रविवार, 27 अगस्त 2017

मुनिया की दुनिया - स्वरांगी साने

तत्सम पर इस बार मुनिया की दुनिया ...........

प्रदीप कान्त

इसकी असली रचयिता है मुनिया की मायाकोशिश केवल उसे शब्द देने वाली हमारी छाया...
(मुनिया छायाचित्रों मे है) 

स्वरांगी साने
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किस्सा 1
सामने के घर में रहती है बमुश्किल तीन साल की मुनियाकभी-भी हलकी बयार-सी आती है। बाकायदा पूछती हैमी आत येऊ (मैं अंदर आऊँ), आपके जवाब को हामी ही मानते हुए बिना इंतज़ार वह अंदर भी आ जाती है। उसकी अपनी दुनिया हैउसमें आप हैआपकी बातों के उसके अपने जवाब हैआपको लाजवाब करते हुए।

आज आई..तो मैं उसे उसके जन्म के समय की कोई घटना सुनाने लगी

मुनियाक्या जब मैं बॉर्न हुई थीतब की बात है..
मैंहाँजब तुम बॉर्न हुई थी..
मुनियापर उससे पहले तो आप बॉर्न हुई होंगी
मैंहाँपर वो तो सालों पहले..
मुनियापर मेरे बॉर्न होने के पहले तो मेरी दीदिया बॉर्न हुई
मैंहाँ
मुनियाउससे पहले यह..वह..वहवह

तो किस्सा यह कि मुनिया के बॉर्न होने से पहले और कौन बॉर्न हुआऔर उससे पहले कौनउससे पहले कौनकी रेल चल पड़ी हैजब वह रुकेगी तब तक मैं भूल जाऊँगी कि मैं क्या कह रही थीइसे कहते हैं चकरघिन्नी..पर बड़ी प्यारी वाली
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किस्सा 2
आज शनिवार
मुनिया आते ही साथ बोल पड़ीबाबा (पिताजीको आज घर से ऑफ़िस का काम करना है।
मैंओह्हकितना बोरिंग न
मुनिया-तभी तो मैं ऑफ़िस नहीं जाती
और मैं कभी जाऊँगी भी नहीं
अलबत्ता बमुश्किल तीन साल की मुनिया इस साल तो प्ले स्कूल में जाने वाली हैपहली बार और वह ऑफ़िस क्यों नहीं जाती की बतकही कर रही थी। ग़ज़ब
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किस्सा 3
आज पता चला कि मैं तो गोल घूम ही नहीं सकती।
..क्योंकि फ्रॉक पहनकर ही गोल घूमा जा सकता है और नया फ्रॉक पहनकर तो और भी अच्छे से
अब आप तो फ्रॉक पहनती ही नहींकैसे गोल-गोलगोल-गोल घूम पाओगी!
इति उवाच मुनिया
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किस्सा 4
रात के दस बज गए थे। मैंने अपनी बेटी को बुलाया और बाकी सब बच्चों को भी कहा अपने-अपने घर जाओ। मुनिया को और खेलना था।
मैंनहीं बेटा..बाहर इतनी रात गए नहीं खेलतेबहुत रात हो गई।
मुनियातो मैं आपके घर खेलूँगी।
मैंनहीं बेटा अब खाना खाओसो जाओ।
मुनियाबाबा (पिताआने वाले हैं।
मैंअरे वाह। तब तो घर जाओ। यदि वे घर आए और उन्हें पता चला कि तुम घर पर नहीं हो तो फिर ऑफ़िस चले जाएँगे।
…. मुनिया लपक कर घर चली गई। कितनी मासूम होती है न यह उम्र। उसे सच लगा कि पिता ऐसा भी कर सकते हैं..सुबह के गए हैंअब आएँगे और मैं न मिली तो फ़िर ऑफ़िस चले जाएँगे।
मतलब ये ऑफ़िस वालेदिन के वे सारे घंटे छीन लेते हैं जो पिता के जाने पर उनके बच्चे उनकी राह तकते बिताते हैं। देर रात थक कर आने वाले पितादेर रात थक चुकी मुनियापर दोनों की एनर्जी फिर फुल ऑन होती है और मेरे घर तक मुनिया की खिलखिलाहट की गूँज आती है।
ओह पर फिर सुबह होगी, …पिता को फिर ऑफ़िस जाना होगाऔर तब मुनिया का रोना सुनाई देगा- ‘बाबा नका न जाऊ ऑफिस’ …
अबकी मुनिया आएगी तो उससे कहूँगी चलो हम मिलकर ऑफिस से कट्टी कर लेते हैं..जो सबके बाबाको ले जाकर बाबूबना देते हैं। मुनिया बाबू बननाक्या होता है नहीं जानतीवह केवल बाबाजानती है..
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किस्सा 5
उस दिन वह आई
वैसे ही दरवाज़ा खोलते ही सीधे भीतर और खाट के नीचे जा छिपीमैंने उसे देखामैंने उसे आते देखा..उसे खाट के नीचे जाते देखा..छिपते देखा
तब भी वह बोली मुझे ढूँढोमैं कहाँ हूँ
मैं झुक गई और खाट के नीचे उससे आँखें दो-चार हुई..तो..वह बोल उठीऐसे नहींयहाँ नहीं ढूँढना मुझेबाकी जगह ढूँढो
मैं उसे बाकी जगह ढूँढने लगी..यह जानते हुए भी कि वह खाट के नीचे है..मैं परदे के पीछे देखने लगीकिवाड़ की ओट मेंखिड़की के पासबरामदे मेंकहाँ हो..कहाँ हो
तब मुनिया जी बोलीं मैं खाट के नीचे हूँमुझे ढूँढो
मैंने भी ऐसी खुश दिखाई कि जैसे खजाना मिल गयाऔर उसे ढूँढ लिया
पर मुनिया से एक और छोटी पड़ोसन चुनिया हैमहज़ डेढ़ साल की..उसका तो खेल ही अजब।
उसे जहाँ जाने से मना करोवह वहाँ जाती हैऔर खुद की आँखें बंद कर जाती है। उसे लगता है कि उसने आँखें बंद कर ली मतलब कोई उसे नहीं देख पा रहाअजब
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किस्सा 6
एक खिड़की है और खिड़की के पार एक पेड़उस पेड़ पर आने वाले कई पक्षी
मुनिया उस दिन आई तो खिड़की की ओर उसकी पीठ थी..मेरा चेहरा खिड़की की तरफ़ थाजाहिर है मुझे खिड़की के पार का दिख रहा थाउसे नहीं।
पत्तियों के खड़खड़ाने की आवाज़ हुई और उसने श्श्श किया
फिर फुसफुसाकर बोली कौन है
मुझे तो दिख रहा था मैंने कहा कौआ है
मुनियानहीं कबूतर है
मैंअरे कौआ है
मुनिया कबूतर है
… कितना बड़ा पाठ उससे खेलते-खेलते मिल गया। उसकी पीठ थी पर वह मान रही थी कि कबूतर हैमैं देख रही थीउसे कह रही थी कौआ है..पर वह मानने को तैयार नहीं थी। यही करते हैं न हम..ईश्वर हमारे सामने खड़े हो हमें सत्य बता रहे होते हैंतब भी हम सत्य की ओर पीठ करे खड़े रहते हैं और चाहते हैं कि ईश्वर वहीं कहे जो हम चाह रहे हैं..
वाह री मेरी मुनिया..तुम तो ज्ञान दे गई
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किस्सा 7
मैं काम कर रही थी..किचन का काम थाफिर ऑफ़िस का
मुनिया को खेलना था
मैंने मुनिया से कहा अभी नहींबाद में खेलेंगे
वह बोली तीन बजे
मैंने हाँ कह दिया तीन बजे
उसने यह कब कहा था कि कबकौन-से दिन तीन बजे।
वह मेरे वादे को भूल गई होगी पर मुझे लगता रहाइसी तरह हम तमाम ज़रूरी-गैर ज़रूरी कामों में ही उलझे रहते हैं और हम तो खेलना ही भूल जाते हैं..खेलना..बेवजह हँसनाखिलखिलाना
जबकि परमानंद है मुनिया
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किस्सा 8
मुनिया इस साल प्ले ग्रुप में जाने वाली है न।
उस दिन उससे यूँ ही पूछा अंग्रेजी की वर्णमाला के बारे में। उसने पहचाना A.. मैं खुश हो गई अब आगेतो उसने सीधे V अक्षर को पहचानाउसका उच्चारण भी उसे नहीं पता..उसे केवल इतना पता है कि यह वह अक्षर है जिससे उसके बाबा (पिताजीका नाम शुरू होता है।
इतना बता कर उसने अपनी बैठकी उठा ली। मैंने कहा अरे पढ़ तोपर वह अपनी ही मस्ती में मगन थीजिसमें एक भाव था कि उसकी दुनिया में उसके पिता के नाम का अक्षर हैमतलब पिता हैबाकी दुनिया से क्यावह तो ठाठ से उठी और कंधे उचका कर चल पड़ी..
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किस्सा 9
ल लल लssss
गाते हुई आई मुनिया
मैंअरे वाहआज क्या गुनगुना रही हो
मुनियाजब मैं गाते हुए आऊँगी नतो मेरे हाथ में वांड (छड़ीहोगी और आप फेयरी (परीबन जाओगी
?!?!?!
मैंपर स्टिक (छड़ीतो परी के हाथ में होती हैजैसे तुम्हारे हाथ में है
मुनियामैं तो हूँ ही फेयरीपर आप हमेशा काम करती रहती होअब जब मैं गाऊँगी न तो आप भी फेयरी बन जाओगीऔर वांड घूमाते ही आपके सारे काम हो जाएँगे..
हाय री मेरी प्यारी मुनिया….
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किस्सा 10
कोई बड़ी फिल्मी हिरोइन आज हमारी सोसाइटी में आई है..लोगों में ग़ज़ब का उत्साह और उसे देखने के लिए बड़ा मजमा लगा है..बच्चे कैसे अछूते रहतेउनका हुजूम भी निकल पड़ा हैऑटोग्राफ़ की डायरी लेकरबच्चों में मुनिया भी तो हैठुमक ठुमक कर चल रही है..सबसे अच्छे कपड़े पहने हैंएकदम चुनकर निकाला ड्रेसधूप से बचने के लिए सिर पर टोपीगॉगल..पैरों में काली जूतीएकदम हिरोइन को टक्कर देती-सी तैयार है मुनिया
और अब सुनिए मुनिया के श्रीमुख से-
मैं उस हिरोइन को कहूँगी तुम मेरा ऑटोग्राफ लोतो मैं तुम्हारा ऑटोग्राफ लूँगी…’
तो बोलो धन्य है न मुनिया
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किस्सा 11
और अभी अभी
मुनिया विलिस पहनकर घूम रही हैविलिस अरे मतलब गम बूट..मुनिया के शब्द सुन कई बार लगता है कि इसे ही जनरेशन गैप कहते हैंपता ही नहीं कि विलिस कहते हैं गम बूट को।
..तो वह विलिस क्यों पहने हैं..
उसका कहना है
मुनिया- ‘विलिस बारिश में पहनते हैं
मैं- ‘पर अभी बारिश कहाँ हो रही है?’
मुनिया- ‘विलिस पहनूँगी तभी तो बारिश को पता चलेगा कि उसे आना है
जिनियस है मुनियावरना हम तो अभी भी मेंढक की टर्र टर्र पर ही अटके हैंकि मेंढक टर्राएँगे तो बारिश होगी..पर विलिस पहनने से बारिश होगीयह कहाँ पता है हमें..हम ओल्ड जनरेशन हाहा)
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किस्सा 12
यूँ तो दरवाज़ा खुला था पर वह एक हाथ से दरवाज़ा बजा रही थी..लगातार..थाप पर थाप
और उसी लय में अपना एक पैर हिला रही थी और दूसरा हाथ हवा में लहरा रही थी
मैं और बेटी दरवाज़े के पास आकर खड़े हो गए पर मुनिया की सिम्फनी जारी थी..अपनी ही धुन में मग्न ..कुछ देर बाद उसका ध्यान गया कि अरे हम तो दरवाज़े पर ही खड़े हैं और वह बेसाख्ता हँसने लगीहम माँ-बेटी भी अपनी हँसी रोक नहीं पाएँ...हमारी समवेत खिलखिलाहट की गूँज से अड़ोस-पड़ौस के बंद दरवाज़े भी खुल गएकि आखिर क्या हुआ?’

..अरे वाह मुनियातुमने तो सिद्ध कर दिया कि आज भी हँसी में बंद दरवाज़ों को खुलवाने की ताकत है।
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किस्सा 13
उसकी दीदिया ने इतनी तेज़ आवाज़ में कहा कि पूरी इमारत को सुनाई देने के लिए काफी थामुनिया नाराज़ है।
और मुनिया गलियारे में लिफ्ट के पास जाकर खड़ी हो जाती हैमुँह फुगाए। फिर ऑफ़िस जाने वाले अंकल-आन्टीकॉलेज जाने वाले भैयास्कूल जाने वाली दीदीमंदिर जाने वाली चिंटू की दादी..सभी उससे पूछते हैंक्या हुआ-क्या हुआ। मुनिया लिफ्टकॉल करने से उसके आने तक का हिसाब जानती हैऔर लिफ्ट किस फ्लोर से आ रही है उस हिसाब से किसी को तपाक सेकिसी से थोड़ी नानुकर के बाद अपनी नाराज़गी का कारण बता देती हैअपने काम से जाने वाला हर शख्स उससे वादा करता है कि वह उसकी समस्या निपटा देगा।
कोप भवन न सहीलिफ्ट से सटा वह कोना मुनिया के गुस्से का भाजन भले ही बनता हो लेकिन मुनिया के पूरे फ्लोर से मिलने वाले लाड़ का भी अकेला साक्षी होता है
कोई उसे वहाँ खड़े होने से मना करता हैकोई उसकी माँ को आवाज़ देकर बाहर बुलवाता है..मुनिया की माँ उसकी चिरौरी करते हुए घर ले जाती है..मुनिया के दोनों हाथ में लड्डू..माँ भी उसकी साइड और उस फ्लोर के सभी लोग भी । हाहा।
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किस्सा 14
मुनिया जब भी घर आती हैबैठक को अपने हिसाब से सजा देती है। मतलब उन छोटे पीढ़ोंचौकियों को लेती हैस्टूल को भी..और सबको एक कतार में लगा देती है।
अरे पर क्यों’?
संगीत कुर्सी (म्यूजिकल चेयरके लिए
अरे पर क्यों’?
कोई भी आएगा और इस तरह लगा-लगाया हो तो आते ही खेल सकता है
इसके बाद फिर मेरी हिम्मत नहीं होती कि अरे पर क्योंपूछने कीकि भला कोई बाहर से आने वाला आते ही संगीत कुर्सी क्यों खेलेगा’?
मुनिया की दुनिया और बड़ों की दुनिया जो अलग है। मुनिया की दुनिया में सब बच्चे हैउसकी माँ भी और उसकी सहेली भी और सहेली की माँ भीजो जब चाहेजहाँ चाहे खेल सकते हैं। बड़ों की दुनिया बूढ़ातेजाने की दुनिया हैजिसमें सलीके का अनुशासनही संयतजीने का एकमात्र तरीका है।
मुनिया के जाने के बाद मैं फिर सब कुछ बड़ों की तरह करीनेसे रख देती हूँ।
वह फिर जब भी घूमते-घामते लौटकर आती है.. फिर सब सजादेती है। बिना कोई गिला-शिकवा किएवह मुझे नहीं डाँटती कि मैंने उसका खेल क्यों बिगाड़ दिया…(जबकि हम तो पहली फुर्सत में बच्चों को डाँटने के लिए ही बैठे होते हैं)
दुनिया को सजा-सँवरादेखना चाहती है मुनियापर दुनिया तो उसे ही अस्त-व्यस्तपड़े होना कहती है।
अब बोलो

किस्सा 15
हम लौट रहे थेअहाते तक आते ही मुनिया ने घोषणा कर दी कि यह स्टेशन (/प्लेटफार्महै और हम ट्रैन के लिए रुके हैं
लिफ़्ट आई तो मैंने भी उसके सुर में सुर मिलाते हुए कहा चलो जल्दीट्रैन आ गई
लिफ़्ट के अंदर जाकर मैं वांछित मंज़िल के लिए बटन दबाने लगी तो मुनिया ने बताया वह तो टिकट लेने का प्वॉइंट है।
मैं भी राजी हो गईमैंने पूछा बताओ कहाँ का टिकट निकाले!’
मुनियाघर का
मैंपर किस शहर का?
मुनियाजिस शहर में मेरा घर हैउस शहर का
मैंतुम्हारा घर किस शहर में है?
मुनियाजहाँ मैं रहती हूँ उस शहर में
मैंपर जगह तो बताओ?
मुनियाघर
मैंअरे जगहप्लेसतुम जहाँ रहती हो वो कौन-सी जगह है?
मुनियाघर
खैर टिकट मतलब बटन दबा दिया और गाड़ी मतलब लिफ़्ट चल पड़ी।
लिफ़्ट रूकीहम दोनों उस लिफ़्ट सह ट्रैन से बाहर आ गए।
अब मुनिया साहिबा को अपने घर जाना चाहिए था न। पर मुनिया के लिए घरघर जैसा होता हैइसका-उसका क्या और तेरा-मेरा क्या।
वह न अपने घर गईन मेरे..तीसरे ही घर का दरवाज़ा खुला थावहाँ चिंकी-मिंकी खेल रहे थेबस मुनिया भी वहाँ चली गईऔर क्या
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किस्सा 16
- “तुम सब इतना शोर क्यों मचा रहे हो?”
मुनिया- “नहीं तो!”
तो?”
मुनिया- “…खेल रहे हैं!”
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किस्सा 17
दरवाज़ा बजा। मैं समझ गई कि घंटी तक हाथ न पहुँच पाने वाली यह मुनिया की ही आमद है।
मुनिया ने उधर से कहा- ‘डकी (डक-बतखआया है
मैंने दरवाज़ा खोलते हुए क्वैक-क्वैक’ (बतख की आवाज़किया। मुनिया एकदम ख़ुश हो गई।
मुनिया ऐसे ही कई नाम धरती है। कभी कहती है कि वह सिंड्रेलाहै। कभी खुद को सॉफ़्टीकहलवाती है..और जिस दिन वह सॉफ़्टीहोती हैउस पूरे दिन उसे कोई डाँट नहीं सकताऐसा उसका ख़ुद का फ़रमान है। फ़िर जिस दिन वह डकीहोती है उस दिन भी नहींऔर सिंड्रेलाहोने पर तो बिल्कुल नहीं।
भई हमें तो बचपन में साल का एक ही दिन पता था-जन्मदिन..जिस दिन डाँट खाने से राहत मिलने की कुछ संभावना होती थी। पर हमारी मुनिया तो सयानी हैइस तरह हर दिन कोई नया स्वाँग रच अपने लाड़ लड़वा लेती है।
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किस्सा 18
उसने मुँह में लॉलीपॉप पकड़ी थी और दोनों हाथों से ताली बजा रही थी। मैं उत्साहित हो गई और कह बैठी-‘चलोमैं भी ऐसा ही करती हूँ
मुनिया ने तुरंत मना कर दियाकह दिया मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगी।
मैं- ‘क्यों नहीं कर पाऊँगी?’ (मुझे लगा वह फिर अपना तर्क देगी कि फ्रॉक पहनकर ही ऐसा कर सकते हैंजैसा उसने कहा था कि फ्रॉक पहनकर ही गोल घूम सकते हैंवरना नहीं)
मुनिया- ‘नहीं कर सकती!’
मैं- ‘अरेपर तुम्हें देखकर मेरा भी ऐसा करने का मन कर रहा है
मुनिया- ‘अरेआप बड़ी है नइसलिए आप ऐसा नहीं कर सकती। बड़े लोग ऐसा नहीं करते
...मैं सकते में आ गई। हम मुनिया को जाने-अनजाने क्या सीखा रहे हैं। हम बच्चों से ऐसा नहीं कहते कि तुम बड़े हो गए हो तो यहभी कर सकते हो और वहभी। हम उनकी काबिलियत को बढ़ाने के नाम पर उन पर पाबंदियाँ बढ़ाते हैं क्या करनाक्या नहीं करना मन में बिठाए जा रहे हैं।
कल को मुनिया भी बड़ी हो जाएगीऔर हम (समाजउससे भी कहेंगे तुम बड़ी हो गई होऐसा मत करोवैसा मत करो
क्या बड़े होने का मतलब खुशियों से दूर बोझिल जीवन जीना है?
मेरी मुनियाबड़ी हो जाओ पर तब भी तुम ऐसे ही लॉलीपॉप खानाचटकारे लेनाफिसलपट्टी पर चढ़ना-उतरनाझूले में बैठ अपने बालों को उड़ाना-इतराना..इठलाना और पानी में वो धम्म से ssपाssभी करना
मेरी मुनियाबड़ी होना पर ऐसे नहीं कि बड़की बन जाओभीतर से छुटकी ही रहनाचुलबुलीशरारतीप्यारी।
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किस्सा 19
मम्माss…मम्माsss…’
मुनिया आवाज़ लगा रही थीउसकी माँ ने पूछा क्या हुआ..?’
मुनिया ने संशोधन किया- ‘रिंकी दीदी मम्माs…’
(अच्छा तो मुनिया खेल रही थी और उससे दो साल बड़ी रिंकी दीदी उसकी मम्मा बनी थी)
रिंकी दीदी- ‘अच्छा अब मैं ऑफ़िस जा रही हूँठीक’ (खेल-खेल में)
मुनिया- ‘मम्माsss…’
रिंकी दीदी- ‘क्या!’
मुनिया- ‘अरेआपको नहींअपनी असली मम्मा को बुला रही हूँ। जब आप ऑफ़िस जाओगीमैं अपनी मम्मा के पास रहूँगी और जब मम्मा ऑफ़िस जाएँगी तो आप मेरी मम्मा बन जाना
मानना पड़ेगा चतरी है मुनिया..!
कुछ देर बाद मुनिया ने अपना टैडी बियर उठा लिया।
मुनिया- ‘यह मेरा बेबी है
मैं- ‘अच्छा तो अब तुम मम्मा हो गईतो रिंकी दीदी नानी बन गई न
मेरे इतना कहते ही रिंकी दीदी और मुनिया दोनों ही ठहाका लगा हँस पड़ी।
मुनिया ने मुझे समझाया- ‘अरेरिंकी दीदी मेरी मम्मा है और मैं टैडी की मम्मा
मैं- ‘हाँ तो तुम्हारे बेबी की मम्मा की मम्मा तुम्हारे टैडी की नानी हुई न
मुनिया- ‘ऐसा थोड़े न होता है
मैं- ‘ऐसे ही तो होता है
मुनिया- ‘अरे क्या रिंकी दीदी बूढ़ी हैंजो नानी बनेंगी
(अब मैं मन में, ‘अरे पर क्या रिंकी दीदी इतनी बड़ी हैंकि मम्मी बनेंगी?’)
तो मैं समझी मतलब यह कि हम सबके बचपन से मानस पटल पर होता है कि हम बड़े बनना चाहते हैंपर बूढ़े नहीं।
इतने में मुनिया को खरोंच आ गई और वह दौड़ी
मम्माsss…’
इस बार उसने रिंकी दीदी मम्माsss…’ नहीं कहाचोट लगने पर अपनी माँ के पास जाना चाहिएकिसी और के पास नहीं..हाहाहाज्ञानी है मुनिया!
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किस्सा 20
कुछ बड़ी लड़कियों मतलब उस तथाकथित टीन एज की उम्र से छोटी हीलड़कियों ने गर्ल्स नाइट आउटकी योजना बनाई और छुटकियाँ भी शामिल हो गईं। बिल्कुल वैसा नाइट आउटनहीं था..केवल घरों से बाहर मिलने वाले थे और वैफर्स-केक-फ्रूटी जैसी कोई पार्टी करने वाले थेरात 10 बजे तकलेकिन वे बहुत उत्साहित थींचार दिनों से उनकी बैठकें हो रही थींउनके किसी सीक्रेट बेसमें।
बातें करते-करते वे सीक्रेटसे ओपन एरियामें भी आ जातीं और उनकी योजनाएँ सबके सामने होती
मुनिया तो होनी ही थीथी..
मुनियाऐसा करते हैंहमारे घर पर सिंड्रेला की मूवी देखेंगे
बड़कीअरे नाइट आउट करना है नआउटआउट समझी न
मुनियाहम्म..तो सिंड्रेला जैसा गाउन पहनेंगे सब लोग
तो सब इस पर राज़ी हो गए। तय दिन (मतलब रात तय हुईवे मिले। सारी छुटकियाँ-बड़कियाँपरियाँ लग रही थीं… ‘पैरेंट्स नॉट अलाउडथे..वे सब खुद करने वाली थीदरियाँ बिछाई जा रही थींपेपर प्लेट लग रही थीसबकी पानी की बोतलें थीमोबाइल पर गाने थेकेवल हंगामा
तो जैसे कि कहा पैरेंट्स नॉट अलाउडथे नपर मुनिया ने उसमें जोड़ा बॉयज़ नॉट अलाउड’..वैसे भी उन लड़कियों की योजना थी और उन्होंने लड़कों को शामिल नहीं किया थालेकिन घोषणा कर उस पर मानो मुनिया ने मुहर लगा दी।
मुनिया इतने से कहाँ रुकतीवह उसकी उम्र के सभी छुटंकों के घर पर गईउनकी मम्मियों मतलब आन्टियों को अपना प्यारा-सा पिंक गाउन दिखायाठुमकीमटकीऔर अच्छी दिख रही हो’, ‘क्यूट’, ‘प्यारीकी प्रशंसा बटोरने के बाद लड़कों वाले हर घर में जाकर कह भी आई.. ‘बॉयज़ नॉट अलाउड
मुझे उसका यह आत्मविश्वासयह दीदीगिरी बहुत प्यारी लगीवो विज्ञापन था न एक दुपहिया का एकदम याद हो आया...
Boys move out,Girls are in नहीं नहीं.. Why Should Boys Have all the Fun अब
Girls move out, Boys are in जय हो
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किस्सा 21
मुनिया आज सुबह-सवेरे आई थीआँखें मलते-मलते..नींद से उठी-उठी हीऔर मुझे गुडमॉर्निंगबोलीउसके आने से मेरी मॉर्निंगतो वैसे भी गुडहो गई थी
भगवान के आगे धूप-दीप-अगरबत्ती जल रही थीवह मंदिर के सामने जाकर बैठ गई
मैंजय-जय बाप्पा करा
मुनियाहैलो बाप्पा
मैंभगवान् को हैलो नहीं कहतेजय करो
मुनियागुड मॉर्निंग बाप्पाबोलूँ
मैंने मुस्कुराते हुए हामी में सिर हिला दियामुनिया ने बाप्पा को गुड मॉर्निंग कहा।
अब वह सारे भगवान् देख रही थी..
मुनियाये काउ (गाययहाँ क्यों रखी है?
मैंयह काउ नहीं नंदी है!
मुनियाकौन नंदी?
मैंनंदी बैल!
मुनिया- ??!!??
मैंऑक्स!
मुनिया हँस दी

आह!
मुनिया को कैसे समझाऊँ कि बाप्पा को जय नहीं किया तब भी चलेगा पर बैल कोई अजनबी प्राणी लगे और ऑक्स समझ में आ जाए तो गड़बड़ है।
आह!!
पर मुनिया कैसे समझेगी कि अभी तो उसके गुडमॉर्निंग बाप्पा कहने पर मैं मुस्कुराई थी और अब आपत्ति क्यों ले रही हूँ?
आह!!!
हमारी उलझी हुई पीढ़ी जो बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ा रही है और उनके अपनी भाषा-संस्कृति से छिटकने पर मन मसोस रही हैइस उलझन से कैसे निकल पाएगी?
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किस्सा 22
दरवाज़े पर ठक-ठक हुईअभी सुबह के शायद साढ़े सात-पौने आठ हो रहे थेदूध वालापेपर वाला तो उससे पहले ही आ चुका थावैसे तो मैं समझ ही गई थी मुनिया होगीमैंने दरवाज़ा खोला,मुनिया ही थी।
मुनिया बिना कुछ बोले रसोईघर में चली गई अपना खाऊखाने। मुनिया को पता है उसका खाऊकहाँ रखा हैवह वहीं जातीकेवल उतना ही डिब्बा खोलती हैउसे जितना चाहिएकभी एक-कभी दोकभी मूड हुआ तो चार-पाँच..और डिब्बा बंद कर फिर जगह पर रख देती है। उसे बाकी किसी चीज़ से कोई मतलब नहीं होता। उसे पता है कि यह खाऊकेवल उसका है और केवल उसी काउस पर एकाधिकार भी।
एक बार तो कहीं बाहर खाना-खाने जाना थापर उससे पहले भी मुनिया को अपने खाऊकी याद आ गई..पार्टी-शार्टी तो सबके लिए थी नपर यह ट्रीट तो केवल उसकी हैउसने वैसे ही डिब्बा खोला, ‘खाऊनिकालामुट्ठी में थामा और डिब्बा बंदकर यथास्थान रख दिया।
ऐसे ही उसकी एक ख़ास गिलासी (छोटा ग्लासभी है। जब वह छोटी थी नमतलब अब से भी छोटीतब उसे उस ज़रा-सी तांबे की गिलासी में पानी देती थीपर अभी भी उसे वही लगती है। अब उस गिलासी से तीन-चार बार पीएगीपर चाहिए वही गिलासी। उससे छोटी डेढ़ साल की चुनिया को एक बार वह गिलासी दी तो मुनिया ने तुरंत एतराज़ भी जतायासही है वह दमकती गिलासी तो मुनिया की है।
अरेहाँतो कहाँ थे हम
तो मुनिया ने डिब्बा निकालाखोलाउसमें से खाऊनिकालाडिब्बा बंद कियाजगह पर रख दिया। मैंने ऐतिहातन पूछ लिया
मैंब्रश किया है न?
मुनियाहाँ ब्रश कियापर नहाई नहीं हूँ। (मुनिया ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया)
मैंकोई बात नहींपर बिना ब्रश किए नहीं खाते न इसलिए पूछा
मुनिया ने सुना या नहीं पता नहींउसने तो फुदकते हुए अपने घर की राह पकड़ी। उसकी माँ ने मेरे घर से उसके घर के बीच के गलियारे में मुनिया को झिड़का भी – ‘मना किया था नऐसे किसी के यहाँ से कुछ नहीं लेते। मैंने कहा- ‘अरे कोई बात नहीं
और यकीन जानिए मेरा यह कोई बात नहींकहनापड़ोसी-धर्म निभाने की औपचारिकता नहीं है। मुझे तो लगता है कि मुनिया जिस अधिकार से आती हैखाती हैपानी पीती हैहाँ कभी-कभी तो बाहर खेलते-खेलतेमेरे घर केवल पानी पीने आती है,उसे ऐसे ही करते रहना चाहिए।
बच्चे अपना-पराया कुछ नहीं जानतेफ़िर धीरे-धीरे हम उनके मन में भेद बैठाना शुरू करते हैंयह तुम्हारा घर हैयह उसका घर है।
फिर चक्र पूरा घूमता है..बुढ़ापे तक आते-आते संज्ञान होता है कि अपना-पराया कुछ नहीं होतासब अपने हैं। फ़िर सबके प्रति वात्सल्य भाव जगता है।
पर क्यों न बच्चों में सबसे प्रीत करने का जो भाव हैउसे वैसे ही रहने दिया जाए..फिर विद्वेष कहाँ टिक पाएगा?
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किस्सा 23
मुनिया आईसामने काका(अंकल-मेरे पतिथेकाका ने उसे गोदी उठा लिया। गोदी उठाकर हवा में उछालामुनिया खिलखिला दीमैं यह सुनकर बाहर आई।
मेरे पति ने बड़ी शान से कहा- ‘देखो मैं सोफे के नीचे कर रहा हूँवैसे तो मुनिया नहीं गिरेगी पर गिर भी गई तो सोफे पर गिरेगीउसे चोट नहीं लगेगी।
मैंने कहा- ‘बढ़ियापंखा भी बंद कर दो
इस तरह मुनिया की सैफ्टी हो गई।
काका ने मुनिया को चार-पाँच बार हवा में उछालाझेलाऔर मुनिया से कहा – ‘काका है कि नहीं सुपर मैन
और ऐसा कहते हुए मेरी ओर देखामैं मुस्कुरा दीउन्हें लगा मैं मुग्ध भाव से मुस्कुरा रही हूँ पर मुझे मुनिया की आँखों में तैरती शरारत साफ़ दिख गई थीऔर मेरी मुस्कान का इशारा पति नहीं समझे कि … ‘बंदा तू समझा है क्याआगे-आगे देखिए होता है क्या
मुनिया ने फ़रमाइश की..दीदी (मतलब मेरी बेटीके सामने भी एक बार करो
आज के सुपर मैन (पतिने मुनिया की दीदी को आवाज़ लगाई
दीदी आईदीदी के सामने एक बार यह खेल हुआ
दीदी के पीछे-पीछे उसके दीदी के कमरे में ही बैठी उसकी सहेली भी आईतो उसके सामने एक बार और दिखाने की फ़रमाइश मुनिया ने कीवह भी हो गया..
बाहर का दरवाज़ा खुला था तो मुनिया की दीदिया भी आ गई
अब दीदिया को चिढ़ाने के लिए तो एक बार और यह खेला होना बनता ही था..वह भी हुआ,
फिर एक बार दीदिया के पीछे-पीछे आई चिंकी के सामनेफिर मिंकी के सामने भी ….
इस तरह पहले चार बार और उसके बादपाँच बार औरमतलब नौ बार झेला-झेली के खेल हो चुका थापति की थकान चेहरे पर दिख रही थी
मुनिया के चेहरे पर शरारत थी
पति ने कहा-‘भई मैं तो थक गया
मुनिया- ‘सुपर मैन नहीं थकता…’
पति- ‘--’
मुनिया- ‘सुपर मैनसुपर मैन..’
सारे बच्चे भी उसकी आवाज़ में आवाज़ मिला बोलने लगे सुपर मैन’ ‘सुपर मैन
सब चाह रहे थे सुपर मैन उन्हें भी एक बार इस तरह उछाले
पति ने मुझे देखा..कहा- ‘अरे इन बच्चों से कह दो मैं हूँ सिंपल मैन
मैं अपनी हँसी न रोक पाई..
तो बोलो आज की कहानी से क्या शिक्षा मिली
किसी भी लड़की को बित्ते भर की समझने की भूल कभी मत करनाहाहाहा
--

किस्सा 24
आज खेलने के लिए कोई नहीं थानहीं तो न सही..मुनिया तो अकेले में ही खिलंदड़ दुनिया है।
मुनिया ने हवा वाली बड़ी-सी गेंद को एक टप्पा दिया
गेंद टप-टप उछलने लगी
मुनिया उछलते हुए उससे आगे निकली और मुड़कर देखने लगीभागने लगीगेंद आ रही है या नहीं।
गेंद के साथ उसका यह पकड़मपाटी का अनोखा खेल उस दिन बहुत देर तक चलता रहाजब तक मुनिया नहीं थक गईया कि गेंदपता नहीं
--

किस्सा 25
आज तो छुट्टी हैपूरे दिन की छुट्टी है..रविवार है और दिन भर खेल चल रहा है।
मैंने पूछ ही लियाहोमवर्क हो गया क्या
मुनिया चुप..क्ले से रोटी बेलने में मगन
मैंहोमवर्कऔर मैंने भवैं उचकाई
मुनिया ने भी भवैं उचकाईमानो मैं न जाने कैसा बेतूका सवाल कर रही हूँ
मैंअरे होमवर्क किया क्या?
मुनियावो तो घर पर करते हैं….
इतना कह वह फिर अपने काम (खेलमें मगन हो गई
मेरे हाथ क्या हासिल लगा कि होमवर्क घर पर करते हैंऔर मुनिया अभी उसके घर पर नहीं हैसो मेरा सवाल ही ग़लत है। उसकी उचकी भवैं जो कह रही थी-मतलब सवाल ही बेतूका है।
हाहाहा

किस्सा अभी जारी है
मुनिया प्यारी है….
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स्वरांगी साने
पूर्व वरिष्ठ उप संपादक, लोकमत समाचार,पुणे
  • जन्म ग्वालियर मेंशिक्षा इंदौर में और कार्यक्षेत्र पुणे
जीवन का लक्ष्यः 
कुछ सृजनशील लमहों की खोज 
शिक्षाः
  • एम. ए. (कथक) (स्वर्णपदक विजेता) देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से
  • बी.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य) प्रथम श्रेणी 
  • विशेष योग्यता (Distinction) के साथ कथक विशारद (Distinction), अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल, मिरज (मुंबई)
  • डिप्लोमा इन बिज़नेस इंग्लिशदेवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर
विशेष
  • पदन्यास नाम से कथक नृत्य शाला की स्थापना, संचालन
  • अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल, मिरज (मुंबई) द्वारा मान्यता प्राप्त कथक शिक्षक
  • सदस्य, इंटरनैशनल डांस काउंसिल- CID / यूनेस्को
  • इंटरनैशनल डांस डायरेक्टरी में नाम सम्मिलित
  • भारतीय भाषाओं के काव्य के सर्वप्रथम और सबसे विशाल ऑनलाइन विश्वकोष-कविता कोश में रचनाएँ।
  • भारत सरकार के सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र- Center for Cultural Resources and Training (CCRT) की वेबसाइट के आर्टिस्ट प्रोफाइल में नाम, संक्षिप्त परिचय शामिल।
पत्रकारिता के क्षेत्र में उपलब्धियाँ 
  • राज्य स्तर का सर्वोत्तम गोपीकृष्ण गुप्ता रिपोर्टिंग पुरस्कार, 2004
  • उस्ताद अलाउद्दीन खान संगीत अकादेमी द्वारा खजुराहो नृत्य समारोह, 2004 में रिपोर्टिंग के लिए आमंत्रित
  • मध्य प्रदेश कला परिषद द्वारा आयोजित मांडु उत्सव -2003 का दैनिक भास्कर के लिए कवरेज
नृत्य, नाटक, रेडियो और टीवी
  • सन् 1992 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित नाट्य शिविर में निर्धारित आयुसीमा से कम होने के बावज़ूद चयन
  • 1995-96 के दौरान अंतर विश्वविद्यालयीन वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लिया.
  • इंदौर कलैक्टरेट द्वारा आयोजित साक्षरता अभियान, सन् 1991 में जत्था कलाकार के रूप में भागीदारी।
  • इंदौर आकाशवाणी द्वारा प्रसारित “उस लड़की का नाम क्या है” रूपक के लिए सन् 1989 भारतीय परिवार कल्याण विभाग द्वारा प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया. उसमें लड़की की भूमिका का निर्वाह।
  • पुणे आकाशवाणी के लिए महाराष्ट्र की आषाढ़ी वारी पर कवि दिलीप चित्रे के वृत्त चित्र का सन् 2007 में अंग्रेजी से हिंदी रूपांतरण किया जिसे आकाशवाणी का अखिल भारतीय स्तर का प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ।
  • इंदौर दूरदर्शन पर समाचार वाचक (News reader) के रूप में भी कार्य किया।
  • शौकिया रंगमंच पर कई सालों तक अभिनय। कई प्रतिष्ठित मंचों यथा उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी (लखनऊ-सन् 2003), मध्यप्रदेश कला परिषद (निमाड़ उत्सव- सन् 2004), राष्ट्रीय रामायण मेला (चित्रकूट- सन् 1996) के मंचों पर कथक प्रस्तुति।
  • सच्चिदानंद सोसाइटी कोलकाता द्वारा बैंगलूर में आयोजित प्रज्ञानपुरुष श्री श्री बाबा ठाकुर को समर्पित अध्यात्मिक संध्या (शास्त्रीय नृत्य कथक और शास्त्रीय गायन) आयोजन में सूत्र संचालन (मई 2017)।
कार्यक्षेत्र : नृत्यकवितापत्रकारिता, संचालन, अभिनयसाहित्य-संस्कृति-कला समीक्षाआकाशवाणी पर वार्ता और काव्यपाठ
आयोजन : वाट्सएप्प के दस्तक साहित्यिक समूह के रचनाकारों की तीसरी बैठक (11-12 फरवरी 2017) के पुणे में दो दिवसीय आवासीय आयोजन का पूरा दारोमदार अकेले कंधों पर सफलतापूर्वक वहन। जिसमें पुणे के अलावा मुंबई, फलटण, गुना, भोपाल, इंदौर आदि स्थानों के तीस से अधिक रचनाकारों की भागीदारी।
प्रकाशित कृति : 
  • काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” 2002 में मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा स्वीकृत अनुदान से प्रकाशित और म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्यक्रम में म.प्र. के महामहिम राज्यपाल द्वारा सम्मानित
  • मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा सन् 1997 से सन् 2000 तक काव्यपाठ हेतु नियमित आमंत्रित।
  • साहित्य अकादमी और महाराष्ट्र राष्ट्रसभा सभा की गोष्ठी में काव्यपाठ सन् 2008।
  • पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशितः कादंबिनीइंडिया टु़डे (स्त्री), वागर्थ, नवनीत, साक्षात्कारभोरकल के लिएआकंठजनसत्ता (सबरंग)शेषवर्तमान साहित्य,गोलाकुंडा दर्पण, समावर्तन के रेखांकित स्तंभ में, कलासमय, मंतव्य-3, वेबदुनिया, अहा ज़िंदगी, यथावत, मुक्तांगण आसरा, सार्थक नव्या, पल्स ऑफ़ इंडिया, विभोम-स्वर,समय के साखी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ-लेख प्रकाशित
  • साहित्य, कला, संस्कृति और इतिहास की द्वैभाषिक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘सेतु’ में कविताएँ प्रकाशित।
  • कैनडा से निकलने वाली पत्रिका ‘पंजाब टुडे’ (13 अप्रैल 2017) के भाषांतर में कविताओं का पंजाबी अनुवाद प्रकाशित।
  • मराठी दिवाली अंक 2015- ‘उद्याचा मराठवाड़ा’ में हिंदी कविता का मराठी अनुवाद प्रकाशित।
  • साथ ही वैबदुनिया ने यू ट्यूब पर मेरी कविताओं को सर्वप्रथम श्रव्य-दृश्यात्मक माध्यम से प्रस्तुत किया.  
  • ANUNAD.com/, asuvidha.blogspot.com/, jankipul.blogspot.com/, kritya.blogspot.com/, medium.com/ samalochan.com/ swaymsidha.blogspot.com/, shabdankan.blogspot.com आदि में लेख-कविताएँ पोस्ट
कार्यानुभव :                     
  • स्वतंत्र पत्रकारिता सन् 1990 से सन् 1997। इंदौर से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र प्रभातकिरण’ में स्तंभलेखन, औरंगाबाद से प्रकाशित पत्र लोकमत समाचार’ में रिपोर्टर, इंदौर से प्रकाशित दैनिक भास्कर में कला समीक्षकनगर रिपोर्टर, पुणे से प्रकाशित आज का आनंद में सहायक संपादक और पुणे के लोकमत समाचार में वरिष्ठ उप संपादक के रूप में कार्य
वॉइस ओव्हर :  
  • पुणे स्थित अंतरराष्ट्रीय कंपनी एस्पायर के लिए 138 दस्तावेजों के वॉइस ओव्हर का कार्य, सीडी में रूपानंतरण, तमाम डॉक्यूमेंट्स का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद भी।
  •  प्राची प्रकाशन, मुंबई से सन् 2006 में प्रकाशित पुस्तक साइकॉलाजी ऑफ लर्निंग एंड टीचिंग (डिप्लोमा इन एजुकेशन के प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए) का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद।
  • उक्त प्रकाशक के लिए महाराष्ट्र शासन के शिक्षा एवं विस्तार विभाग से स्वीकृत एक अन्य पुस्तक एनवायरमेंटल स्टडीज एंड सोशल साइंस का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद (डिप्लोमा इन एजुकेशन के द्वितीय वर्ष के छात्रों के लिए)।
  • पुणे आकाशवाणी के लिए महाराष्ट्र की आषाढ़ी वारी पर कवि दिलीप चित्रे के वृत्त चित्र का सन् 2007 में अंग्रेजी से हिंदी रूपांतरण, जिसे आकाशवाणी का अखिल भारतीय स्तर का प्रथम पुरस्कार प्राप्त। (पूर्व उल्लेखित)
  • CDAC, पुणे के लिए अब तक ग्यारह फिल्मों यथा- तीन मराठी फिल्में – देवुल, एक कप चहा, पाली ते संबुरान, चार कन्नड़ फिल्में कुर्मावतार, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित डॉ. के. शिवराम कारंथ के उपन्यास पर आधारित बेट्टदा जीवा- पहाड़ी इंसान, मौनी एवं स्टंबल,तीन बांग्ला फिल्म निशब्द, जानला एवं सांझबातिर रूपकथा और एक असमी फिल्म – कोयाद के अंग्रेजी सबटाइटल का हिंदी अनुवाद . साथ ही तीन फिल्मों के सब टाइटल्स का वेलिडेशन-नाबार (पंजाबी),शिवेरी (मराठी) और माहुलबनी सेरंग (बांग्ला).
  • CDAC, पुणे के लिए- डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर स्मारक संग्रहालय में रखे जाने वाले छायाचित्रों के अंग्रेजी कैप्शन का हिंदी अनुवाद का कार्य।
  • CDAC, पुणे के लिए- पेटेंट आवेदन प्रकाशन की 150 से अधिक फ़ाइलों के अनुवाद का कार्य।
  • CDAC, पुणे के लिए- जीवन बीमा संबंधी तीन सौ से अधिक फाइलों का अनुवाद।
  • भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान( इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी- आईआईटीएम) और जलवायु परिवर्तन अनुसंधान केंद्र (सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज रिसर्च सेंटर-सीसीसीआर), पुणे के वैज्ञानिक डॉ. मिलिंद मुजुमदार के लिए वैज्ञानिक पर्चों का अनुवाद।
  • गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष और ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक आशुतोष गर्ग  के लिए निरंतर अनुवाद का कार्य।
  • मूषक एप्प के लिए हिंदी में सेवाएँ प्रदत्त।
अंतिम कार्यकाल :         
लोकमत समाचार,पुणे में वरिष्ठ उप संपादक के रूप में 3 जून 2012 - 31 मई 2015 तक।
संप्रति :

·         वेबदुनिया के लिए स्तंभ लेखन।
·         स्वतंत्र अनुवादक
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मोबाइलः +91 9850804068 / ई-मेल : swaraangisane@gmail.com 
cleardot-2/504, अटरिया होम्स, आर. के. पुरम् के निकट, रोड नं. 13, टिंगरे नगर, मुंजबा वस्ती के पासधानोरी, पुणे-411015

3 टिप्‍पणियां:

Rachana Aggarwal ने कहा…

मैं तो मुनिया की दुनियां में खो सी गयी।बेहतरीन वर्णन।

kavita verma ने कहा…

मुनिया की छोटी-छोटी बातें बड़ी सीख।

Anju Sharma ने कहा…

मुनिया की सुंदर छोटी सी दुनिया और बड़ी बड़ी सीख। बहुत आनंद आया।