शनिवार, 8 जनवरी 2022

टिड्डी - ख़्वाजा अहमद अब्बास

यह पुरानी ज़रूर है लेकिन क्लासिक है,  तत्सम पर इस बार  ख़्वाजा अहमद अब्बास की कहानी-

- प्रदीप कान्त 

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मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से ख़बरें आ रही हैं कि काश्तकार डटकर टिड्डी दल का मुक़ाबला कर रहे हैं। ‎हवाई जहाज़ों से टिड्डी के दलों पर ज़हरीली गैस का हमला किया जा रहा है। अपनी-अपनी खेतियों को इस ‎दुश्मन से बचाने के लिए काश्तकार हर मुम्किन तदबीर कर रहे हैं। ढोल बजाकर, टीन के कनस्तरों को ‎पीट-पीटकर टिड्डी दल को भगाया जा रहा है। लाठियों और डण्डों और झाड़ुओं से टिड्डी फ़ौज का क़लक़ ‎क़ुमअ किया जा रहा है। बहुत जल्द उम्मीद की जाती है कि करोड़ों टिड्डियों में से एक टिड्डी भी ज़िन्दा न ‎बचेगी।

खेत में गेहूँ की फ़स्ल तैयार खड़ी थी और रामू के मन में आशा की फुलवारी लहलहा रही थी।

‎देखने में एक छोटा-सा खेत था। उसमें जो फ़स्ल खड़ी थी उसमें कटाई, छटाई के बाद मुश्किल से पचास ‎मन गेहूँ के दाने निकलेंगे। रामू ने दिल ही दिल में हिसाब लगाया। मण्डी में गेहूँ का भाव था पन्द्रह रुपय फ़ी ‎मन। कुल फ़स्ल के हुए साढे़ सात सौ रुपये। कोई ख़ज़ाना उसके घर में नहीं आने वाला था। मगर फिर भी ‎पकी हुई गेहूँ की बालियों को देख-देखकर रामू फूला नहीं समा रहा था। शाम के सूरज की रौशनी में खेती ‎जगमगा रही थी जैसे वो सोना मल सुनार की दुकान हो जहाँ सोने-चाँदी के ज़ेवर हमेशा शीशे की ‎अलमारियों में सजे रहते हैं और जहाँ से इस बरस की फ़स्ल का सौदा करते ही रामू लाजो के लिए एक चाँदी ‎की हँसली लाने वाला था। और ये सोचते ही रामू की नज़रों में गेहूँ की तमाम बालियाँ सिमटकर एक चमकती ‎हुई हँसली बन गईं और उस हँसली में उसकी लाजो की लम्बी पतली गर्दन थी और उसका पके गेहूँ की तरह ‎दमकता हुआ चेहरा था।

लाजो। उसकी बीवी। उसके दो बच्चों की माँ। छः बरस हुए जब वो उसे मुकलावा करके घर लाया था और ‎पहली बार घूँघट उठाकर उसका मुँह देखा था तो उसे ऐसा महसूस हुआ था जैसे सच-मुच लक्ष्मी उसके घर ‎आ गई हो। इतनी सुन्दर बहू तो उनके सारे गाँव में एक भी नहीं थी। कितने ही दिन तो वो खेत पर भी नहीं ‎गया था। बस हर वक़्त बैठा लाजो को घूरता रहता था। यहाँ तक कि माँ को उसे धक्के मारकर बाहर ‎निकलना पड़ा।

“अरे बे-शरम। गाँव वाले क्या कहेंगे? अभी से जोरू का गुलाम हो गया।”‎

छः बरस से रामू हर फ़स्ल पर लाजो के लिए हँसली बनवाने का प्रोग्राम बनाता था मगर हर बार उसका ये ‎मन्सूबा मिट्टी में मिल जाता था या पानी में डूब जाता था। एक बरस बारिश इतनी हुई और ऐसे ग़ैर वक़्त हुई ‎कि आधी पकी हुई फ़स्ल तबाह हो गई। अगले बरस सूखा पड़ा और खेतियाँ जल गईं। तीसरे बरस बाढ़ आ ‎गई और फ़सलें पानी में डूब गईं। चौथे बरस गेहूँ को घुन खा गई। पाँचवें बरस ऐसा ज़बरदस्त पाला पड़ा कि ‎फ़स्ल ठिठुरकर रह गई। छठे बरस ऐसी तेज़ आँधियाँ चलीं कि पकी-पकाई फ़स्ल को तबाह कर दिया। ‎मगर इस बरस भगवान की कृपा से सब ठीक-ठाक था। नयी नहर से उनको पानी काफ़ी मिला था। सरकार ‎के महकमा-ए-ज़राअत से खाद भी मिली थी और फ़स्ल को खाने वाले कीड़ों को मारने की दवा भी मिली ‎थी। बारिश न कम हुई थी, न ज़्यादा। इस बरस रामू को ऐसा लगता था कि उसकी लाजो के नाज़ुक गले में वो चाँदी की हँसली ज़रूर जगमगाएगी जो कब से सोना मल की शीशे की अलमारी में उस घड़ी का इंतज़ार ‎कर रही थी।

अपने खेत में खड़ा-खड़ा रामू सोच रहा था कि अब एक-आध दिन में कटाई शुरू ही कर देनी चाहिए। ‎इतने में उसने धूप में जगमगाते हुए खेत पर एक साया पड़ता हुआ देखा और न जाने क्यों दफ़अतन ‎उसका दिल ख़ौफ़ से भर गया। नज़र उठाकर देखा तो आकाश पर पच्छिम की तरफ़ से आता हुआ एक ‎बादल दिखायी दिया। उसने सोचा ये बे-वक़्त की बरखा कैसी। इन दिनों तो कभी बादल नहीं देखे। उसके ‎बराबर के खेत में उसका पड़ोसी गंगुआ भी यही सोच रहा था।

‎”अरे रामू। इस बरस बे बख़त की बरखा होने वाली है क्या?”

‎”यही मैं सोच रहा हूँ, भइया।” और अभी वो कुछ और न कह पाया था कि बादल जो बड़ी ग़ैर-मामूली ‎रफ़्तार से उड़ रहा था अब उनके सर पर ही आ गया और बरखा की पहली बूँद रामू की नाक पर से ‎फिसलती हुई गेहूँ की एक पकी हुई बाली पर गिरी। मगर ये ‘बूँद’ पानी की नहीं थी। वो बूँद ही नहीं थी। एक ‎ज़हरीला भूखा कीड़ा था जो देखते ही देखते गेहूँ के कितने ही दाने चट कर गया।

रामू चिल्लाया, “टिड्डी!”

गंगुआ चिल्लाया, “टिड्डी!”

आस-पास के खेतों से आवाज़ें आयीं। “टिड्डी! टिड्डी!”‎

‎इससे पहले भी ये आसमानी मुसीबत उनके खेतों पर नाज़िल हुई थी। उन्होंने मन्दिरों में घण्टे बजाए थे और ‎मस्जिदों में दुआएँ माँगी थीं और खेतों में खड़े होकर शोर मचाया था मगर वो टिड्डी की यलग़ार को न रोक ‎सके थे और देखते ही देखते उनकी साल भर की मेहनत मिट्टी में मिल गई थी और वो ज़मींदार और ‎साहूकार से गिड़गिड़ाकर मदद माँगने पर मजबूर हो गए थे।

‎मगर इस बार वो बदल चुके थे। उनका मुल्क और उनके खेत बदल चुके थे। ज़मींदारी ख़त्म हो चुकी थी। ‎अब काश्तकारों के अपने खेत थे। उनकी अपनी सरकार थी जो ऐसे मौके़ पर उनकी सहायता के लिए ‎तैयार थी। सो इस बार सिर्फ़ चन्द बड़े बूढ़ों ने ही मन्दिर में घण्टे बजाकर भगवान से फ़रयाद की। बाक़ी जितने ‎काश्तकार थे सब अपनी मेहनत से उगायी हुई फ़स्ल को दुश्मन से बचाने के लिए तैयार हो गए। पहले ‎सैंकड़ों ढोल और टीन के कनस्तर पीट-पीटकर टिड्डी को डराया और भगाया गया। फिर भी दुश्मन पसपा ‎न हुआ तो किसानों की फ़ौज की फ़ौज लाठीयाँ और डण्डे ले-लेकर उन पर पिल पड़े। औरतें और बच्चे भी ‎पीछे नहीं रहे। झाडुएँ ले-लेकर टिड्डी दल का सफ़ाया करने लगे। मगर दुश्मन इतनी आसानी से हार मानने ‎वाला नहीं था। हज़ार टिड्डियाँ मारी जातीं तो दस हज़ार और आ जातीं। ऐसा लगता था कि आसमान में एक ‎सूराख़ हो गया है और उसमें से टिड्डियों की मुसलसल बारिश हो रही है। लाखों टिड्डियाँ, करोड़ों टिड्डियाँ। ‎फिर भी मुक़ाबला करने वालों ने हार नहीं मानी। रात के अन्धेरे में भी मशालें जला-जलाकर दुश्मन पर ‎हमला करते रहे।

टिड्डी का मुक़ाबला करने वालों में सबसे आगे-आगे रामू था। दिन-भर, रात-भर उसने न खाया, न पिया, न ‎पल-भर आराम किया। उसके पड़ोसियों में कोई भी हिम्मत हार जाता और कहने लगता कि “इस ‎आसमानी बला का हम मुक़ाबला नहीं कर सकते। भगवान ही हमें इससे निजात दिला सकता है।” तो रामू ‎ललकारकर कहता, “अरे मर्द होकर एक ज़रा से कीड़े से हार मान गए। पूरे छः महीने ख़ून पसीना एक ‎करके तो ये फ़स्ल उगायी है अब इसे दुश्मन के हवाले कर दें? चलो उठो। हिम्मत न हारो।”

रामू को तो ऐसा ‎लग रहा था कि ये टिड्डी उसकी ज़ाती दुश्मन है जो उससे उसकी खेती ही नहीं उसकी ज़िन्दगी की सारी ‎ख़ुशियाँ और कामयाबियाँ छीनना चाहती हैं। उसको ऐसा लगता कि ये टिड्डी उसकी उगायी हुई फ़स्ल ही को ‎नहीं चट करना चाहती बल्कि उस चाँदी की हँसली को भी दीमक की तरह खाए जा रही हैं जो वो लाजो के ‎गले में देखना चाहता है और कभी-कभी तो उसको ऐसा महसूस होता कि एक बहुत बड़ी टिड्डी अपने ‎मनहूस पंजे लाजो की नर्म-नर्म गर्दन में पैवस्त करके उसका ख़ून पी रही है। और ये सोचते ही वो लाठी ‎लेकर टिड्डी दल पर टूट पड़ता और लोग हैरत से देखते कि रामू में ये बला की ताक़त और अनथक ‎हिम्मत कहाँ से आ गई है।

‎और फिर रात-भर की मेहनत के बाद सुब्ह-सवेरे जब उन्होंने देखा कि पूरब से एक और टिड्डी दल उड़ता ‎चला आ रहा है तो एक बूढ़े ने लाठी फेंकते हुए कहा, “अब तो भगवान ही हमारी सहायता करे तो हम बच ‎सकते हैं।” और उसी लम्हे में उन्होंने आसमान से आती हुई एक घूँ-घूँ की आवाज़ सुनी जैसे कोई जिन्नाती ‎जसामत की शहद की मक्खी क़रीब आ रही हो। मगर ये शहद की मक्खी नहीं थी एक हवाई जहाज़ था जो ‎सरकार ने टिड्डी का मुक़ाबला करने के लिए भेजा था। देखते ही देखते हवाई जहाज़ ने हवा में एक डुबकी ‎लगायी और उनके खेतों पर से नीचे-नीचे उड़ने लगा और उसकी दुम में से निकलकर एक भूरे रंग का ‎बादल सारे खेतों पर छा गया। अब उन्होंने देखा कि गेहूँ पर बैठी हुई टिड्डियाँ टप-टप ज़मीन पर गिर रही हैं, ‎दम तोड़ रही हैं।

सो रामू की खेती बच गई। उस जैसे और हज़ारों काश्तकारों की खेतियाँ बच गईं। रामू कटाई करता जा रहा ‎था और सोच रहा था कि ये नयी ताक़त जो अब हमारे पास है, इसके मुक़ाबले में सौ टिड्डी दल भी आएँ तो ‎हम उनको शिकस्त दे सकते हैं।

और फिर अनाज को गाड़ीयों में लादकर वो मण्डी ले गया।

सरकारी भाव पन्द्रह रुपये मन था। मगर लाला किरोड़ी मल आढ़ती ने अपनी तोंद सहलाते हुए कहा, फ़स्ल ‎टिड्डी से बच गई इसलिए मण्डी में अनाज ज़रूरत से ज़्यादा हो गया है और क़ीमतें गिर गई हैं।”

‎”तो क्या आप चाहते थे टिड्डी हमारी फ़स्ल को खा जाती तो बेहतर होता?”

‎”ये तो मैं नहीं कहता। मगर क़ीमतें ज़रूर बढ़ जातीं। अब तो इतना अनाज मण्डी में आ गया है कि मैंने तो चन्द रोज़ के लिए ख़रीद ही बन्द कर दी है।” और फिर किसी क़दर धीमी आवाज़ में कहा, “वैसे बारह रुपये मन ‎देना चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ…”‎

‎”मगर सरकारी रेट तो पन्द्रह रुपये मन है।”

‎”सो तो है। मगर मैंने कहा नहीं अनाज ज़्यादा पैदा हो गया है। हमें ज़रूरत ही नहीं रही।”

‎”तो मैं लाला बंसी धर के यहाँ ले जाता हूँ।” रामू ने कहा और उधर गाड़ी हाँक दी।

मगर लाला बंसी धर ने भी वही कहा जो किरोड़ी मल ने कहा था और जो बंसी धर ने कहा वही लाला शगुन चन्द ने कहा।

‎फिर वो लाला किरोड़ी मल के यहाँ वापस आया। वो बोले, “घण्टा भर में भाव और गिर गया है। आस्ट्रेलिया से ‎कई जहाज़ आ गए हैं। अमरीका में भी फ़स्ल बहुत अच्छी हुई है। सारी दुनिया में गेहूँ की क़ीमत गिर गई है। ‎अब तो मैं ग्यारह रुपये मन दे सकता हूँ।”

और सौ रामू को ग्यारह रुपये मन पर ही अनाज बेचना पड़ा। कभी कुछ हो, उसने सोचा, लाजो के लिए ‎हँसली ज़रूर लूँगा। बस सेठ मक्खन लाल से बीज के लिए जो क़र्ज़ा लिया था वो चुका दूँ।

सेठ मक्खन लाल का नाम होना चाहिए था सेठ सोखन लाल। दुबले-पुतले, सूखे हुए, पिचके हुए गाल। मगर ‎रुपये देखते ही उनकी मुरझायी हुई आँखों में चमक आ गई। दो सौ रुपये अस्ल और चौबीस रुपये सूद ‎सरकारी और छब्बीस रुपये नज़राने के, ग़ैर सरकारी।

‎जेब हल्की करके आगे रामू चला ही था कि चौधरी मलखान सिंह मिल गया जो नहर का पटवारी था और ‎काश्तकारों के जीवन में भगवान का दर्जा रखता था। जिसको चाहे पानी दे, जिसको चाहे न दे। चाहे कम ‎पानी दे, चाहे ज़्यादा पानी दे।

मलखान सिंह की बड़ी-बड़ी मूँछें ख़िज़ाब से काली की हुईं थीं और तेल में डूबी रहती थीं और किसी ‎काश्तकार जिससे रुपया मिलने की उम्मीद हो, उसे देखते ही ये मूँछें लालची कुत्ते की तरह दुम हिलाने ‎लगती थीं। चौधरी मलखान सिंह का क़ौल था कि “जितना गुड़ डालोगे उतना ही मीठा होगा।” जिसका ‎मतलब था कि जितना रुपया नहर पटवारी की जेब में डालोगे, उतना ही पानी तुम्हारे खेत में पहुँचेगा। सो ‎रामू ने अगली फ़स्ल के लिए पानी का इन्तेज़ाम कर लिया। मगर उसकी जेब और भी हल्की हो गई। और ‎जब वो सोना मल की दुकान के सामने से गुज़रा और शीशे की अलमारी में लटकी हुई हँसली नज़र आयी तो ‎उसने दिल ही दिल में कहा, “अगली फ़स्ल पर ज़रूर लूँगा।” और नज़र झुकाकर गुज़र गया।

‎रात हुए घर वापस पहुँचा तो देखा लाजो उसका इंतज़ार करते-करते चूल्हे के पास बैठी-बैठी ही सो गई है। ‎चंगीर में रोटी पकी रखी थी। चूल्हे पर साग की हण्डिया धरी थी। वो लाजो को आवाज़ देने वाला ही था कि ‎उसने देखा कि एक परों वाला कीड़ा दीवार पर रेंगता हुआ लाजो की तरफ़ बढ़ रहा है। उसने हाथ बढ़ाकर ‎उसे पकड़ लिया।

‎”टिड्डी!” उसने सोचा। “तो अभी सारे टिड्डी दल का ख़ातमा नहीं हुआ?”

उसकी उंगलियों में दबी हुई टिड्डी कुलबुला रही थी, फड़फड़ा रही थी, शायद दम तोड़ रही थी मगर अभी ‎तक ज़िन्दा थी। चिराग़ की रौशनी में लाया तो उसने देखा कि टिड्डी का पेट न जाने किसका अनाज खाकर ‎फूला हुआ है, उसकी छोटी-छोटी आँखें चमक रही हैं और उसकी लम्बी नुकीली मूँछें लालची कुत्ते की तरह ‎दुम हिला रही हैं।

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

हर मंज़र में इक तस्वीर अलावा है - संजू शब्दिता की ग़ज़लें

देख रही मेरी आँखों का दावा है
हर मंज़र में इक तस्वीर अलावा है 

संजू शब्दिता का यह एक शेर बता देता है कि शायर की दृष्टि को कितना तीक्ष्ण होना  चाहिए।  पर्दे पर जो नज़र आ रहा है उसके पीछे कौन है, उसी की शिनाख़्त तो ज़रूरी है जो संजू का शायर यहाँ कर रहा है। तो तत्सम पर इस बार संजू शब्दिता….


प्रदीप कान्त

1
देख रही मेरी आँखों का दावा है
हर मंज़र में इक तस्वीर अलावा है

उम्र गवाँ कर मंज़िल तक तो आ पहुँचे
फिर हम समझे मंज़िल एक छलावा है

रूह की सूरत दिखने में कुछ और है पर
हम जो दिखते हैं वो महज़ दिखावा है

इन ज़ख्मो को कैसे भर जाने दूँ मैं
इन के दम से मेरे पास मुदावा है

कहाँ हुआ ओझल वो मेरी आँखों से
ध्यान हटा लेना बस एक भुलावा है

2
ख़ुद ही प्यासे हैं समन्दर तो फ़क़त नाम के हैं
भूल जाओ कि बड़े लोग किसी काम के हैं

दस्तकें ख़ास उसी वक़्त में देता है कोई
चार छह पल जो मेरी उम्र में आराम के हैं

कोई क्या लाग लगाए कि बिछड़ना है अभी
हमसफ़र आप के हम एक ही दो गाम के हैं

आसमानों की बुलन्दी का सफ़र तय कर के
लौट आते हैं परिन्दे जो मेरे बाम के हैं

शाइरी चाय तेरी याद चमकते जुगनू
बस यही चार तलब रोज़ मेरी शाम के हैं

3
निकल गया है मेरे हाथ से निज़ाम मेरा
मुझे ही आँख दिखाता है अब ग़ुलाम मेरा

मैं क्या बताऊँ ख़ुशामद के क्या तरीक़े हैं
कभी पड़ा ही नहीं जाहिलों से काम मेरा

मेरा भी नाम उछाला था मेरे दुश्मन ने
अब आसमाँ की जबीं पर लिखा है नाम मेरा

अब आप लोग तमाशे से हो गए फ़ारिग़
लो हो गया है चलो काम अब तमाम मेरा

जो बच रहे थे मेरे साथ हम कलामी से
वो आज पढ़ रहे हैं ढूंढ़ कर कलाम मेरा

4
ख़ुद से कुछ यूँ उबर रहे हैं हम
इक भंवर में उतर रहे हैं हम

ज़िन्दगी कौन जी रहा है यहाँ
मौत में जान भर रहे हैं हम

मौत के बाद ज़िन्दगी होगी
ये समझकर ही मर रहे हैं हम

अब संवरने का लुत्फ़ जाता रहा
आईने में बिखर रहे हैं हम

इश्क़ पहले भी तो हुआ है हमें
क्या नया है जो डर रहे हैं हम

वक़्त अपनी जगह पे क़ायम है
बस मुसलसल गुजर रहे हैं हम

5
सफ़र की रात है दरिया को पार करना है
सफ़ीना डूब गया है मुझे उबरना है

तुम्हारे बाद अभी इन शिकस्ता क़दमों से
पहाड़ चढ़ने हैं दरियाओं में उतरना है

मैं ख़ुश-लिबास समझ कर पहन रही हूँ क़फ़न
मैं ज़िन्दगी हूँ मेरा काम रंग भरना है

मिटाना ख़ुद है मुझे अपने अंदरूं का शोर
मगर ये काम बहुत ख़ामोशी से करना है

मिटा रही हूँ चटख रंग सब शबीह के मैं
कि कैनवस को बहुत सादगी से भरना है

किसी की मौत पे अक्सर ये सोचती हूँ मैं
मुझे भी कल को इसी राह से गुज़रना है

6
गुमाँ पानी का हो ऐसा नहीं था
वो दरिया था कोई सहरा नहीं था

ख़ुशी भी जान ले सकती है इक दिन
मुझे इस ग़म का अंदाज़ा नहीं था

ये दीवारें बहुत उकता गई थीं
इन्हें इक रंग में रहना नहीं था

मैं हर पहलू से उसको सोचती थी
फ़क़त सोचा ही था समझा नहीं था

किसी दरवेश की सोहबत में थी मैं
मेरा मन यूँ ही बंजारा नहीं था

हमारे अहद की ये ख़ासियत थी
दरीचे थे प दरवाज़ा नहीं था

7
पर्वतों के बीच वो जो इक नदी थी
अक्स अपना मैं उसी में देखती थी

रंग मुझ पर एक भी चढ़ता नहीं था
सादगी भी क्या बला की सादगी थी

आह वो मुझको किसी में देखता था
आह मैं उसको किसी में देखती थी

सिर्फ़ माज़ी कह के फ़ुर्सत हो लिए हम
क्या बताते क्या हमारी ज़िन्दगी थी

तुम फ़क़त इस जिस्म तक ही रह गए ना
मैं तुम्हें ख़ुद से मिलाना चाहती थी

चाँद सूरज तक मेरे आँगन में उतरे
ज़िन्दगी बस एक तेरी ही कमी थी

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संजू शब्दिता


जन्म स्थान -  भादर अमेठी

शिक्षा     - एम.ए . (हिंदी साहित्य) नेट, जे.आर.एफ.
प्रकाशन - कविता कोष, रेख़्ता,  पाखी, कथादेश, अनुभूति, हस्ताक्षर, गंभीर समाचार,गुफ़्तगू,अट्टहास, विभोम स्वर, कविकुम्भ, संवेदन, शब्द-व्यंजना, हिन्दुस्तान दैनिक, चेतान्शी जर्नल,जानकीपुल,स्त्रीकाल आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉगों, साझा संग्रहों में ग़ज़लें प्रकाशित।

ग़ज़लों को सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायकों ने  अपना स्वर दिया है।

एफ़ एम गोल्ड रेडियो चैनल से दो बार ग़ज़ल का प्रसारण।

समय-समय पर आकाशवाणी इलाहाबाद एवं हिंदुस्तानी एकेडमी इलाहाबाद में ग़ज़ल- पाठ।

पुरस्कार/ सम्मान - गुफ़्तगू साहित्यिक संस्था (इलाहाबाद) द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान प्राप्त, वाग्धारा यंग अचीवर अवार्ड.(वाग्धारा संस्था,  मुम्बई)

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

मेरे कमरे में आसमान भी था- हरजीत की गज़लें

बहुत समय बाद ब्लॉग पर कोई पोस्ट लगा रहा हूँ, बल्कि पोस्ट लगाने पर मजबूर हो रहा हूँ| हुआ यूँ कि यश भाई का व्हाट्सएप मेसेज आया जिसमे वे हरजीत को याद कर रहे हैं और बेचैन हो रहे हैं तो सोचा की इससे बेहतर क्या हो सकता है कि यश भाई की यह छोटी सी टिप्पणी और हरजीत की गज़लें| तो तत्सम पर इस बार हरजीत की गज़लें…

 

प्रदीप कान्त

 

सौ प्रतिशत सरदार, असरदार गज़लकार

 

हरजीत जितना प्यारा ग़ज़लकार था, उतना ही प्यारा इंसान भी। प्यारा इंसान था, शायद इसलिये भी बहुत प्यारी ग़ज़लें कहता था। ग़ज़ल और वो दो रूह एक जान थे। बच्चों के सुंदर सुंदर लकड़ी के प्यारे-प्यारे खिलौने भी बनाता था। बड़ी शान से कहता था कि तुमने कभी किसी सरदार को ग़ज़लगोई करते सुना है, देखो मैं सौ प्रतिशत सरदार हूँ और उतना ही प्रतिशत ग़ज़लगो भी।मैं सरदार होकर भी, दोनों मुश्किल काम आसानी से कर लेता हूँ। शतरंज की बाज़ी भी जीत लेता हूँ और असरदार ग़ज़लें भी कह लेता हूँ। मुझसे पहले सरदार होकर भी ग़ज़ल कहने की नहीं अलबत्ता गाने की ज़ुर्रत जगजीत सिंह साहब ज़रूर कर चुके थे। कल अनुज अंशु मालवीय के ख़ज़ाने से अचानक ही हरदिलअजीज़ हरजीत सिंह का दीवान बरामद हुआ । ए जी अड्डे इलाहाबाद में भाई श्रीप्रकाश मिश्र के साथ वह हमारी मित्र मंडली में आया था और मन मोह गया था । फिर तो देहरादून में वो मेरा हमगिलास भी हुआ । वसु याद आते हैं - 

 

अब तक जो आसपास था जाने कहाँ गया 

वो मेरा हमगिलास था जाने कहाँ गया 

 

देहरादून के टिपटॉप रेस्टोरेंट में चाय पीकर रम की बोतल साथ लेकर मसूरी के लिए चल पड़ना याद आता रहा । ग़ज़ल के मामले में संजीदा गुफ्तगू याद आती रही । उसकी सहमत और असहमत होने की भंगिमाएँ याद आती रहीं । पूरी रात सो नहीं पाया । उसके कुछ चुने हुए शेर यहाँ दे रहा हूँ । यक़ीनन इन्हें पढ़कर आप भी मेरी तरह बेचैन हो उठेंगे - 

 

फ़साद जब से हुए हमने फिर नहीं देखी

किसी के नाम की तख़्ती यहाँ मकानों में।

 

वो जो इक शख़्स यहाँ अम्न का पुजारी था

मौत पर उसकी वसीयत के ये झगड़े कैसे

 

शहर के एक किनारे पे लोग प्यासे थे

शहर के बीच फ़वारे में जब कि था पानी 

 

अफ़वाह है उस आग में कुछ भी बचा नहीं 

लेकिन ख़बर ये है कि वहाँ कुछ हुआ नहीं 

 

ढेर लाशों के लगाना फूँकना आबादियाँ 

बददिमाग़ी बूढ़ी क़ौमों की निशानी है अभी 

 

तमाम शहर में कोई नहीं है उस जैसा 

उसे ये बात पता है यही तो मुश्किल है 

 

ये शामें-मयकशी भी है यादगार कितनी 

नासेह शेख़ वाइज़ ज़ाहिद हैं हम पियाला 

 

मैंने देखा है तुझे उस नज़र से जाने क्यूँ 

जाने क्यूँ मैंने तुझे उस नज़र से देखा है 

 

आई चिड़िया तो मैंने ये जाना 

मेरे कमरे में आसमान भी था 

 

ये हरे पेड़ हैं इनको न जलाओ लोगों 

इनके जलने से बहुत रोज़ धुआँ रहता है 

 

नदियों के पुल बनेंगे ख़बर जबसे आई है 

कश्ती चलाने वाले झुका कर नज़र मिले ।

 

साहिल क़रीब देख मुसाफ़िर तो ख़ुश हुए

मल्लाह चुप था उसके लिए आम बात दी।

 

- यश मालवीय

 

1

अपने मन का रूझान क्या देखूँ

लौटना है थकान क्या देखूँ

 

आँख टूटी सड़क से हटती नहीं

रास्ते के मकान क्या देखूँ

 

मैंने देखा है उसको मरते हुए

ये ख़बर ये बयान क्या देखूँ

 

कहने वालों के होठ देख लिये

सुनने वालों के कान क्या देखूँ

 

इस तरफ से खड़ी चढ़ाई है

उस तरफ से ढलान क्या देखूँ

 

2

सूरज हज़ार हमको यहाँ दर-ब-दर मिले

अपनी ही रौशनी में परीशाँ मगर मिले

 

नक़्शे सा बिछ चुका है हमारा नगर यहाँ

आँखें ये ढूँढती हैं कहीं अपना घर मिले

 

फिर कौन हमको धूप की बातें सुनायेगा

तुम भी मिले तो हमसे बहुत मुख़्तसर मिले

 

कच्चे मकान खेत कुँए बैल गाड़ियाँ

मुद्दत हुई है गाँव की कोई ख़बर मिले

 

नदियों के पुल बनेंगे ख़बर जब से आई है

कश्ती चलाने वाले झुकाकर नज़र मिले

 

3

आते लम्हों को ध्यान में रखिये

तीर कुछ तो कमान में रखिये

 

एक तुर्शी बयान में रखिये

एक लज़्ज़त ज़बान में रखिये

 

यूँ भी नज़दीकियाँ निखरती हैं

फ़ासले दरमियान में रखिये

 

वरना परवाज़ भूल जायेंगे

इन परों को उड़ान में रखिये

 

आप अपनी ज़मीन से दूर न हों

खुद को यूँ आसमान में रखिये

 

हर ख़रीदार खुद को पहचाने

आईने भी दुकान में रखिये

 

4

जलते मौसम में कुछ ऐसी पनाह था पानी

सोये तो साथ सिरहाने के रख लिया पानी

 

सिसकियाँ लेते हुए मैंने तब सुना पानी

मुझसे तपते हुये लोहे पे पड़ गया पानी

 

इस मरज़ का तो यहाँ अब कोई इलाज नहीं

शहर बदलो कि बदलना है अब हवा-पानी

 

आसमां रंग न बदले तो इस समन्दर से

ऊब ही जायें जो देखें फ़क़त हरा पानी

 

शहर के एक किनारे पे लोग प्यासे थे

शहर के बीच फवारे में जब कि था पानी

 

उस जगह अब तो फ़क़त ख़ुश्क सतह बाक़ी है

कल जहाँ देखा था हम सबने खौलता पानी

 

जब समंदर से मिलेगा तो चैन पायेगा

देर से भागती नदियों का हाँफता पानी

 

5

रेत बनकर ही वो हर रोज़ बिखर जाता है

चंद गुस्ताख़ हवाओं से जो डर जाता है

 

इन पहाड़ो से उतर कर ही मिलेगी बस्ती

राज़ ये जिसको पता है वो उतर जाता है

 

बादलों ने जो किया बंद सभी रस्तों को

देखना है कि धुआँ उठके किधर जाता है

 

लोग सदियों से किनारे पे रुके रहते है

कोई होता है जो दरिया के उधर जाता है

 

घर कि इक नींव को भरने में जिसे उम्र लगे

जब वो दीवार उठाता है तो मर जाता है

 

6

उसके लहजे में इत्मिनान भी था

और वो शख्स बदगुमान भी था

 

फिर मुझे दोस्त कह रहा था वो

पिछली बातों का उसको ध्यान भी था

 

सब अचानक नहीं हुआ यारो

ऐसा होने का कुछ गुमान भी था

 

देख सकते थे छू न सकते थे

काँच का पर्दा दरमियान भी था

 

रात भर उसके साथ रहना था

रतजगा भी था इम्तिहान भी था

 

आयीं चिड़ियाँ तो मैंने ये जाना

मेरे कमरे में आस्मान भी था

 

7

सीढ़ियाँ कितनी बड़ी हैं सीढ़ियाँ

मुझको छत से जोड़ती हैं सीढ़ियाँ

 

गाँव के घर में बुज़ुर्गों की तरह

आजकल सूनी पड़ी हैं सीढ़ियाँ

 

इन घरों में लोग लौटे ही नहीं

धूल में लिपटी हुई हैं सीढ़ियाँ

 

सिर्फ बच्चों की कहानी के लिए

आसमानों में बनी हैं सीढ़ियाँ

 

इस महल में रास्ते थे अनगिनत

अब गवाही दे रही हैं सीढ़ियाँ

 

उस नगर को जोड़ते हैं सिर्फ पुल

उस नगर की ज़िन्दगी हैं सीढ़ियाँ

 

इस इमारत में है ऐसा इंतजाम

हम रुकें तो भागती हैं सीढ़ियाँ 

 

8

एक बड़े दरवाज़े में था छोटा सा दरवाज़ा और.

अस्ल हक़ीक़त और थी लेकिन सबका था अन्दाज़ा और

 

मैं तो पहले ही था इतने रंगों से बेचैन बहुत,

मेरी बेचैनी देखी तो उसने रंग नवाज़ा और

 

कितने सारे लोग यहां हैं अपनी जगह से छिटके हुए,

चेहरे और लिबास भी और हैं हालात और तक़ाज़ा और

 

जब तक इसकी दरारों को इस घर के लोग नहीं भरते,

तब तक इस घर की दीवारें भुगतेंगी ख़मियाज़ा और

 

ख़ुश्बू रंग परिन्दे पत्ते बेलें दलदल जिसमें थे,

उस जंगल से लौट के पाया हमने ख़ुद को ताज़ा और

 

9

दूब को चाहिए हरा मौसम

और मुझ को खिला खिला मौसम

 

देख कर एक शख़्स को तन्हा

कुछ से कुछ और हो गया मौसम

 

सीढ़ियों पर जमी थी काई बहुत

पैर रखते फिसल गया मौसम

 

इन दिनों कुछ नहीं हुआ मुझ से

हर तरफ़ गूँजता रहा मौसम

 

सब ने चिपकाए काले काग़ज़ थे

किस झरोके से झाँकता मौसम

 

एक तिरपाल उड़ के दूर गिरी

हाट को रौंदता गया मौसम

 

और सब लोग बात करने लगे

जाने किस शख़्स ने कहा मौसम

 

उम्र भर उस के साथ रहता है

एक बच्चे की आँख का मौसम

 

10

उस ने बहती नदी को रोक लिया

फिर किसी ने उसी को रोक लिया

 

सारा दिन मैं न मिल सका उस से

चाँद ने धूप ही को रोक लिया

 

एक बच्चे ने माँग ली सीपी

रेत ने लहर ही को रोक लिया

 

भोली-भाली नहीं रही अब वो

उस ने अपनी हँसी को रोक लिया


अज्नबिय्यत बहुत ही प्यारी थी

मैं ने इस दोस्ती को रोक लिया

 

11

बंद घरों की दीवारों के अंदर बाहर धूल

आईने पर धूल जमी है और चेहरे पर धूल

 

दिन भर जिन के पाने को दिल रहता है बेताब

शाम की आँधी कर जाती है सारे मंज़र धूल

 

इतनी शरारत करती है सब लोग करें तौबा

बरसातें आने से पहले शहर में अक्सर धूल

 

धूल में खेले धूल ही फाँकी धूल ही उन का गाँव

धूल ही उन के तन की चादर उन का बिस्तर धूल

 

क़िस्तों में सब सफ़र किए हैं क़िस्तों में आराम

दूर गई बैठी फिर चल दी थोड़ा रुक कर धूल