शनिवार, 25 अप्रैल 2009

लिख सकूँ तो -



नईम : 01 अप्रैल 1935 - 09 अप्रेल 2009

पिछले दिनों नवगीत के शीर्ष ह्स्ताक्षर नईम हमारे बीच नहीं रहे. हालांकि वे अपने नवगीतों के माध्यम से हमारे बीच हमेशा रहेंगे. तत्सम में इस बार प्रभु जोशी के आत्मीय आलेख के साथ नईम जी का एक नवगीत....

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ये कैसी है, सहर कबीरा? - प्रभु जोशी

साठ के दशक के सर्वाधिक ख्यात नवगीतकार 'नईम' की तीन महीने की लंबी अस्वस्थता के बाद निधन हो गया। वे रोमान के विरुद्ध जीवन के यथार्थ के प्रटिबद्ध कवि थे, जिन्होंने बुंदेलखंड से आकर मालवा को न केवल अपनी कर्मभूमि, बल्कि रचनाभूमि बताया और अपनी कविता में मालवा के शब्दों को बहुत प्रीतिकर बनाया। उनके निधन से निश्चय ही हिन्दी कविता के एक युग पर पूर्णविराम लगा है।

वह भी मृत्यु का एकाएक किया गया लगभग अचूक-सा ही वार था, पर वे संभल गए थे- पक्षाघात ने उनके दाएँ गाल को अपना निशाना बनाया था और वे गाड़ी में मृत्यु से जूझते हुए सीधे अस्पताल के बजाए मेरे घर आ गए थे। मेरे प्रश्न के उत्तर में वे बोले थे- "मौत को पता था कमबख्त मास्टर है, बहुत बोलता है इसलिए गाल पर तमाचा मारा है, वह तो जीभ ही खींचना चाहती थी।" एक पीड़ाग्रस्त हँसी। ऐसे आसन्न क्षण में भी उनके भीतर का हास्यबोध उसी तरह का था, जबकि मृत्यु हँसियों को छीनना अपना पहला हक समझती है। मैं दहल गया था।

इसके बाद यह दूसरा वार था, उसका। इस बार उसने उनसे वह सब कुछ छीन लिया था, जिसको जोड़कर 'नईम' बनता था। वे लगभग तीन महीने से जीवन और मृत्यु के बीच धीमे-धीमे लगातार थरथराते क्षीण से पुल पर खड़े थे। हम उनके जीवन की ओर लौट आने की उम्मीद में थे, क्योंकि जब भी उनसे अस्पताल में मिलने गए, वहाँ डबडबाती भाषा से भरी गीली आँख में जैसे 'नईमाना' अंदाज में सवाल हो, 'ये कौन-सा संसार है?' ... शब्द नहीं, सिर्फ एक आद्य-भाषा थी, जिसके हर्फों को पढ़ने की कुव्वत किसी में नहीं थी- पर, घर के सभी लोग उनकी पीड़ा को ही पहचानते थे और रोज-रोज उसका अपनी इस दुनिया की भाषा में तर्जुमा कर रहे थे।

जबकि, मुझे तो जीवनभर जब भी पहली बार मिले- सवाल करते हुए ही दिखे। उनकी हर शुरुआत सवाल से होती थी और आज फिर वे अपने पीछे मेरे ही नहीं, सबके लिए सवाल छोड़ गए हैं। सिर्फ, हम अपनी तरफ से उसमें 'कबीरा' जोड़ सकते हैं। पिछले दिनों में उन्होंने ' कबीरा' में अपनी, जैसे एक बहुप्रतीक्षित अन्विति पाली थी। जैसे पश्चाताप भी व्यक्त हो तो वे कबीरा से कह रहे हों।

जब से पक्षाघात हुआ था, वे लकड़ी का सहारा लेकर घर-बाजार के बीच घूम भी आते थे। एक दफा मैंने कहा, ' लिए लुकाटी हाथ' आप कहाँ जा रहे हैं? बाजार में। हँसने लगे : कबीर के लिए ये मुमकिन रहा होगा कि लुकाटी हाथ में लेकर बाजार में खड़े हो जाएँ, अब तो बाजार में बटुए के साथ ही जाया जा सकता है। हमारे बटुए में भी रुपए कहाँ, जर्दे की पुड़िया भर मिलेगी। 'और लुकाटी तो अब लट्ठ में बदल गई है, और उन्हीं के बूते पर चुनाव जीत रहे हैं' एक बहुत क्षीण-सा संकेत। लुकाटी। लट्ठ। लकड़ी।

मुझे याद आ रहा है, आपातकाल में एक दिन बोले थे- 'लोग अंडरग्राउंड' हो रहे हैं, ...राजनीति के डर से। हमें तो मौत ही 'अंडरग्राउंड' करेगी। सचमुच ही वे आज 'अंडरग्राउंड' (दफनाए) हो गए। उस मिट्टी की पर्त के नीचे एक कभी न जागने वाली नींद के लिए तैयार कर दिया उन्होंने अपने जिस्म को।

तीन महीने लगे, उन्हें। बोलते होते तो कहते : ' मालवे की मेरी यही कमाई है।' वे बुंदेलखंड से आए थे, लेकिन मालवा की मिट्टी को ही उन्होंने अपना गोत्र बना लिया था, और इससे मालवा की भी पहचान बनी। ...उन दिनों वे 'धर्मयुग' के रंगीन पृष्ठों पर छपने वाले गीतकार की तरह ख्यात थे। एक ईर्ष्या पैदा करने वाला यश प्राप्त था उन्हें। मालवा देश में उनके भी संदर्भ से जाना जाता था।

मुझे याद है, उनकी आखिरी आवाज। मैंने भोपाल के लिए की जा रही यात्रा में यों ही चुहुल के लिए मोबाइल किया। कहा, ' साँस-साँस में दिक्कत-दिक्कत, घुला हवा में जहर कबीरा' । ठहाके के साथ उत्तर- 'तो मियाँ, भोपाल में हो' , लौटते समय उनकी आवाज थी। ' बहुत मलिन है, शक्ल सूरज की, ये कैसी है, ' सहर" (सुबह) कबीरा।' अरे तुमने मजाक-मजाक में मतला दे दिया। गजल पर काम कर रहा हूँ।

आज, ऐसा ही लग रहा है, जैसे सूरज बिना किसी तैयारी के आसमान में आ गया है। धूप धुँधली है। या सूरज ही कहीं आसमान में भटक गया है। धूप को प्यार करने वाले नईम की बिदाई की सोचकर ऐसा ही लग रहा है। कुछ लोगों के जीवन में उनकी उपस्थिति ऐसी ही थी। रौशनी से भरी। लेकिन, वे तो पिछले तीन महीने से अपने ही अँधेरे में धीरे-धीरे उस पुल को पार करते हुए जीवन की तरफ लौटने का उपक्रम कर रहे थे- उनके लिए अब यह दुनिया नहीं रही है। उनकी वापसी की कोशिश पर एक आखिरी पूर्ण-विराम...। शब्द, वाक्य, सभी पूर्ण-विराम पर चुप रहते हैं।

मैंने पिछले दिनों शब्द नहीं, रंग में उनकी इस स्थिति को लेकर एक 'चार बाय छः फुट' की एक पेंटिंग तैयार की थी, जिसमें नजरुल इस्लाम और नीत्शे की तरह 'नईम" के लिए भी, ' टाइम फ्रैक्चर्ड' और ' टाइम-डिस ज्वाइंटेड' की स्थिति थी। उनके लिए मस्तिष्काघात के बाद वक्त टुकड़े-टुकड़े हो गया था। जब वे बड़ी-बड़ी पनीली और पीड़ाग्रस्त आँख से देखते तो मुझे लगता है, वे वक्त के उन टुकड़ों को ढूँढ रहे हैं,... और, अब हम उन्हें ढूँढेंगे- उनके अस्तित्व के टुकड़े-टुकड़े।

लोगों में, जगहों में, शब्दों में- और, हाँ मालवी की मिट्टी के उन कणों में भी, जो अप्रैल की धूप नहीं, किसी ज्वालामुखी के लावे से बने थे। एक ज्वालामुखी उनके भीतर था, जो सिर्फ कविता में ही धधकने की कोशिश करता था, लेकिन वह अंततः देह में फूट पड़ा। वे मालवा की मिट्टी के भीतर दफ्न रहते हुए, अपने कान उस तरफ जरूर खोल लेंगे, जहाँ कभी कुमार गंधर्व मालवा को गाते रहे। नईम देवास में 'घर' बनाते हुए खुद घराना बन गए। उनके इस घराने में सैकड़ों नाम हैं, जिनकी अवसादग्रस्त स्मृति में नईम अपनी हँसियों के साथ हमेशा किलकिलाते रहेंगे। उन्हें मेरा ही नहीं, उन सबकी ओर से भी नमन, जो उस नईम-घराने के हैं।

(आलेख नई दुनिया से साभार)

लिख सकूँ तो—
प्यार लिखना चाहता हूँ,
ठीक आदमजात सा
बेखौफ़ दिखना चाहता हूँ।
थे कभी जो सत्य, अब केवल कहानी
नर्मदा की धार सी निर्मल रवानी,
पारदर्शी नेह की क्या बात करिए-
किस क़दर बेलौस ये दादा भवानी।
प्यार के हाथों
घटी दर पर बज़ारों,
आज बिकना चाहता हूँ।
आपदा-से आये ये कैसे चरण हैं ?
बनकर पहेली मिले कैसे स्वजन हैं ?
मिलो तो उन ठाकुरों से मिलो खुलकर—
सतासी की उम्र में भी जो ‘सुमन’ हैं
कसौटी हैं वो कि जिसपर-
नेह के स्वर
ताल यति गति लय
परखना चाहता हूँ।

6 टिप्‍पणियां:

Harkirat Haqeer ने कहा…

नवगीत के शीर्ष ह्स्ताक्षर नईम हमारे बीच नहीं रहे...यह जानकर दुःख हुआ....जब तब इनका नाम पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाता था ....आज आपसे विस्तृत जानकारी मिली ...!

मौत को पता था कमबख्त मास्टर है, बहुत बोलता है इसलिए गाल पर तमाचा मारा है, वह तो जीभ ही खींचना चाहती थी।" एक पीड़ाग्रस्त हँसी......

रचनाकारों की यही श्ब्दावादी उन्हें औरों से अलग करती है......मेरे श्रद्धासुमन उन्हें अर्पित हैं ........!!

Ek ziddi dhun ने कहा…

नईम जी को खिराजे अकीदत।
आपका ब्लाग अच्छा है, मैं पहली बार यहां पहुंचा और कई पुरानी पोस्ट भी देखीं

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

Naim sahab ka jana navgeet vidha ki hi nahi poore sahity jagat ki chati hai!!

shradhhanjali.

मुनीश ( munish ) ने कहा…

My tributes to Naeem saheb.

Arun Aditya ने कहा…

" आज, ऐसा ही लग रहा है, जैसे सूरज बिना किसी तैयारी के आसमान में आ गया है। धूप धुँधली है। या सूरज ही कहीं आसमान में भटक गया है। धूप को प्यार करने वाले नईम की बिदाई की सोचकर ऐसा ही लग रहा है। कुछ लोगों के जीवन में उनकी उपस्थिति ऐसी ही थी। रौशनी से भरी।"
Prabhu da, ham sab naeem ji se roshni paate rahe hain.bahut hi marmik aalekh hai. padhkar dil bhari hai.

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

आज पता चला,
मगर विश्वास नहीं हुआ!
ऐसे लोग वास्तव में मरते जो नहीं!