प्रेम ही

प्रेम की अभिलाषा।


प्रेम ही

प्रेम ही प्रत्याशा।


प्रेम ही

प्रेम ही परिभाषा।

00


2

गणित

प्रेम का गणित

कुछ ऐसा


उलझ गया

तो सुलझ गया।


जो सुलझाने बैठा

उलझ गया।

00


3

राजनीति

राजनीति में प्रेम

एक कुटनीति

मगर

प्रेम में राजनीति

अनीति

सिर्फ अनीति।

00


4

इतिहास

इतिहास की आँख में

हमेशा किरकिरीसा

चुभता रहा है

प्रेम।

फिर भी इतिहास में

दाखिल होता रहा है प्रेम।

00


5

दर्शन

प्रेम

जहाँ से

शुरू होता है

दुनिया भी शुरू होती है

या यूँ भी कह लें

कि

जहाँ प्रेम खत्म होता है

दुनिया भी हो जाती है खत्म।

00


6

अर्थशास्त्र

कल तक

तो नहीं था


आज

जरूर है

प्रेम में अर्थशास्त्र

और

यही मेरी चिंता

उनका दुःख है।

00


7

मनोविज्ञान

प्रेम

किया

तो क्या किया?


प्रेम

नहीं किया

तो क्या किया?

00


8

भूगोल

प्रेम के भवसागर से

उतरा वही पार

देह के भूगोल से

जो रहा निरंकार।

00


9

पर्यावरण

न रंग है

न गंध है

न मादकता

प्रकृत अलान्कारुपकरण नहीं।


चलो

यहाँ से चले

प्रेम के लिए

यह अनुकूल पर्यावरण नहीं।

00

9 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Sabhi rachnayen badee hee anoothee hain!

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

भाई प्रदीप जी आपके ब्लॉग पार अद्भुत प्रेम कविताएं पढ़ने को मिलीं आपको और जिलावने जी को बधाई |

dharmendra ने कहा…

छोटी-छोटी आकर्षक कविताएं

varsha ने कहा…

prem ka darshan aur bhoogol badhiya hai.

भगीरथ ने कहा…

chhoti magar gahari kavitaye

भगीरथ ने कहा…

chhoti magar gahari kavitaye

सुभाष नीरव ने कहा…

भाई प्रदीप कांत जी, प्रदीप जिलवाने जी की प्रेम कविताएं पढ़वाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। प्रेम पर बहुत ही जीवन्त कविताएं लगीं। आपको और कवि प्रदीप जिलवाने जी को बधाई !

batkahi ने कहा…

prem ke itne vividh aayam hain in kavitaon men ki ek bar ko apne saare kiye par shanka hone lagti hai--kya sachmuch apne samay men hamne thoda dekha aur jyada chhod diya?...ap pachhtaaye hot ka ????

yadvendra

ketaki ने कहा…

pradeep jilwane g ko adbhut anuthi aur anmol prem kavitao k liye badhai
sath hi pradeep kant g ko bhi
jinke madhyum se prem ki
bhasha,
ganit,
rajniti,
itihas,
darshan,
arthshastra,
manovigyan aur
bhugol ka
hame gyan ho paya....