बुधवार, 6 मार्च 2013

नदी सूख गई और सारा गांव पुल से निकल रहा है - रविन्द्र स्वपनिल प्रजापति की कुछ कविताएँ




नदी सूख गई और सारा गांव पुल से निकल रहा है – यह हमारे समय की एक भयानक पंक्ति है जिसे रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति की कविता दर्ज़ करती है। यह पंक्ति  बिना किसी धुंधलके के हमारे समाज का भयावाह वर्तमान दिखाती है जिसमें लोगों की संवेदनाएँ ग़ायब होती जा रही है और निहीत स्वार्थों के पुल से लोग आपस में जुड़े हैं।

ये कविताएँ बिल्कुल प्रचलित और साधारण से दिखते बिम्बों जैसे नदी, पहाड़, पुल, पक्षी, पेड, बिजली, ट्रेन आदि को उपयोग करती हुई बात करती हैं और अपने गहन अर्थ खोलती हैं। ट्रेन चल रही है में एक दृष्य कविता बन जाता है। शरीर के माध्यम से वो महानगरीय आपाधापी कविता के रूप में सामने आती है जिसके हम सब महानगरीय लोग शिकार हैं। हमारे समय की जटिलता और समाज में आ रहे जटिल परिवर्तनों को ये कविताएँ बिल्कुल सहज भाषा में खोलती है।

तत्सम में इस बार रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति की कुछ कविताएँ

-          प्रदीप कांत
1
मेरे गांव की नदी पर पुल
मैं एक पहाड़ बना रहा
तुम एक गांव बने रहे
हम इस तरह गांव और शहर के दो दोस्त हुए
वक्त ने हमारे बीच से गुजर जाना मंजूर किया
वह नदी बना और हममें से होकर बहने लगा
मेरे सपने पेड़ बन कर उग आए
वक्त बहता रहा पेड़ों ने अपने झाड़ फैलाए
छांव दी और फल गिराए
मेरे विचारों ने दूब का रूप धर लिया
मेरी शुभकामनाएं फूल बन गर्इं
वक्त की नदी की तरह बहते हुए
सब कुछ हरियाली में मिल गया
कुछ दिनों बाद मैं शहर आ गया
नदी सूख गई थी और
गांव भी किनारों पर छांव में नहीं रुका
पहाड़ में से एक सड़क गुजर गई
गांव की नदी पर एक पुल उभर आया
मैं पहाड़ हूं और नदी में देखता हूं अपना चेहरा
नदी सूख गई और सारा गांव पुल से निकल रहा है
2
ओ मेरे शरीर
ओ शरीर आज तुम कितने थके
आज तुमने कितनी सीढ़ियां चढ़ीं
सारे दिन तुम को बाईक पर घुमाता रहा
सुबह न एक्सरसाइज दी न नाश्ता
तुम्हें लिए लिए देर तक पड़ा रहा

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति

जन्म - 15 जून 1970
शिक्षा - एम ए बीएड, डिप्लोम फिल्म स्क्रिप्ट राइटिंग
प्रकाशन - अफेयर एवं कोलाज कविता संग्रह
मन का ट्रैक्टर कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य
देश की लगभग सभी साहित्य कि पत्रिकाओं में प्रकाशन
पुरस्कार
रजा सम्मान
उर्मिल प्रसाद सम्मान,
विनय दुबे कविता सम्मान
सम्प्रति कोलाज कला का सम्पादन

सम्पर्क -
टॉप 12, हाई लाइफ कॉम्पलेक्स,
चर्चरोड जहांगीराबाद, भोपाल मप्र
फोन - 0755 4057852, 09826782660
फिर जल्दी पहुंचने की भागम भाग में
दौड़ता रहा, खींचता रहा, धूप और धूल में
ओ शरीर, तुम मेरे सबसे अच्छे रूम मेट हो
मेरी तनाव भरी उलझी जिंदगी में
मैं तुम्हारे लिए खड़ा कर लेता हूं रोग
तुम मुझ से चीख कर नहीं बोलते लेकिन
बता देते हो कि तुम अब थक रहे हो
फिर भी घर की ओर लौटते लौटते
तुम्हें लिए रुक जाता हूं बस दस मिनट और
तुम्हारे न चाहते हुए भी दोस्त के साथ चाय
साथ साथ सिगरेट भी पी लेता हूं
तुम बताते हो खीझते हो, सीने में जलन को लेकर
और मैं लौटते हुए तुम्हें कितना थका डालता हूं
मेरे काम के पीछे तुम सर्दी गर्मी झेलते हो
आफिस में देर रात में दर्द होने तक
फिर किसी पार्टी में जाने का कोई कार्यक्रम
तुम फिर भी साथ देते रहते हो राततक
जहां मैं लौटता हूं तुम्हें लेकर कमरे पर
तुम पस्त हो चुके होते हो दुनिया की झिक झिक से
तुम्हारा लोच को खोकर कितना कुछ नष्ट कर लिया
मेरा और तुम्हारा साथ जिंदगी का साथ है
तुम अपने लिए हो और मैं अपने लिए रहूंगा
आखिर इस सब के लिए मुझे माफी मांगना चाहिए
ओ मेरे शरीर मैं तुमसे माफी चाहता हूं...मुझे दो
3
पक्षी बिजली का तार और एक पेड़
जब पेड़ था तो पक्षी उसके दोस्त थे
एक दिन पेड़ न जाने कहां चला गया
मैं जब भी फोटो खींचता हूं
चाहता हूं पक्षी शाखों पर मिलें
बिजली के तारों से बचता हूं
मेरे कैमरे में भी कुछ तार हैं
फ्रेम में अक्सर तार आ ही जाते है।
मुझे तारों से शिकायत नहीं
पर वे फ्रेम में आते हैं और पेड़ को हटा कर
............
4
कुछ दिन और मैं
मैंने दिनों को स्ट्रीट लाइट
बना कर टांग दिया
अपना हर दिन जो प्यार से रंगा था
आज शहर में हर तरफ हैं
मेरे दिन जो नीले लाल थे
आज मुझ से कितने दूर हैं
मेरे दिन चमक रहे हैं लाइटों में
दुकानों सड़कों और हर लड़की के चश्मे पर
सारा शहर गुजर रहा है
कार के कांच पर जैसे बदलते हैं दृश्य
मेरे दिनों में चमक रहा है प्यार
बरस रहा है मुस्कुराते शहर पर
मैंने अपने दिन छोड़ दिए हैं
मेरे दिन प्यार कर रहे हैं
मैं अकेला हूं अपने दिनों के बिना
मैं खड़ा हूं अपने ही दिनों के प्यार में
...............
5
मेरा मन एक पृथ्वी
मेरा मन भी एक धरती है
बरसों से वह रही हैं नदियां
युगों से उग रहे हैं जंगल
मेरे मन में हजारों सल्तनतों का इतिहास दर्ज है
यहीं है मेरे मन की समृद्वि
तक की
मेरा मन एक संसार है हरा भरा
जहां हर पल नए का स्वीकार है
मेरा मन एक हरे पेड़ की जड़ से जुड़ा है
जहां आते रहते हैं नए पत्ते
हवा न जाने कौन सी सुगंध लेकर आई
हाल ही में जब पनी बरसाया
उसकी हवा जैसे कोई पता लिखा था
सुगंध से लिखा हुआ पता
हरियालियों में नदियों न जाने किसी का पता
मैं खड़ा अपने शहर के बाहर
वही सुगंधित हवा सड़क छोड़ कर चली गई
क्यों मुझे सुगंधित हवा सड़क छोड़ कर चली गई
क्यों मुझे चलते रहना चाहिए
उस सुगंध की ओर
जिसका हर पल सुगंध को लिए था
.........
6
दुनिया के बारे में
मैं किसी के बारे में कुछ नहीं कह सकता
दुनिया अच्छी है या बुरी कि लोग अच्छे हैं या बुरे
लोग झूठे वादों के साथ चलने का वादा करते
बहुत साथ छोड़ जाते, उन्हें बहुत काम होते
कुछ लोग साथ चल कर
कमजोर लम्हों में ठहर जाएंगे
वो साथ चले जितना भी चले
कुछ लोग धीरे धीरे कोशिश करेंगे
साथ छोड़ कर फिर साथ आ जाएंगे
न जाने कितने लोगों को हैरान करेंगे
कई लोग देखना चाहेंगे कितना दम है
तुम्हारी परीक्षा लेगे लेकिन साथ नहीं चलेंगे
दुनिया से अलग चलने की सजा देंगे
वे दमखम देखेंगे और- कहेंगे जाओ
कई लोग दुनिया के धूल औ गुबार में साथ होंगे
वे कहीं भी साथ नहीं दिखेंगे
लेकिन वो काफिले में कहीं न कहीं साथ होंगे
दुनिया के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता
..................
7
ट्रेन चल रही है
ट्रेन चल रही है बैठे हैं लोग
खिड़की में कुछ कुछ बाहर हैं लोग
बाहर से अंदर आते हैं लोग
ट्रेन चल रही है बैठे हैं लोग
ट्रेन चल रही है खड़े हैं लोग
खा रहे हैं पराठे पी रहे हैं चाय
ट्रेन चल रही है हिल रहे हैं लोग
धीरे धीरे हिलमिल हो रहे हैं लोग
बेचता है अंधा खाते हैं लोग
ट्रेन चल रही है खिसक रहे हैं लोग
ट्रेन चल रही है चल रहे हैं लोग
स्टेशन आ रहा है हो रहे हैं खड़े लोग
कुछ जाग रहे हैं कुछ सो रहे हैं लोग
हिल रहे हैं कुंदों में बैग, सो रहे हैं लोग
कुछ आ रहे हैं कुछ जा रहे हैं लोग
एक ही ट्रेन में आ जा रहे हैं लोग
ट्रेन चल रही है चल रहे हैं लोग

3 टिप्‍पणियां:

कुमार अम्‍बुज ने कहा…

रवि में मुझे हमेशा ही बेहतर संभावनाएं और अप्रत्‍याशित पंक्तियां दिखाई देती हैं। यह अलग बात है कि उसकी अधिकांश कविताएं अंधी यात्रा करती हैं। लेकिन दिलचस्‍प हैं। बहरहाल, बधाई।

Aarsi Chauhan ने कहा…

वास्तव मे कवि की प्रस्तुति और कथ्य अद्भुत है.सुंदर कवितायेँ ………….. बधाई

Ashok Khachar ने कहा…

वाह...क्या खूब...