शनिवार, 14 नवंबर 2009

बाल दिवस पर बच्चों की खुशी के लिये…

गिन्नी
आज बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू का जन्म दिवस यानि बाल दिवस है। बहुत दिनों से कक्षा चार में पढ़ती छोटी बेटी गिन्नी (प्रख्या) कह रही थी उसके कमप्यूटर पर बनाऐ चित्र कहीं भेजूँ और मैं ठहरा आलसी, टाले जा रहा था। आज लगा कि बाल दिवस पर उसके कुछ चित्र डाल ही दूँ। बच्ची भी खुश, पापा भी संतुष्ट और पाठक भी एक छोटी बच्ची की कल्पनाओं को महसूस कर पाऐंगे। यानि बाल दिवस पर बच्चे भी खुश और इस खुशी से बड़े भी प्रसन्न। ये सब उसने Adob Photoshop बनाई। मैंने उससे इन चित्रों के बारे में पूछा तो उसने मुझे कुछ कुछ बताया। जो समझ में आया उसे शीर्षक के तौर पर चित्रों के साथ लिख रहा हूँ। किन्तु बिना पूर्वाग्रह के आप उसकी इन कल्पनाओं से अलग सोच सकें तो मज़ा आए।
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Colorful stones


Valley of leaves


Butterflies

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शनिवार, 7 नवंबर 2009

डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाएँ

जन्म : 30 अप्रैल 1954, अबोहर (जिला: फिरोज़पुर), पंजाब।
शिक्षा : एम.बी.बी.एस., एम.डी. (कम्युनिटी मैडीसन), एम.ए. (समाज विज्ञान व पंजाबी), एम.एस-सी. (एप्लाइड साइकोलॉजी)

प्रकाशित पुस्तकें मौलिक : ‘बेड़ियाँ’, ‘इक्को ही सवाल’(लघुकथा संग्रह, पंजाबी में), तथा विभिन्न विधाओं से संबंधित 33 और पुस्तकें।
संपादित : 27 लघुकथा संग्रह (पंजाबी व हिंदी में) तथा 10 अन्य पुस्तकें।
संपादन : पंजाबी त्रैमासिक ‘मिन्नी’ का वर्ष 1988 से तथा पत्रिका ‘चिंतक’ का वर्ष 2000 से निरंतर संपादन।
संप्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, मैडीकल कॉलेज, अमृतसर।
संपर्क : 97, गुरु नानक एवेन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर (पंजाब)-143004
दूरभाष : 0183-2421006 मोबाइलः 09815808506
ईमेलः
-->drdeeptiss@yahoo.co.in ____________________________________________________________________

लघुकथा के सशक्त हस्ताक्षर बलराम अग्रवाल के ब्लॉग जनगाथा पर हिन्दी व पंजाबी लघुकथा के हस्ताक्षर डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की ये लघुकथाएँ पढ़ने को मिली। पढ़ कर लगा कि ये तो तत्सम के पाठकों को भी पढ़वानी चाहिये। डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाओं में संवेदनाओं की गहनता बहुत ही शिद्धत के साथ महसूसी जा सकती हैं। बलराम अग्रवाल के शब्दों में ‘पंजाब के श्याम सुन्दर अग्रवाल व डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति, दोनों ही कथाकारों की लघुकथाओं से ‘लघुकथा कहने की (न कि लिखने की) कला’ को जाना जा सकता है।’

आस्था व मजहब, मानव मन की एक बेहद जटिल संवेदना है। तत्सम में इस बार इसी की जद्दोजहद में उलझी डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति की लघुकथाएँ...
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दूसरा
किनारा
काफिला चला जा रहा था। शाम के वक्त एक जगह पर आराम करना था और भूख भी महसूस हो रही थी। एक जगह दो ढाबे दिखाई दिए। एक पर लिखा था–‘हिंदु ढाबा’ और दूसरे पर ‘मुस्लिम ढाबा’। दोनों ढाबों में से नौकर बाहर निकल कर आवाजें दे रहे थे। काफिले के लोग बँट गए। अंत में एक शख्स रह गया, जो कभी इस ओर, कभी उस ओर झांक रहा था। दोनों ओर के एक-एक आदमी ने, जो पीछे रह गए थे, पूछा, “किधर जाना है? हिंदु है या मुसलमान? क्या देख रहा है, रोटी नहीं खानी?”
वह हाथ मारता हुआ ऐं…ऐं…अं…आं करता हुआ वहीं खड़ा रहा। जैसे उसे कुछ समझ में न आया हो और पूछ रहा हो, ‘रोटी, हिंदु, मुसलमान।’
दोनों ओर के लोगों ने सोचा, वह कोई पागल है और उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए।
कुछ देर बाद दोनों ओर से एक-एक थाली रोटी की आई और उसके सामने रख दी गईं। वह हलका-सा मुस्काया। फिर दोनों थालियों में से रोटियां उठाकर अपने हाथ पर रखीं और दोनों कटोरियों में से सब्जी रोटियों पर उँडेल ली। फिर सड़क के दूसरे किनारे जाकर मुंह घुमाकर खाने लगा।
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मूर्ति

वह बाज़ार से गुजर रहा था। एक फुटपाथ पर पड़ी मूर्तियाँ देख कर वह रुक गया।
फुटपाथ पर पड़ी खूबसूरत मूर्तियाँ! बढ़िया तराशी हुईं। रंगो के सुमेल में मूर्तिकला का अनुपम नमूना थीं वे!
वह मूर्तिकला का कद्रदान था। उसने सोचा कि एक मूर्ति ले जाए।
उसे गौर से मूर्तियाँ देखता पाकर मूर्तिवाले ने कहा, “ ले जाओ, साहब, भगवान कृष्ण की मूर्ति है।”
“भगवान कृष्ण?” उसके मुख से यह एक प्रश्न की तरह निकला।
“हाँ साहब, भगवान कृष्ण! आप तो हिंदू हैं, आप तो जानते ही होंगे।”
वह खड़ा-खड़ा सोचने लगा, यह मूर्ति तो आदमी को हिंदू बनाती है।
“क्या सोच रहे हैं, साहब? यह मूर्ति तो हर हिंदू के घर होती है, ज्यादा महँगी नहीं है।” मूर्तिवाला बोला।
“नहीं चाहिए।” कहकर वह वहाँ से चल दिया।
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हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
“साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।”
“तुम इस बारे में कुछ कहना चाहते हो?” मजिस्ट्रेट ने पूछा।
“मैने क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी देकर बैठा था। ‘हीर’ के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नज़र नहीं आई।”
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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

दीपोत्सव की शुभकामनाएँ


आज हमारी परम्परा का एक महत्वपूर्ण दिवस है - दीपोत्सव यानि दीपावली। यह पर्व हमारे लिये मुफ्त में हषोल्लास का कारण नहीं है। इसके पीछे बुराई पर अच्छाई की जीत की चिरपरिचित कथा है। और वही सबसे बड़ा सत्य भी है, कम से कम उन लोगों की नज़र में जिनका काम केवल अच्छाइयों को कहीं से भी तलाश करके आत्मसात करते हुए जीना होता है। सत्य के पक्ष में बोलना होता है। जैसा कि कृष्ण बिहारी नूर ने अपने एक शेर में कहा भी है -


चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो

आइना झूठ बोलता ही नहीं


अब त्योहार तो है हषोल्लास का और आप सभी को दीपोत्सव की शुभकामनाएँ भी। बावजूद इसके कि बढ़ती जा रही महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है। ग्लोबलाइजेशन की लम्बीऽऽ ट्रेन छोटे दुकानदारों को रोंद रही है। भ्रष्टाचार का मुँह सुरसा की तरह खुलता ही जा रहा है। और सुरसा का मुँह तो वापस छोटा भी हो गया था, ये तो बन्द होने का नाम भी नहीं लेता। स्त्रियों की असुरक्षा दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। बलात्कार के मामलों में देश में राज्यों की रेंकिग होती है। और शायद ही कोई राज्य बुराई की इस रेंकिग में अपने आप को पीछे करने का प्रयास कर रहा हो। समस्याएँ बहुत गम्भीर हैं और ऐसे में हमारे समय के महत्वपूर्ण शायर निदा फाज़ली याद आते हैं -


वही हमेशा का आलम है क्या किया जाए

जहाँ से देखिये कुछ कम है क्या किया जाए


मिली है ज़ख्मों की सौगात जिसकी महफिल से

उसी के हाथ में मरहम है क्या किया जाए


और हम है कि बावजूद इसके कि बहुत कुछ बुरा हो रहा है, अच्छे की उम्मीद बनाए रखे हुऐ है। क्यों कि किसी भी चीज़ की अति बहुत देर तक कायम नहीं रह सकती। एक ना एक दिन उसे खत्म होना होता है। ठीक वैसे ही, जैसे दीपोत्सव के पीछे की कथा का खलनायक माना जाने वाला रावण। और सबसे बढ़िया दृष्टांत तो भस्मासुर का है। घोर तप के बाद शिवजी से वरदान पाकर, शिवजी के ही सर पर हाथ रख उन्हे भस्म करने चला था। बचा तो वो भी नहीं। हालांकि ग़लत अपने आप खत्म नहीं होगा, उसके खिलाफ़ बोलना होगा। इसलिये आप भी ग़लत के खिलाफ़ सही के लिये संघर्ष करते हुए सकारात्मक रहें, मस्त रहें और स्वस्थ रहें।


पुनश्च:


दीपोत्सव की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएँ


-प्रदीप कान्त

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चित्र गुगल सर्च इंजन से साभार


शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

गाँधी की प्रासंगिकता पर सवाल क्यों?

आज हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी यानि सबके प्यारे बापू की जयन्ती है। बापू की प्रासंगिकता के सन्दर्भ में जो थोड़ा बहुत समझ पाया हूँ वह इस बार तत्सम पर आपके सामने । आपकी प्रतिक्रियाओं का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।
-प्रदीप कान्त
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न्यूटन का तीसरा नियम है - प्रत्येक क्रिया की विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया होती है। विज्ञान के ज़्यादातर नियम आम जीवन में भी लागू होते हैं। इनमें से यह नियम भी एक है। यदि आप किसी को मारने दौड़ोगे तो वह भी लठ्ठ लेकर आपको मारने आऐगा, यह एक सामान्य सी बात है, यानि प्रत्येक क्रिया की विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया। किन्तु गाँधी ऐसे शख्स़ थे जिन्होने इस नियम को नकारा। यानि केवल सामने वाला ही क्रिया करता जाऐ, आप विपरीत प्रतिक्रिया मत करिये। अर्थात् हिंसा के जवाब में प्रतिहिंसा नहीं, अहिंसा। होता है ना आश्चर्य, लेकिन तभी तो कहने वालों ने गाँधी को उनके जीवन काल में ही महात्मा बना दिया।

पिछले सालों एक फिल्म आई थी लगे रहो मुन्ना भाई, इसने बापू की गांधीगिरी को कुछ दिनों के लिए ही सही, लोकप्रिय तो कर दिया था। वैसे तो सही शब्द गाँधीवाद है, गाँधीगिरी नहीं। किन्तु यदि सही ही इस्तेमाल करेंगे तो फिर फिल्म वाले फिल्म वाले कैसे कहलाएंगे? युवा वर्ग इससे खासा प्रभावित होता नज़र आया। भ्रष्ट कर्मचारियों को फूलों के गुच्छे भेंट किये गए।ये ठीक है कि फिल्मों का असर आखिर कितने दिन रहता? धीरे धीरे हम सब भूल गए। किन्तु इसको देखते हुऐ बापू की प्रासंगिकता पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। सच बात तो यह है कि बापू भी पहले एक साधारण आदमी ही थे। महात्मा तो उन्हे उनके कर्मों ने साबित किया। और ऐसा भी नहीं है कि अहिंसा की परिकल्पना सबसे पहले बापू ने ही की। यह तो सदियों पुरानी अवधारणा है जो गौतम बुद्ध ने की थी। यही महावीर स्वामी भी मानते थे। अपनी जिद के कारण सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध जीत तो लिया किन्तु उसमें हुई मारकाट और जन हानि को वह बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसका हृदय परिवर्तन हो गया तथा वह अहिंसावादी हो गया। उसने बोद्ध धर्म के प्रचार के द्वारा इसे फैलाया भी। किन्तु अहिंसा के इतने सशक्त उपयोग बापू से पहले शायद ही किसी ने किया हो।

इस बात को समझने के लिये हमें भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास जाना पड़ेगा जहां दो तारिखें बहुत महत्वपूर्ण हैं - २९ मार्च १८५७, जहाँ गरम दर्जे का विरोध होता है और ११ सितम्बर १९०६ जहाँ नरम विरोध की नींव बनती है जब बापू ने पहली बार दक्षिण अफ्रीका में बने खूनी बिल के सामने सर झुकाने से साफ साफ इन्कार कर दिया था। गरम दर्जे का पहला विरोध यानि १८५७ का स्वतन्त्रता संग्राम इसलिये असफल नहीं हुआ था कि उसमें ताकत नहीं थी, वरन् इसलिये असफल हुआ था कि ताकत तो थी पर संघटित नहीं थी। दूसरा, एक सामान्य से सिद्धान्त के तहत लोहे को लोहा काटता है जिसका बापू ने उपयोग नहीं किया। उन्होने तो पत्थर को रस्सी से काटने वाला नियम अपनाया, जैसे पानी खींचते खींचते रस्सी कुँऐ की मुंडेर पर पत्थर को काटने लगती है। ये ठीक है कि इसमें समय लगता है किन्तु शत प्रतिशत एक निश्चित समय बाद पत्थर कटने लगता है। रास्ता लम्बा था किन्तु बापू ने यही किया क्योंकि वे समझ गये थे कि हिंसा के प्रभाव अल्पकालिक होंगे। बापू की महानता इसमें नहीं थी कि उन्होने हिंसा के ख़िलाफ अहिंसा के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया वरन् उनकी महानता इसमें थी कि उन्होने अहिंसा को ही हिंसा के ख़िलाफ सबसे शक्तिशाली हथियार बनाया। सामान्यतया लोगों को मारकाट नहीं पसन्द होती और इस बात को बापू ने सबसे पहले समझा। उन्होने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया तो लोगों ने इसे मारकाट से ज़्यादा सही समझा और वे संघटित हो गये और यही बापू की सबसे बड़ी सफलता थी। संघटन की यही ताकत १८५७ में नहीं मिलती। वहाँ कहीं न कहीं सबके अपने अपने स्वार्थ थे जिसके कारण सबका अपना अपना विरोध शुरू हुआ। शायद यही वजह थी कि इस शुरूआत को गदर का नाम देकर अंग्रेजों ने लगभग ५० सालों तक भारतीय जनता को भरम में रखा जबकि अन्तत: वह स्वतन्त्रता आंदोलन ही था न कि गदर। लेकिन बापू के अहिंसा वाद के आह्वान से जो संघटन पैदा हुआ वह अंग्रेज सरकार को भारी पड़ गया।

बापू के दर्शन में केवल अहिंसा नहीं है, वहाँ सत्य है, सादगी है, स्वदेशी है, प्रकृति की और लौटने की अभिलाषा है और एक और महत्वपूर्ण बात कि जो स्वयं न कर सको औरों को भी न कहो। इस सन्दर्भ में ज़रा बापू की वेशभूषा को भी याद करें। उसके पीछे एक नहीं कई दर्शन थे - पहला कि इस देश के कई गऱीब लोगों के पास कपड़ा नहीं है तो वे अपने तन पर केवल एक धोती पहनते थे। दूसरी, स्वदेशी की धारणा कि यहाँ की कपास मेनचेस्टर चली जाती थी और कपड़े वहाँ से बन कर आते थे। वह नहीं पहनना ताकि स्वदेशी के माध्यम से देशप्रेम की प्रेरणा प्राप्त हो। और तीसरा प्रकृति की और लौटना और स्वस्थ रहना।

शायद बापू के सत्य और अहिंसा के दर्शन को देख कर ही महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन ने एक बार कहा था कि आने वाली पीढियां शायद ही यकीन कर पाएं कि हाड मांस का कोई ऐसा पुलता इस धरती पर कभी हुआ था। एक और दिलचस्प बात यह भी है गांधी जयंती के आसपास ही हर बार नोबेल पुरस्कारों की घोषणा होती है। दुनिया के सबसे बड़े सम्मान देने वाली नोबेल समिति को इस बात का हमेशा अफसोस रहा कि दुनिया को सत्य और अहिंसा का बेमिसाल दर्शन देने वाले और इसे अपने जीवन में उतारने वाले व्यक्ति को वह सम्मानित नहीं कर सकी. नोबेल शांति पुरस्कार के लिए गांधी जी तीन बार नामांकित हुए थे. १९४८ में जब उन्हें यह पुरस्कार मिलना तय था तो उनकी हत्या हो गई और नोबेल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिया जाता।

कौन नहीं जानता कि दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला के प्रेरणा स्रोत भी बापू ही थें। यहाँ तक कि अफ्रीका का तो संविधान भी गाँधीवादी मूल्यों पर आधारित ही बनाया गया है। गाँधीवाद के कतिपय समर्थक तो ये आज भी मानते हैं कि आज के तमाम् सवालों का हल भी गाँधीवाद में मिलता है। अब अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा को ही लें। स्कूली छात्राओं के एक प्रश्न के जवाब में कि वे किस महान हस्ती के साथ भोजन करना पसन्द करते तो उन्होने गाँधी का ही नाम लिया। बराक ओबामा के अनुसार उनके आदर्श हैं महात्मा गाँधी, नेल्सन मंडेला एवं अब्राहम लिंकन। इसी से आप बापू के नैतिक मूल्यों की वर्तमान प्रासंगिकता के बारे में सोच सकते हैं। वैसे भी बापू ने जिन नैतिक मूल्यों पर ज़ोर दिया है वे बुद्ध, महावीर और ईसा के नैतिक मूल्यों से अलग नहीं हैं। जैसे इसा भी सूली पर चढ़ते हुए भी कह रहे थे कि हे ईश्वर इन्हे क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहें हैं? और जब बुद्ध और ईसा की प्रासंगिकता पर कोई सवाल नहीं उठता तो फिर गाँधी पर ही प्रासंगिकता का सवाल क्यों? हमें तो उनकी प्रासंगिकता को समझते हुऐ उस तमाम बाज़ारवाद का विरोध करना चाहिये जो बापू का उपयोग करके वस्तु बेचने कि बात करता है। इसका उदाहरण है आज ही नई दुनिया की एक खबर - गाँधी की सादगी और ११ लाख का पेन, इसके अनुसार एक विदेशी कम्पनी गाँधीजी के नाम पर ११ लाख ३९ हज़ार के २४१ सोने के पेन बाज़ार में उतारे हैं जिसे गाँधीजी की २४१ मील लम्बी दांडी यात्रा से जोड़ा गया है। सोचने की बात है जो आदमी तमाम उम्र सादगी से जीता रहा उसका उपयोग निर्मम बाजारवाद कर रहा है और हम ख़ामोश हैं। ऐसे में क्या हमें दुश्यन्त कुमार नहीं याद आने चाहिये -

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलना चाहिये
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये
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शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

चाँद तनहा है


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1 अगस्त, 1932 को जन्मी मीना कुमारी का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। उनका असल नाम महज़बीन बानो था। उनकी सफल फिल्मों में परिणीता, शारदा, मिस मेरी, साहिब बीवी और गुलाम, आरती, मैं चुप रहूँगी, दिल एक मंदिर, काजल, फूल और पत्थर जैसी कई बेहतरीन फिल्में शामिल थीं। 1962 में उन्हें ’साहिब बीवी और गुलाम’, ’आरती’ और ’मैं चुप रहूँगी’ के लिये सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के सम्मान के लिये नामांकित किया गया जो अपने आप में एक रिकार्ड है। मीनाकुमारी ने 1952 में कमाल अमरोही से शादी की। परंतु यह शादी सफल न हो सकी। मीनाकुमारी ने खुद को शराब में डुबो दिया और एक ज़माने की सफलतम अभिनेत्री अपने ही अंधेरों में खोती चली गई। 1972 में अपनी आखिरी फिल्म "पाक़ीज़ा" की रिलीज के तीन सप्ताह बाद 31 मार्च, 1972 को उनका इंतकाल हो गया।

नई पीढ़ी तो शायद ही जानती हो कि मीनाकुमारी सशक्त अभिनेत्री होने के साथ शायरा भी थीं और "नाज़" तखल्लुस का इस्तेमाल करतीं थीं। कारण जो भी रहा हो पर उनकी शायरी एक लम्बे समय तक लोगों के सामने नहीं आ पाई । उनकी मौत के बाद उनकी डायरियाँ मशहूर गीतकार और निर्देशक गुलज़ार को वसीयत में मिलीं जिन्होंने इनमें से कुछ गज़लों और नज़्मों को बाद में छपवाया। इससे पहले खुद उनकी आवाज़ में उनकी कुछ रचनाओं का एक एलबम "I Write, I Recite" ज़रूर आया था जिसमें संगीत दिया था मशहूर संगीतकार खैयाम ने।

तत्सम मे इस बार मीनाकुमारी की गज़लें..... । मीनाकुमारी की शायरी में उनके अपने नाखुशगवार जीवन का दर्द शिद्दत से महसूस होता है। इन्तज़ार रहेगा कि इन गज़लों की खलिश आपको भी मह्सूस हुई कि नहीं?
1
चाँद तनहा है आस्माँ तन्हा
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तनहा

बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआँ तन्हा

जिन्दगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तनहा है और जाँ तन्हा

हमसफर कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हा

जलती-बुझती-सी रौशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा इक मकाँ तन्हा

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे यह जहाँ तन्हा
2
रिमझिम- टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम बूँदों में, जहर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दी दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते-आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा-सी जो बात मिली
3
आगाज तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता

जब जुल्फ की कालिख में गुम जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता

हँस-हँस के जवाँ दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स की किस्मत में ईनाम नहीं होता

बहते हुए आँसू ने आँखों से कहा थमकर
जो मय से पिघल जाए वह जाम नहीं होता

दिन डूबे हैं या डूबी बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता।
4
पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है
रात खैरात की सदके की सहर होती है

साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब
दिल ही दुखता है न अब आस्तीं तर होती है

जैसे जागी हुई आँखों में चुभें काँच के ख्वाब
रात इस तरह दीवानों की बसर होती है

गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है

एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती खुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है

दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है

काम आते हैं न आ सकते हैं बेज़ाँ अल्फ़ाज़
तर्ज़मा दर्द की खामोश नज़र होती है
5
आबलापा कोई इस दश्त में आया होगा
वरना आँधी में दिया किस ने जलाया होगा

ज़र्रे ज़र्रे पे जड़े होंगे कुँवारे सज्दे
एक एक बुत को ख़ुदा उस ने बनाया होगा

प्यास जलते हुये काँटों की बुझाई होगी
रिसते पानी को हाथेली पे सजाया होगा

मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा

ख़ून के छींटे कहीं पोछ न लें रहरौं से
किस ने वीराने को गुलज़ार बनाया होगा
6
यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो

रोओ मत, न रोने दो
ऐसी भी जल थल क्या हो

बहती नदी की बाँधे बाँध
चुल्लू में हलचल क्या हो

हर छन हो जब आस बना
हर छन फिर निर्बल क्या हो

रात ही ग़र चुपचाप मिले
सुबह फिर चंचल क्या हो

आज ही आज की कहें-सुने
क्यों सोचें कल, कल क्या हो

शनिवार, 11 जुलाई 2009

कैफ़ी आज़मी की गज़ले

कैफ़ी आज़मी का नाम हिन्दुस्तान के आलातरीन शायरों में शुमार किया जाता है. उत्तरप्रदेश के आज़मगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव में सन १९१९ में जन्मे कैफ़ी साहब का मूल नाम अख्तर हुसैन रिज़वी था. कैफी आजमी के पिता उन्हें एक मौलाना के रूप में देखना चाहते थे लेकिन कैफी आजमी को उससे कोई सरोकार नहीं था और वह मजदूर वर्ग के लिए कुछ करना चाहते थे। 1942 मे कैफी आजमी उर्दू और फारसी की उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ और इलाहाबाद भेजे गए। लेकिन कैफी ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की सदस्यता स्वीकार कर पार्टी कार्यकर्ता के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया और फिर अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हो गए। समाजवादी विचारधारा के पक्के समर्थक कैफ़ी साहब की रचनाओं में मज़लूमों का दर्द पूरी शिद्दत से उभर कर सामने आता है।

(Source: संघर्ष के शायर थे कैफी आजमीhttp://josh18.in.com/showstory.php?id=200691)


मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली के अनुसार - दूसरे कम्युनिस्टों की तरह उन्हें नास्तिक कहना मुनासिब नहीं, उनका साम्यवाद भी उनके घर की आस्था का ही एक फैला हुआ रूप था। वह जब से कॉमरेड बने हमेशा इसी रास्ते पर चले और देहांत के वक़्त भी उनके कुर्ते की जेब में सीपीआई का कार्ड था।

(Source: शोषित वर्ग के शायर थे कैफ़ी आज़मीhttp://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2006/08/060815_nida_column3.shtml)

तत्सम में इस बार कैफी आजमी की गज़लें …
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1
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की खलल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े


जिस तर्ह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े


इक तुम कि तुम को फ़िक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े


साकी सभी को है गम-ए-तिश्न: लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पडे


मुद्दत के बाद उसने की तो लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

2
हाथ आ कर लगा गया कोई
मेरा छप्पर उठा गया कोई

मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई

वो गए जब से एसा लगता है
छोटा मोटा खुदा गया कोई

ये सर्दी धूप को तरस्ती है
जैसे सूरज को खा गया कोई

मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई

3
पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाये
हम चाँद से आज लौट आये

दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं
क्या हो गया मेहरबाँ साये

जंगल की हवायें आ रही हैं
काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाये

लैला ने नया जनम लिया है
है कैस कोई जो दिल लगाये

है आज ज़मीन का गुसल-ए-सहत
जिस दिल में हो जितना ख़ून लाये

सहरा सहरा लहू के ख़ेमे
फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आये

4
शोर परिंदों ने यु ही न मचाया होगा
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा

पेड़ के कांटने वालो को ये मालूम तो था
जिस्म जल जायंगे जब सर पे न साया होगा

मानिए जश्न-ऐ-बहार ने ये सोचा भी नहीं
किसने कांटो को लहू पाना पिलाया होगा

अपने जंगल से घबरा के उडे थे जो प्यासे
हर सेहरा उनको समंदर नज़र आया होगा

बिजली के तार पे बैठा तनहा पंछी
सोचता है की यह जंगल तो पराया होगा

5
मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमाँ नहीं मिलता

नई ज़मीं नया आसमाँ भी मिल जाये
नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता

वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता


खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता

6
कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है

मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़ज़ा
कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा है

मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ
कि आज दामन-ए-यज़दाँ भी तार-तार-सा है

सजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किए
उसी पे ख़ालिक़-ए-कोनैन शर्मसार सा है

तमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है

सब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार सा है

जिसे पुकारिए मिलता है इस खंडहर से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी के इश्तेहार सा है

हुई तो कैसे बियाबाँ में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरे मज़ार सा है

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है
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