मंगलवार, 24 मार्च 2009

डॉ कुमार विनोद की गज़लें

जन्मः 10 मार्च 1966, अम्बाला शहर (हरियाणा)
शिक्षा: एम.एससी., एम.फिल., पीएच.डी. (गणित)

प्रकाशन : हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा प्रदत्त अनुदान से काव्य संग्रह कविता ख़त्म नहीं होती प्रकाशित.
राट्रीय स्तर की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, कादम्बिनी, वसुधा, कथादेश, कथाक्रम, आजकल, बया, साक्षात्कार, उद्भावना, अन्यथा, अक्षरा, अक्षर पर्व, हरिगंधा, इरावती, सेतु, द संडे इंडियन, अहा! ज़िंदगी, व्यंग्य यात्रा, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, नई दुनिया, दैनिक भास्कर, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून आदि में कविताएं, ग़ज़लें एवम व्यंग्य प्रकाशित।

प्रसारण: ऑल इंडिया रेडियो एवम दूरदशर्न से रचनाओं का प्रसारण। ऑल इंडिया रेडियो द्वारा आयोजित सर्वभाषा कवि सम्मेलन 2008 में बतौर अनुवादक कवि शमिल। विभिन्न राष्ट्रीय एवम अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में कविता पाठ.

सम्पर्क: डॉ कुमार विनोद, रीडर, गणित विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र-136119 (हरियाणा)
फोन: 094161 37196, 01744 293670
ई मेल­: vinodk_bhj@rediffmail.com

डॉ कुमार विनोद को इस समय के एक महत्वपूर्ण युवा ग़ज़लकार है जो गम्भीरता से लिख रहे हैं. इस बार तत्सम में डॉ कुमार विनोद की गज़लें. हमारे वक्त के कई सवाल इन ग़ज़लों में नज़र आते हैं. चाहे भूख हो या बाज़ार, ग्लोबलाइजेशन हो या ज़मीर की जद्दो ज़हद. एक सरल-सहज भाषा में गढ़ी ये गज़लें पाठक के दिल में सीधे उतरने में कामयाब होती हैं. पढ़ें और अपनी ईमानदार प्रतिक्रिया दें.
- प्रदीप कान्त
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1
आस्था का जिस्म घायल रूह तक बेज़ार है
क्या करे कोई दुआ जब देवता बीमार है

तीरगी अब भी मज़े में है यहाँ पर दोस्तो
इस शहर में जुगनुओं को रोशनी दरकार है

भूख से बेहाल बच्चों को सुनाकर चुटकुले
जो हँसा दे, आज का सबसे बड़ा फ़नकार है

मैं मिटा के ही रहूँगा मुफ़लिसी के दौर को
बात झूठी रहनुमा की है, मगर दमदार है

वो रिसाला या कोई नॉवल नहीं है दोस्तो
पढ़ रहा हूँ मैं जिसे, वो दर्द का अख़बार है

ख़ूबसूरत जिस्म हो या सौ टका ईमान हो
बेचने की ठान लो तो हर तरफ़ बाज़ार है

रास्ते ही रास्ते हों जब शहर की कोख में
मंज़िलों को याद रखना और भी दुश्वार है



2
तल्खियाँ, सारी फ़ज़ा में घोलकर
क्या मिलेगा बात सच्ची बोलकर

गुम हुए ख़ुशियों के मौसम इन दिनों
इसलिए जब भी हँसो, दिल खोलकर

भेद खुल जाएँगे सब आकाश के
देख तो अपने परों को तोलकर

बात करते हो उसूलों की मियाँ
भाव रद्दी के बिकें सब तोलकर

शौक़ बिकने का अगर इतना ही है
जिस्म क्या फिर रूह का भी मोल कर



3
इक यही सूरत बची है आज़माकर देखिए
दुश्मनों को भी कभी समझाबुझाकर देखिए

आँख से रंगीन चश्मे को हटाकर देखिए
ज़िन्दगी के रंग थोड़ा पास जाकर देखिए

रोज़ ख़ुश रहने में यारो है मज़ा कुछ भी नहीं
ज़ायक़ा बदले ज़रा सा ग़म भी खाकर देखिए

कल बड़ी मासूमियत से आइने ने ये कहा
हो सके तो आज मुझको मुस्कुराकर देखिए

छोड़कर ख़ामोशियों को चार दिन तन्हा कहीं
आसमाँ को भी कभी सर पर उठाकर देखिए

ख़ुशबुओं के क़ाफ़िले जाएँगे ख़ुद ही दूर तक
इक ज़रा सा आप फूलों को हँसाकर देखिए



4
है हवा ख़ामोश इसका ये मगर मतलब नहीं
आँधियों ने डर के मारे सी लिए हैं लब, नहीं

सबकी हाँ में हाँ मिला, गर्दन झुकाकर बैठ जा
करके कोशिश देखना आसान ये करतब नहीं

रात के हाथों उजाले आज फिर बेचे गए
है अ़जूबा इसमें क्या, ऐसा हुआ है कब नहीं

जब कभी दैरोहरम में चल पड़े बादेसबा
सबको देती ताज़गी है पूछती मज़हब नहीं

दिल में था जो कह दिया जो कह दिया सो कर दिया
साफ़गोई से इतर आता हमें कुछ ढब नहीं

5
दिल पे लेकर बोझ ख़ाबों का सिकंदर की तरह
फिर भी हँसना चाहता है वो समन्दर की तरह

पूछ मत इतिहास उनका और क्या भूगोल है
पूजते हैं लोग जिनको अब कलंदर की तरह

रिक्शा वाले से छुड़ाया दो का सिक्का लड़झगड़
रात भर चुभता रहा सीने में ख़ंजर की तरह

घर मेरा घर है मेरे बच्चे के दम पर दोस्तो
उल्टी सीधी हरकतें करता है बंदर की तरह

मुद्दतें गुज़रीं न मैंने याद भी उसको किया
कौन बरसा फिर मेरी आँखों से अम्बर की तरह

ज़िंदगी की दौड़ में हर शख़्स आगे बढ़ गया
और मैं दीवार पर लटका कलंडर की तरह

हादसों के इस शहर में जबसे रक्खा है क़दम
हो गए ख़ामोश मेरे होंठ पत्थर की तरह



6
बहुत दिनों के बाद मिले हो ठीक ठाक तो हो
गुमसुम गुमसुम से बैठे हो ठीक ठाक तो हो

एक ज़रा ईमाँ की ख़ातिर यार मेरे तुम तो
दौलत को ठुकरा आए हो ठीक ठाक तो हो

मुनसिफ से इंसाफ़ का मिलना अब नामुमिकन है
सच को सच तुम कह आए हो ठीक ठाक तो हो

चेहरे का रंग उड़ा देखकर देवदार बोला
शहर से आए तुम लगते हो ठीक ठाक तो हो

चाँद मेरी खिड़की में आकर मुझसे ये कहता है
छत पर तुम कम ही दिखते हो ठीक ठाक तो हो

फ्रेम जड़ी तस्वीर में उगते सूरज ने टोका
सुबह देर से क्यों उठते हो ठीक ठाक तो हो



7
ज़िंदगी हँसने हँसाने के लिए
बात अच्छी है सुनाने के लिए

ख़ाब महलों के लिए आँखों में हम
दरब-दर भटके ठिकाने के लिए

एक तितली को सज़ा फिर से हुई
फूल से ख़ुशबू चुराने के लिए

नाउम्मीदी से हमें उम्मीद थी
आएगी, पर लौट जाने के लिए

पूछ मत कितनी मशक़्क़त चाहिए
इक ज़रा सा मुस्कुराने के लिए

एक मुद्दत से लगा हूँ दोस्तो
नींद से ख़ुद को जगाने के लिए
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सभी छाया चित्रः प्रदीप कान्त

5 टिप्‍पणियां:

Arun Aditya ने कहा…

.......
.......

ख़ुशबुओं के क़ाफ़िले जाएँगे ख़ुद ही दूर तक
इक ज़रा सा आप फूलों को हँसाकर देखिए
वाह डॉक्टर साब।

Krishna Patel ने कहा…

एक तितली को सज़ा फिर से हुई
फूल से ख़ुशबू चुराने के लिए

bahut achchha likha aapne.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

डाक्टर साहब की ग़ज़लो के लि्ये शुक्रिया।
विनोद जी न केवल मस्तमौला रचनाकार हैं बल्कि बडे दिलवाले भी।
कथन मे मेरी कविता पढकर उन्होने कहाँ - कहाँ से नम्बर जुगाड के जो फोन किया था उसे उम्रभर नही भूल सकता।
ग़ज़ले आराम से पढने के लिये फिर लौटूँगा।

sandhyagupta ने कहा…

वो रिसाला या कोई नॉवल नहीं है दोस्तो
पढ़ रहा हूँ मैं जिसे, वो दर्द का अख़बार है


बात करते हो उसूलों की मियाँ
भाव रद्दी के बिकें सब तोलकर

Bahut khub.

भगीरथ ने कहा…

ख़ूबसूरत जिस्म हो या सौ टका ईमान हो
बेचने की ठान लो तो हर तरफ़ बाज़ार है
विनोद की गज़ले हमारे समय की चिंताओं को
अभिव्यक्त करतीहै
भगीरथ