शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

हरीश भादानी के गीत

बीकानेर (राजस्थान) में जन्मे जनकवि हरीश भादानी का जीवन संघर्षमय ही रहा। आपका सारा जीवन रायवादियों-समाजवादियों के बीच तथा सड़क से जेल तक की कई यात्राओं में ही गुजरा। निजी से लेकर सार्वजनिक तक के सभी रंगों को समेटे हरीशजी की कविताओं में विद्रोह के स्वरों व जनजीवन की गहरी झलक मिलती है। तत्सम में इस बार हरीश भादानी के दो गीत...

- प्रदीप कांत

______________________________________________________________

हरीश भादानी

(११-०६-१९३३ - ०२-१०-२००९)

प्रकाशन: अधूरे गीत (1959), सपन की गली (1961), हँसिनी याद की (1963), एक उजली नज़र की सुई(1966), सुलगते पिण्ड (1966), नष्टो मोह (1981), सन्नाटे के शिलाखंड पर(1982), एक अकेला सूरज खेले (1983), रोटी नाम सत है (1982), सड़कवासी राम (1985), आज की आंख का सिलसिला (1985), पितृकल्प (1991), साथ चलें हम (1992), मैं मेरा अष्टावक्र (1999), क्यों करें प्रार्थ (2006), आड़ी तानें-सीधी तानें (2006), विस्मय के अंशी है (1988) और सयुजा सखाया(1998) के नाम से दो पुस्तकों में ईशोपनिषद व संस्कृत कविताओं तथा असवामीय सूत्र, अथर्वद, वनदेवी खंड की कविताओं का गीत रूपान्तर प्रकाशित। प्रोढ़ शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा को लेकर आपकी राजस्थानी में 20-25 पुस्तिकाएँ।

सम्मान/पुरुस्कार: राजस्‍थान साहि‍त्‍य अकादमी, मीरा प्रि‍यदर्शि‍नी अकादमी, परि‍वार अकादमी महाराष्‍ट्र, पश्‍चि‍म बंग हि‍न्‍दी अकादमी, के.के. बि‍ड़ला फाउन्डेशन आदि और अन्य कई पुरुस्कार, सम्मान आदि|

सम्पादन: आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादक भी रहे। कोलकाता से प्रकाशित मार्क्सवादी पत्रिका ‘कलम’ (त्रैमासिक) से भी सम्बद्ध।

१

रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है

ऐरावत पर इंदर बैठे
बांट रहे टोपियां
झोलिया फैलाये लोग
भूग रहे सोटियां
वायदों की चूसणी से
छाले पड़े जीभ पर
रसोई में लाव-लाव भैरवी बजत है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है

बोले खाली पेट की
करोड़ क्रोड़ कूडियां
खाकी वरदी वाले भोपे
भरे हैं बंदूकियां
पाखंड के राज को

स्वाहा स्वाहा होमदे
राज के बिधाता सुण तेरे ही निमत्त है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है

बाजरी के पिंड और
दाल की बैतरणी
थाली में परोसले
हथाली में परोसले
दाता जी के हाथ
मरोड़ कर परोसले
भूख के धरम राज यही तेरा ब्रत है
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है

२

मैंने नहीं कल ने बुलाया है

खामोशियों की छतें,
आबनूसी किवाड़ें घरों पर
आदमी आदमी में दीवार है
तुम्हें छेणियाँ लेकर बुलाया है
मैंने नहीं कल ने बुलाया है

सीटियों से
साँस भरकर भागते
बाजार-मिलों दफ्तरों को
रात के मुर्दे
देखती ठंडी पुतलियाँ
आदमी अजनबी
आदमी के लिए
तुम्हें मन खोलकर मिलने बुलाया है
मैंने नहीं कल ने बुलाया है

बल्ब की रोशनी
शेड में बन्द है
सिर्फ परछाईं उतरती है
बड़े फुटपाथ पर
जिन्दगी की जिल्द के
ऐसे सफे तो पढ़ लिये
तुम्हें अगला सफा पढ़ने बुलाया है
मैंने नहीं कल ने बुलाया है

मंगलवार, 7 जून 2011

सुरेश सेन नि‍शांत की कविताएँ

सुरेश सेन निशान्त उन कवियों में से हैं जिन्होने बहुत तेजी से हिन्दी कविता के परिदृष्य में अपनी पह्चान बनाई है। निशांत की कविताओं में यूँ तो ज़्यादातर पहाडी जनजीवन के प्रतीक नज़र आते हैं किन्तु ये व्यापक अर्थ प्रदान करती हैं| अच्छे भाग वाला मैं में जहाँ अब भी बची हुई आस है वहीं या पहाड़ में एक लड़की के चित्र के बहाने एक दुविधा और निराशा सी| तत्सम में इस बार सुरेश सेन निशांत की कुछ कविताएँ....

-प्रदीप कांत

जन्म : 12 अगस्त 1959

१९८६ से ग़ज़ल लेखन से शुरुआत।

१९९२ से कविता लिखना शुरू किया।

पहल, हंस, कथाक्रम, आलोचना, कथादेश कृतिओर, सूत्र, सर्वनाम, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, लमही, समकालीन भारतीय साहित्य, वागर्थ, परिकथा, बया, आधारशीला आदि देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन।

विद्युत-संकाय से डिप्लोमा निशान्त वर्तमान में कनिष्ठ अभियंता के पद पर कार्यरत हैं। निशान्त को पहला प्रफुल्ल स्मृति सम्मान, सूत्र सम्मान २००८ आदि प्राप्त हुए हैं| पहला कविता संग्रह "वे जो लकड़हारे नहीं हैं" अंतिका प्रकाशन ग़ाज़ियाबाद से २०१० में प्रकाशित हुआ है। उन्होंने ’आकण्ठ’ पत्रिका के अगस्त - २०१० में प्रकाशित ’हिमाचल की समकालीन कविता’ विशेषांक का सम्पादन भी किया है।

संपर्क : द्वारा श्री कुलदीप सिंह सेन, गाँव सलाह, डा. सुंदरनगर-1, जिला मंडी- १७४४०१ (हिमाचल प्रदेश)
मो. ९८१६२-२४४७८

1

इस वृक्ष के पास

चुपचाप गुज़रो
इस वृक्ष के पास से
प्रार्थना में रत है यहाँ एक औरत
उसे विश्वास है
इस वृक्ष में बसते हैं देवता
और वे सुन रहे हैं उसकी आवाज़।

एक औरत और ईश्वर
रत है बातचीत में
चुपचाप गुज़रो
इस वृक्ष के पास से
ऎसा कौतुक
एक औरत ही रच सकती है
जो ईश्वर को स्वर्ग से उतार कर
एक वृक्ष की आत्मा में बसा दे ।

चिड़ियों की चहचहाहट
हवाओं की सरसराहट
कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा है उसे
सिवाय अपने ह्रदय की धड़कनों के
सिवाय अपनी प्रार्थना के ।

वृक्ष के हरे पत्ते
तालियों की तरह बजते हुए
दे रहे हैं उसे आश्वासन
कि उठो माँ
सुन ली है ईश्वर ने तुम्हारी प्रार्थना ।

मंदिर और मस्ज़िद से दूर
उनकी घंटियों और अजानों
से बहुत दूर
प्रार्थना में रत है एक औरत
चुपचाप गुज़रो
इस वृक्ष के पास से


2

अच्छे भाग वाला मैं

अच्छे भाग वाला हूँ मैं
इतना बारूद फटने के बाद भी
खिल रहे हैं फूल
चहचहा रही हैं चिड़ियाँ
बचा है धरती पर हरापन
सौंधी ख़ुशबू

अभी भी नुक्कड़ों पे
खेले जा रहे हैं ऐसे नाटक
कि उड़ जाती है तानाशाह की नींद

बचा है हौंसला
आतताइयों से लड़ने का
इतने खौफ़ के बावजूद भी
गूँगे नहीं हुए हैं लोग

बहुत भागवाला हूँ मैं
बाज़ारवाद के इस शोर में भी
कम नहीं हुआ है भरोसा दोस्त
कवियों का
जीवन पर से

अभी भी
उन लोगों के पास
दूजों का दुख सुनने के लिए
है ढेर सारा वक़्त

अभी भी है
उनके दिल की झोली में
सांत्वना के मीठे बोल
द्रवित होने के लिए
बचे हैं आँसू
कुंद नहीं हुई है
इस जीवन की धार
बहुत ख़ुशक़िस्मत हूँ मैं
हवा नहीं बँधी है
किसी जाति से
और पानी धर्म से
चिड़िया अभी भी
हिन्दुओं के आँगन से उड़ कर
बैठ जाती है मुसलमानों की अटारी पे

उसकी चहचहाहट में
उसकी ख़ुशियों-भरी भाषा में
कहीं कोई फ़र्क नहीं

अच्छे भागवाला हूँ मैं
अभी भी लिखी जा रही है
अन्धेरे के विरुद्ध कविताएँ
अभी भी
मेरे पड़ोसी देश में
अफ़जल अहमद जैसे रहते हैं कई कवि


3

काग़ज़

इस काग़ज़ पर
एक बच्चा सीखेगा ककहरा
एक माँ की उम्मीदें
इस काग़ज़ पर उतरेंगी
चिड़िया की तरह
दाना चुगने के लिए

एक पिता देखेगा
अपने संग बच्चे का भविष्य
सँवरता हुआ

इस काग़ज़ पर सचमुच
एक लड़का सीखेगा ककहरा

एक कवि लिखेगा कविताएँ
इस काग़ज़ पर
एक-एक शब्द को लाएगा
गहन अँधेरों से ढूँढकर

हज़ारों प्रकाश-वर्ष की दूरी
तय करेगा इस छोटे से काग़ज़ पर
अपनी चेतना की
रौशनाई के सहारे
एक-एक पंक्ति को
कई-कई बार लिखेगा
तपेगा दुख की भट्टी में
कितने ही रतजगे होंगे उसके

इस काग़ज़ के भीतर
सदियों बाद भी
किसी कबीर का
तपा-निखरा चेहरा झाँकता मिलेगा
इसी तरह के किसी काग़ज़ पे

इस काग़ज़ पर
लिखे जाएँगे अध्यादेश भी

इस काग़ज़ पर
कोई न्यायाधीश
लिख देगा अपना निर्णय
क़ानून की किसी धारा के तहत

और सो जाएगा
मज़े से गहरी नींद

इस काग़ज़ पर
एक औरत लिखना चाहेगी
अपने मन और ज़िस्म पे हुए
अनाचार की कथा

इस काग़ज़ पर
एक दूरदर्शी संत लिखेगा उपदेश
जिन पे वह ख़ुद कभी भी
नहीं करेगा अमल

एक मज़दूर लिखेगा चिट्ठी
इस काग़ज़ पर
अपने घर अपनी कुशलता की
आधी सदी के बाद भी
किसी स्त्री के संदूक में
सुरक्षित मिलेगा यह काग़ज़

इस काग़ज़ से
एक बच्चा बनाएगा कश्ती
और सात समन्दर पार की
यात्रा पे निकल जाएगा


4

ये पहाड़

ये कितनी बड़ी बिड़म्बना है

इस कठिन समय में

पहाड़ का एक आसान सा चित्र

नहीं बन पा रहा है

एक छोटी सी बच्ची से।

उसे नहीं आ रहा है ख्याल

पहाड़ों पे वृक्ष बनाने का

वह चिड़ियों को

नहीं दे पा रही है

अपने उस चित्र में जगह

उगता सूरज

घुमड़ते बादल कुछ भी नहीं।

पहाडों की नंगी देह पर

उकेरे हैं उसने

बिजली के बड़े­-बड़े टावर

और चुपचाप चली गई

उस चित्र को वहां छोड़।

मैं भौंचक सा खड़ा

डूबा उस चित्र में

सोचता हुआ कि

उसने पेड़ों को क्यों नहीं बुलाया

क्यों नहीं दिया न्यौता

चहचहाते पंछियों को

वह घुमड़ते बादलों से

क्यों नहीं बतिया पाई

अपने उस चित्र में।

मैं अपराधी सा शर्मिंदा

खड़ा रहा उस चित्र के सामने

मांगता हुआ मन ही मन मापफी

उस नन्ही मासूम से

कि हमने नहीं

उसने सुनी है

इस पहाड़ की कराहटें।


गुरुवार, 5 मई 2011

मजाज़ की एक नज़्म


असरारुल हक़ "मजाज़"

(19 अक्तूबर 1911 - 5 दिसम्बर 1955)


१९०९ में रुदौली जिला बाराबंकी में जन्में असरारुल हक मज़ाज़ शायरी के फन के उस्ताद शायर थे। कहा जाता था कि जिगर मुरादाबादी के अलावा अगर किसी शायर के तरन्नुम के लोग दीवाने थे तो वह थे मज़ाज़...। अपने वक्त में मज़ाज़ के कलाम की दीवानगी लोगों , खासतौर से लड़कियों में बहुत जादा थी। और शायरों की मज़ाज़ की शायरी की शुरुआत भी रुमानियत से ही हुई थी किंतु मज़ाज़ का व्यक्तित्व और कृतित्व जिस दौर में विकसित हुआ वह हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिये छटपटाहट का दौर तो था ही, प्रगतिशील आन्दोलन की शुरुआत भी हो चुकी थी जिसके संस्थापकों के रूप में सज्जाद ज़हीर और अली सरदार जाफरी अपनी पहचान बना चुके थे।


देखना जज़्बे मोहब्बत का असर आज की रात
मेरे शाने पे है उस शोख़ का सर आज की रात


जैसे रुमानी शेर कहने वाले मजाज़ की शायरी ने प्रगतिशील आन्दोलन का साथ पाते ही करवट बदली और फिर बोल ! अरी, ओ धरती बोल ! जैसी नज़्म की पैदाइश हुई।


इस साल मज़ाज़ की जन्म शताब्दी के लिये आयोजनओ का दौर चल रहा है। हालांकि यह नज़्म पहले भी सबने पढी होगी किंतु तत्सम में इस बार मज़ाज़ की यही नज़्म...


- प्रदीप कांत


बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

राज सिंहासन डाँवाडोल!

बादल, बिजली, रैन अंधियारी, दुख की मारी परजा सारी

बूढ़े़, बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी

बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !


कलजुग में जग के रखवाले चांदी वाले सोने वाले,

देसी हों या परदेसी हों, नीले पीले गोरे काले

मक्खी भुनगे भिन-भिन करते ढूंढे हैं मकड़ी के जाले,

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !


क्या अफरंगी, क्या तातारी, आँख बची और बरछी मारी!

कब तक जनता की बेचैनी, कब तक जनता की बेजारी,

कब तक सरमाए के धंदे, कब तक यह सरमायादारी,

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !



नामी और मशहूर नहीं हम, लेकिन क्या मज़दूर नहीं हम

धोखा और मज़दूरों को दें, ऐसे तो मज़बूर नहीं हम,

मंज़िल अपने पाँव के नीचे, मंज़िल से अब दूर नहीं हम,

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !


बोल कि तेरी खिदमत की है, बोल कि तेरा काम किया है,

बोल कि तेरे फल खाये हैं, बोल कि तेरा दूध पिया है,

बोल कि हमने हश्र उठाया, बोल कि हमसे हश्र उठा है,

बोल कि हमसे जागी दुनिया

बोल कि हमसे जागी धरती

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

राज सिंहासन डाँवाडोल!

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

गांधी के ब्रह्यचर्य पर नई बहस - डॉ वेद प्रताप वैदिक

डॉ वेद प्रताप वैदिक इन महात्मा गाँधी पर आई लेलीवेल्डकी एक नई किताब ”ग्रेट सोल : महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विथ इंडिया” आई है जिसके एक अंश विशेष को लेकर बहस और विवाद खडे किये जा रहें हैं। इसी को लेकर हमारे समय के सर्वाधिक चर्चित पत्रकार डॉ वेद प्रताप वैदिक का एक दृष्टिकोण जनसत्ता में 07 अप्रैल 2011 को छ्पा है। तत्सम में इस बार डॉ वेद प्रताप वैदिक का सोचने पर मजबूर करता यह आलेख..., जो हमें मेल से प्राप्त हुआ है।

- प्रदीप कांत

जोज़फ लेलीवेल्ड का भला हो कि उनकी वजह से गांधी पर एक बार फिर लंबी-चौड़ी बहस शुरू हो गई है| कृतज्ञ भारत गांधी को सिर्फ हर 2 अक्तूबर या 30 जनवरी को याद करने को मजबूर हो जाता है वरना गांधी अब अजायबघर की वस्तु हो गए हैं| लेलीवेल्ड की पुस्तक ”ग्रेट सोल : महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विथ इंडिया” कोई चालू किताब नहीं है| लेलीवेल्ड ने वर्षों के अनुसंधान के बाद यह पुस्तक लिखी है| वे ‘पुलिट्रजर’ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के विजेता हैं| वे ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के कार्यकारी संपादक भी रह चुके हैं| उन्हें भारत और दक्षिण अफ्रीका में रहकर काम करने का भी अच्छा अनुभव है| उन्होंने अपनी पुस्तक पर लगे प्रतिबंध की कड़ी भर्त्सना की है और इस आरोप को बिल्कुल निराधार बताया है कि उन्होंने गांधी को समलैंगिक या नस्लवादी कहा है| उनका कहना है कि इस तरह के शब्द उनकी पुस्तक में कहीं आए ही नहीं हैं|जनसत्ता, 07अप्रैल 2011 : जोज़फ लेलीवेल्ड का भला हो कि उनकी वजह से गांधी पर एक बार फिर लंबी-चौड़ी बहस शुरू हो गई है| कृतज्ञ भारत गांधी को सिर्फ हर 2 अक्तूबर या 30 जनवरी को याद करने को मजबूर हो जाता है वरना गांधी अब अजायबघर की वस्तु हो गए हैं| लेलीवेल्ड की पुस्तक ”ग्रेट सोल : महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विथ इंडिया” कोई चालू किताब नहीं है| लेलीवेल्ड ने वर्षों के अनुसंधान के बाद यह पुस्तक लिखी है| वे ‘पुलिट्रजर’ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के विजेता हैं| वे ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के कार्यकारी संपादक भी रह चुके हैं| उन्हें भारत और दक्षिण अफ्रीका में रहकर काम करने का भी अच्छा अनुभव है| उन्होंने अपनी पुस्तक पर लगे प्रतिबंध की कड़ी भर्त्सना की है और इस आरोप को बिल्कुल निराधार बताया है कि उन्होंने गांधी को समलैंगिक या नस्लवादी कहा है| उनका कहना है कि इस तरह के शब्द उनकी पुस्तक में कहीं आए ही नहीं हैं|लेलीवेल्ड बिल्कुल ठीक हैं| उन्हें उनके शब्दों के आधार पर कोई भी नहीं पकड़ सकता लेकिन उनकी पुस्तक की एक समीक्षा ने उन्हें विवादास्पद बना दिया| एक बि्रटिश अखबार ने इस समीक्षा को आधार बनाकर महात्मा गांधी और उनके शिष्य हरमन कालेनवाख के संबंधों को उछाल दिया| उसने लेलीवेल्ड द्वारा वर्णित तथ्यों की ऐसी वक्र-व्याख्या की कि गांधी एक बार फिर चर्चा के घेरे में आ गए| लेलीवेल्ड ने गांधी और कालेनबाख के संबंधों के बारे में जो भी लिखा है, वह प्रामाणिक दस्तावेजों के आधार पर लिखा है| संपूर्ण गांधी वाड्रमय से उन्होंने कालेनबाख के नाम गांधी के पत्रें को उद्रधृत किया है|ये हरमन कालेनबाख कौन थे ? कालेनबाख गांधी से दो साल छोटे थे| वे जर्मन-यहूदी थे| वे 1904 में गांधी से मिले| गांधी और कालेनबाख इतने घनिष्ट मित्र् बन गए कि वे एक-दूसरे को दो शरीर और एक आत्मा मानते थे| कालेनबाख ने ही अपनी 1100 एकड़ भूमि गांधीजी को दी थी, जिस पर उन्होंने ”तॉल्सतॉय फार्म” नामक आश्रम खड़ा किया था| वे गांधी से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने ब्रह्यचर्य और शाकाहार का व्रत ले लिया| वे गांधीजी के सत्याग्रहों में जमकर भाग लेते, संगठनात्मक कार्य करते और आश्रम की व्यवस्था भी चलाते| ऐसे दो परम मित्रें के बीच समलैंगिक संबंधों की बात कैसे उठी ?लेलीवेल्ड ने गांधीजी के पत्रें के कुछ शब्दों को इस तरह उद्रधृत किया कि उनके दोहरे अर्थ लगाए जा सकते हैं| जैसे गांधीजी खुद को ‘अपर चेंबर’ (उच्च सदन) और कालेनबाख को ‘लोअर चेम्बर’ (निम्न सदन) लिखा करते थे| लेलीवेल्ड ने इन दो शब्दों को तो उछाला लेकिन उन्होंने और उनके समीक्षकों ने यह नहीं बताया कि वे ऐसा क्यों लिखते थे ? कालेनबाख ‘लोअर हाउस’ की तरह बजट बनाते थे और गांधीजी ‘अपर हाउस’ की तरह उसमें कतरब्योंत कर देते थे| इस आर्थिक पदावलि को यौन पदाविल में बदलनेवाले मस्तिष्क को आप क्या कहेंगे ? यह आधुनिक पश्चिमी जीवन-पद्घति का अभिशाप है| इसी तरह गांधी के पत्रें में जगह-जगह कालेनबाख के लिए लिखे गए ”स्नेह और अधिक स्नेह” जैसे शब्दों का भी गलत अर्थ लगाया गया| गांधी द्वारा अपने शयन-कक्ष में रखे गए कालेनबाख के चित्र् को भी उसी अनर्थ से जोड़ा गया| गांधी के लगभग 200 पत्रें में उन्होंने कालेनबाख से अपने पूर्व-जन्म के संबंधों की बात भी कही है| ये सब बातें किसी भी भौतिकवादी सभ्यता के ढांचे में पले-बढ़े विद्वान या पत्र्कार के लिए अजूबा ही हो सकती हैं| वे यह मानकर चलते हैं कि दो पुरूषों या दो महिलाओं के बीच परम आत्मीयता का भाव रह ही नहीं सकता| यौन संबंधों के बिना आत्मीय संबंध संभव ही नहीं हंंै|वास्तव में गांधी इतने विलक्षण और इतने अद्वितीय थे कि उन्हें न तो परंपरागत पश्चिमी चश्मों से देखा जा सकता है और न ही परंपरागत भारतीय चश्मों से ! गांधी का सही रूप देखने के लिए मानवता को अपना एक नया चश्मा बनाना पड़ेगा| गांधी ने अपनी आत्म-कथा को ”मेरे सत्य के प्रयोग’ कहा है| यदि वे कुछ वर्ष और जीवित रहते और मेरी उनसे भेंट हो जाती तो मैं उनसे कहता कि आप एक आत्म-कथा और लिखिए और उसका शीर्षक दीजिए ‘मेरे ब्रह्यचर्य के प्रयोग’ ! उनकी यह दूसरी आत्म-कथा भी मानवता की बड़ी सेवा करती| मानव-समाज को तब यह मालूम पड़ता कि दुनिया में महापुरूष तो एक से एक बढ़कर हुए लेकिन गांधी-जैसा कोई नहीं हुआ| पिछले 55 वर्षों में गांधीजी के निजी जीवन पर चार-पांच ग्रंथ आ चुके हैं| जिनमें प्रो। गिरजाकुमार का शोध सर्वश्रेष्ठ है लेकिन अभी इस रहस्यमय मुद्दे पर काफी काम होना शेष है|कामदेव से कौन पराजित नहीं हुआ ? क्या माओ, क्या लेनिन, क्या हिटलर, क्या आइंस्टीन, क्या कार्ल मार्क्स, क्या सिगमिंड फ्रायड, क्या तॉल्सतॉय, क्या लिंकन, क्या केनेडी और क्या क्लिंटन ? दुनिया के किसी भी बलशाली या धनशाली व्यक्ति का नाम लीजिए और उसके पीछे कोई न कोई रेला निकल आएगा| जिन्हें विभिन्न मज़हब और संप्रदाय अपना जनक कहते हैं और जिन्हें अवतारों और देवताओं की श्रेणी में रखा जाता है, ऐसे महापुरूष भी यौन-पिपासा के शिकार हुए बिना नहीं रहे लेकिन गांधी गजब के आदमी थे, वे 79 साल की उम्र में भी कामदेव से लड़ते रहे और उसे परास्त करते रहे| 37 साल की भरी जवानी में उन्होंने जो ब्रह्यचर्य का व्रत लिया, उसे उन्होंने अंतिम सांस तक निभाया| उन्होंने अपनी यौन-शक्ति का उदात्तीकरण किया| वे ऊर्ध्वरेता बने| जब कभी कुछ लड़खड़ाहट का अंदेशा हुआ, उन्होंने उसे छिपाया नहीं| अपने अति अंतरंग अनुभवों को भी उन्होंने अपने संपादकीय में लिख छोड़ा| वे सत्य के सिपाही थे| यदि मन में सोते या जागते हुए भी कोई कुविचार आया तो उन्होंने उसे अपने साथियों को बताया और उसके कारण और निवारण में वे निरत हुए|ज़रा याद करें कि अपनी आत्म-कथा में उन्होंने अपनी कामुकता का चित्र्ण कितनी निर्ममता से किया है| उन्होंने अंतिम सांसें गिनते हुए पिता की उपेक्षा किसलिए की ? सिर्फ काम-वासना के वशीभूत होने के कारण ! इस काम-शक्ति ने अंतिम दम तक गांधी का पीछा नहीं छोड़ा| दक्षिण अफ्रीका में सिर्फ कालेनबाख ही नहीं, हेनरी पोलक और उनकी पत्नी मिली ग्राहम तथा उनकी 16 वर्षीय सचिव सोन्या श्लेसिन के साथ गांधी के संबंध इतने घनिष्ट और आत्मीय रहे कि कोई चाहे तो उनकी कितनी ही दुराशयपूर्ण व्याख्या कर सकता है| मिस श्लेसिन को केलनबाख ही गांधीजी के पास लाए थे| गांधीजी ने लिखा है कि श्लेसिन बड़ी नटखट निकली ”लेकिन एक महिने के भीतर ही उसने मुझे वश में कर लिया|” अपने पुरूष और महिला मित्रें के साथ गांधी के संबंध इतने खुले और सुपरिभाषित होते थे कि कहीं किसी प्रकार की मर्यादा-भंग का प्रश्न ही नहीं उठता था| तॉल्सतॉय फार्म और फीनिक्स आश्रम में गांधी जैसे खुद रहते थे, वैसे ही वे अपने अनुयायियों को भी रहने की छूट देते थे| उसका नतीज़ा क्या हुआ ? दोनों स्थानों पर अपि्रय यौन-घटनाएं घटीं| गांधी को विरोधस्वरूप उपवास करना पड़ा| कुछ लोगों को निकालना पड़ा| उनके अपने बेटे को दंडित करना पड़ा| गांधी-जैसे लौह-संयम और पुष्प-सुवास की-सी उन्मुक्त्ता क्या साधारण मनुष्यों में हो सकती है ? इन दो अतियों का समागम गांधी-जैसे अद्वितीय व्यक्ति में ही हो सकता था|गांधीजी के दबाव में आकर आग्रमवासी ब्रह्यचर्य का व्रत तो ले लेते थे लेकिन वे लंबे समय तक उसका पालन नहीं कर पाते थे| स्वयं कालेनबाख इसके उदाहरण बने| गांधी के बड़े-बड़े अनुयायी वासनाग्रस्त होने से नहीं बचे लेकिन गांधी ने कभी घुटने नहीं टेके| गांधीजी के आश्रमों में रहनेवाले युवक-युवतियों को वे काफी छूट देते थे लेकिन उन पर कड़ी निगरानी भी रखते थे|जहां तक कालेनबाख का सवाल है, वे उन्हें ‘लोअर चेंबर’ कहकर जरूर संबोधित करते थे लेकिन ऐसे अड़नाम उन्होंने अपने कई अन्य पुरूष और महिला मित्रें को दे रखे थे| रवीद्रनाथ ठाकुर की भतीजी सरलादेवी चौधरानी को वे अपनी ‘आध्यात्मिक पत्नी’ कहा करते थे| बि्रटिश एडमिरल की बेटी मिस स्लेड को उन्होंने ‘मीरा बेन’ नाम दे दिया था| अमेरिकी भक्तिन निल्ला क्रेम कुक को वे ‘भ्रष्ट बेटी’ कहा करते थे| बीबी अमतुस्सलाम को वे ‘पगली बिटिया’ बोला करते थे| दक्षिण अफ्रीका के अपने 21 वर्ष के प्रवास में गांधीजी ने ब्रह्यचर्य की जो शपथ ली, उसके पीछे उद्दीपक कारण उनका जेल का एक भयंकर अनुभव भी था| नवंबर 1907 में ट्रांसवाल की जेल में उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि एक चीनी और एक अफ्रीकी कैदी किस तरह पूरी रात वीभत्स यौन-क्रीड़ा करते रहे| उन्हें अपनी रक्षा के लिए पूरी रात जागना पड़ा| संतोनोत्पत्ति के अलावा किसी भी अन्य कारण के लिए किए गए सहवास को वे पाप मानने लगे| इस प्रतिज्ञा का पालन उन्होंने जीवन भर किया| अफ्रीकी कैदियों के दुराचरण को नजदीक से देखने के कारण ही गांधीजी ने जो टिप्पणी कर दी, उसके आधार पर उन्हें नस्लवादी कहना सर्वथा अनुचित है|दक्षिण अफ्रीकी प्रवास के दौरान उन्होंने ब्रह्यचर्य पर काफी जोर दिया लेकिन भारत लौटकर 15-16 साल बाद गांधीजी ने ब्रह्यचर्य के कुछ ऐसे प्रयोग शुरू कर दिए, जो गांधी के पहले दुनिया में किसी ने नहीं किए| वे स्वयं पूर्ण नग्न होकर नग्न युवतियों और महिलाओं के साथ सोते थे, पूर्ण नग्नावस्था में महिलाओं से मालिश करवाते थे और रजस्वला युवतियों को मां की तरह व्यावहारिक मदद देते थे| गांधीजी के इन प्रयोगों पर राजाजी, विनोबा, कालेलकर, किशोरभाई मश्रूवाला, नरहरि पारेख और डॉ. राजेन्द्रप्रसाद जैसे गांधी-भक्तों ने भी प्रश्न चिन्ह लगाए| गांधीजी के साथी प्रो. निर्मलकुमार बोस ने गांधीजी के इस आचरण पर कड़ी आपत्ति भी की| नोआखली यात्र के दौरान गांधीजी के निजी सचिव आर.पी. परसुराम इतने व्यथित हुए कि उन्होंने पंद्रह पृष्ठ का पत्र् लिखकर गांधीजी के प्रयोगों का विरोध किया और इस्तीफा दे दिया| फिर भी गांधीजी डटे रहे|गांधीजी क्यों डटे रहे ? क्योंकि गांधीजी के मन में कोई कलुष नहीं था| वे कामशक्ति पर विजय पाने को अपनी आध्यात्मिकता का चरमोत्कर्ष समझते थे| वे चाहते थे कि वे स्वेच्छया पूर्णरूपेण नपुंसक बन जाएं, जैसा कि बाइबिल और कुरान में कहा गया है| वास्तव में वे उस हद तक पहुंच रहे थे| वे अपनी कुटिया में खिड़की-दरवाजें बंद करके कभी नहीं सोए| वे मालिश भी खुले मैदान में करवाते थे| वे अपनी परीक्षा तो रोज करते ही थे, आम लोगों को भी देखने देते थे कि वे इस परीक्षा में सफल हुए या नहीं| उनके बहुत निकट रहनेवाली लगभग दर्जन भर देसी और विदेशी महिलाओं में से किसी ने भी एक बार भी यह नहीं कहा कि गांधीजी ने कभी कोई कुचेष्टा की है| कुछ महिलाओं और युवतियों को गांधीजी ने अपने से दूर किया, क्योंकि उनमें से विकार के संकेत आने लगे थे| महिलाएं गांधीजी के संग क्यों आती थीं और उन पर क्या प्रतिकि्रया होती थी, यह एक अलग विषय है|गांधीजी का ब्रह्यचर्य केथोलिक और हिंदू ब्रह्यचर्य से काफी अलग था| सहवास के अलावा उनके यहां दरस-परस-वचन-स्मरण आदि की छूट थी लेकिन पारंपरिक ब्रह्यचर्य के इन अपवादों में कहीं रत्ती भर भी वासना न हो, यह देखना गांधी का काम था| सरलादेवी चौधरानी के साथ चले ‘वासनामय’ प्रेम-प्रसंग को भंग करने के लिए गांधी ने जिस आध्यात्मिक साहस का परिचय दिया, वह बड़े-बड़े साधु-संतों के लिए भी ईर्ष्या का विषय हो सकता है| ऐसे गांधी पर कालेनबाख के हवाले से समलैंगिक होने का संदेह करना अपनी विकृत मानसिकता को गांधी पर आरोपित करना है|

- डॉ वेद प्रताप वैदिक

A-19, प्रेस एंनक्लेव,

नई दिल्ली – 110017

फोन: 011-26867700