शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

वीरेन डंगवाल की कुछ कविताएँ

दुनिया भले कहें कि वीरेन डंगवाल नहीं रहे पर वे हैं हमारे बीच ही अपनी कविताओं के साथ। तत्सम पर इस बार वीरेन दा की कुछ कविताएँ
प्रदीप कान्त
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प्रेम तुझे छोड़ेगा नहीं !

प्रेम तुझे छोड़ेगा नहीं !
वह तुझे खुश और तबाह करेगा

सातवीं मंज़िल की बालकनी से देखता हूं

नीचे आम के धूल सने पोढ़े पेड़ पर
उतरा है गमकता हुआ वसन्‍त किंचित शर्माता

बड़े-बड़े बैंजली-

पीले-लाल-सफेद डहेलिया
फूलने लगे हैं छोटे-छोटे गमलों में भी

निर्जन दसवीं मंज़िल की मुंडेर पर
मधुमक्खियों ने चालू कर दिया है
अपना देसी कारखाना

सुबह होते ही उनके झुण्‍ड लग जाते हैं काम पर
कोमल धूप और हवा में अपना वह
समवेत मद्धिम संगीत बिखेरते
जिसे सुनने के लिए तेज़ कान ही नहीं
वसन्‍त से भरा प्रतीक्षारत हृदय भी चाहिए
आँसुओं से डब-डब हैं मेरी चश्‍मा मढ़ी आँखें

इस उम्र और इस सदी में
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इतने भले नहीं बन जाना साथी

इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?
इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना
इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना
ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो
उस पर भी तो तनिक विचारो
काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी

3 टिप्‍पणियां:

राकेश कौशिक ने कहा…

आभार

GathaEditor Onlinegatha ने कहा…

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Ashok Kumar Sharma ने कहा…

मैं वीरेनदा के साथ बहुत रहा और उनके परिवार के भी निकट रहा. उनकी कवितायें पढ़ कर मन भर आया..बेमिसाल इंसान थे..मेरे मित्र बने, फिर उम्र के हिसाब से बड़ा भाई कहने लगा उनको, हर बार कोई नई किताब भेंट करता था उनको, बोले रिसर्च क्यों नहीं करते, शोध किया उनके अधीन. उनका शिष्य बन गया. शिष्य मैं मानता रहा अपने आपको उन्होंने मित्र ही माना..उनकी कृपा थी..