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शनिवार, 30 मई 2020

मैं नहीं चाहता मेरे बच्चे मुझे किसी वीडियो में भीख मांगता हुआ देखें – सतीश राठी की लघुकथाएँ


मैं नहीं चाहता मेरे बच्चे मुझे किसी वीडियो में भीख मांगता हुआ देखें

यह हमारे समय की सबसे भयावह पंक्तियों में से एक है, एक मजबूर किन्तु स्वाभिमानी गरीब का दर्द| सतीश राठी की इन लघुकथाएँ कहीं खाए पिए अघाए वर्ग का ऐसा व्यक्ति है जिसने कभी गेंहूं ही नहीं पिसवाया था (रोटी की कीमत), कहीं भ्रष्टाचार के लिए अपने आप को जस्टिफाई करता ठेकेदार (पेट का सवाल), कहीं एक चतुर ग्रहिणी है जिसके २५ रूपये के नाश्ते पानी के एवाज़ में मेकेनिक 1500 के बजाए 1200 रूपये ले लेता है| और तो और आज़ाद भारत के वे लोग हैं जो किसी इंतज़ार में अपने सोचने समझाने की शक्ति और यहाँ तक छीन लेने की हैसियत यानी हाथ भी गवां चुके हैं (जिस्मो का तिलस्म) | तो तत्सम पर इस बार सतीश राठी....
- प्रदीप कान्त

रोटी की कीमत

आटा चक्की पर भीड़ लगी हुई थी। सभी लोग गेहूं पिसवाने के लिए आए हुए थे  उसी समय एक महंगी कार में से एक सूटेड बूटेड व्यक्ति ने उतर कर आटा चक्की वाले से पूछा ,'भाई! गेहूं  पीस दोगे।
आटा चक्की वाले ने कहा,' इसीलिए तो बैठे हैं। थोड़ा समय लगेगा। भीड़ काफी है। बैठिये आप।'- इतना कहकर एक कुर्सी उस व्यक्ति की ओर बढ़ा दी।
कसमसाता  हुआ व्यक्ति उस कुर्सी पर बैठ गया और अपना मोबाइल देखने लगा। उसकी बेचैनी बार-बार उसके चेहरे पर परिलक्षित हो रही थी।  चक्की वाला लगातार लोगों के डिब्बे के गेहूं चक्की में डालकर उन्हें पीसता जा रहा था।  तकरीबन बीस मिनट इंतजार के बाद उसने पूछा,' हो जाएगा ना!' चक्की वाले ने कहा,' अब आपका ही नंबर है और उसका गेहूं चक्की में पीसने के लिए डाल दिया। वह व्यक्ति बड़ा असहज महसूस कर रहा था।
उसने आटा चक्की वाले को लगभग सफाई देने की भाषा में बोलते हुए कहा,' अपने जीवन के इतने बरसों में आज पहली बार गेहूं पिसाने के लिए आया हूं। कभी मुझे तो आने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
आटा चक्की वाले ने उससे कहा,' चलिए अच्छा है भाई साहब !आज आपको रोटी की कीमत तो समझ में आई।'
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राशन

इक्कीस दिन की तालाबंदी ने उसके झोपड़े में सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया था । घर से बाहर निकला तो देखा  कि  एक स्थान पर कुछ लोग राशन का वितरण कर रहे हैं । वह वहां पर जाकर खड़ा हो गया।
एक व्यक्ति ने उससे पूछा," राशन चाहिए क्या?"
उसने कहा," चाहिए तो सही लेकिन आप वीडियो तो नहीं बनाओगे।"
उस व्यक्ति ने पूछा," क्यों वीडियो से  भला क्या दिक्कत है।"
उसने बड़े ही विवशता भरे स्वर में जवाब दिया," मैं नहीं चाहता मेरे बच्चे मुझे किसी वीडियो में भीख मांगता हुआ देखें।"
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पेट का सवाल

"क्यों बे! बाप का माल समझ कर मिला रहा है क्या?" गिट्टी में डामर मिलाने वाले लड़के के गाल पर थप्पड़ मारते हुए ठेकेदार चीखा।
" कम डामर से बैठक नहीं बन रही थी ठेकेदार जी। सड़क अच्छी बने यही सोचकर डामर की मात्रा ठीक रखी थी।मिमियाते हुए लड़का बोला।
 "मेरे काम में बेटा तू नया आया है। इतना डामर डाल कर तूने तो मेरी ठेकेदारी बंद करवा देनी है।" फिर समझाते हुए बोला," यह जो डामर है इसमें से बाबू ,इंजीनियर, अधिकारी, मंत्री सबके हिस्से निकलते हैं बेटा। खराब सड़क के दचके तो मेरे को भी लगते हैं । चल! इसमें गिट्टी का चूरा और डाल।मन ही मन लागत का समीकरण बिठाते हुए ठेकेदार बोला।
 लड़का बुझे मन से ठेकेदार का कहा करने लगा। उसका उतरा हुआ चेहरा  देखकर ठेकेदार बोला," बेटा ,सबके पेट लगे हैं। अच्छी सड़क बना दी और छह माह में गड्ढे नहीं हुए तो, इंजीनियर साहब अगला ठेका किसी दूसरे ठेकेदार को दे देंगे । इन गड्ढों से ही तो सबके पेट भरते हैं बेटा।"
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 गणित

दीपावली का समय था । यह तय हुआ कि निहाल को बुलाकर उससे बिजली की सारी बंद लाइट बदलवा दी जाए तथा और भी बिजली के जो छोटे-मोटे काम बचे हैं, वह करवा कर घर के बाहर की झालर लाइट भी लगवा ली जाए।
वैसे तो बिजली मैकेनिक को बुलाना ही बड़ा टेढ़ी खीर होता है ,लेकिन हमारी धर्मपत्नी की आदत है कि, जब भी कोई कारीगर आता है तो, वह उसकी खातिरदारी अच्छे से कर देती है और वह बड़ा खुश होकर जाता है । इसलिए जब निहाल को फोन लगाया तो निहाल ने तुरंत दोपहर में आने की हामी भर दी।
निहाल ने सारा काम तकरीबन एक घंटे में पूरा कर दिया । जब मैंने उससे पूछा कि ,भाई कितने हुए तो, निहाल ने तुरंत जोड़कर बताया सर पंद्रह सौ रुपए दे दीजिए ।
तभी धर्मपत्नी चाय और उसके साथ नाश्ते की एक प्लेट निहाल के लिए लेकर आ गई । निहाल ने मना किया ,लेकिन मेरी पत्नी ने बड़े आग्रह के साथ उसे नाश्ता भी करवाया और चाय भी पिलाई । 
निहाल जब जाने के लिए तैयार हो गया तो मैंने उससे पूछा,' हां निहाल भाई ! कितने दे दूं।'
अब सर, आपका तो घर का मामला है । आप तो सिर्फ बारह सौ रुपए दे दीजिए |” मैंने उसे तुरंत 12 सो रुपए निकाल कर दे दिए।
उसके जाने के बाद पत्नी ने कहा 'देखा मेरी चाय और नाश्ते की प्लेट का कमाल!  आपके ₹300 बच गए  । मेरी  चाय और नाश्ते की लागत  सिर्फ ₹25  ही थी।'
 मैं मौन रह गया ।पत्नी का गणित मेरी समझ से बाहर का था।
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घर में नहीं दाने

विमला देवी ने सुरेंद्र कुमार से कहा," घर चलाने के लिए पैसे  समाप्त हो गए।"
सुरेंद्र ने कहा," पिताजी के जमाने के पीतल के घड़े पड़े हैं ,उन्हें बेच दो।"
 विमला ने कहा," वह तो पिछले साल ही बेच दिए थे।"
"अरे तो पुराने समय के जो जेवरात पड़े हैं, उन्हें बेच दो।" सुरेन्द्र बोला।
"वह भी बेच दिए थे ।विमला ने दुखी मन से जवाब दिया।
"तो फिर हमारे इस हवेली जैसे प्राचीन  घर में जितनी भी पुरानी एंटीक चीजें हैं, अब उन्हें बेचने की बारी आ गई है। ऐसा करो  अब धीरे धीरे उन्हें बेचने का काम शुरू कर दो। आखिरकार  किसी तरह घर तो चलाना है ना।" सुरेन्द्र बोला।
विमला मौन हो गई। उसे तो सुरेंद्र का कहना मानना ही था।
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जिस्मों का तिलिस्म

वे सारे लोग सिर झुकाकर खड़े थे। उनके कांधे इस कदर झुके हुए थे कि पीठ पर कूबड़-सी निकली लग रही थी। दूर से उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे सिरकटे जिस्म पंक्ति बद्ध खड़े हैं। 
मैं उनके नजदीक गया। मैं चकित था कि ये इतनी लम्बी लाईन लगा कर क्यों खड़े हैं?
"क्या मैं इस लम्बी कतार की वजह जान सकता हूं?" नजदीक खड़े एक जिस्म से मैंने प्रश्न किया।
उसने अपना सिर उठाने की एक असफल कोशिश की। लेकिन मैं यह देखकर और चौंक गया कि उसकी नाक के नीचे बोलने के लिए कोई स्थान  नहीं है।
तभी उसकी पीठ से तकरीबन चिपके हुए पेट से एक धीमी सी आवाज आई, "हमें पेट भरना है और यह राशन की दुकान है।"
"लेकिन यह दुकान तो बन्द है। कब खुलेगी यह दुकान?" मैंने प्रश्न किया।
"पिछले कई वर्षों से हम ऐसे ही खड़े हैं। इसका मालिक हमें कई बार आश्वासन दे गया कि दुकान शीघ्र खुलेगी और सबको भरपेट राशन मिलेगा।" आसपास खड़े जिस्मों से खोखली सी आवाजें आईं।
"तो तुम लोग... अपने हाथों से क्यों नहीं खोल लेते यह दुकान?" पूछते हुए मेरा ध्यान उनके हाथों की ओर गया तो आंखें आश्चर्य से विस्फरित हो गई।
मैंने देखा कि सारे जिस्मों के दोनों हाथ गायब थे।
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सतीश राठी।
जन्म :23 फरवरी 1956 को इंदौर में जन्म। 
शिक्षा: एम काम, एल.एल.बी ।
लेखन: लघुकथा ,कविता ,हाइकु ,तांका, व्यंग्य, कहानी, निबंध आदि विधाओं में समान रूप से निरंतर लेखन । देशभर की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में सतत प्रकाशन। 
सम्पादन: क्षितिज संस्था इंदौर के लिए लघुकथा वार्षिकी 'क्षितिज' का वर्ष 1983 से निरंतर संपादन । इसके अतिरिक्त बैंक कर्मियों के साहित्यिक संगठन प्राची के लिए 'सरोकार' एवं 'लकीर' पत्रिका का संपादन। 
प्रकाशन:पुस्तकें  शब्द साक्षी हैं (निजी लघुकथा संग्रह), पिघलती आंखों का सच (निजी कविता संग्रह)
संपादित पुस्तकें - तीसरा क्षितिज(लघुकथा संकलन), मनोबल(लघुकथा संकलन), जरिए नजरिए (मध्य प्रदेश के व्यंग्य लेखन का प्रतिनिधि संकलन), साथ चलते हुए(लघुकथा संकलन उज्जैन से प्रकाशित), सार्थक लघुकथाएँ( लघुकथा की सार्थकता का समालोचनात्मक विवेचन), शिखर पर बैठकर  (इंदौर के 10 लघुकथाकारों की 110 लघुकथाएं संकलित)
साझा संकलन- समक्ष (मध्य प्रदेश के पांच लघुकथाकारों की 100 लघुकथाओं का साझा संकलन) कृति आकृति(लघुकथाओं का साझा संकलन, रेखांकनों सहित), क्षिप्रा से गंगा तक(बांग्ला भाषा में अनुदित साझा संकलन),
शिखर पर बैठ कर (दस लघुकथाकारों का साझा संकलन)
अनुवाद: निबंधों का अंग्रेजी, मराठी एवं बंगला भाषा में अनुवाद । लघुकथाएं मराठी, कन्नड़ ,पंजाबी, गुजराती,बांग्ला भाषा में अनुवादित । बांग्ला भाषा का साझा लघुकथा संकलन 'शिप्रा से गंगा तक वर्ष 2018 में प्रकाशित।
विशेष: लघुकथाएं दो पुस्तकों में,( छोटी बड़ी कथाएं एवं लघुकथा लहरी ) मेंगलुर विश्वविद्यालय  कर्नाटक के  बी ए प्रथम वर्ष और बी बी ए के पाठ्यक्रम में शामिल।
 लघुकथाएं विश्व लघुकथा कोश, हिंदी लघुकथा कोश, मानक लघुकथा कोश, एवं पड़ाव और पड़ताल के विशिष्ट खंड में शामिल।
शोध: विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में एम फिल में मेरे लघुकथा लेखन पर शोध प्रबंध प्रस्तुत । कुछ पी एच डी के शोध प्रबंध  में  विशेष रूप  से शामिल । 
पुरस्कार सम्मान: साहित्य कलश, इंदौर के द्वारा लघुकथा संग्रह' शब्द साक्षी हैं' पर राज्यस्तरीय ईश्वर पार्वती स्मृति सम्मान वर्ष 2006 में प्राप्त। लघुकथा साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए मां शरबती देवी स्मृति सम्मान 2012 मिन्नी पत्रिका एवं पंजाबी साहित्य अकादमी से बनीखेत में वर्ष 2012 में प्राप्त । सरल काव्यांजलि, उज्जैन से वर्ष 2018 में सम्मानित। 
विशेष:  एक लघुकथा संग्रह एक गजल संग्रह एक व्यंग्य संग्रह वर्ष 2020 में प्रकाशनाधीन।
सम्प्रति:भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इंदौर शहर में निवास, और लघुकथा विधा के लिए सतत कार्यरत।
संपर्क: सतीश राठी, त्रिपुर ,आर- 451, महालक्ष्मी नगर, इंदौर 452010 
मोबाइल नंबर 94250 67204, लैंडलाइन नंबर 0731 4959 451, Email : rathisatish1955@gmail.com

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

ब्रजेश कानूनगो की दो छोटी कहानियाँ


तत्सम पर इस बार ब्रजेश कानूनगो की दो छोटी किन्तु सशक्त कहानियाँ…| हालांकि ये नई नहीं हैं तो आपकी पढ़ी भी हो सकती हैं...

-प्रदीप कान्त

 रंग बेरंग

 छब्बीस जनवरी से लेकर पन्द्रह अगस्त जैसे त्यौहारों पर वह आशा करता रहता था कि शायद इस बार उसकी दुकान से तिरंगे के कपडों के थान बिक जाएँ, लेकिन ऐसा होता नही था। लोग बने-बनाए झंडे खादी भंडार से खरीद लिया करते थे।

 लेकिन इस बार कुछ विचित्र घटा। एक बूढा व्यक्ति, जिसके बारे में लोग सिर्फ इतना जानते थे कि वह सिलाई वगैरह करके अपना गुजारा करता रहा है , उसकी दुकान पर आया और केसरिया रंग का पूरा थान खरीद ले गया। दुकानदार को बडी खुशी हुई कि उसका बेकार पडा कुछ माल तो बिका।

 कुछ दिनों बाद वही बूढा व्यक्ति पुन: उसकी दुकान पर आया और उसने हरे रंग के कपडे की मांग की और पूरा हरे रंग का थान खरीद लिया। दुकानदार बडा प्रसन्न हुआ। अगले हफ्ते उसने देखा शहर के हर गली-मोहल्ले में हरे और केसरिया रंग के झंडे-झंडियाँ लहरा रहे थे।

 किंतु एक दिन अचानक सारे शहर में लाल ही लाल रंग बिखर गया। दंगे भडक गए थे। कर्फ्यू लगा। सेना आई। राजनीतिक शतरंज खेला गया। और फिर अंतत: शांति के दौरान कर्फ्यू में कुछ समय के लिए छूट भी दी गई।

 दुकानदार ने छूट के दौरान अपनी दुकान भी खोली। वही बूढा पुन: उसकी दुकान पर उपस्थित हुआ। इस बार उसने दुकानदार से दो मीटर सफेद कपडे की माँग की। दुकानदार को आश्चर्य हुआ,पूरा थान खरीदने वाले बूढे से जिज्ञासावश उसने पूछ लिया-‘क्यों बाबा अबकी बार सिर्फ इतना ही? क्या पूरा थान नही खरीदोगे?’

 बूढा फफक कर रो पडा, बोला-‘यह कपडा तो मैं अपने पोते के लिए खरीद रहा हूँ बेटा, जो कल के दंगों की चपेट में आ गया...।’

 कुछ ही घंटों में दुकानदार का सफेद कपडे का थान भी बिक गया,दो-दो मीटर के टुकडों में कट कर।
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 चुइंगम

 ‘हाँ तो अभी आपने देखा, पीडित महिला ने बताया कि किस तरह वह शाम को खेत से काम करके लौट रही थी और किस तरह पाँच बदमाशों ने उसे दबोच लिया।’ टीवी संवाददाता बडे जोश के साथ बता रहा था।

 चौबीस घंटे चैनल का पेट भरने के लिए डबलरोटी का बडा टुकडा उसे मिल गया था जिसे कुतर-कुतर कर पूरी रात चबाते रहना था।

 ‘बिल्कुल प्रमोद, आप बने रहिए वहीं,हम थोडी देर में फिर आपके पास लौटेंगे।’ सीधे प्रसारण को बीच में रोकते हुए स्टूडियो में बैठे सूत्रधार ने संवाददाता से कहा, फिर दर्शकों से मुखातिब होकर बोला-‘जाइएगा नहीं,आगे हम जानेंगें किस प्रकार पीडित आदिवासी महिला ने बहादुरी के साथ अकेले बदमाशों का सामना किया लेकिन अपनी आबरु बचाने में नाकायमाब रही। प्रशासन और राजनेताओं से भी पूछेंगे कि इसी घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार है और इन्हे रोकने के लिए उनके स्तर पर क्या प्रयास किए जा रहे हैं,लेकिन फिलहाल एक छोटा-सा ब्रेक।’

 उधर टीवी स्क्रीन पर अभिनेत्री ने साबुन बेचने के लिए अपनी देह को मोहक मुस्कान बिखेरती सहलाने लगी इधर एक बच्चे ने रिमोट का बटन दबा दिया। दूसरे चैनल पर संवाददाता और सूत्रधार एक बडी और रसीली चुइंगम चबा रहे थे।
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रविवार, 20 नवंबर 2016

खलील जिब्रान की लघुकथाएँ (अनुवाद - बलराम अग्रवाल)

खलील जिब्रान 
बलराम अग्रवाल
 विश्व साहित्य में खलील जिब्रान का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं| कुछ पढ़ने के लिए भटकते हुए हिंदी समय पर पहुँचा तो उनकी लोककथाएँ मिली जिनका अनुवाद सुपरिचित लघुकथाकार बलराम अग्रवाल ने किया है| तत्सम पर इस बार ये लोककथाएँ हिन्दी समय से साभार... 

- प्रदीप कान्त


पेड़

पेड़ आसमान में धरती द्वारा लिखी हुई कविता हैं। हम उन्हें काटकर कागज़ में तब्दील करते हैं और अपने खालीपन को उस पर दर्ज़ करते हैं।
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अटल सत्य

महान से महान आत्मा भी दैहिक जरूरतों की अवहेलना नहीं कर सकती।
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आज़ादी

वह मुझसे बोले - "किसी गुलाम को सोते देखो तो जगाओ मत। हो सकता है कि वह आज़ादी का सपना देख रहा हो।"

"अगर किसी गुलाम को सोते देखो तो उसे जगाओ और आज़ादी के बारे में उसे बताओ।" मैंने कहा।
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औरत और मर्द

एक बार मैंने एक औरत का चेहरा देखा। उसमें मुझे उसकी समस्त अजन्मी सन्तानें दिखाई दीं।

और एक औरत ने मेरे चेहरे को देखा। वह अपने जन्म से भी पहले मर चुके मेरे सारे पुरखों को जान गई।
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प्रेमगीत

एक कवि ने एक बार एक प्रेमगीत लिखा। यह बड़ा सुन्दर था। उसने उसकी कई प्रतियाँ तैयार कीं और अपने मित्रों व प्रशंसकों को भेज दिया। एक प्रति उसने पर्वत के पीछे रहने वाली उस युवती को भी भेजी जिससे वह सिर्फ एक बार ही मिला था।

एक या दो दिन के बाद उस युवती का पत्र लेकर एक आदमी उसके पास आया। पत्र में उसने लिखा था - "मैं आपको यकीन दिला दूँ कि मुझे लिखे आपके प्रेमगीत ने मुझे विभोर कर डाला है। आओ, मेरे माता-पिता से मिलो। हम सगाई की तैयारियाँ करेंगे।"

कवि ने पत्र का उत्तर लिखा - "दोस्त! यह कवि के हृदय से निकला गीत था। इसे कोई भी पुरुष किसी भी स्त्री के लिए गा सकता है।"

युवती ने जवाब भेजा - "झूठ और पाखंड से भरी बातें लिखने वाले! आज से लेकर कब्रिस्तान जाने के दिन तक मैं कभी भी किसी कवि पर यकीन नहीं करूँगी, तुम्हारी कसम।"
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पोशाक

सुन्दरता और भद्दापन एक दिन सागर किनारे मिल गए। आपस में बोले - "चलो, नहाते हैं।"

उन्होंने कपड़े उतारे और पानी में उतर गए।

कुछ देर बाद भद्दापन किनारे पर आया। उसने सुन्दरता के कपड़े पहने और चला गया।

सुन्दरता भी सागर से बाहर आई। उसे अपने कपड़े नहीं मिले। अपने नंगेपन पर उसे शर्म आने लगी। इसलिए उसने भद्दापन के कपड़े उठाए और पहनकर अपने रास्ते चली गई।

उसी दिन से लोग दूसरे-जैसा दिखने की गलती करते हैं।

अब, कुछ लोग हैं जिन्होंने सुन्दरता की नकल कर ली है। वे उसकी वास्तविकता को, उसकी पोशाक के झूठ को नहीं जानते। कुछ ऐसे भी हैं जो भद्देपन को पहचानते हैं। सुन्दर पोशाक उसको पहचानने से नहीं रोक सकती।
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(चित्र: गूगल सर्च से साभार)

रविवार, 14 सितंबर 2014

बिन तले के जूते - सुखबीर विश्वकर्मा की लघुकथा


हमेशा से यही होता था गांव में कभी कोई मौत होती या खुशी का मौका होता तो उन्हें जरूर बुलाया जाता वह खुद न जाकर चमरौंधे जूतों का एक जोडा भेज देते जो उनके शामिल होने का प्रतीक था

वे सैकडों बीघा जमीन के मालिक थे। गांव का एक हिस्सा उनकी जमीन जोत-बो कर पलता था।उनकी किलेनुमा आलीशान हवेली में हर वक्त मोटे-तगडे नौकर मौजूद रहते।

भला किसमें हिम्मत थी कि उनकी हरकत के खिलाफ़ मुंह खोल सकता।

अचानक एक दिन उनकी मां मर गई।परम्परा के मुताबिक गांव में खबर पहुंचा दी गयी कि हरेक घर से एक-एक आदमी को शवयात्रा में शामिल होना है। जबाब मिला आयेंगे

अर्थी बनकर तैयार हो गई लेकिन एक भी आदमी वहां नहीं पहुंचा । वे हैरान थे। झल्लाकर वे नौकरों पर बरसने लगे।

तभी दो बैलगाडियां हवेली की तरफ़ आती दिखाई पडी । वे चादरों से ढकी थी । पास आने पर उन्होंने गाडीवालों से पूछा,"लोग कहां है ? और ये क्या तमाशा है ?

गाडीवान बगैर कुछ कहे वापस लौट गये ।इधर उन्होंने आगे बढकर बैलग़ाडियों पर से चादरें हटायी ।वह ठगे रह गये । ग़ाडियों में बिन तलों के वही जूते भरे थे जो उन्होंने समय-समय पर गांव वालों के यहां भिजवाये थे ।

("तनी हुई मुट्ठियां" सम्पादक मधुदीप/ मधुकांत-1980)
ज्ञानसिंधु से साभार (http://gyansindhu.blogspot.in) 

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

मस्त लेखक के हृदय की सरलता: कबतरों से भी खतरा है

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एन उन्नी

जन्म: 23-04-1943, मवेली करा, एल्लपी, केरला में
शिक्षा: एम ए (अंग्रेजी)
प्रकाशन: मलयालम में 40 कहानियाँ व दो उपन्यास और हिन्दी में 30 कहानियाँ व 60 लघुकथाएँ प्रकाशित-प्रसारित। लघुकथाएँ विभिन्न संग्रहों में शामिल, लघुकथा संग्रह कबूतरों से भी खतरा है (2010)।
सम्मान: हिन्दीतर भाषी हिन्दी कथाकार के रूप में मध्य प्रदेश सहित्य परिषद से पुरुस्कृत-सम्मानित।
पता: 91, नीर नगर, ब्लू वाटर पार्क, बिचौली मर्दाना रोड़, इन्दौर 452016
मोबाइल: 98930 04848
मूलत: मलयाली भाषी एन उन्नी हमारे समय के एक महत्वपूर्ण लघुकथाकार हैं। वे समान रूप से मलयालम और हिन्दी में लिखते हैं। कई बार तो उनकी भाषा मूल हिन्दी भाषी लेखकों के लिए चुनौती की तरह उपस्थित हो जाती है। उन्नी की लघुकथाएँ हिन्दी के हाल के बहुत से तथाकथित लघुकथाकारों के लिये चुनौती है।
हाल ही में उन्नी का एक लघुकथा संग्रह कबूतरों से भी खतरा है प्रकाशित हुआ है। तत्सम में इस बार इसी संग्रह पर युवा कवि प्रदीप मिश्र की इस संग्रह पर टिप्प्णी के साथ कुछ लघुकथाएँ.....
-प्रदीप कांत
सिखा दिया तो तोता भी आदमी जैसी बात करता है। ठीक से नहीं सिखाया तो आदमी भी आदमी की तरह बात नहीं करते। (भावुक होना मना है। पृ.15)
लच्छू ने सोचा, डरकर भागने के लिए ही हैं पैर तो किस काम के...... जड़ जमाकर डटे रहना इससे बेहतर हैं। (उम्मीदों का कटहल पृ.17)
पिताजी ने बोझिल स्वर में कहा, बेटे जब प्रजा आजादी की तीव्र इच्छा से जाग उठती है तो बड़े से बड़ा तानाशाह भी घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। (कबूतरों से भी खतरा है पृ.29)
इस तरह के हजारों सूत्र वाक्यों से भरी पुस्तक " कबूतरों से भी खतरा है" हमारे हाथ में है। 136 पृष्ठों की इस पुस्तक में 59 लघुकथाएं संग्रहित हैं। इन लघुकथाओं के लेखक एन उन्नी मूलतः मलयालम भाषी हैं। उनकी लगभग आधी सदी की हिंदी रचना यात्रा की प्रतिनिधि रचनाओं से इस पुस्तक का जन्म हुआ है। लेखक के बारे में लघुकथा आंदोलन के प्रतिनिधि हस्ताक्षर और हिंदी कथा के प्रतिष्ठित कथाकार बलराम लिखते हैं कि - "एन उन्नी की लघुकथाएं ऐसी हैं कि बीसवीं सदी के श्रेष्ठ लेखकों की सूची बनानी पड़े तो एन उन्नी का नाम किसी भी कीमत पर रखूंगा। लघु कथा को एक विशिष्टता प्रेमचन्द्र ने सौंपी तो दूसरी राजेंद्र यादव ने, तीसरी चित्रा मुद् गल और चौथी सुदर्शन वशिष्ठ ने तो पांचवीं विष्णु नागर एवं चैतन्य त्रिवेदी ने और छठी एन.उन्नी, मुकेश वर्मा तथा मालचंद्र ने। हिंदी लघुकथा को भाषा और भाव की जो गरिमा और ऊंचाई एन.उन्नी ने सौंपी है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। " बलराम के इन दावों की पुष्टि करतीं कई लधुकथाएं इस संग्रह को न केवल पठनीय बनातीं हैं, बल्कि पाठ के बाद पाठक के अंदर एक जिम्मेदार नागरिक का सृजन भी करतीं हैं। इस संदर्भ में शीर्षक कथा-कबूतरों से भी खतरा है के साथ भीमसेन पटेल और अयोध्या, सर्कस, तबाही, फसल बयानवे, आजादी,लंकेश डाट काम, राम-राज्य, राहें समाजवाद की, गुलाम, खबरदार और गेहूँ आदि कथाओं को देखा जा सकता है। इन कथाओं मे हमारे समय को एक जागरूक नागरिक की तरह से देखते हुए जिस जीवन-दृष्टि का अर्जन लेखक करता है वह उर्जा से भरपूर है।
एकदम साफ वैचारिक समझ और समाज, वर्ग और मूल्यों के अस्तित्व से खूब परिचित एन उन्नी के गहन विश्लेषण के सार के रूप में ये लघुकथाएँ जन्म लेती हैं। पात्रों का चयन, संवाद और लेखकीय वक्तव्य का सठीक प्रयोग और किस्सागोई की कलात्मकता की रक्षा एन उन्नी के लघुकथाओं की विशेषता है जिसका उदाहरण ऊपर संकलित अंशों में देखा जा सकता है। वे आज की चुटकुलेनुमा, स्थूल व्यंग्य और करूणा की मसालेदार दाँचे से अलग अपनी संरचना तैयार करते हैं। वे दैनिक जीवन से एक सरल प्रतीक उठाते हैं और आम बोलचाल की भाषा में उसे कथा की पोषाक पहनाते हैं। जिसे पहनते ही रचना विवेक से भर जाती है और जटिल से जटिल पहलुओं का रेशा-रेशा उघाड़ कर रख देती है। पितृत्व कथा में जब एक पिता अपनी पुत्र से कहता है - तेरे पास रूपया नहीं है तो फिर रात भर कुत्ता क्यों भौंका? तो इस छोटे से वाक्य में समाज का एक बहुत ही त्रासद पहलू उभर कर सामने आता है। जहाँ अपनी गरीबी की विवशता में एक पिता चुपचाप पढ़ा कसमसाता रहता है। और उसके बेटी के पास आनेवाले ग्राहकों को देख कर कुत्ते भौंकते रहते हैं। अंत में विवशता के प्रहार से पिता की संवेदना मर जाती है। इस तरह के सूत्र वाक्यों से भरी एन उन्नी की इन लघुकथाओं को पढ़ना आसान है लेकिन पढ़ने के बाद की मानसिक बेचैनी और दायित्वबोध पाठक को थोड़ा और जागरूक तथा मनुष्य बना देतीं हैं। रचनाकार की यह बड़ी सफलता है। सभी तरह के दांव-पेंच से दूर एवं बिना किसी नाम-दाम के लालच में पड़े, अपने रचना संसार में मस्त लेखक के हृदय की सरलता इन कहानियों से टपकती है। इस महत्वपूर्ण कथाकार की अगली रचना की प्यास जगाने में सफल यह पुस्तक हमारे समय की संग्रहणीय कृति है।

पुस्तक का नाम - कबतरों से भी खतरा है
लेखक एन उन्नी
प्रकाशक - मित्तल एण्ड सन्स, -32 आर्यानगर सोसायटी दिल्ली-92,
मूल्य - 200 रूपये

-प्रदीप मिश्र, 72ए, सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड, इन्दौर-09 मो: 0919425314126
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समय
बचपन से ही पापाजी अपने बच्चों को कहानी सुनाया करते थे। बच्चे चाव से सुनते थे। बाद में गर्व से सुनने लगे थे। एक कहानीकार के रूप में पापाजी की सफलता में बच्चों का भी हाथ था, ऐसा पापाजी धन्यवाद स्वरूप महसूस करते थे।
अब बच्चे बड़े होकर नौकरी पेशा हो गये हैं। बड़े घर से रिता जोड़ लिया हैं। जिंदगी के बहुरंगी चकाचौंध में डुबकी लगा रहे हैं। किसी अन्जान ऊँचाईओं को छूने की फिराक में हमेशा परेशान रहते हैं।
पिताजी अब भी कहानी लिखते हैं। बच्चों को सुनाते हैं। उद्वेग से पूछते हैं
कैसी हैं ?
ठीक हैं !
सिर्फ ठीक ?
अच्छी हैं। कहकर बच्चे पापाजी के तरफ देखते हैं। पापाजी का उदासीन चेहरा देख कर बच्चे चिड़ जाते हैं, और असहिष्णुता से पूछते हैं -
अब क्या जान लोगे क्या ?............
शेर
बारबार समझाने पर भी काम नहीं करने वाले बच्चों के निकम्मेपन पर गुस्सैल मिश्राजी आखिरी चेतावनी स्वरूप बच्चों से चिल्लाकर कहा करते थे अब मैं दस तक गिनूंगा। इस बीच काम शुरू होना चाहिए। एक........ दो........
इस पर बेशर्त बच्चे अपना काम करते थे !
अब बच्चे बड़े हो गये हैं। परिदृश्य बदल गये हैं पर मिश्राजी में बदलाव नदारद हैं। अब भी मिश्राजी गुस्से में आकर आखिरी चेतावनी स्वरूप बच्चों पर चिल्लाते हैं अब में दस तक गिनूंगा! .. और बच्चों की तरफ देखते हैं तो बच्चे निर्विकार से पापाजी से आँख मिलाकर पूछते हैं फिर क्या करोगें ? .......
मिश्राजी चुप ! वे प्रश्न दोहराते हैं दस तक गिनने के बाद आप क्या करोगे?
यह सुनकर बाहर से आये छोटे बेटे को प्रश्न बहुत भाता है ! और अवज्ञा से पापाजी की तरफ देख कर कहते हैं ! और क्या करेंगे, आगे गिनेगें..... ग्यारह .... बारह ......तेरह..... और गिनते रहेंगे !
मिश्राजी दोनों बेटों के तरफ देखकर स्तब्ध रह जाते हैं|
गेहूँ
बांध के उद्घाटन के लिये अब सिर्फ तीन दिन ही बाकी है। रात दिन काम चल रहा है। मजदूरों को ऊचें आवाज में डाटते फटकारते ठेकेदार इधर से उधर एक बॉल की तरह लु़ रहा है। हमेशा स्कॉच की बदबु बहाने वाला आदमी
स्वागत समारोह के लिए आवश्यक वस्तुओं की तालिका में सिर्फ शराब की कई किस्मों के नाम देखकर लगा कि उद्घाटन मंत्री शराब की दुकान खोलने जा रहे है। फिर कई तरह के माँसका भी इंतजाम है।
उन्माद से भरे उस वातावरण में अशुभ सी सिर्फ एक ही बात है। एक बच्चे का रोना कांक्रीटींग हो रहे ट्रेंच के बाहर बैठकर जाने कब से वह रो रहा है।
मना कर सकूँ उससे पहले गुस्से से ट्रेंच के बाहर आये पिता ने बच्चे को बेरहमी से मारा, और सफाई के रूप में कहा उसको भुख लग रही है। साला हरामी राशन की दुकान में गेहूँ नहीं आया, उसको एक हजार बार समझा चुका हूँ।
क्यों गेहूँ नहीं मिल रहा है। यह मैनें नहीं पुछा क्योंकि मुझे यकीन है कि जिस दिन वह जान पायेगा, नालों में नदी की ओर बहने वाला पानी नहीं खून होगा।
लेकिन
स्थानीय अख़बार में चेतन को नौकरी मिलने से सबसे ज्यादा खुश तो मम्मी थी। बच्चे को कहीं बाहर गाँव जाने की जरूरत नहीं पड़ी। उपसंपादक होने से दफ़तर में बैठ कर काम करना है। तंख्वा भी अच्छी है।
बाल गंगाधर तिलक जैसे क्रांतिकारी देशभक्तों को याद करके अखबार की नौकरी एक आदर्श मानकर चेतन ने कार्य की शुरूआत की । अख़बार में ध्यान देने वाली बहुत सी बातें है। समाचार और विज्ञापन में एक संतुलन। अब विज्ञापनों की बा़ में समाचार लुप्त होते जा रहे है। पहले पॄनीय सामग्री इतनी अधिक थी कि अख़बार पॄने के लिए कम से कम दो तीन घण्टे लगते थे। अब पाँचदस मिनिटों में निपट जाती है। विज्ञापन की बा़ से आमदनी इतनी बड़ गई कि रोज नयेनये अख़बार निकलने लगे है। प्रचार के लिए उपहार ! बरिश के दिनों में छाता! । जाड़े के दिनों में जेकेट!। गर्मी के दिनों में फ्लास्क । समाचार के बदले आप कुछ भी लीजिए । बस! स्माचार मत मांगिये!....
पहले अख़बार टिकते नही थे । आत्माहूति करने की तैय्यारी करने के बाद ही अख़बार चालू करते थे। अब तो लखपति लोग रातों रात करोड़पति बनने के लिए ही अख़बार निकालते है। उन दिनों छपे हुए समाचारों के बदले कालापानी की सजा मिलती थी क्यों कि अख़बार वाले लोग क्रांतिकारी हुआ करते थे। वो लोगों के लिए लिखते थे। देश के लिए लिखते थे। अब लोग क्या हैं? देश क्या हैं? सिर्फ मुनाफा हैं! जुगाड़ है।
बीच बीच में आकड़ों का खेल चलता हैं। एक आकड़ा बताता है कि भारत में अब पच्चास फीसदी से ज्यादा भुखमरी हैं। मगर यह बात अखबारों से लगती नहीं है। अखबारों में तो पन्ने भरभर के दृश्य है, मादक सुन्दरियों के ! फिल्मी नोक छोकों के । यह सब पॄ पॄकर मनुष्यता मरती है। कविता मरती है। कहानी मरती है। इसके साथसाथ क्याक्या मरता है कोई सोच भी नहीं सकता।
यह सब बदलना हैं । अच्छा हुआ कि पुरानी अख़बारों का बंडल है। तुलनात्मक अध्ययन के लिए उठाकर देख सकता हूँ।
शहर में आजशीर्षक से छपी एक दैनिक कालम ने चेतन को आकर्षित किया । समय के साथ दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची इसका नग्न चित्र! उस समय की ॔शहर में आज॔ कॉलम में अंकित गतिविधियों में राष्ट्र है । राष्ट्रीय आन्दोलन है, राष्ट्र नेताओं के प्रवचन है। साहित्य को समर्पित कार्यक्रम है, कविगोष्ठि है। नाटक मंचन है। राष्ट्र निर्माण की रूप रेखाओं पर चर्चा है। मनुष्य सब एक होकर मनुष्यता के लिए लड़ने का संकल्प है।
वर्तमान के शहर में आज मनुष्य एक होने की बात नहीं करता। लोग मिलकर कोई भी कार्य नहीं करते । अग्रवाल समाज, गुप्ता समाज, मराठी समाज, ब्राम्हण समाज, कायस्त समाज ऐसे अलगअलग समाजों का कार्यक्रम! इन सभी समाजों का महिला समाज अलग से । इज्जददार लोगों का अलग समाज है जैसे कि लायण, लायणस, इन्नर व्हील, औटर व्हील!. . ..
चेतन ने सोचा बहुत हो गया । अब संपादक जी से बात करनी ही पड़ेगी । वर्तमान व्यवस्था से निजा़द पाना बहुत आवश्यक है।
प्रत्येक मुद्दों पर अतिविस्तिृत चर्चा हुई। भविष्य के लिए कार्य योजना तैयार करने पर विचार विमर्श के बाद संपादक ने चेतन को समझाया देखो चेतन! अख़बार में तुम्हारे लिए एक ही कॉलम उपयुक्त लगता है वो है संपादक के नाम चिट्ठी! उसके लिए तुमको ज्यादा कोई तैय्यारी करने की जरूरत भी नहीं हैं ज्यादा से ज्यादा शहरों के नाम रट कर रखना है। अपनी अख़बार के प्रति प्रशंसा लिखते रहना है! गुड़लक!
आश्चर्य चकित चेतन ने पूछा लेकिन सर ! ……
सख्त उत्तर मिला नो लेकिन प्लीस ! …..
छायाचित्र: प्रदीप कांत