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सोमवार, 18 मई 2020

मन से मन की दूरी – अंजू शर्मा की कहानी


इस अंतहीन दौड़ में आदमी दौड़ता तो है पर ट्रेडमिल की तरह ही कहीं पहुँचता नहीं!  जीवन को आहिस्ता-आहिस्ता मशीन में बदलती इस दौड़ में आदमी कब शामिल हो जाता है जान ही नहीं पाता!  

तत्सम पर इस बार अंजू शर्मा की कहानी - मन से मन की दूरी...

प्रदीप कान्त

जिस दिन से वह कार्ड आया है दुनिया बदल गई है विनय की!  नहीं मतलब दुनिया तो अब भी वही है नाइन टू सिक्स के चक्रव्यूह में अभिमन्यु सा फंसा विनय बस दौड़ता ही रहता है!  घर से दफ़्तर, दफ़्तर में केबिन से बॉस के केबिन में, मीटिंग्स में बनी नई नई नीतियों-रणनीतियों, तय किये जाते नए-नए टारगेट्स, उन्हें पाने के लिए हुई फिर और फिर-फिर मीटिंग दर मीटिंग बस भाग ही तो रहा है विनय!  इस अंतहीन दौड़ में आदमी दौड़ता तो है पर ट्रेडमिल की तरह ही कहीं पहुँचता नहीं!  जीवन को आहिस्ता-आहिस्ता मशीन में बदलती इस दौड़ में आदमी कब शामिल हो जाता है जान ही नहीं पाता!  

उस दिन ऑफिस से लौटा तो वह  शादी का कार्ड टेबल पर पड़ा था!  न बच्चों की कोई रूचि थी इन दूर की रिश्तेदारियों में और न ही अपर्णा ने कोई नोटिस लिया!  रूचि लेते भी कैसे बरसों पहले ही, केवल अपने सर्कल में सिमटकर रह गया विनय का जीवन!  माँ-पिताजी के जाने के बाद वह सूक्ष्म तंतु जो विनय को परिवार से बांधे हुए था, वही टूट गया तो रिश्तेदारियां कब तक इकतरफा निभाए जाने का इंतजार करतीं!  उसके ब्याह के बाद मौसी के फोन आते रहे! अपर्णा ने कई बार कहा कि चलो, अलवर घूम आयें पर विनय ने हर बार अनसुना कर दिया! धीरे-धीरे ये सम्पर्क सूत्र भी औपचारिकता भर को रहकर लगभग टूट गया!  

लेकिन इस कार्ड ने जैसे सेंध लगा दी है उसकी इस कसी हुई दिनचर्या में!  कहीं कोई तार ढीला पड़ा नहीं कि लगा जैसे जलतरंग लहरा उठा! दिल के किसी कोने में एक मीठी सी याद ने अंगड़ाई ली तो इस उम्र में भी विनय के मन में एक पहचानी सी हिलोर उठने लगी!  रीढ़ में अनचीन्ही सी सिहरन हुई तो जैसे झनझना उठा तनबदन!  यादों की ट्रेन उस रात फिर रुकी नहीं, अब भी चल रही  है पर अब उसकी दिशा विपरीत है! 

स्मृतियों ने जैसे दो चमकती हुई आँखें पा ली हों! ये आँखें लगी स्मृतियाँ अब लौट रही थीं उन पीछे छूट गये गलियारों में!  और मन, वह तो उन गलियों के धुंधलके में दिये की लौ की मानिंद लहरा रहा था!  घिर गया है विनय राजस्थान की लू भरी आंधियों सी यादों में जो अब ठहर रही हैं, कुछ स्थिर हुआ तो सब स्पष्ट नजर आने लगा!  बाहर तेज बारिश हो रही थी और उस भीगती बरसती रात में  बिस्तर पर करवटें बदलते हुए, नोस्टाल्जिया की उस झील में डूबते उतराते विनय कब गाँव पहुँच गया जान ही नहीं पाया!

नंदा मौसी, माँ की ममेरी बहन, बहन कम सहेली ज्यादा! और मौसा जी भी पिताजी के घर-कुनबे और गाँव के रिश्ते से भाई थे तो इस डबल रिश्ते ने उनके जीवन में जो जगह ली उसने विनय के जीवन को दो माँओं के स्नेह और मिठास से भर दिया था जो नंदा मौसी आजीवन लुटाती रहीं हैं!  कालान्तर में उनके अलवर बस जाने से भी नेह की ये डोर कच्ची न पड़ सकी! आखिर अलवर दूर ही कितना था फिर उनका गाँव आना जाना लगा ही रहता था! 

दूरियां मन के बीच ना होणी चइए रे वीनू!  इतनी तो कभी ना कि उन्हें उलांघ न पावैं! छुट्टियों में आ जइयो मेरे पास!”  उसकी शिकायत पर उसके आंसुओं से तरबतर चेहरे को चूमते हुए कहा था मौसी ने और अपनी साड़ी के पल्लू से उसका चेहरा पोंछते हुए उसे खुद से सटा लिया था! 

फिर एक दिन माँ चली गईं! महज दो दिन के ताप ने उससे माँ को कैसे छीन लिया विनय कभी नहीं समझ पाया! माँ के बिना जीना जैसे सीखता उनका वीनू! एकांत के ऐसे बवंडर में घिरा कि जी घबराने लगा उसका!  बस गाँव के उस घर से मन उचट गया था विनय का! अलवर में रहने जाने में कितना बहाना शामिल था और कितनी जरूरत विनय कभी इस हिसाब-किताब में नहीं पड़ा! 

यूँ जाने को तो सुबह एक ट्रेन जाती थी अलवर, जिसे अद्धा बोलते थे क्योंकि वह आधे घंटे में अलवर पहुँचा देती थी!  बाकी लड़कों की तरह वह डेली अपडाउन भी कर सकता था पर उसे लगने लगा था यहाँ रहा तो अवसाद की इस परत के नीचे एक दिन उसका दम घुट जाएगा! जानते तो पिताजी भी थे तभी तो उन्होंने ख़ामोशी से उसके फैसले पर मुहर लगा दी! पिताजी को भी यूँ घुलते हुए नहीं देख सकता था विनय!  उसने अलवर में ही एक कमरा ले लिया था!  

नंदा मौसी कितना नाराज़ हुई थीं पर विनय जिस एकांत की तलाश में गाँव से यहाँ आया था उसे सीने से लगाये रहने की आदत हो गई थी उसे! अपने दर्द को एक बार जीभर जीने के लिए एकांत बेहद जरूरी था! जिस दर्द को दबाये हुआ था विनय गांव में, यहाँ तनिक एकांत पाते ही वह मेंढ तोड़कर बह निकला!

जाणू हूँ मैं, रोजीना आने-जाने में तेरा टेम खराब होता है पर इतवार को तो आ सके है तू कि तेरा दीदा अब अलवर में लगे है!”  खीजकर कई बार बोले पिताजी पर माँ के बिना वह घर जैसे सायं-सायं करता! 

जब तक गाँव में रहा, शाम को छत पर पढ़ते हुए मोरों को दाना डालता विनय अक्सर माँ को याद कर भावुक हो जाता!  माँ की लगाईतुलसां जीजैसे उसके मन को प्रतिबिम्बित करती हुई अपनी हरियाली को खोने लगी थी!  बारने में लगी मेहँदी की बाड़ अलबत्ता खरपतवार-सी चारों ओर बढ़ रही थी बिल्कुल वैसे ही जैसे विनय के मन का खालीपन दिनोदिन बढ़ रहा था!  

वह उस एक रात में ही कितना बड़ा और परिपक्व हो गया था जिस रात ने उसे इस भरे संसार में अकेले होने का दंश दे दिया! जैसे माँ के साथ उसका सारा बचपना, उसका सारा खिलंदडपन भी विदा हो गया था!  कहाँ तो माँ कह-कहकर थक जाती थी किवीनू, सुधर जा...पर विनय था कितना अव्यवस्थित, कितना लापरवाह, कितना मनमौजी कि सुधरता ही नहीं था! कभी कोई चीज गुम हो जाती तो कभी कोई!  कैसे न होती! माँ के कहे अनुसार कभी कोई चीज ढंग-सिर रखता तो मिलती न समय पर!  

गाँव के उस घर में पहली मंजिल पर एक छोटा सा भंडारघर था, एक बैठक और एक मेहमानों का कमरा जो हमेशा बंद ही रहता था!  बैठक सदा पिताजी के दोस्तों या मिलने जुलनेवालों से आबाद रहती और भंडारघर पर ताला लगा रहता! बुआओं के ब्याह में कोठियार यहीं बनता था!  

ऊपर की मंजिल पर एक बड़ा सा कमरा था जो उसका और माँ का साझा हुआ करता था!  इसी कमरे में एक दीवार पर बने आलों में माँ के बासन धरे रहते और दीवार में बनी अलमारी में बाकी डिब्बे आदि जमे थे!  एक कोने में मिट्टी तेल से जलने वाला माँ काइस्टोपभी रखा था पर माँ को चूल्हे पर रसोई करना पसंद था जो सामने के खुले चौक के एक साइड में बना था! माँ खाना बनातीं और विनय वहीँ पटरा डालकर बैठ जाता! 

इसी के बराबर में एक अन्य कमरा था जो पहले पिताजी प्रयोग करते थे पर जब से विनय समझदार हुआ पिताजी जैसे बैठक में ही शिफ्ट हो गये थे!  इस दूसरे कमरे में धीरे-धीरे विनय समाता चला गया!  दसवीं में आया तो पिताजी ने उसी कमरे में बाकायदा एक टेबल कुर्सी और लैंप की व्यवस्था जमा दी थी! कितनी खुश हुईं माँ उस दिन! उनके शांत चेहरे पर थिरकती संतोष की रेखाएं आज भी नहीं भूला विनय!

माँ को न रहे कितने दिन बीत गये थे पर विनय माँ के न रहने की आदत नहीं डाल पा रहा था!  घर भी तो शिद्दत से माँ को याद करता था!  विनय कभी भूलकर अचार की तलब में खाली मर्तबान में हाथ डाल देता तो कभी बाहर से प्यासा घर में घुसता तो मटके के परिंडे पर से लोटा गायब मिलता! कमीज के टूटे बटन, उधड़ी सीवनें, धूल खाती अलमारी और रसोई से आये दिन गायब रहता कोई न कोई सामान माँ कितनी तरह से अपनी याद दिलाती, विनय उदासी से उबर ही नहीं पाता!       

विनय के कमरे के आगे ही एक चौड़ा सा खुला छज्जा था जिस पर जाने के लिए एक खिड़कीनुमा द्वार बना था!  इसके दोनों सिरों पर ओट थी!  वहीं एक कोने में बैठकर, ओट की टेक लगाकर वह पढ़ाई करता और बराबर में बैठे पिताजी अख़बार पढ़ते हुए भी गली के अवागमन का जायजा लेते थे!  इसी छज्जे के अंतिम सिरे पर, ओट में माँ राख से बासन मांजती थी जिन दिनों पानी कम आता!  

पड़ोस का बूली अपनी ऊँटगाड़ी लेकर निकलता तो खुले छज्जे से बेसाख्ता पुकारता, ‘ताsssss’!  फिर अपनी पुकार पर खुद ही संजीदा हो आगे बढ़ जाता! उसका मिट्टी का ऊँट लहराता हुआ हाथ हवा में रह जाता!  

ताई, अठे कोणी बावले!न कुछ पिताजी बोलते न विनय बस उन दोनों के मन में यही गूंजता जब उस खुले छज्जे पर बैठे वे दोनों खाली आँखों से दूर जाती बूली की ऊँटगाड़ी को तब तक निहारते जब तक वह गली के मुहाने से मुड़कर आँख से ओझल न हो जाती!  पिताजी का अख़बार और विनय की किताब दोनों अनमने हो उठते!  

माँ से ऊँट-हाथी-गुड़िया सजवाने अकेला बूली ही नहीं आता था और भी बच्चे थे गाँव के जो ताई-ताई बोलते उनके पीछे लगे रहते!  माँ के गोटा-पट्टी और शीशे से सजाये ऊँट-हाथी मानो मुँह से बोलते और गुड़िया तो इतनी सुंदर बनाती माँ कि पड़ोस की लड़कियाँ नाच उठतीं!  माँ की अनुपस्थिति में भी उनकी उपस्थिति का अहसास घर पर छाया रहता! घर का कोना-कोना माँ की सुघड़ता और कलाप्रेम का साक्षी था! कितनी गुणी और सुघड़ थीं माँ! माँ के काढ़े मेजपोश, क्रोशिये से बने थालपोश, तरह-तरह की कलाकृतियों से सजा था ये घर!  पढ़ते समय धानी-चना चुगलते हुए माँ के लुगदी से बनाये और बेलबूटों से सजे सुंदर से बर्तन को सहलाते हुए एकाएक भावुक हो उठता विनय लगता जैसे माँ को स्पर्श कर रहा हो!

उनका असमय चले जाना विनय को तबाह कर रहा था!  जानता था विनय माँ की याद एक ऐसा कांटा है जो गड़ा रहेगा उसके सीने में!  उसे उखाड़कर फेंकने की बजाये वक़्त-बेवक्त उसे सहलाकर दर्द को ताज़ा कर देने का यह कैसा सुख था कि विनय से छूटता ही नहीं था! अलबत्ता गाँव जरूर छूट गया!

कॉलेज का वो पहला ही साल था! अलवर आये काफी दिन बीत चले थे! फर्स्ट ईयर के एग्जाम के बाद अकेलापन सताने लगा, उस पर मौसी के तकाजे तो सन्डे को मौसी के यहाँ चला गया! उसे देखकर हैरत में पड़ गया था!  कहीं बाहर मिलती तो शायद ही पहचान पाता!  कद अच्छा खासा निकल आया था!  रंग कितना निखर गया था और नाक नक्शा कुछ इस तरह उभर आया था कि सीधे विनय के सीने में हलचल करता उतर गया!   उससे डेढ़-दो बरस बड़ी, बचपन की नाक पोंछती वो फ्रॉक वाली बातूनी श्रुति की छवि इस स्मार्ट और मॉडर्न श्रुति के सामने आते ही नेपथ्य में चली गई थी! उसकी जगह इस नयी लावण्यमयी मितभाषी श्रुति ने ले ली थी जिसने अब शरमाना भी सीख लिया था!  

विनय को एकाएक याद आने लगा, गाँव की डंडा-बगीची को जो रास्ता खारे कुंए की बगल से गुज़रकर जाता, वहाँ हर शाम तायलों की हवेली के सामने मंजुला जीजी के साथ खड़ी श्रुति उसे मिलती! वे सब मिलकर बगीची जाते!  श्रुति को झड़बेरी बहुत पसंद थी और जीजी को आम! सर्दी-गर्मियों की छुट्टियों की वो शामें इसी सब में बीत जाती बाकी कभी सरकंडों के तो कभी इमली की चिया के पासे बनाकर चक्कन-अष्टा भी खेलते वे लोग!  हारने पर कितना शोर मचाती थी श्रुति!  उसकी साइकिल की सीट पर जाने कितनी बार बैठकर उसने रामसा पीर से मीठी कुईं तक चक्कर खाये होंगे! फिर कुछ साल वह नहीं आई तो विनय की बाल स्मृतियों की एल्बम से उसके चित्र कुछ धूमिल से होते चले गये!  

ये वीनू है न आंटी?”  वीनू को औचक आया देख उसी ने पूछा था!

बताया तो था मौसी ने कि बचपन में पास के गाँव से उनके घर रहने आने वाली उनकी सहेली की बेटी श्रुति अब हॉस्टल चली गई थी! होस्टल की आबो-हवा खूब रास आई थी श्रुति को!  खिलकर आया था उसका पूरा व्यक्तित्व कि उसके चुम्बकीय आकर्षण को नज़रंदाज़ नहीं कर पाया विनय! नजर ही नहीं हटती थी विनय की! उसके मन की दरारों पर इस इकतरफ़ा, पहले प्रेम ने जैसे कोई शीतल लेप लगा दिया हो!  बदल रहा था विनय!
   
बीए फाइनल की परीक्षा देकर वह यहाँ अलवर घूमने आई थी और उन दिनों विनय को जैसे कोई अदृश्य डोर बार-बार खींचते हुए मौसी के घर ले जाती!  मौसी उसे देखकर सुखद आश्चर्य से भर जातीं!  फिर एक दिन मौसाजी ने दीपांकर भाई के साथ जाकर उसका हिसाब किया और कमरा खाली करवा उसे घर ले आये!  हैरत में था विनय कि शुरुआती नानुकर के बाद कैसे वह चुपचाप मौसाजी के साथ चला आया!

नहीं जानता विनय कि उसके लिए वह प्रेम था या महज आकर्षण या विनय की ही नजर का धोखा कि वह भी उसकी उपस्थिति से कुमुदिनी की तरह खिल जाती प्रतीत होती! वे लोग मिलकर सीढ़ियों पर बनी उस खास जगह पर जो तपती लू से भरी गर्मियों में भी ठंडी रहती, बैठकर घंटों ताश खेलते या फिर कैरमबोर्ड की बाज़ी जमती! उसे देखते हुए विनय लाख सावधानी बरतता पर उसकी चोरी अक्सर पकड़ी जाती! श्रुति के चेहरे पर सदा बनी रहने वाली स्मित मुस्कान की लकीरें कुछ और गहरी हो जातीं और विनय झेंपकर नज़र झुका लेता और मुँह में धानी चने चिगलने लगता! दीपांकर भाई, मंजुला जीजी, छुटकी, वह और श्रुति, शाम को जब कभी वे सब कंपनी बाग़ घूमने जाते श्रुति और मंजुला जीजी साथ-साथ घूमती और वह बस उन्हें अपलक निहारा करता!  

वह जान ही नहीं पा रहा था कि ये क्या है जो उसके मन के हर घाव पर मरहम सा लगाकर उसे एक अनदेखी सी शीतलता से भिगो रहा है!  उसके रेगिस्तान से सूखते जीवन में प्रेम कुछ ऐसे बरस रहा था कि पता ही नहीं चला मन की बंजर जमीन में प्रेम का बिरवा कब साँस लेने लगा!  उसने सुना था मृत्यु जीवन से शक्तिशाली है पर प्रेम मृत्यु से भी अधिक ताकत रखता है!  

उस एक महीने में वह कभी किसी को नहीं कह पाया कि श्रुति ने उसकी बेरंग, उदास दुनिया को कितने इन्द्रधनुषी रंगों से भर दिया था!  श्रुति को भी नहीं! तब भी नहीं मौसी के कहने पर उसके साथ चूड़सिद्ध के मेले में गया था! मन्नत का धागा बांधते हुए श्रुति ने उसकी ओर जिस दृष्टि से देखा उस मौन में उसे प्रेम के अतिरिक्त कोई आवाज़ सुनाई न दी! वहाँ कल-कल बहते पानी में अटखेलियाँ करती श्रुति ने डगमगाते हुए अनायास ही कसकर पकड़ लिया था विनय का हाथ!  उस पकड़ में कोई सहजता रही होती तो विनय उसे नजरंदाज़ कर देता लेकिन स्पर्श की स्नेहिलता और श्रुति की खिलखिलाहट दोनों ने जैसे सम्मोहित कर दिया विनय को! उसका मन किया था कि समय यूँ इसी पड़ाव पर थम जाये सदा के लिए!  पर लौटना भी जरूरी था और वे लौटे भी!  

फिर एक शाम गोपाल टाकिज में पिक्चर देखने गए थे सब!  वे पाँचों! सब कितना सुहावना था! लौटते ही उसने मौसी को श्रुति की मम्मी से बातें करते सुना!  श्रुति को अपने घर की बहू बनाने का मौसी का सपना अब पूरा होने जा रहा था!  और वह, वह तो जड़वत हो गया था जैसे! मौसी के इस सपने से वह पूरी तरह अनभिज्ञ था पर श्रुति? पता नहीं वह कितना जानती थी! श्रुति के भावहीन चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं था कि विनय भी कुछ साहस जुटा पाता!  शायद कर्तव्यबोध प्रेम पर भारी पड़ गया!  इस दुनियादारी के पलड़े में प्रेम ही सदा क्यों हल्का बैठता है, नहीं समझ पाया वह!  पर यदि श्रुति के चेहरे पर कुछ होता भी तो क्या कर सकता था उन परिस्थितियों में विनय!  दीपांकर भाई और श्रुति को एक साथ रखकर देखता तो मन हाहाकार कर उठता!

उस रात भूख न लगने का बहाना बनाकर वह छत पर जाकर लेट गया था! उस रात पूरी तरह भीगी आँखों से धुंधले तारे ताकते हुए वह सीढ़ियों पर दो पगथलियों की आहट सुनता रहा जो उस तक पहुँचे बिना, अधबीच से ही लौटती रहीं!

अगले ही दिन बहाने से वह गाँव लौट आया था!  चूड़सिद्ध के मेले से छिपाकर लाया लाल लाख के जड़ाऊ कंगनों का जोड़ा, जिसे वह कभी श्रुति को नहीं दे पाया वहीं माँ के उस आले में रख दिया था विनय ने, जिसे माँ मंदिर कहती थी! 

दीपांकर भाई की शादी के समय वह दिल्ली चला आया था! तब गिरिराज चाचा यहीं थे! उसके बाद की पढ़ाई दिल्ली में उनके साथ रहकर ही हुई!  ट्रेनिंग पूना में और नौकरी मुंबई, बैंगलोर, अहमदाबाद होते हुए फिर दिल्ली में!  फिर कभी नहीं लौटा वह अलवर! मंजुला जीजी की शादी के वक्त वह ट्रेनिंग के लिए पूना में था!  कुछ मजबूरी थी और कुछ उसके लगभग इकतरफ़ा होने को धकेल दिए गये प्रेम का वह हश्र, उसका जख्म अभी हरा था!  मौसी का प्रेम उसे खींचता था पर बारहा सोचने के बाद भी वह जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया! रिश्तेदारियों की सारी औचारिकतायें पिताजी ही निभाते रहे!  उसने जी कड़ा कर लिया, उसे लगा शायद इसी में सबकी बेहतरी है! 

उसकी शादी गाँव में नहीं दिल्ली में हुई!  मौसी और मंजुला जीजी तब हफ्ते भर दिल्ली रही थीं!  गाँव जाने से हमेशा बचता रहा विनय!  तभी गया जब पिताजी बीमार पड़े! उसकी जिद के आगे सदा हारते रहे और इस बार भी विनय की ही चली!  चलाचली की बेला में उन्हें विनय के साथ दिल्ली आना ही पड़ा!  कब तक अकेले पड़े रहते वहाँ!  

उनके स्वर्गवास के बाद मौसी, मौसाजी दिल्ली आये थे और ये उनकी आखिरी मुलाकात थी! उस रात मौसी के गले लगकर कितना रोया था विनय! लगा जैसे बरसों का गुबार बह निकलने का ही रास्ता ढूँढ़ रहा था! इस रात ने विनय को पत्थर में बदलने से बचा लिया था! गाँव के घर की चाबी उसने गिरिराज चाचा को सौंप दी थी जो रिटायरमेंट के बाद गांव में जा बसे थे! उस घर से माँ की सब स्मृतियों के साथ निकला विनय पिताजी के जाने के बाद कभी गाँव नहीं लौटा!  माँ की स्मृतियों से विहीन वह घर अब उसका कहाँ रहा!  

इन पिछले सत्रह वर्षों में कितना कुछ बदल गया!  दुनिया क्या से क्या हो गई!  उसका ज़ख्म भी अब शायद भर गया है! बारह बरस की छुटकी अब शादी के योग्य हो गई है, सोचकर मुस्कुरा दिया विनय!  इधर अपर्णा संग विवाह से अपने जीवन के साश्वत खालीपन को भर दिया उसने! उसके अधूरे जीवन को पूर्णत्व और प्रेम से संवार दिया था अपर्णा ने!  

वक़्त के पास हर जख्म का मरहम है!  मन की टूटन कहीं पीछे छूट गई है!  सदा से एकाकी विनय अब भरे-पूरे परिवार का सुख उठाते हुए पूर्णता के अहसास से भरा रहता है! इस व्यस्त दिनचर्या में चुपके से जगह बनाती स्मृतियाँ अब कचोटती नहीं, सहलाते हुए एक विचित्र से सुकून से भर देती हैं! पता नहीं उम्र का असर है या परिपक्वता का या उन सत्रह वर्षो के समयकाल का कि श्रुति को लेकर आज भी मन में एक हिलोर तो उठती है पर मन की कसक पर अब काबू पा चुका है विनय! आज उसके मन में अधूरेपन की कसक नहीं पहले प्यार की मधुर स्मृतियाँ बची रही हैं!  बस एक बार उसे फिर से देख पाने का मन है! अपनी इस आकांक्षा की पवित्रता पर विनय को अब तनिक भी अंदेशा नहीं!  उसने अपने मन को एक बार फिर टटोला!  हाँ, अब वह पूरी तरह तैयार है उसके सामने जाने के लिए!  उसने सोचा और मुस्कुराया!  

दूरियां मन के बीच ना होणी चइए रे वीनू!  इतनी तो कभी ना कि उन्हें उलांघ न पावैं!”  मौसी के कहे शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे! उसने उन दूरियों को उलांघने भर का साहस जुटा लिया था!

अपर्णा, सो इट इज डिसाइडेड.... हम छुटकी की शादी में अलवर जरूर जायेंगे!”  उसने कार्ड हवा में लहराते हुए पूरे उत्साह से, किसी रहस्योद्घाटन की तरह घोषणा की!  टीवी पर क्रिकेट का मैच देखते अपर्णा और बच्चों ने उसे कुछ अचरज, कुछ अविश्वास से निहारा, फिर एक दूसरे को देखा और चुपचाप टीवी देखने लगे!

अंजू शर्मा, दिल्ली में जन्म और रिहाइश, मूलतः राजस्थान से! स्वतंत्र लेखन! 

प्रकाशन :  पिछले कई वर्षों से सभी प्रतीक्षित पत्र-पत्रिकाओं और ब्लोग्स में वर्षों से कविताओं, कहानियों, लेखों, रिपोर्टों का प्रकाशन!   

पुस्तकें: 

2014 में कविता-संग्रह *"कल्पनाओं से परे  का समय"* बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित! 
2018 में दूसरा कविता-संग्रह *चालीस साला औरतें’* अधिकरण प्रकाशन से प्रकाशित! 
2018 में कहानी संग्रह *एक नींद हज़ार सपने’* सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित    
2019 में एक डिजिटल लघु-उपन्यास *मन कस्तूरी रे’* मातृभारती डॉट कॉम पर प्रकाशित  
दूसरा कहानी संग्रह *सुबह ऐसे आती है* भावना प्रकाशन से 2020 में प्रकाशित
उपन्यास *शांतिपुरा - टेल ऑफ लव एंड ड्रीम्स* डायमंड बुक्स से 2020 में प्रकाशित
प्रेम कहानियों का संग्रह *रात के हमसफ़र*  शोपिज़ेन पर प्रकाशित

2017 में मातृभारती पर प्रकाशित हिंदी के पहले इ-उपन्यास *आइना सच नहीं बोलता*में सहलेखक!   

अनुवाद
पंजाबी, उर्दू, गुजराती, मराठी, राजस्थानी, भोजपुरी, नेपाली, उडिया आदि भाषाओँ में कविताओं का अनुवाद!

परिकथा में 2015 में प्रकाशित  कहानी 'आज शाम है बहुत उदासपंजाबी और उर्दू में अनूदित हुई!  जनसत्ता में 2016 प्रकाशित कहानी 'पत्ता टूटा डाल से' के पंजाबी अनुवाद की अनुमति ली गई। पहली कहानी 'गली नंबर दो' का Norwich Writers Centre में अनुवाद लेखकों के लिए अंग्रेजी में अनूदित अंश का शोकेस बुकलेट के तौर पर प्रस्तुतिकरण।  संवेदन में 2016 में प्रकाशित कहानीछत वाला कमरा और इश्क़ वाला लवका प्रतिलिपि के "ट्रांसलेशन चैलेन्ज प्रोजेक्टके अंतर्गत गुजराती और तमिल भाषाओँ में अनुवाद के लिए चयन! 

अन्य गतिविधियाँ :
आलोचना में प्रकाशित कवितादोराहाकी सुप्रसिद्ध रंगकर्मी लेखिका उमा झुनझुनवाला के निर्देशन में अभिनयात्मक प्रस्तुति!
कविता चालीसा साला औरतें बहुत चर्चित हुई और राष्ट्रीय स्तर पर कई कार्यक्रमों के माध्यम से इस पर लगातार बातचीत हुई!
कविता 'बेटी के लिए' चीन के 'क्वांगचो हिंदी विश्वविद्यालय, क्वांगचो, चीनमें स्नातक स्तर के पाठकों के लिए पाठ्यक्रम में पढाई जा रही है!
प्रतिलिपि की कई कथा प्रतियोगिताओं में बतौर निर्णायक जुड़ाव!
देश के कई महत्वपूर्ण मंचों से कविता और कहानी पाठ 

पुरस्कार 
*'इला त्रिवेणी सम्मान 2012' से सम्मानित।
*'राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013' से सम्मानित
*स्त्री शक्ति सम्मान 2014 से सम्मानित
*कविता संग्रह 'कल्पनाओं से परे का समय' के लिए 2015 में 'राजेन्द्र बोहरा कविता पुरस्कार 2014'  द्वारा जयपुर में सम्मानित
*साहित्य श्री पुरस्कार 2018 द्वारा मेरठ लिटरेचर फेस्टिवल में सम्मानित 
कहानी *मुख़्तसर सी बात है* साहित्य समर्था के विशिष्ट कथा सम्मान से सम्मानित

पुरस्कृत कहानियां : 
कहानी 'समयरेखा' स्टोरीमिरर से पुरस्कृत। 
कहानी 'बन्द खिड़की खुल गई' प्रतिलिपि द्वारा आलोचक द्वारा चुनी गई कहानियों में शामिल।
कहानीरात के हमसफ़रजयपुर में पहले कलमकार सम्मान 2018 के सांत्वना पुरस्कार के लिए चुनी गई!
पता : 41-A, आनंद नगर, इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन के सामने, दिल्ली-110035

फ़ोन : 9873851668
ईमेल :  anjuvsharma2011@gmail.com

गुरुवार, 26 मई 2016

दुनिया में ताकतवर बनना कितना आसान है?

तत्सम इन दिनों अनियमित है, कुछ व्यस्तताऐं हैं किन्तु माफी माँगना ठीक नहीं क्योंकि लोग कहते हैं समय होता नहीं निकालना पड़ता है। बहरहाल, तत्सम पर इस बार चेखव की एक कहानी… । आपने पहले भी ज़रूर पढ़ी होगी, फिर से पढ़िए क्योंकि यह हमेशा प्रासंगिक रहेगी …

-प्रदीप कान्त


कमजोर - अंतोन चेखव

आज मैं अपने बच्चों की अध्यापिका यूलिमा वार्सीयेव्जा का हिसाब चुकता करना चाहता था।

''बैठ जाओ, यूलिमा वार्सीयेव्जा।'' मेंने उससे कहा, ''तुम्हारा हिसाब चुकता कर दिया जाए। हाँ, तो फैसला हुआ था कि तुम्हें महीने के तीस रूबल मिलेंगे, हैं न?''

''नहीं,चालीस।''

''नहीं तीस। तुम हमारे यहाँ दो महीने रही हो।''

''दो महीने पाँच दिन।''

''पूरे दो महीने। इन दो महीनों के नौ इतवार निकाल दो। इतवार के दिन तुम कोल्या को सिर्फ सैर के लिए ही लेकर जाती थीं और फिर तीन छुट्टियाँ... नौ और तीन बारह, तो बारह रूबल कम हुए। कोल्या चार दिन बीमार रहा, उन दिनों तुमने उसे नहीं पढ़ाया। सिर्फ वान्या को ही पढ़ाया और फिर तीन दिन तुम्हारे दाँत में दर्द रहा। उस समय मेरी पत्नी ने तुम्हें छुट्टी दे दी थी। बारह और सात, हुए उन्नीस। इन्हें निकाला जाए, तो बाकी रहे... हाँ इकतालीस रूबल, ठीक है?''

यूलिया की आँखों में आँसू भर आए।

"कप-प्लेट तोड़ डाले। दो रूबल इनके घटाओ। तुम्हारी लापरवाही से कोल्या ने पेड़ पर चढ़कर अपना कोट फाड़ डाला था। दस रूबल उसके और फिर तुम्हारी लापरवाही के कारण ही नौकरानी वान्या के बूट लेकर भाग गई। पाँच रूबल उसके कम हुए... दस जनवरी को दस रूबल तुमने उधार लिए थे। इकतालीस में से सताईस निकालो। बाकी रह गए चौदह।''

यूलिया की आँखों में आँसू उमड़ आए, ''मैंने सिर्फ एक बार आपकी पत्नी से तीन रूबल लिए थे....''

''अच्छा, यह तो मैंने लिखा ही नहीं, तो चौदह में से तीन निकालो। अबे बचे ग्यारह। सो, यह रही तुम्हारी तनख्वाह। तीन,तीन... एक और एक।''

''धन्यवाद!'' उसने बहुत ही हौले से कहा।

''तुमने धन्यवाद क्यों कहा?''

''पैसों के लिए।''

''लानत है! क्या तुम देखती नहीं कि मैंने तुम्हें धोखा दिया है? मैंने तुम्हारे पैसे मार लिए हैं और तुम इस पर धन्यवाद कहती हो। अरे, मैं तो तुम्हें परख रहा था... मैं तुम्हें अस्सी रूबल ही दूँगा। यह रही पूरी रकम।''

वह धन्यवाद कहकर चली गई। मैं उसे देखता हुआ सोचने लगा कि दुनिया में ताकतवर बनना कितना आसान है।

(हिन्दी समय से साभार)


सोमवार, 21 अप्रैल 2014

सुषमा मुनीन्द्र की कहानी

मन मोहने का मूल्य
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अन्तर्गत बलात्कार के जुर्म में भजनलाल को दस साल कैद की सजा।
दस हजार की आबादी वाला बदेरा मौके-मौके पर स्तब्ध होता रहा है। कचहरी के इस फैसले पर भिन्न भाव से स्तब्ध हुआ। स्तब्ध यूं कि बदेरा की सरजमीं में जो भी उत्थान - पतन हुये, बलात्कार जैसा प्रसंग पहला है। बदेरा अब तक बेस्ट क्वालिटी टमाटरों के प्रचुर उत्पादन और उच्चतर माध्यमिक विधालय के शत-प्रतिशत परिणाम के लिये ख्यात रहा है। अब बलात्कार के मददेनजर स्थानीय अखबारों की सुर्खी बन एक पृथक किन्तु बड़ी पहचान के रूप में चिनिहत हुआ। टमाटरों पर चर्चा करें तो जब से बदेरा को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के फलस्वरूप एक पुख्ता सड़क नसीब हुर्इ है टमाटर बैलगाड़ी, ट्रैक्टर ट्राली, ट्रक, साइकिल, झौआ बहियों में ल दकर सुदूर क्षेत्रों में आपूर्ति कर रहे हैं। विधालय का यह है होते-होते चार बरस हुये शासकीय हो गया है और तीन सौ रुपिया मासिक पर गुरूजी बने बेरोजगार युवक शासकीय वेतनमान के हकदार हो गये हैं। पहले यहाँ माध्यमिक कक्षायें चलती थीं। मैं चुनाव जीत गया तो स्कूल को सरकारी बनाने में जान लड़ा दूंगा जैसी स्थानीय विधायक की संकल्पना पर  बदेरा के जोशीले बेरोजगार युवकों ने उच्चतर माध्यमिक कक्षायें शुरू की। विधायक ने जान लड़ार्इ अथवा नहीं, विधालय शासकीय हो गया है। आरम्भ  में बदेरा  के युवक कक्षायें लेते थे पर अं ग्रेजी और विज्ञान विषय पढ़ाना उनकी दक्षता में एकदम नहीं था। इस निमित्त तीन बाहरी अध्यापकों को फेकेल्टी में जोड़ा गया। इन्हीं में नया-नया एम. एस-सी. फिजिक्स हुआ भजनलाल प्रकाश में आया। कृतज्ञ बदेरा ने स्वीकार किया भजन गुरूजी से अच्छा भौतिक शास्त्र कोर्इ नहीं पढ़ा सकता। उसी भजन ने बदेरा की लुटिया डुबो दी। शुरुआती दिनों में विधालय प्रबंधन और भजन एक अलिखित समझौते के अनुसार व्यवहार करते थे।
प्रबंधन ने स्पष्ट किया -
''तीन सौ रुपये मासिक मिलेंगे, नहीं भी मिलेंगे।
भजन ने पूंछा ''क्यों मिलेंगे और क्यों नहीं मिलेंगे?
''विधार्थियों की संख्या बढ़ेगी, फीस आयेगी तो मिलेंगे वरना नहीं मिलेंगे।
''मैं सप्ताह में एक-दो बार आ सकता हूँ , नहीं भी आ सकता हूँ ।
सुषमा जी की की कहानियाँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती है। यह कहानी मुझे सम्बोधन के महिला कथा विशेषांक में पने को मिली तो मैने मंगा ली। और उन्होने सहर्ष मुझे यह कहानी भिजवा दी। तत्सम में इस बार यही कहानी....। इस पर मैं इतना ही कहूंगा कि बडी रोचक कहानी है और अंत में स्तब्ध करती है। बाकी आप पढ़िये और कहिये।
-    प्रदीप कांत
''क्यों आ सकते हैं, क्यों नहीं आ सकते हैं?
''विधायकजी का आश्वासन है स्कूल सरकारी हो जायेगा इसलिये आ सकता हूँ । पापी पेट के बन्दोबस्त के लिये बेला में मुझे टयूशन करनी होती है, इसलिये नहीं आ सकता हूँ ।
इस आपसी सौहाद्र में विधार्थियों की रुचि-अरुचि नहीं थी। उन्हें ज्ञान अर्जन के बिना उत्तम परिणाम वाली अंक सूचि चाहिये थी जो नकल के जोर पर वे पा लेते थे। स्थानीय गुरुओं की रुचि-अरुचि नहीं थी क्योंकि खेती-किसानी, राजनीति, सटटा-गांजा, मामला-मुकदमा जैसी तिकड़मों के कारण वे स्वयं नियमित उपसिथति नहीं देते थे। बोर्ड परीक्षाओं में शत-प्रतिशत परि णाम जैसी प्रगति का हल्ला ऐसा मचा कि जिले और कस्बा के जो विधार्थी दसवीं और बारहवीं में उत्तीर्ण नहीं हो रहे थे, बदेरा केन्द्र से चान्स मारने लगे। हवा ऐसी बही जब बदेरा की बहू-बेटियां बारहवीं उत्तीर्ण कहाने लगीं। प्रवेश और परीक्षा के मोटे शुल्क ने अध्यापकों का वेतन कुछ उत्साहजनक कर दिया। वेतन वृद्धि  से अध्यापकों ने  उपसिथति बढ़ार्इ। विधार्थियों को नियमितता बढ़ानी पड़ी। सहशिक्षा में कुछ रचनात्मक हो ही जाता है।  छात्राओं के स्कूल बैग से प्रेम पत्र बरामद होने लगे और बदेरा की माताओं को समय रहते छात्राओं के हाथ पीले कर देने जैसा शूल उठने लगा। नजाकत ऐसी प्रवेश, प्रायोगिक फिर लिखित परीक्षाओं में बाहरी छात्र आ ते और आंख मार, आय लव यू बोल, रूमाल फहराकर बदेरा की छात्राओं के दिलों में लहरी जगाकर लौट जाते। छात्रायें एक तरह का गुरूर रखने लगीं कि वे इतनी काबिल जरूर हैं जब डिजाइनर टी शर्ट और भारी जूतों वाले शहरी लड़के उन पर फिदा होते हैं। इन गम्भीरताओं में लिप्त बदेरा को खबर न थी भजन गुरूजी और मिसरी (अंक सूचियों में नाम मिश्री है पर लोग मिसरी कहते हैं तो हमें भी कहना होगा) की आशिकी पुख्ता होकर बलात्कार जैसी ऊँचार्इ को छू लेगी। आरमिभक दिनों में भजन नियमित नहीं आता था। जिस दिन आता पढ़ाकर  बेला लौट जाता।  कभी रुकना पड़ता तो शाला भवन में रुक जाता।  स्कूल सरकारी हुआ तब प्राचार्य ने सख्ती बढ़ा दी --
''आपको अब नियमित होना है।
भजन ने माना ''होना ही है। बदेरा में रहने का इंतजाम कर लूं।
ठौर मिली राम बरन के घर में।
ठिकाना बना मिसरी के दिल में।
मिसरी के बेटे राम जनम और राम दरस बदेरा विधालय से लगभग अस्सी प्रतिशत प्रति वर्ष कबाड़ रहे थे। गृह जिला में विक्रय कर विभाग के बाबू पद से समृद्धि बटोर रहा मिसरी का पति राम बरन सप्ताहांत में बदेरा आ या। राम जनम ने भजन गुरूजी की अनुशंसा की -
''पापा, कुयें से लगा पम्प वाला कमरा गुरूजी को किराये पर दे दो। पम्प कोने में है, बाकी जगह में गुरूजी रह लेंगे। मेरी फिजिक्स अच्छी हो जायेगी। यह बारहवीं का इम्तहान है। नम्बर अच्छे आने चाहिये।
राम बरन ने प्रपंच किया ''मैं यहाँ रहता नहीं हूँ । तुम इस साल, अगले साल राम दरस बाहर प ढ़ने चले जाओगे। तुम्हारी अम्मां यहाँ अकेले होंगी। बाहरी आदमी को रखना ठीक नहीं है।
लैनटर्न थामे कुछ भरमाये कुछ बौराये से गुरूजी और ट्रांजिस्टर से फूटती संगीत लहरी 'शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो ....... मानो गुस्ताखी का हौसला दे रही थी। मिसरी को लगा एकांत की एक पीड़ा होती है। वह अपने परिवार में खूब खुश, खूब तुष्ट है जो दरअसल खुश और तुष्ट होना नहीं है।
इधर भजन का  अनुमान लें तो जवान  खून  नहीं था तो तुरंत जोश पकड़ता, उसके भीतर एक लरज, एक धुकधुकी जरूर प्रस्फुटित हो गर्इ। लगा परिवार के संदर्भ में जो सुख है वह है पर उसके समानान्तर जरा सी उमंग, जरा सी दिलचस्पी बने तो जनम सफल हो जाये। जल्द ही साझा न्यूनतम कार्यक्रम तय हुआ - एक दूसरे पर दावेदारी न करते हुये दोनों प्रेम अपने-अपने परिवार से करेंगे। कभी-कभी कौतूहल पा लेंगे।
मिसरी हर हाल में बेटों की किस्मत बनाना चाहती थी, बोली -
''यह कैसी बात? तुम जिनके घर में रहते हो, उनके लिये बाहरी ही हो। भरोसा करना पड़ता है।
''भरोसा नहीं होता।
''गुरूजी की स्कूल में कितनी इज्जत है। पढ़ार्इ में मेरी और राम दरस की मदद करेंगे। कुंयें में नहा लेंगे, पम्प वाले कमरे में सो जायेंगे, इतवार और दीगर छुटिटयों में बेला चले जायेंगे। पाप ठीक तो है। कह कर राम जनम ने राम बरन को मना लिया।
विक्रय कर विभाग से प्राप्त अच्छी कमार्इ से निर्मित बदेरा के सबसे आलीशान मकान में भजन की अगुआर्इ हुर्इ। भजन को यह सुजलाम - सुफलाम जगह पसंद आर्इ। चौगान में इंदारा, इंदारे को घेरती हुर्इ श्यामा तुलसी की लहलहाती झाडि़यां, मकान के पीछे आम, आंवला, बेल, चीकू के दरख्तों से सम्पन्न बगीची, दो गायों वाली सार। भजन ने परिसर की सराहना की -
''राम बरनजी, यह खूब खुली जगह है, जिसका आप लोगों ने अच्छा उपयोग किया है।
राम बरन ने शान से मिसरी को निहारा ''मैं यहाँ नहीं रहता हूँ। इंतजाम गृहिणी का है।
बदेरा से अस्सी और तिरासी प्रतिशत लेकर, आगे की पढ़ार्इ के लिये राम जनम और राम दरस के जबलपुर जाने तक मिसरी और भजन में उल्लेखनीय संवाद नहीं हुआ था। आगे कुछ खास कारण नहीं बने, नजदीकियां बन गयीं। स्कूल में मीटिंग थी अत:  भजन देर से लौटा था। देखा, मिसरी तुलसी के पौधों से मंजरी तोड़कर अलग रख रही है। सीधे पल्ले की साड़ी, सिर से सरक जा रहा आंचल, चेहरे पर पड़ती सूर्य की विदा होती संतरी किरणें। मिसरी की जो भी आभा रही हो, भजन को लगा मिसरी को पहली बार देखा है। कहें भली प्रकार पहली बार देखा है। भजन प्रेरित हुआ -
''क्या हो रहा है भौजी?
''मंजरी तोड़ रही हूँ । मंजरी से पौधों की बाढ़ रुकती है।
''हां, पूरा इलाका तुलसी की महक से भरा रहता है।
''औरतें काढ़ा बनाने के लिये यहीं से तुलसी दल ले जाती हैं।
''कहते हैं तुलसी के सात पत्ते मुंह में रख कर परीक्षा दो तो पूरा पर्चा हल हो जाता है। मैं यही करता था।
''हमने भी तुलसी के भरोसे परीच्छा पास की।  जानते हैं तु लसी को चबाना नहीं चाहिये। दोस  होता है।
''दोष नहीं, चबाने से दांतों का इनेमल खराब हो जाता है।
''यह क्या होता है, हमें पता नहीं।
मिसरी ने जिस कौतुक से भजन को देखा, भजन को अपने भीतर कुछ संचार होता जान पड़ा।
तुलसी से हुआ सूत्रपात अबाह में सानी बनाते हुये जोर पकड़ने लगा। भार्इ जान ( गाय-भैंस चराने वाले बूढ़े लगुआ का नाम भार्इ जान कैसे पड़ा नहीं मालूम पर उसके बच्चे भी उसे भार्इ जान कहते हैं) गायों को सानी-पानी देने नहीं आया था।
भार पड़ा मिसरी पर। बदेरा में दोपहर दो से शाम आठ तक विधुत प्रवाह बंद रहता है। मिसरी सानी बनाये अथवा लालटेन पकड़े। उसने इंदारा के पास फाइबर चेयर पर बिराजे, ट्रांजिस्टर थामे फिल्म संगीत सुनते भजन से सहायता मांगी -
''गुरूजी, रोसनी दिखा दें, हम सानी बना लें।
लैनटर्न थामे कुछ भरमाये कुछ बौराये से गुरूजी और ट्रांजिस्टर से फूटती संगीत लहरी 'शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो ....... मानो गुस्ताखी का हौसला दे रही थी। मिसरी को लगा एकांत की एक पीड़ा होती है। वह अपने परिवार में खूब खुश, खूब तुष्ट है जो दरअसल खुश और तुष्ट होना नहीं है।
इधर भजन का  अनुमान लें तो जवान  खून  नहीं था तो तुरंत जोश पकड़ता, उसके भीतर एक लरज, एक धुकधुकी जरूर प्रस्फुटित हो गर्इ। लगा परिवार के संदर्भ में जो सुख है वह है पर उसके समानान्तर जरा सी उमंग, जरा सी दिलचस्पी बने तो जनम सफल हो जाये। जल्द ही साझा न्यूनतम कार्यक्रम तय हुआ - एक दूसरे पर दावेदारी न करते हुये दोनों प्रेम अपने-अपने परिवार से करेंगे। कभी-कभी कौतूहल पा लेंगे।
आशिकी गोपनीय तरीके से सम्पन्न हो रही थी फिर भी खबर मिसरी के घर के रंन्ध्रो से होकर बदेरा में प्रसारित हो गर्इ। काढ़ा के लिये तुलसी लेने आती बहुओं-सासों ने मिसरी के चेहरे में फूले न समाने वाले भाव बरामद किये और बदेरा में गोहार पीट दी। उधर जमाने भर की हांकने जैसी पुरुष  वृति से लाचार भज न ने मित्र समुदाय को चौंका दिया - ''अच्छा वेतनमान और सुरुचि सम् पन्न मकान मलकिनी। बदेरा की आबोहवा बड़ी खूब है।
सुनकर लोगों की रगें तनतनार्इ पर नितांत निजी मामला मानते हुये किसी ने राम  बरन को बताने की झंझट नहीं की। सब कुछ ठीक जा रहा था वह तो क्या कहें राम बरन की चार बहनों में तीसरी सोहागी बदेरा आर्इ और कुटनी टाइप औरतों ने पुषिट कर दी।  सोहागी ने  सेल फोन पर राम बरन को मंत्र दिया -
''राम बरन तुम हम बहनों से छोटे हमारे अकेले भार्इ हो। मिसरी का कुछ ध्यान रखो। मास्टर को सूने घर में रख दिये हो। औरतें कहती हैं गांव का माहौल बिगड़ रहा है।
राम बरन को मिसरी की नैतिकता पर खास आस्था थी। शुरुआती असमंजस के बाद भजन भी राम बरन की गुड बुक में आ गया है। राम जनम और राम दरस को भजन ने इतनी अंग्रेजी पढ़ा दी थी कि जब वे जबलपुर गये उन्हें अड़चन नहीं हुर्इ। यही नहीं प्रवेश के समय साथ जाकर अच्छा नेतृत्व करते हुये प्रवेश संबंधी कागजी खानापूर्ति अंग्रेजी में कर भजन ने राम बरन को अपने विश्वसनीय होने का प्रमाण दे दिया। राम बरन की उपसिथति में यह मिसरी को देखता तक नहीं तो राम बरन को भजन पर संदेह करने जैसी वजह दिखार्इ नहीं दी।
''जीजी, गांव का माहौल बना कब था? जिन औरतों की कहावत सच मान बैठी हो वे फूहड़ मजाक करने के लिये प्रसिद्ध हैं। किसी की इज्जत उतार दें।
राम बरन ने सोहागी की निंदा की लेकिन अधीर  हो गया। एक बात यह है पुरुष उपलब्ध के अलावा अनुपलब्ध  के दीवाने होते हैं। दफ्तर में इस समय तीन महिलायें हैं। दो अधिकारी एक बाबू। बडे़ साहब से लेकर भृत्य तक सभी सज-धज, राजा बाबू बनकर दफ्तर आते हैं कि मैडमों की नजरें उन पर पडे़। बडे़ साहब कहते हैं 'माहौल चुस्त और सकि्रय रखना हो तो हर विभाग में महिलायें होनी चाहिये।
ऐसे में भाजन गुरू भंवरा बन गया हो तो कोर्इ अप्राकृतिक कि्रया न होगी। पर एक दूसरी बात भी है। विभागीय लोग मैडमों पर प्रभाव डालने के लिये मेहनत करते हैं किन्तु चरित्रवती मैडमें किसी को लाभानिवत करती नहीं पायी जातीं। तो मि सरी, भजन को पास क्यों मंडराने देगी? तीसरी बात - नैतिकता और चरित्र विकट मसला है । नैतिकता ने कितनों का ठगा और चरित्र के बनने-बिगड़ने से दास्तान तैयार होती है।  सम्भव है सुगृहिणी प्रेम में मुबितला हो।
राम बरन सप्ताहांत में बदेरा आया। काम खत्म कर रात दस बजे मिसरी शयन कक्ष में आर्इ और राम बरन ने दिल तोड़ने जैसी बात कर दी -
''मिसरी तुम अकेले रहती हो। देखना, भजन पहुँच न बना ले। मिसरी फटफटा गर्इ ''गुरूजी कैसे हैं पता नहीं, पर पता है मैं कैसी हूँ ।
''सुनो तो। दफ्तर में तीन मैडम हैं। बड़े साहब काम-बिना काम उन्हें अपने चैम्बर में बुलाते रहते हैं।
''पटाना चाहते हैं?
''पट जायेगी?
''कोसिस करें।
''भजन कोशिश करे तो मिसरी तुम पट जाओगी?
चेहरा अपने-आप में विश्वसनीय साक्ष्य होता है पर मिसरी को दस बजे वाले अंधेरे की मोहलत मिल गर्इ  ''कोर्इ हाथ लगाकर देखे। खुरपी रखकर सोती हूँ ।
राम बरन ने मान लिया मिसरी चरित्रवती है, बस सतर्कता बतौर भार्इ जान से कह गया -
''भार्इ जान बच्चे यहाँ नहीं रहते, घर का कुछ ध्यान रखा करो।
भार्इ जान के लिये यही मौका था ''अउर सब ठीकय हय किसानजू। गुरूजी हमको जम नहीं रहे हैं।
आरमिभक सावधानी के बाद जब साहस और अराजकता आ जाती है ध्यान नहीं रहता जोगकुजोग इसी धारा पर घटित होते हैं और लपेटे में मनुष्य ही आते हैं। मिसरी और भजन कुछ लापरवाह हो चले थे जबकि राम बरन तेजी से सोच रहा था। बुधवार की गहराती रात आकसिमक थी। शुभ रात्रि सम्पन्न कर भजन मिसरी के घर का दालान वाला मुख्य द्वार खोल अपने कमरे में जाने के लिये निकला और दविश देता राम बरन ठीक सामने था। राम बरन तो सप्ताहांत में आता है और जिस बस से आता है वह बदेरा के पहुँच मार्ग वाले मोड़ से होकर शाम आठ बजे निकल जाती है। भजन के ठीक पीछे खड़ी मिसरी तैंतीस करोड़ देवताओं को सुमिरने लगी और भजन की बुद्धि तत्काल प्रभाव से निलमिबत हो गर्इ।
फिर मिसरी तनिक आगे आर्इ ''इतनी रात को तुम  ......।
''बुरा लगा कि मैं?  राम बरन ने कहा मिसरी से ताड़ा भजन को।
खुरपी रखकर सोने वाली सौम्य से चेहरे वाली मिसरी गुरू का मन मोह रही है और जहीन से चेहरे वाला भजन मानो सुराग दे रहा है।
राम बरन के खून मे तेज उबाल आया कि दोनों का खून कर दे पर वह इन दिनों तेजी से सोच रहा था और अपराधियों को दण्ड देने के लिये अपराधी नहीं बनना चाहिये जैसी सावधानी उसे याद रही। सिथति यह थी तीनों वह नहीं लग रहे थे जो वे थे। दरवाजे के पास एक बिन्दु पर सिमटी मिसरी चालाक औरत लग रही थी, दूसरे बिन्दु पर सफेद हुआ भजन आततायी मर्द और दरवाजे को छेंककर खड़ा राम बरन ऐसा बली, बर्बर बलिक बौराया हुआ पहले कभी नहीं लगा था। वह बारी-बारी से बार-बार दोनों को देखता रहा - 
''क्या हो रहा था?
प्रश्न का जवाब दे भजन और मिसरी इनते निर्लज्ज नहीं थे।
राम बरन प्रहार की सी मुद्रा में मिसरी के इतने करीब जा खड़ा हुआ कि मिसरी सहम कर कुछ पीछे हट गर्इ ।
''मिसरी, गुरू की ऐसी चाह है तो जा रह इसके कब्जे में ।
मिसरी ने नकार में शीश डुलाया।
''नहीं है? तब तो मुझे लगता है अभी-अभी तुम्हारे साथ बलात्कार हुआ है।
मिसरी को एस्केप रूट मिल गया ''नहीं .......... हां ......... मैं बताना चाहती थी गुरूजी परेसान करते हैं।  
मिसरी ने पैतरा बदलकर भजन को साफ तौर पर ठग डाला।
भजन ने अपनी हिफाजत की ''बलात्कार नहीं है।
''कुछ तो है।                                                              
''श्रीमतिजी की सहमति रही। सच की एक अपनी मासूमियत होती है और वह इसी तरह प्रकट हो जाती है।
''साबित करो तो गुरूजी तुम बरी और जिस खुरपी को रखकर मिसरी सोती है उसी से मैं इसकी खाल खींचूंगा।
खाल खींच सकता है यह राम बरन की मुद्रा बता रही थी। मिसरी आतंक से हिल गर्इ  ''बलात्कार है। गुरू परेसान करता है।
राम बरन ने असहाय हुये भजन को घेरा ''इसे त्रिया चरित्र कहते हैं। औरतें लगन लगाती हैं और पकड़े जाने पर कह देती हैं मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे। सुनो गुरू ............।
भजन की बुद्धि कुछ चेष्ट हुर्इ। भाग जाने के लिये दरवाजा खुला था। भजन सुनने के लिये नहीं रुका। वेग से चला और अपने कमरे में बन्द हो गया। बन्द कमरे में आभास मिलता रहा राम बरन, मिसरी को पूरी ताकत से धो-पछार रहा है। भजन ने परिणाम पर कुछ नहीं सोचा। सोचा तो यह सोचा राम बरन, मिसरी को कूट-पीस कर चुप बैठ जायेगा। बतंगड़ बना कर अपना तमाशा नहीं बनायेगा। नहीं सोचा राम बरन रिपोर्ट लिखाने के लिये मिसरी को थाने घसीट ले जायेगा। इन्सपैक्टर गिरफ्तार करने आ पहुंचा तब भी भजन को विश्वास नहीं हुआ मिसरी रिपोर्ट लिखाने जैसी दगाबाजी करेगी। वह अपने बचाव में जो भी बोलना चाहता था, बोला यह -
''यह म्यूचुअल कनसेन्ट (आपसी सामन्जस्य) है।
इन्सपैक्टर ने पुलिसिया ढिठार्इ अपनाते हुए कहा ''ऐसे बता रहे हो, मानो गौर व वाली बात है।
बदेरा मौके-मौके पर स्तब्ध होता रहा है।
भजन की गिरफ्तारी पर स्तब्ध बदेरा ने भजन को क्रोध से देखा और करुणा से -
- बलात्कार नहीं आंट-सांट है।
- कानून को साबूत चाहिये। मिसरी ने कहा कुकर्म हुआ है। मेडिकल जांच में मेल-मिलाप सिद्ध हो गया। गुरूजी चले गये जेल।
- सजा मिसरी को भी मिलनी चाहिये।
- मिली है। सुनते हैं राम बरन ने ऐसा पीटा कि चलते नहीं बनता था।
- देखें, कचहरी क्या फैसला करती है।
बलात्कार जैसे मामले में बड़ी जल्दी फैसला हो जाता है।
पुलिस ने आरोपी भजनलाल को गिरफ्तार कर उसके विरुद्ध धारा 376 के तहत अपराध पंजीबद्ध कर, मामला न्यायिक विचारण हेतु मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया। मजिस्ट्रेट ने केस अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायाधीश को कमिट किया। बेला लिंक कोर्ट में सेशन ट्रायल शुरू हुआ। मिसरी का कलम बन्द बयान, पुलिस, राम बरन, चिकित्सकों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट, केमिकल एक्जामिनेशन रिपोर्ट, दोनों पक्ष के वकीलों की जिरह, क्रास क्वेश्चन ............। बर्डन आंफ प्रूफ (सिद्धि का भार) भजन पर। भजन खुद को निर्दोष नहीं साबित कर पाया।
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के तहत बलात्कार के जुर्म में भजनलाल को दस साल कैद की सजा।
मिसरी गहरी तकलीफ में।
लगा आज की तारीख में बदेरा उजाड़ हो गया है और वह अकेली प्रेत की तरह खामोेशियों में डोल-भटक रही है। जिंदगी ने प्रयोजन खोया, परिवार ने मायने बदल लिये। घर वही है, वही इंदारा, वही तुलसी वृन्द, वही अबाह, वही बगीची, वही खेत पर सब कुछ कितना बदल गया है। वह खुद कितना बदल गर्इ है। लगता नहीं, किसी नकल वाले केन्द्र से नहीं वरन जिला से हायर सेकण्डरी पास तमीज सीखी हुर्इ वही मिसरी है जो रिश्तेदारी में सबसे जहीन और भाग्यशालिनी बहू मानी जाती थी - है तो साधारण रूप रंग की स्कूल पास, कुछ खास दहेज न लार्इ पर भाग्य चमक रहा है। तीस एकड़ खेती की मालकिन। खूब कमाने वाला पति। खूब पढ़ने वाले ऐसे हुसियार दोनों लड़के कि नौकरी पक्की समझो। इतना गहना, ऐसा सुन्दर मकान। ढोलकी बजाने और लोकगीत गाने में यही मिसरी ऐसी तेज रही है कि विवाह वाले घर में द्वार  चार, चढ़ावा जेवनार, कन्यादान, लावा परसना, सप्तपदी, कोहबर ..... 
प्रत्येक इवेंट में गीत गाकर रात पार कर देती थी। टनाटन्न लागय दुलहा तोर बहिनी टनाटन्न लागय .......... जैसी गारी सुन पंगत में बैठे विहंसते समधी कहते ''बदेरा की औरतें टनाटन्न हैं, अपने साथ ले जायेंगे।
पर्यावरण में प्रसन्नता भर देने वाली मिसरी अब घर से नहीं निकलती। औरतें तुलसी लेने नहीं आतीं। नहीं आतीं इंदारा से पानी भरने। बेटे घर नहीं आते। जो घर आराम देता था वह उन्हे अश्लील लगने लगा। घर में उनकी अम्मां रहती थी  अब व्यभिचार में लिप्त हुर्इ औरत रहती है। राम बरन न आता। आता तो फिर-फिर दोहराने लगता ''अखबार में छपी तेरी करतूत के कारण मैं मुंह दिखाने लायक नहीं रहा। दफ्तर के लोग मुझे दया से देखते हैं, कभी मजाक से। जी करता है तेरा गला दबा दूं  .........।
मिसरी जीना नहीं चाहती थी पर जीने का मोह विकट होता है। रोज रात को प्रार्थना करती सुबह का सूरज न देखे और जब राम बरन गला दबा देने जैसी बात कर मिसरी की पसलियों में चिलक उठने लगती। राम बरन की जो मानसिकता बनती जा रही है, कोर्इ गजब न होगा यदि उसे सोता जान गला रेत दे और शव को बोरे में भर कर बदेरा से लगे पहाड़ पर ले जाकर जला दे कि शिनाक्त न हो। राम बरन की उपसिथति
में मिसरी को नींद न आती। नींद वैसे भी न आती। समय बीत कर भी नहीं बीतता था। दिन कब अस्त होगा? रात कब बीतेगी? शर्म, ग्लानि, दंश और  यातना। मिसरी पस्त हो बिस्तर पर ढह जाती। आंखें मूंद लेती कि कुछ दिखार्इ न दे। मुशिकल यह है आंखें बंद हों तो सिथतियां स्पष्ट दिखने लगती हैं। कितने दृश्य, कितने स्वर, कितनी मुद्रायें, कितने चेहरे, कितनी आंखें। याद आता है राम बरन। बेटे याद आते हैं। भजन गुस्जी भूलते नहीं। कुंयें पर नहा रहे हैं, तुलसी दल खा रहे हैं, मीठा पान ले आये हैं, हंस रहे हैं, बलात्कारी कहे जा रहे हैं, गिरफ्तार हो रहे हैं .........। शर्म, ग्लानि, दंश और यातना। मिसरी इंदारे पर जाकर खड़ी हो जाती। इंदारा मीठे पानी के लिये बदेरा में ख्यात है। अब आत्महत्या का श्राप ढोयेगा। देर तक खड़ी रहती। किसी नतीजे पर न पहुंचती। लौट आती।
दिन शर्म बढ़ा रहे थे।
रातें आतंक फैला रही थीं।
किसी अनपेक्षित तिथि पर भजन की पत्नी नूतन, भजन का सामान लेने बदेरा आर्इ। सामान में रुचि नहीं थी उस पदमिनी को देखना चाहती थी जिसके लिये भजन ने चरित्र खोया। नूतन को देख मिसरी को लगा एक बार फिर वह भजन के साथ रंगे हाथों पकड़ी गर्इ है। भजन का बंद कमरा खोलते हुये मिसरी खुद को जब्त न रख सकी और डहक कर रोने लगी।
नूतन ने अर्थ पकड़ा ''रोकर मुझे शर्मिन्दा मत कीजिये। मेरे दिल पर बद़ा बोझ है। मैं अपासे माफी मांगने आर्इ हूँ । मैं मानती हूँ  बलात्कार हिंसा का सबसे बुरा तरीका है। समाज और परिवार में आपकी बुरी दशा हो गर्इ और लोग मुझे बलात्कारी की पत्नी की तरह देखने लगे हैं। मेरे लिये यह मर जाने वाली बात है। तब भी भजन का झूठ देखिये। कहते है बलात्कार नहीं रजामंदी थी। जो हुआ, हो ही गया। मुझे तकलीफ है भजन झूठ बोल रहे हैं। सच कहती हूँ  मैंने बहुत अभाव देखे हैं। जब हमारी शादी हुर्इ भजन बेरोजगार थे। परिवार चलाने के लिये वे टयूशन करने लगे मैं आंगन बाड़ी में पढ़ाने लगी। अब मैं ठीक-ठाक कमा लेती
हूँ । भजन अच्छा वेतन पा रहे थे। मेरे दोनों बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं। हम कुछ सम्मान से जीने लगे थे पर हमारी किस्मत खराब है। आप न रोयें वरना मैं भी रो दूंगी।
नूतन ने भजन की किताबें और कपड़े बांध लिये। फोलिडंग बेड, मसहरी, चार फाइबर चेयर, बर्तन, बाल्टी एक ओर सहेज दिये।
''किसी गरीब को दे दें या पड़ा रहने दें।
नूतन लौट चली। कुछ था उस पतली और लम्बी स्त्री में। मिसरी को लगा जमा ने का सामना फिर भी कर लेती है इसका सामना नहीं कर पा रही है। इच्छा हुर्इ नूतन दबाव बनाकर बार-बार पूछे - आप बता सकती हैं यह बलात्कार था या रजामंदी। बता दीजिये, भजन ने जो कुछ कहा वह सच है या झूठ बोलकर वे आपकी पोजीशन खराब करना चाहते हैं। सच बता कर मेरी मदद कीजिये। पर अत्यन्त दीन भाव में वापस लौटती नूतन शायद एक गिरी हुर्इ औरत से मदद नहीं लेना चाहती। जो भी जज्बा-जुनून बना मिसरी चाहने लगी नूतन थोड़ा सा तोष लेकर वापस जाये। बच्चे अपने नहीं रहे, राम बरन अपना नहीं रहा, घर गांव अपना नहीं रहा फिर किस मोह-महत्व को बचाये रखने के लिये भेद को छिपाया जाये? इस जिंदगी में अब कुछ नहीं रखा, पर झूठे आरोप में गुरूजी की जिंदगी तबाह न हो। खत्म हुआ सम्मान लौटना नहीं, नूतन का सम्मान बचे। बदनामी फिर होगी पर जो हो चुकी है उससे अधिक नहीं होगी। बोझ है दिल पर। किसी सूरत जिया नहीं जाता। तो इस जाती हुर्इ को थोड़ा सा आधार मिले। प्रबल भावना या खास विचार से सम्पन्न होकर नहीं भावनाओं और विचारों से पूरी तरह खाली होकर मिसरी बोली -
''मुझे माफ कर दो।
''आप माफी क्यों मांगे?
''माफ कर दो।
''शर्मिन्दा कर रही हैं।
''मै बहक गर्इ थी।
''रजामंदी?
''आप समझती हैं।
''आपने मेरा बोझ कुछ कम कर दिया। हम लोग समाज में जगह तो खो चुके हैं पर यह बलात्कार नहीं था सुनकर मैं थेड़ी तसल्ली पा रही हूँ ।
''आपसे मिलकर मुझमें हिम्मत आ गर्इ है। मेरा कुछ बनना नहीं है, गुरूजी को बचाना चाहती हूँ ।
''फैसला हो चुका है।
''कोर्इ उपाय नहीं है?
''मैं कानून के बारे में कुछ खास नहीं जानती। अपने वकील से पूंछकर आपको जानकारी दूंगी।
''वकील से बात करना ठीक होगा। मैं भी अपने वकील से अरज-विनती करूंगी।
नूतन के जाते ही मिसरी ने सरकारी वकील का फोन कॉल किया। जानती थी यह काम तत्काल नहीं करेगी तो साहस खो देगी। मिसरी की अरज सुन वकील की इच्छा हुर्इ कहे पियारे को बेगुनाह सिद्ध करने की तड़प है  या उसके बिना देह का दर्द नहीं जा रहा है। पर उसे महिला जान उसने सभ्यता दिखार्इ -
''तो वह झूठा केस था?
''मुझसे गलती हो गर्इ वकील साहब।
''ऐसी गलती जिसे सुधारा नहीं जा सकता।
गुरूजी की जिंदगी का प्रश्न है साहब।
''कुछ नहीं हो सकता।
''मैं बराबर की दोषी हूँ। मुझे सजा मिले, यह तो हो सकता है?
''नहीं हो सकता।
''मैं कितनी परेशान हूँ । कुछ नहीं हो सकता तो सुन लीजिये कुंये में कूदकर जान दे दूंगी।
''यह हो सकता है .........। थोड़ा सम्भला, थोड़ा हंसा वकील ''तमाम चैनलों में देख तो रही है कोर्इ मांडल, कोर्इ नौकरानी, कोर्इ प्रेमिका रजामंदी का खेल लम्बे समय तक खेलती रहती है फिर एक दिन अचानक मीडिया के सामने कूद पड़ती है मेरे साथ अमुक छ: महीने से बलात्कार कर रहा है। बलात्कार ऐसे होता है? कानून, पुलिस, वकील, चैनल महिला को पीडि़त बताने में पूरी ताकत लगा देते हैं और पुरुष बलात्कारी साबित हो जाता है। उसकी न कानून सुनता है, न पुलिस, न मीडिया। आपको क्या सूझी जो अचानक आदर्श जैसी बात ले बैठीं? फजीहत झेल चुकी हैं, फजीहत फिर होगी।
''सुनिये तो .........।
''आप समझ नहीं रही हैं। समझ नहीं रही हैं इसलिये मैं आपको कानून नहीं समझा सकता। फैसला हो चुका है। सजा मिल चुकी है। पुलिस अपना काम कर चुकी है। वह अदालत को क्या बतायेगी उसने सही जाँच नहीं की ? मेरी एक पोजीशन है। जिस केस को मैं जीत चुका हूँ  उसे हार  जाऊँ यह मजाक  जैसी बात है। ......... देखिये हर विभाग में  एक तंत्र होता है, पद्धति होती है, व्यवस्था होती है। कानून आपकी समझ में नहीं आयेगा .........।
कानून मिसरी की समझ में सचमुच नहीं आया।
हुआ तो यह हुआ मीठे पानी के लिये ख्यात इंदारा मिसरी के डूब मरने का श्राप ढो रहा है।
सुषमा मुनीन्द्र
द्वारा श्री एम. के. मिश्र
एडवोकेट
लक्ष्मी मार्केट
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