भगीरथ परिहार समकालीन हिन्दी लघुकथा आन्दोलन के वरिष्ठ हस्ताक्षर है। समकालीन हिन्दी लघुकथा के प्रथम संकलन 'गुफाओं से मैदान की ओर` (१९७२) का सम्पादन इन्होनें ही किया। इस संकलन ने लघुकथा को एक विधा के रूप में मान्यता दिलवाने में मदद की । १९९६ में प्रकाशित उनका लघुकथा संग्रह ‘पेट सबके हैं’काफी चर्चित रहा। आज भी हिन्दी लघुकथा साहित्य में यह संग्रह महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लघुकथा के आलोचनात्मक पक्ष को मजबूत करने के लिए आपके कई सैद्धांतिक और व्यवहारिक समीक्षा संबधी दृष्टिपरक महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हुए। व्यवहारिक समीक्षा के क्षेत्र में दो पुस्तकों का उल्लेख जरूरी है , पहली ‘पंजाबी की चर्चित कथाएँ’`दूसरी ‘राजस्थान की चर्चित कथाएँ’इनमें संकलित लघुकथाओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणियॉं संकलित है।
इन लघुकथाओं के शिल्प में किसी एक गम्भीर विचार की महीन बुनावट को महसूसा जा सकता है। यथार्थ के जिन पक्षों को सामान्यत: देख कर भी नकार दिया जाता है, उसी यथार्थ के धरातल पर खडा करके ये लघुकथाएँ आपको सोचने को मजबूर करती है।
पुत्रियाँ इतनी जल्दी युवा क्यों हो जाती हैं! युवा होकर सपने क्यों देखती है! सपने भी इन्द्रधनुषी! सपनों में वे हिरनियों - सी कूदती - फांदती, किलोल करती, मदन - मस्त विचरण करती है। हिरनी जैसी आँखों को देखकर सपनों का राजकुमार पीछा करता है। वह रोमांचित हो उठती है। अंग - प्रत्यंग मस्ती में चूर। इस उमर में इतनी मस्ती आती कहाँ से है!
घोड़े पर सवार राजकुमार फिर उसके सपने में आता है। वे वन में अठखेलिया कर रहे है। आँख मिचौनी खेल रहे है। राजकुमार, आँख पर पट्टी बाँधे अपनी राजकुमारी को आलिंगन में ले लेता है।
बेटी, सपना देख, लेकिन सपने में राजकुमार को मत देख। किंतु युवती का सपनों पर वश नहीं है। वे आते हैं और आते ही चले जाते हैं। एक रोमानी खुमारी और मीठी चुभन छोड़ जाते हैं। वह सपनों के बाहर नहीं आ पाती, सपनों का सौंदर्य और माधुर्य अलौकिक है। रोमांस भरे दृश्य उसकी आंखो में तैरते हैं। वह खुली आंखो से सपने देखती है।
इन सपनों में वह पति नहीं, चिर प्रेमी को देखती है। बस एक आकर्षण है, भविष्य के सपने है, लेकिन भविष्य के परिणाम से निश्चिंत है, वह अतीत में नहीं है, भविष्य में भी नहीं है। सिर्फ वर्तमान में है, सपने में है। उसे लग रहा है जैसे पूरा अस्तित्व उसके साथ उत्सव मना रहा हो, प्रेम में परिपूर्ण आनन्द है।
पिता चिंतित है क्योंकि उन्होनें उसकी आंखो में सपना देख लिया है। पिता समझाते है, सच देख, सपने नहीं। 'मैं तुम्हें सपने नहीं दे सकता। स्त्री यहाँ सपने नहीं देखती वह सपनों में भी यथार्थ देखती है। अपना हौसला कर बुलंद कि सपनों में यथार्थ देख सके। समाज में औरत की नियति देख। परिवार में औरत की नियति देख।`
सपने टूटने लगते है, और टूटते ही चले जाते हैं। कहीं आत्मा के चटखने की आवाज भी सुन लेती है युवती। एक आत्महीन युवती का जीवन सामाजिक यथार्थ बन जाता है।
पुनश्च: - लेकिन सपने देखने वाले ही सामाजिक यथार्थ को बदलते है। नहीं, तू देख सपने और मुस्तैदी से देख, कि तू औरत की नियति बदल सके ।
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बैसाखियोंकेपैर
वह अपनी टांगों सहारे नहीं चलता था, क्योंकि उसकी महत्वाकाक्षाएँ ऊँची थी क्योंकि वह चढ़ाइयॉं बड़ी तेजी में चढ़ना चाहता था, क्योंकि उसे अपनी टांगों पर भरोसा नहीं था क्योंकि वे मरियल और गठिया से पीड़ित थी।
फिर भी, जिन दूसरी टांगों के सहारे चलता था, उन पर टरपेन्टाइन तेल की मालिश किया करता था। हाथ की मॉंसपेशियाँ खेता नाई की तरह मजबूत हो गई थी और शाम उनके टखने एवं ऊँगलियॉं चटखाया करती थीं ताकि विश्वास हो जाये कि कल भी ये टांगे उसका साथ देंगी। इतना कर चुकने के बावजूद उसका मन संशकित रहता, काँपता और बोलते वक्त भाषा उससे आगे निकल जाती। और वह फिर आश्वस्त हो जाता कि एक वाक्य में चार बार हिनहिनाने से उसकी वैसाखियों में सुखद हरकत होने लगती है। आखिर उसे अपनी सारी दूरियॉं इन्ही बैसाखियों से तय करनी हैं ।
वह इस बात को जानता है कि उसके सम्मान में उठे हाथ उसके लिए नहीं है पर वह जानता है यहॉं के लोग इसी भाषा को समझते हैं। निहायत दरबारी ।
वह जानता है जो सेनापति बैठें हुए हैं, उनसे सुरक्षा का वचन लेना है और उन्हीं की सहायता से अपने प्रतिद्वन्दी को पछाड़ना है।
वह जानता है कि वह स्वयं अपने में कुछ नहीं है, और उसकी बैसाखियों को छीन लो तो वह धड़ाम से धूल में लोट जायेगा पर वह अपनी बैसाखियों को दूसरे के हाथों में नहीं जाने देगा ।
आज वह किले की हर बुर्ज पर मौजूद है। भव्य महल और मयूर सिहांसन की सुरक्षा के लिए बना है किला यह, जिसमें अब उसके लिए 'श्री १००८ महाराजाधिराज` की गुहार लगानेवाले मौजूद हैं ।
वह अपनी सफलता के जश्न का केक काटते हुए इस बात का ऐलान करता है कि उसके पैर निकल आए हैं - मजबूत और बलिष्ठ ।
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छिपकली
छिपकली रेंगती है, तेजी से दौड़ती है बिना आहट किए, उसके छोटे-छोटे पैर दीवार पर चिपके रहते है, ताकि गिरे नहीं, लेकिन हरकत तेज करते है। वह कभी भी गिर जाने का अहसास नहीं होने देती। कभी-कभी वह पांव पर खड़ी हो जाती है। गुस्से में लाल-पीली होती है। गर्दन उठाकर आक्रमण करने की मुद्रा में और भी भयानक लगती है। छिपकली जुगुप्सा जगाती है। छिपकली हममें सौंदर्य बोध नहीं जगाती, लोग इससे घृणा करते है, डरते है, लडकियां तो इन्हें देखते ही चीखने लगती है। वे उन्हें देख कर ऐसे भागती है जैसे दुश्मन गन लेकर कमरे में घुस आया हों। छिपकली की आंखे आदमी की तरह गड़ढे में नहीं धंसी रहती, बल्कि माथे पर उभरी होती है, जिससे वह चारों तरफ देख, हर पल चौकन्नी रहती है। वह आदमी की तरह अनेकानेक विचारों में उलझी रहने की बजाए, हमेशा एक ही तन्मयता में रहती है, एक ही बिन्दु पर यानि शिकार पर सम्पूर्ण शक्ति केंद्रित करती है। शिकार करना उसके लिए महज शिकार नहीं है, इबादत करने का तरीका है, जिस धैर्य से,चपलता से, तन्मयता से एक निष्ठ होकर शिकार की टोह में रहती है, वह केवल सच्चे ऋषि मुनि को ही उपलब्ध हो सकती है। उसे धोखेबाज कहना, इसलिए कि वह पीछे से वार करती है, दबे पांव आती है, बिना आहट के और अपनी लम्बी जिह्वा से शिकार को पकड़ कर जबड़ों में जकड़, पछाड़ देती है, और इस पूरी क्रिया में उसे क्षण भर ही लगता है, सही नहीं है, यह धोखे बाजी नहीं, शिकार पकड़ने के कलात्मक अंदाज है। छिपकली की चाल में अब शिकार पा जाने का संतोष है। ताज्जुब की बात है, यह सब कीट-पतंगों को खा जाती है, किंतु इसे कोई नहीं खा सकता, क्योंकि इसकी पूंछ में कहते है जहर होता है। इसके पास आक्रमण और बचाव के तमाम साधन है। आदमी सोचता है छिपकली फसले नहीं उगाती, खदानों में नहीं खपती, उद्योगों में काम नहीं करती, सिर्फ जिंदा या तबाह करती है। इन जहरीले रैंगते जीवों से बचने का क्या तरीका है, बचने का नहीं, इन्हें नेस्तनाबूद करने का क्या तरीका है, दूसरे आदमी ने प्रश्न किया।
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कोणार्क
कोणार्क का सूर्यमन्दिर, मन्दिर के दोनों ओर रथ और घोड़े पर गतिशील सूर्य और वाद्ययंत्र बजाते नाचते स्त्री - पुरूष उत्कीर्ण हैं। साथ ही विभिन्न मुद्राओं में स्त्री-पुरूष प्रेमालिंगन व रति क्रिया में रत देखे जा सकते हैं। पुरूष व स्त्री की सुन्दर देह और यौन अंगों को पत्थरों पर मूर्तिकार ने स्पष्ट उकेरा है ।
उनके चेहरों पर कामुकता या यौनहिंसा के भाव नहीं हैं। एक प्रेमपूर्ण शांतचित से की गई यौनलीला अपूर्व है। मैं देखकर दंग रह गया कि क्या ऐसा भी हो सकता है! परिपूर्ण प्रेम के बिना रति की कोई कल्पना ही नहीं है। क्या ऐसा भी समाज रहा होगा जब यौन को लेकर वर्जनाऍं न रहीं हों? अपराध बोध का भाव न रहा हो? नैतिकता के मापदंड यौनता से न जुड़े हों? क्या ऐसा भी समाज रहा होगा जो अपने पूजा स्थलों में भोग की इन कौतुक क्रियाओं को इतना स्पष्ट उत्कीर्ण करने में कहीं संकोच नहीं करता था, आश्चर्य इसलिए भी होता है कि इसी देश में भोग की जड़ हत्या को प्रतिष्ठित किया गया था । लेकिन भोग शब्द का यहॉं उपयोग अनुचित लगता है, इसके स्थान पर प्रेमपूर्ण समर्पण ही सही शब्द होगा।
सूर्य मन्दिर की सूर्य घड़ी, यही काल चक्र है। कुछ भी स्थिर नहीं, समय भी नहीं । लेकिन परिपूर्ण प्रेम के दृश्यों में जैसे समय थम सा गया है। एक अपूर्व आनन्द के क्षणों में समय का भान रहता भी कहॉं है! किसी की दृष्टि में यह भोग हो सकता है, लेकिन उस समय के कलाकारों ने इनमें भोग नहीं, प्रेम की पूर्णाहुति देखी थी, हमारी दृष्टि क्यों और कैसे परिवर्तित हो गई? हमने जीवन्त आत्माओं को वस्तु बनाकर भोग का माध्यम बना दिया,ऐसा क्यों और कैसे हो गया? यह प्रश्न लगातार मेरे मन पर चोट कर रहा है।
मैँ मूर्तिकला को नहीं, जीवंत भाव भंगिमाओं को देखकर भावविभोर हूँ। आनन्द उनके चेहरे पर झलक-झलक पड़ रहा है जीवन का प्याला लबालब भरा हुआ । सृजन के ये अप्रतिम क्षण हैं जो मुर्तिकार ने उत्कीर्ण किये हैं । सृजन के क्षण सबसे सुन्दर और प्रेममय होते हैं। व्यक्ति अपनें में ठहरा, अपने से विस्तीर्ण होता दिखाई पड़ता है। ये पूजा के क्षण रहे होंगे जब वह अपने अस्तित्व को ही विसर्जित कर देता है।
आज, जब युवा पीढ़ी का केवल एक ध्येय है - किसी तरह भी पैसा कमाने की मशीन बन जाना। सामाजिक सरोकारों से शायद ही कुछ लेना देना हो। स्कूल भी मैनेजर, डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनाने की फैकट्री बन गये हैं, नागरिक बनने के संस्कार बिरला ही कोई स्कूल दे रहा हो। ऐसे में यदि युवतम पीढ़ी से कोई कवि मिल जाए तो…, अमेय कान्त युवतम पीढ़ी की ऐसे कवि हैं जिनकी कविताएँ युवा पीढ़ी में बची सामाजिक सरोकारों की चिन्ता के बारे में आश्वस्त करती हैं। अमेय की कविताओं में जहाँ बचपन की स्मृतियाँ हैं वहीं वर्तमान और भविष्य की चिन्ताएँ भी। उनके कविता संसार में संवेदनाओं की गहनता भी दिखाई देती है तो विचारों की गम्भीरता भी। अतीत को सहेजती और कोहरे के पार देखने की कोशिश करती उनकी कविताएँ मन को सीधे सीधे कचोटती हैं।
- प्रदीपकान्त
पन्नों के बीच
पुरानी डायरी खोलता हूँ
और ढेर सारे पीले पत्ते उड़ निकलते हैं
एक गंध आती है हल्की सी
शायद तब पन्नों में दबी रह गयी थी
एक पूरा संसार ज़िन्दा है वहाँ
पन्नों के बीच
कैद से आज़ाद होकर
हवा के साथ फड़फड़ाकर
फैल जाता है सामने
कुछ रिश्ते फिर हरे हो जाते हैं
ठण्ड, गर्मी, बारिश;
सब छुपा दिए थे मैंने
पन्नों के बीच कहीं कहीं पर
फिर नहा लेता हूँ गुनगुनी धूप से
और मिल आता हूँ उस बच्चे से
जो अभी भी खेल रहा है
अपने दोस्तों के साथ
हरे मैदान में
नंगे पाँव
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पुराने दोस्त से
अगर रख सको
तो बचा कर रखना
अपने भीतर
एक प्लास्टिक की गेंद,
कुछेक अँटियाँ, भँवरी और पतंग
ज़रूरी नही है
पर कोशिश ज़रूर करना
कि रख सको बचाकर
थोड़ासा आसमान ,
जिसमें हम उड़ाया करते थे,
काग़ज़ के हवाई जहाज़
थोड़ी सी मिट्टी,
जिसमें घर बनाया करते थे हम
बारिश के बाद
मैं जानता हूँ इन दिनों, बहुत मुश्किल हो चला है
ऐंसी चीज़ें बचाकर रखना
फिर भी चाहता हूँ कि अगली बार जब तुम मिलो,
तो दौड़ूँ तुम्हारे साथ
तालाब की पाल तक
और ढूँढ निकालूँ
वो रंग बिरंगे काँच के टुकड़े
जो हमने छुपाए थे
उस पेड़ के नीचे
मिट्टी में कहीं
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मैं, तुम और रामप्रसाद
इस अंधी यात्रा में
तुम हो,
मैं भी हूँ,
और उधर पीछे कहीं रामप्रसाद भी है
हम नही जानते, कहाँ जा रहे हैं,
पर खुश हो रहे हैं
तुम बाज़ार में खड़े होते हो,
दुकानदारों के बीच घिरे
इधर मैं भी शोरगुल के बीच।
रामप्रसाद भी है उधर कहीं,
घिरा हुआ, विस्मित!
हमें खरीदना ही है कुछ न कुछ,
और खुश भी होना है
हम हो भी रहे हैं
रामप्रसाद भी
एक दिन हम दोनों खो देंगे अपनी जमा पूँजी
अपनी साख, अपनी पहचान,
अपना नाम भी
मैं, मैं नहीं रहूँगा
तुम, तुम नहीं
रामप्रसाद भी नहीं रहेगा, रामप्रसाद
पता नहीं क्या बुलाएँ हम उसे!
वह हमें भी जाने क्या बुलाए!
पर यह सब होगा
और हम सब देखते रहेंगे
क्या करें, इस कोहरे के पार
न मैं देख पा रहा हूँ,
न तुम,
और न रामप्रसाद
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दूसराकिनारा
काफिला चला जा रहा था। शाम के वक्त एक जगह पर आराम करना था और भूख भी महसूस हो रही थी। एक जगह दो ढाबे दिखाई दिए। एक पर लिखा था–‘हिंदु ढाबा’ और दूसरे पर ‘मुस्लिम ढाबा’। दोनों ढाबों में से नौकर बाहर निकल कर आवाजें दे रहे थे। काफिले के लोग बँट गए। अंत में एक शख्स रह गया, जो कभी इस ओर, कभी उस ओर झांक रहा था। दोनों ओर के एक-एक आदमी ने, जो पीछे रह गए थे, पूछा, “किधर जाना है? हिंदु है या मुसलमान? क्या देख रहा है, रोटी नहीं खानी?”
वह हाथ मारता हुआ ऐं…ऐं…अं…आं करता हुआ वहीं खड़ा रहा। जैसे उसे कुछ समझ में न आया हो और पूछ रहा हो, ‘रोटी, हिंदु, मुसलमान।’
दोनों ओर के लोगों ने सोचा, वह कोई पागल है और उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए।
कुछ देर बाद दोनों ओर से एक-एक थाली रोटी की आई और उसके सामने रख दी गईं। वह हलका-सा मुस्काया। फिर दोनों थालियों में से रोटियां उठाकर अपने हाथ पर रखीं और दोनों कटोरियों में से सब्जी रोटियों पर उँडेल ली। फिर सड़क के दूसरे किनारे जाकर मुंह घुमाकर खाने लगा।
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मूर्ति
वह बाज़ार से गुजर रहा था। एक फुटपाथ पर पड़ी मूर्तियाँ देख कर वह रुक गया।
फुटपाथ पर पड़ी खूबसूरत मूर्तियाँ! बढ़िया तराशी हुईं। रंगो के सुमेल में मूर्तिकला का अनुपम नमूना थीं वे!
वह मूर्तिकला का कद्रदान था। उसने सोचा कि एक मूर्ति ले जाए।
उसे गौर से मूर्तियाँ देखता पाकर मूर्तिवाले ने कहा, “ ले जाओ, साहब, भगवान कृष्ण की मूर्ति है।”
“भगवान कृष्ण?” उसके मुख से यह एक प्रश्न की तरह निकला।
“हाँ साहब, भगवान कृष्ण! आप तो हिंदू हैं, आप तो जानते ही होंगे।”
वह खड़ा-खड़ा सोचने लगा, यह मूर्ति तो आदमी को हिंदू बनाती है।
“क्या सोच रहे हैं, साहब? यह मूर्ति तो हर हिंदू के घर होती है, ज्यादा महँगी नहीं है।” मूर्तिवाला बोला।
“नहीं चाहिए।” कहकर वह वहाँ से चल दिया।
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हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
“साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।”
“तुम इस बारे में कुछ कहना चाहते हो?” मजिस्ट्रेट ने पूछा।
“मैने क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी देकर बैठा था। ‘हीर’ के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नज़र नहीं आई।”
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आज हमारी परम्परा का एक महत्वपूर्ण दिवस है - दीपोत्सव यानि दीपावली। यह पर्व हमारे लिये मुफ्त में हषोल्लास का कारण नहीं है। इसके पीछे बुराई पर अच्छाई की जीत की चिरपरिचित कथा है। और वही सबसे बड़ा सत्य भी है, कम से कम उन लोगों की नज़र में जिनका काम केवल अच्छाइयों को कहीं से भी तलाश करके आत्मसात करते हुए जीना होता है। सत्य के पक्ष में बोलना होता है। जैसा कि कृष्ण बिहारी नूर ने अपने एक शेर में कहा भी है -
चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
आइनाझूठबोलताहीनहीं
अब त्योहार तो है हषोल्लास का और आप सभी को दीपोत्सव की शुभकामनाएँ भी। बावजूद इसके कि बढ़ती जा रही महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है। ग्लोबलाइजेशन की लम्बीऽऽ ट्रेन छोटे दुकानदारों को रोंद रही है। भ्रष्टाचार का मुँह सुरसा की तरह खुलता ही जा रहा है। और सुरसा का मुँह तो वापस छोटा भी हो गया था, ये तो बन्द होने का नाम भी नहीं लेता। स्त्रियों की असुरक्षा दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। बलात्कार के मामलों में देश में राज्यों की रेंकिग होती है। और शायद ही कोई राज्य बुराई की इस रेंकिग में अपने आप को पीछे करने का प्रयास कर रहा हो। समस्याएँ बहुत गम्भीर हैं और ऐसे में हमारे समय के महत्वपूर्ण शायर निदा फाज़ली याद आते हैं -
वही हमेशा का आलम है क्या किया जाए
जहाँ से देखिये कुछ कम है क्या किया जाए
मिली है ज़ख्मों की सौगात जिसकी महफिल से
उसीकेहाथमेंमरहमहैक्याकियाजाए
और हम है कि बावजूद इसके कि बहुत कुछ बुरा हो रहा है, अच्छे की उम्मीद बनाए रखे हुऐ है। क्यों कि किसी भी चीज़ की अति बहुत देर तक कायम नहीं रह सकती। एक ना एक दिन उसे खत्म होना होता है। ठीक वैसे ही, जैसे दीपोत्सव के पीछे की कथा का खलनायक माना जाने वाला रावण। और सबसे बढ़िया दृष्टांत तो भस्मासुर का है। घोर तप के बाद शिवजी से वरदान पाकर, शिवजी के ही सर पर हाथ रख उन्हे भस्म करने चला था। बचा तो वो भी नहीं। हालांकि ग़लत अपने आप खत्म नहीं होगा, उसके खिलाफ़ बोलना होगा। इसलिये आप भी ग़लत के खिलाफ़ सही के लिये संघर्ष करते हुए सकारात्मक रहें, मस्त रहें और स्वस्थ रहें।