बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ के गीत

न्म:: ०९ सितम्बर १९७०

शिक्षा: बी कॉम

सम्पर्क: S-49, सचिन स्वीट्स के पीछे, दीनदयाल नगर फेज़-I,

काँठ रोड, मुरादाबाद-244001 (उ०प्र०)

ई-मेल: vyom70@yahoo.in
मोबाइल: 94128 05981,

94570 38652, 93597 11291

योगेन्द्र वर्मा व्योमनवगीत के एक युवा ह्स्ताक्षर हैं। इनके नवगीतों में माँ, बच्चा, बहू, मुनिया सभी आसानी से चले आते हैं। इन नवगीतों में भले आपको शिल्प का कुछ खास नयापन न दिखे किंतु इनकी सरल भाषा ही इनकी खासियत है जिसके कारण ये पाठक को कहीं गहरे तक कचोटने की क्षमता रखते हैं। माँ की उपेक्षा के लिये धूल चढ़ी सरकारी फाइल जैसी है अब माँ जैसा प्रयोग या उपेक्षित होते रिश्तों के लिये मुनिया ने पीहर में आना-जाना छोड़ दिया जैसा वाक्यांश कवि की इस क्षमता का सीधा सा उदाहरण है। अब तक योगेन्द्र का एक काव्य संग्रह इस कोलाहल में प्रकाशित हो चुका है। तत्सम में इस बार योगेन्द्र के कुछ गीत...

1

कैसी है अब माँ


किसको चिन्ता किस हालत में
कैसी है अब माँ


सूनी आँखों में पलती हैं

धुंधली आशाएँ

हावी होती गईं फ़र्ज़ पर

नित्य व्यस्तताएँ


जैसे खालीपन काग़ज़ का
वैसी है अब माँ


नाप-नापकर अंगुल-अंगुल

जिनको बड़ा किया

डूब गए वे सुविधाओं में

सब कुछ छोड़ दिया


ओढ़े-पहने बस सन्नाटा
ऐसी है अब माँ


फ़र्ज़ निभाती रही उम्र-भर

बस पीड़ा भोगी

हाथ-पैर जब शिथिल हुए तो

हुई अनुपयोगी


धूल चढ़ी सरकारी फाइल
जैसी है अब माँ


2

छोटा बच्चा पूछ रहा है कल के बारे में


छोटा बच्चा पूछ रहा है

कल के बारे में


साज़िश रचकर भाग्य समय ने
कुछ ऐसे बाँटा
कृष्ण-पक्ष है, आँधी भी है
पथ पर सन्नाटा


कौन किसे अब राह दिखाए

इस अँधियारे में


अन्र्तर्ध्यान हुए थाली से
रोटी दाल सभी
कहीं खो गए हैं जीवन के
सुर-लय-ताल सभी


लगता ढूँढ रहे आशाएँ

ज्यों इकतारे में


नई उमंगें नये सृजन भी
कुछ तो बोलेंगे
शनै-शनै आशंकाओं की
पर्तें खोलेंगे


एक नई दुनिया है शायद
मिट्टी गारे में


3

मुनिया ने पीहर में आना-जाना छोड़ दिया


मुनिया ने पीहर में आना-
जाना छोड़ दिया


ना पहले जैसा अपनापन

ना ही प्यार दिखा

फ़र्ज़ कहीं ना दिखा; दिखा तो

बस अधिकार दिखा


चिट्ठी ने भी माँ का हाल
बताना छोड़ दिया


वृद्ध पिता का बरगद-सा जब

साया नहीं रहा

मिट्ठू ने भी राम-राम तक

मन से नहीं कहा


ममता ने भी भावों को
दुलराना छोड़ दिया


बीते कल को सोच-सोचकर

नयन हुए गीले

कच्चे धागे के बंधन भी

पड़े आज ढीले


चावल ने रोली का साथ
निभाना छोड़ दिया


4

धीरे-धीरे सूख रही है तुलसी आँगन में


सामग्री वाला पन्ना देखें [c]">पन्ना

धीरे-धीरे सूख रही है
तुलसी आँगन में


पछुवा चली शहर से, पहुँची

गाँवों में घर-घर

एक अजब सन्नाटा पसरा

फिर चौपालों पर


मिट्टी से जुड़कर बतियाना
रहा न जन-जन में


स्वांग, रासलीला, नौटंकी,

नट के वो करतब

एक-एक कर हुए गाँव से

आज सभी गायब


कहाँ जा रहे हैं हम, ननुआ
सोच रहा मन में


नये आधुनिक परिवर्तन ने

ऐसा भ्रमित किया

जीन्स टॉप में नई बहू ने

सबको चकित किया


छुटकी भी घूमा करती नित
नूतन फ़ैशन में


5

नई बहू घर में आई है बन्दनवार लगे


नई बहू घर में आई है
बन्दनवार लगे


चीज़ों से जुड़ना बतियाना

पीछे छूट गया

पहली बारिश की बूँदों-सा

सब कुछ नया-नया


कुछ महका-सा कुछ बहका-सा
यह संसार लगे


संकेतों की भाषा नूतन

अर्थ गढ़े पल-पल

मूक-बधिर अँखियाँ भी करतीं

कभी-कभी बेकल


गंध नहाई हवा सुबह की
भी अंगार लगे


परीलोक की किसी कथा-सा

आने वाला कल

ऊबड़-खाबड़ धरा कहीं पर

और कहीं समतल


कोमल मन में आशंकाओं
के अंबार लगे

शनिवार, 10 सितंबर 2011

कीर्ति चौधरी की कविताएँ

01 जनवरी 1934 - 13 जून 2008

कीर्ति चौधरी का मूल नाम कीर्ति बाला सिन्हा था. उन्नाव में जन्म के कुछ बरस बाद उन्होंने पढ़ाई के लिए कानपुर का रुख़ किया। 1954 में एमए करने के बाद 'उपन्यास के कथानक तत्व' जैसे विषय पर उन्होंने शोध भी किया।

साहित्य उन्हें विरासत में भी मिला और फिर जीवन साथी के साथ भी साहित्य, संप्रेषण जुड़े रहे। हालांकि पिता एक ज़मीदार थे पर माँ, सुमित्रा कुमारी सिन्हा ख़ुद एक बड़ी कवियत्री, लेखिका और जानी-मानी गीतकार थीं। माँ के प्रभाव से मुक्त कीर्ति चौधरी का लेखन अपनी मौलिकता ही लिए हुए था। कीर्ति चौधरी की कविताएँ तीसरा सप्तक में शामिल की गई थी।

कीर्ति चौधरी का विवाह हुआ हिंदी के सर्वश्रेष्ठ रेडियो प्रसारकों में से एक, ओंकारनाथ श्रीवास्तव से जो बीबीसी हिंदी सेवा के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे और केवल रेडियो को अपने योगदान ही नहीं, बल्कि अपनी कविताओं और कहानियों के लिए भी जाने जाते हैं।

कीर्ति चौधरी की साहित्यिक यात्रा यों तो बहुत लंबा-चौड़ा समय और सृजन समेटे हुए नहीं है पर जितना भी है, उसे किसी तरह से कमतर नहीं आंका जा सकता। कीर्ति चौधरी के परिवार में अब उनकी बेटी अतिमा श्रीवास्तव हैं जो ख़ुद अंग्रेज़ी की लेखिका हैं। अतिमा के दो उपन्यास, 'ट्रांसमिशन' और 'लुकिंग फ़ॉर माया' प्रकाशित हो चुके हैं।

तत्सम में इस बार कीर्ति चौधरी की कुछ कविताएँ.... और यहाँ यह जिक्र महत्वपूर्ण होगा कि पहली कविता आगत का स्वागत मैने कक्षा -10 के पाठ्यक्रम में पढी थी। दूसरी व तीसरी कविता तीसरा सप्तक में शामिल कुछ कविताओं में से है।

- प्रदीप कांत

1

आगत का स्वागत

मुँह ढाँक कर सोने से बहुत अच्छा है,

कि उठो ज़रा,

कमरे की गर्द को ही झाड़ लो।

शेल्फ़ में बिखरी किताबों का ढेर,

तनिक चुन दो।

छितरे-छितराए सब तिनकों को फेंको।

खिड़की के उढ़के हुए,

पल्लों को खोलो।

ज़रा हवा ही आए।

सब रौशन कर जाए।

... हाँ, अब ठीक

तनिक आहट से बैठो,

जाने किस क्षण कौन आ जाए।

खुली हुई फ़िज़ाँ में,

कोई गीत ही लहर जाए।

आहट में ऐसे प्रतीक्षातुर देख तुम्हें,

कोई फ़रिश्ता ही आ पड़े।

माँगने से जाने क्या दे जाए।

नहीं तो स्वर्ग से निर्वासित,

किसी अप्सरा को ही,

यहाँ आश्रय दीख पड़े।

खुले हुए द्वार से बड़ी संभावनाएँ हैं मित्र!

नहीं तो जाने क्या कौन,

दस्तक दे-देकर लौट जाएँगे।

सुनो,

किसी आगत की प्रतीक्षा में बैठना,

मुँह ढाँक कर सोने से बहुत बेहतर है।

2

फूल झर गए

फूल झर गए।

क्षण-भर की ही तो देरी थी
अभी-अभी तो दृष्टि फेरी थी
इतने में सौरभ के प्राण हर गए ।
फूल झर गए ।

दिन-दो दिन जीने की बात थी,
आख़िर तो खानी ही मात थी;
फिर भी मुरझाए तो व्यथा हर गए
फूल झर गए ।

तुमको औमुझको भी जाना है
सृष्टि का अटल विधान माना है
लौटे कब प्राण गेह बाहर गए ।
फूल झर गए ।

फूलों-सम आओ, हँस हम भी झरें
रंगों के बीच ही जिएँ औमरें
पुष्प अरे गए, किंतु खिलकर गए ।
फूल झर गए ।

3

कम्पनी बाग

लतरें हैं, ख़ुशबू है,पौधे हैं, फूल हैं ।
ऊँचे दरख़्त कहीं, झाड़ कहीं ,शूल हैं ।

लान में उगाई तरतीबवार घास है ।
इधर-उधर बाक़ी सब मौसम उदास है ।

आधी से ज़्यादा तो ज़मीन बेकार है ।
उगे की सुरक्षा ही माली को भार है ।

लोहे का फाटक है, फाटक पर बोर्ड है ।
दृश्य कुछ यह पुराने माडल की फ़ोर्ड है ।

भँवरों का, बुलबुल का, सौरभ का भाग है ।
शहर में हमारे यही कम्पनी बाग़ है ।

4

यथास्थान

नहीं, वहीं कार्निस पर

फूलों को रहने दो।

दर्पण में रंगों की छवि को

उभरने दो।


दर्द :उसे यहीं

मेरे मन में सुलगने दो।

प्यास : और कहाँ

इन्हीं आँखों में जगने दो।

बिखरी-अधूरी अभिव्यक्तियाँ

समेटो,लाओ सबको छिपा दूँ

कोई आ जाए!

छि:,इतना अस्तव्यस्त

सबको दिखा दूँ!


पर्दे की डोर ज़रा खीचों

वह उजली रुपहली किरन

यहाँ आए

कमरे का दुर्वह अंधियारा तो भागे

फिर चाहे इन प्राणों में

जाए समाए


उसे वहीं रहने दो।

कमरे में अपने

तरतीब मुझे प्यारी है।

चीजें हों यथास्थान

यह तो लाचारी है।


(कविताएँ व परिचय: कविता कोश से साभार, चित्र: प्रदीप कान्त)

शनिवार, 13 अगस्त 2011

जय जनता, जय जनतंत्र

आज 14 अगस्त है, कल 15 अगस्त, 65 वें स्वतंत्रता दिवस के लिये जोर शोर से जश्न की तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी होगी। इस अवसर पर क्या बोलना है, क्या नहीं? कौनसे मुद्दे को भुनाना है, कौनसे को सफाई से छुपाना है? तय किया जा चुका है। महात्मा गाँधी, चन्द्र शेखर आज़ाद, भगत सिंह, बाल गंगाधर तिलक, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आदि (सैंकड़ो नाम हैं किस किस को गिनाया जाए? और बहुत से बेनाम भी जिन्हे इतिहास में भी शायद दर्ज न किया गया हो) को याद किया जाएगा, उपलब्धियों को गिनाया जाएगा - रिटेल बाज़ार में मल्टीनेशनल सबसे बड़ी उपलब्धि है माई डीयर, चाहे ग़रीब भूखा मर जाए, कहावत के लिये सात आसमानों का जिक्र होता है किंतु महंगाई आठवे आसमान को छू रही है और कोई प्रेमी प्रेमिका का लिये सातवें आसमान से तारे तोड़ कर लाने का वादा कर सकता है किंतु आठवे आसमान से महंगाई को ज़मीन पर लाने का तो शायद कोई ख्वाब में भी न सोचता हो। और महंगाई पर तथाकथित नियंत्रण के लिए रिज़र्व बेंक पिछले दो साल मे करीब 11 बार ब्याज दर बढ़ा चुका है पर महंगाई डायन का मुख सुरसा की तरह बढ़त जात है। मकान का तो सपना भी आम आदमी की पहुँच से बाहर है (एक गीत पहले ही लिखा जा चुका है – रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा)। पिछले पाँच सालों में घोटाले नहीं बल्कि महा महा...................घोटाले हुए हैं, एक से बढ़ कर एक, जैसे कोई प्रतिस्पर्धा चल रही हो और दोषी कोई भी नहीं हो। भ्रष्टाचार का आलम यह है देश में रिश्वत को कानूनन मान्यता देने की सुगबुगाहट होने लगी है (क्या ये भी किसी उपल्ब्धि की तरफ एक कदम है?)। अब जनता बेचारी चिल्ला रही है....., चिल्लाए, लोकतंत्र में सबको चिल्लाने का हक है, जनता भी चिल्ला रही है। और हमारा लोकतंत्र..., हमारा लोकतंत्र है..., विश्व का महानतम लोकतंत्र, जिसमें अपनी किसी भी परेशानी के लिये किसी को भी चिल्लाने का हक है, चाहे उसकी परेशानी दूर हो या न हो। और ज़्यादातर परेशानी दूर होती नहीं और आम आदमी है तो बढ़ ही सकती है, घटेगी तो कतई नहीं।

पिछ्ले 65 सालों में हालात बदतर ही हुए हैं, अब हमारी आज़ादी के लिये मर मिटने वालों ने इन सब समस्याओं के लिये तो नहीं ही कहा होगा –


कर चले हम फिदा जानोतन साथियों
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों

खैर, जिस देश में सदन में तुष्टिकरण के लिये गाली गलौज, मार पिटाई तक हो जाती हो वहाँ किसी को इन समस्याओं से क्या? मतलब तो केवल किसी एक दिन अपना अपना ढोल पीटने से है। कुल मिला कर एक दिन मनाया जाएगा और पाँच महीने (26 जनवरी यानि गणतंत्र दिवस भी है – रोने गाने के लिये) भूल जाया जाएगा। और हिन्दुस्तान का आम आदमी भी सहने का आदी हो गया है। जय हो इस महान जनतंत्र और इसके आम आदमी की|

बहरहाल, बात आज़ादी की है तो प्रासंगिक है कि इसी आज़ादी की लड़ाई के समय उस समय के शायरों ने क्या क्या नहीं लिखा जिसे तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने जब्त भी किया था ताकि ये सब आम जनता के बीच फैले नहीं। तत्सम में इस बार जोश मलीहाबादी की एक नज़्म...

- प्रदीप कांत


शिकस्ते-ज़िंदाँ का ख्वाब

क्या हिंद का जिंदाँ काँप रहा गूँज रही हैं तकबीरें
उकताए हैं शायद कुछ क़ैदी और तोड़ रहे हैं जंज़ीरें


दीवारों के नीचे आ-आ कर यूँ जमा हुए हैं ज़िंदगानी
सीनों में तलातुम बिजली का आँखों में झलकती शमशीरें


भूखों की नज़र में बिजली है तोपों के दहाने ठंडे हैं

तक़दीर के लब पे जुम्बिश है दम तोड़ रही है तदबीरें


आँखों में गदा की सुर्खी है बे-नूर है चेहरा सुल्ताँ का

तखरीब ने परचम खोला है सजदे में पड़ी हैं तामीरें


क्या उन को खबर थी सीनों जो ख़ून चुराया करते थे

इक रोज़ इसी बे-रन्गी से झलकेंगी हज़ारों तस्वीरें


क्या उन को खबर थी होंठों
पर जो कुफ्ल लगाया करते थे
इक रोज़ इसी खामोशी से टपकेंगी दहकती तक़रीरें


संभलो कि वो जिंदाँ गूँज उठा झपटो की वो क़ैदी छूट गये

उठो की वो बैठी दीवारें दो.दो की वो टूटी जंजीरें

(ये और ऐसी कई नज़्में ‘जब्तशुदा नज़्में’ में संकलित है)

फोटो - प्रदीप कान्त

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

हरीश भादानी के गीत

बीकानेर (राजस्थान) में जन्मे जनकवि हरीश भादानी का जीवन संघर्षमय ही रहा। आपका सारा जीवन रायवादियों-समाजवादियों के बीच तथा सड़क से जेल तक की कई यात्राओं में ही गुजरा। निजी से लेकर सार्वजनिक तक के सभी रंगों को समेटे हरीशजी की कविताओं में विद्रोह के स्वरों व जनजीवन की गहरी झलक मिलती है। तत्सम में इस बार हरीश भादानी के दो गीत...

- प्रदीप कांत

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हरीश भादानी

(११-०६-१९३३ - ०२-१०-२००९)

प्रकाशन: अधूरे गीत (1959), सपन की गली (1961), हँसिनी याद की (1963), एक उजली नज़र की सुई(1966), सुलगते पिण्ड (1966), नष्टो मोह (1981), सन्नाटे के शिलाखंड पर(1982), एक अकेला सूरज खेले (1983), रोटी नाम सत है (1982), सड़कवासी राम (1985), आज की आंख का सिलसिला (1985), पितृकल्प (1991), साथ चलें हम (1992), मैं मेरा अष्टावक्र (1999), क्यों करें प्रार्थ (2006), आड़ी तानें-सीधी तानें (2006), विस्मय के अंशी है (1988) और सयुजा सखाया(1998) के नाम से दो पुस्तकों में ईशोपनिषद व संस्कृत कविताओं तथा असवामीय सूत्र, अथर्वद, वनदेवी खंड की कविताओं का गीत रूपान्तर प्रकाशित। प्रोढ़ शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा को लेकर आपकी राजस्थानी में 20-25 पुस्तिकाएँ

सम्मान/पुरुस्कार: राजस्‍थान साहि‍त्‍य अकादमी, मीरा प्रि‍यदर्शि‍नी अकादमी, परि‍वार अकादमी महाराष्‍ट्र, पश्‍चि‍म बंग हि‍न्‍दी अकादमी, के.के. बि‍ड़ला फाउन्डेशन आदि और अन्य कई पुरुस्कार, सम्मान आदि|

सम्पादन: आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादक भी रहे। कोलकाता से प्रकाशित मार्क्सवादी पत्रिका कलम(त्रैमासिक) से भी सम्बद्ध।

रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है

ऐरावत पर इंदर बैठे
बांट रहे टोपियां
झोलिया फैलाये लोग
भूग रहे सोटियां
वायदों की चूसणी से
छाले पड़े जीभ पर
रसोई में लाव-लाव भैरवी बजत है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है

बोले खाली पेट की
करोड़ क्रोड़ कूडियां
खाकी वरदी वाले भोपे
भरे हैं बंदूकियां
पाखंड के राज को

स्वाहा स्वाहा होमदे
राज के बिधाता सुण तेरे ही निमत्त है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है

बाजरी के पिंड और
दाल की बैतरणी
थाली में परोसले
हथाली में परोसले
दाता जी के हाथ
मरोड़ कर परोसले
भूख के धरम राज यही तेरा ब्रत है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है

मैंने नहीं कल ने बुलाया है

खामोशियों की छतें,
आबनूसी किवाड़ें घरों पर
आदमी आदमी में दीवार है
तुम्हें छेणियाँ लेकर बुलाया है
मैंने नहीं कल ने बुलाया है

सीटियों से
साँस भरकर भागते
बाजार-मिलों दफ्तरों को
रात के मुर्दे
देखती ठंडी पुतलियाँ
आदमी अजनबी
आदमी के लिए
तुम्हें मन खोलकर मिलने बुलाया है
मैंने नहीं कल ने बुलाया है

बल्ब की रोशनी
शेड में बन्द है
सिर्फ परछाईं उतरती है
बड़े फुटपाथ पर
जिन्दगी की जिल्द के
ऐसे सफे तो पढ़ लिये
तुम्हें अगला सफा पढ़ने बुलाया है
मैंने नहीं कल ने बुलाया है