शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

डॉ मोहसिन खान 'तन्हा' की ग़ज़लें

जब भी सदा आई ज़हन तक अज़ानों की,
मस्जिदों की ऊँची मीनारों से डर लगा।

डर को इस तरह से अपने शेर में बयान करते हैं डॉ मोहसिन खान 'तन्हा' । आप लाख तकनीक को गरियाऐं पर फेसबुक पर इनकी ग़ज़लों से मुठभेड़ हुई तो मुझे इनसे अनुरोध करना पड़ा कि भाई कुछ मेरे ब्लॉग के लिए भी। और मुझे तुरंत और बड़ी सरलता से गज़लें मिल गई। ये कितनी आसानी से कह देते हैं-

बड़ी महीन चुभन है इस नैज़े की,
क़लम कम नहीं किसी औज़ार से।

और सचमुच कलम किसी औज़ार से कम नहीं। मोहसिन अपने समय और उसके ख़तरों से वाकिफ हैं और इसीलिए कहते हैं-

मुझको पता है ये उसको ख़बर है,
झाँक रहा था कौन उस दरार से।

देर से ही सही पर तत्सम पर इस बार डॉ मोहसिन खानतन्हा’…

- प्रदीप कान्त
डॉ. मोहसिन ख़ान (लेफ़्टिनेंट), जन्म 01-06-1975

प्रकाशन - प्रकाशित शोध-पत्र, आलेख, कहानी, कविताएँ एवं ग़ज़लें
35 से अधिक शोध-पत्र एवं आलेख राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। कथाक्रम में पहली कहानी प्रकाशित। वर्तमान में कहानी लेखन में सक्रिय। अपनी माटी, रचनाकार डॉट कॉम, सृजनगाथा वेब पत्रिका पर कहानियाँ,कविताएँ एवं ग़ज़लें प्रकाशित।

प्रकाशित पुस्तकें
प्रगतिवादी समीक्षक और डॉ. रामविलास शर्मा’ , ‘दिनकर का कुरुक्षत्र और मानवतावाद’ , पुस्तक (सह-सम्पादक) – ‘देवनागरी विमर्श

उपन्यास त्रितयग़ज़ल संग्रह-सैलाबपरिदृश्य प्रकाशन (शीघ्र प्रकाश्य)

प्रेमचंद की तीन कहानियों का नाट्य रूपान्तरण एवं मंचन हेतु निर्देशन। अक्षर वार्ताअंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में सम्पादन सहयोग 

कुलाबा गौरव समान, डॉ. अम्बेडकर फ़ेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान 2014 (दलित साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा प्रदत्त) आदि कई पुरूस्कार व सम्मान

Blog-www.sarvahara.blogspot.com

संप्रति
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं शोध निर्देशक
जे.एस.एम. महाविद्यालय, अलीबाग – 402 201, जिला रायगड़ (महाराष्ट्र)   
ई-मेल–khanhind01@gmail.com, मोबाईल:-+919860657970, 8793816539

1
कभी दरिया से, कभी किनारों से डर लगा।
तो कभी अपने घर की दीवारों से डर लगा।

जाने क्यों सुना दिया अपने दिल का हाल,
मुझे अपने ही सारे राज़दारों से डर लगा।

जब भी सदा आई ज़हन तक अज़ानों की,
मस्जिदों की ऊँची मीनारों से डर लगा।

जो कहा, सामने कहा और सहीं तोहमतें।
पीठ के पीछे चल रहे इशारों से डर लगा।

तनहा रखा जब बुलंदियों पे क़दम मैंने तो,
आसमानों से टूटते सितारों से डर लगा।

2
न दिलों में रहा, न निगाहों में रहा।
उम्र भर मैं गैरों की पनाहों में रहा।

मस्जिद सामने थी,फ़ितरत न थी,
साथ आवारगी के गुनाहों में रहा।

मेरी मुश्किल खुद मैं ही बन गया,
न जाने मैं किन भुलावों में रहा।

ख़ामोश तबीअत ने किया बदनाम,
हर वक़्त मैं झूठी अफ़वाहों में रहा।

तनहा बिछड़ा जबसे अपने घर से,
जैसे टूटा कोई पत्ता हवाओं में रहा।

3
गिरा के मुझको वो मुस्कुरा रहा है।
औक़ात अपनी अब बता रहा है।

मैदान भी उसका, खेल भी उसका,
चालें नई-नई मुझको दिखा रहा है।

टूटे उनके हौसले जो कमज़ोर थे,
काँच से पत्थर को डरा रहा है।

क़ायम रखना है गर ऊंचाई तुझे,
तो क़द मेरा तू क्यों घटा रहा है।

तनहातप के बनी शख़्सीयत,
सलीक़ा तू मुझे सिखा रहा है।

4
रिश्ते ख़रीदे नहीं जाते बाज़ार से।
एक डोर बाँधे हुए है, एतबार से।

आईने शराफ़त छोड़ दें तो अच्छा,
नीयत नज़र आ जाएगी दीदार से।

बड़ी महीन चुभन है इस नैज़े की,
क़लम कम नहीं किसी औज़ार से।

मुझको पता है ये उसको ख़बर है,
झाँक रहा था कौन उस दरार से।

'तनहा'  हूँ, बेसहारा हूँ, बेचारा हूँ,
बिछड़ा हुआ हूँ कूच-ए-दयार से।

5
ये हुनर है, इसे छुपा रहने दो।
ज़रा मुझमें मेरी अदा रहने दो।

बड़ी नाज़ुक हैं, काँच की चीज़ें,
छुओ नहीं, इन्हें सजा रहने दो।

बाँट लो तुम ज़मीं-आसमाँ सारे,
बस मेरे हक़ में दुआ रहने दो।

राख़ कुरेदो नहीं, सुलग जाएगी,
इस आग को अब बुझा रहने दो।

'तनहा' जी लूँगा पर झुकूँगा नहीं,
मेरे हिस्से में मेरी ख़ता रहने दो।

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

मैं कहानीकार नहीं, जेबकतरा हूँ - सआदत हसन मंटो

मंटो का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं, इसलिए बिना किसी परिचय और भूमिका के मंटो का यह दिलचस्प आत्म कथ्य, या जो भी आप इसे कह लें| हालाँकि आपने इसे पहले पढ़ा हो सकता है पर फिर भी... तत्सम पर इस बार मंटो...

- प्रदीप कांत

मेरी जिंदगी में तीन बड़ी घटनाएँ घटी हैं। पहली मेरे जन्म की। दूसरी मेरी शादी की और तीसरी मेरे कहानीकार बन जाने की।

लेखक के तौर पर राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। लीडरों और दवाफरोशों को मैं एक ही नजर से देखता हूँ। लीडर और दवाफरोशी दोनों पेशे हैं। राजनीति से मुझे उतनी ही दिलचस्पी है, जितनी गांधीजी को सिनेमा से थी। गांधीजी सिनेमा नहीं देखते थे, और मैं अखबार नहीं पढ़ता। दरअसल हम दोनों गलती करते हैं। गांधीजी को फिल्में जरूर देखनी चाहिए थीं, और मुझे अखबार जरूर पढ़ने चाहिए।

मुझसे पूछा जाता है कि मैं कहानी कैसे लिखता हूँ। इसके जवाब में मैं कहूँगा कि अपने कमरे में सोफे पर बैठ जाता हूँ, कागज-कलम लेता हूँ और 'बिस्मिल्ला' कहकर कहानी शुरू कर देता हूँ। मेरी तीनों बेटियाँ शोर मचा रही होती हैं। मैं उन से बातें भी करता हूँ। उनके लड़ाई-झगड़े का फैसला भी करता हूँ। कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, पर कहानी भी लिखता रहता हूँ। सच पूछिए तो मैं वैसे ही कहानी लिखता हूँ, जैसे खाना खाता हूँ, नहाता हूँ, सिगरेट पिता हूँ और झक मारता हूँ।

अगर पूछा जाए कि मैं कहानी क्यों लिखता हूँ, तो कहूँगा कि शराब की तरह कहानी लिखने की भी लत पड़ गई है। मैं कहानी न लिखूँ, तो मुझे ऐसा लगता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या गुसल नहीं किया है या शराब नहीं पी है। दरअसल मैं कहानी नहीं लिखता हूँ, बल्कि कहानी मुझे लिखती है। मैं बहुत कम-पढ़ा लिखा आदमी हूँ। वैसे तो मैंने दो दर्जन किताबें लिखी हैं और जिस पर आए दिन मुकदमे चलते रहते हैं। जब कलम मेरे हाथ में न हो, तो मैं सिर्फ सआदत हसन होता हूँ!

कहानी मेरे दिमाग में नहीं, मेरी जेब में होती है, जिसकी मुझे कोई खबर नहीं होती। मैं अपने दिमाग पर जोर देता हूँ कि कोई कहानी निकल आए। कहानी लिखने की बहुत कोशिश करता हूँ, पर कहानी दिमाग से बाहर नहीं निकलती। आखिर थक-हारकर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ। अनलिखी कहानी की कीमत पेशगी वसूल कर चुका हूँ, इसलिए बड़ी झुँझलाहट होती है। करवट बदलता हूँ। उठकर अपनी चिड़ियों को दाने डालता हूँ। बच्चियों को झूला झुलाता हूँ। घर का कूड़ा-करकट साफ करता हूँ, घर में इधर-उधर बिखरे नन्हें-मुन्ने जूते उठाकर एक जगह रखता हूँ, पर कमबख्त कहानी जो मेरी जेब में पड़ी होती है, मेरे दिमाग में नहीं आती और मैं तिलमिलाता रहता हूँ।

जब बहुत ही ज्यादा कोफ्त होती है, तो गुसलखाने में चला जाता हूँ, पर वहाँ से भी कुछ मिलता नहीं। सुना है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है। मुझे अपने तजुर्बे से पता लगा है कि मैं बड़ा आदमी नहीं हूँ, पर हैरानी है कि फिर भी मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बहुत बड़ा कहानीकार हूँ। इस बारे में मैं यही कह सकता हूँ कि या तो मेरे आलोचकों को खुशफहमी है या फिर मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ।

ऐसे मौकों पर, जब कहानी नहीं ही लिखी जाती, तो कमी यह होता है कि मेरी बीवी मुझसे कहती है, 'आप सोचिए नहीं, कलम उठाइए और लिखना शुरू कर दीजिए!' मैं उसके कहने पर लिखना शुरू कर देता हूँ। उस समय दिमाग बिल्कुल खाली होता है, पर जेब भरी हुई होती है। तब अपने आप ही कोई कहानी उछलकर बाहर आ जाती है। उस नुक्ते से मैं खुद को कहानीकार नहीं, बल्कि जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद काटता है और लोगों के हवाले कर देता है।

मैंने रेडियो के लिए जो नाटक लिखे, वे रोटी के उस मसले की पैदावार हैं, जो हर लेखक के सामने उस समय तक रहता है, जब तक वह पूरी तरह मानसिक तौर पर अपाहिज न हो जाए। मैं भूखा था, इसलिए मैंने यह नाटक लिखे। दाद इस बात की चाहता हूँ कि मेरे दिमाग ने मेरे पेट में घुसकर ऐसे हास्य-नाटक लिखे हैं, जो दूसरों को हँसाते हैं, पर मेरे होठों पर हल्की-सी मुस्कराहट भी पैदा नहीं कर सके।

रोटी और कला का रिश्ता कुछ अजीब-सा लगता है, पर क्या किया जाए! खुदाबंदताला को यही मंजूर है। यह गलत है कि खुदा हर चीज से खुद को निर्लिप्त रखता है और उसको किसी चीज की भूख नहीं है। दरअसल उसे भक्ति चाहिए और भक्ति बड़ी नर्म और नाजुक रोटी है, बल्कि चुपड़ी हुई रोटी है, जिस से ईश्वर अपना पेट भरता है। सआदत हसन मंटो लिखता है, क्योंकि वह ईश्वर जितना कहानीकार और कवि नहीं है। उसे रोटी की खातिर लिखना पड़ता है।

मैं जानता हूँ कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बहुत बड़ा नाम है। अगर यह खुशफहमी न हो तो जिंदगी और भी मुश्किल बन जाए। पर मेरे लिए यह एक तल्ख हकीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूँढ़ नहीं पाया हूँ। यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है। मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ।

मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता? मैं अपनी जिंदगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेजियों की भेंट चढ़ा चुका हूँ। अब तो यह हालत है कि परहेज शब्द ही मेरे लिए डिक्शनरी से गायब हो गया है।

मैं समझता हूँ कि जिंदगी अगर परहेज से गुजारी जाए, तो एक कैद है। अगर वह बदपरहेजियों में गुजारी जाए, तो भी कैद है। किसी-न-किसी तरह हमें इस जुर्राब के धागे का एक सिरा पकड़कर उसे उधेड़ते जाना है और बस!
(हिन्दी समय से साभार)

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

कविता और जीवन - बेन ओकरी

(अनुवाद- गीत चतुर्वेदी)
 
कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें। वे राजनेताओं की तरह आपसे वोट नहीं माँगते।
-बेन ओकरी
 
तत्सम पर इस कविता और जीवन बेन ओकरी के ये विचार जिनका अनुवाद किया है युवा कवि, कथाकार गीत चतुर्वेदी ने...
-प्रदीप कांत
 
1
ईश्वर जानता है कि किसी भी समय के मुकाबले हमें कविता की जरूरत आज कहीं ज्यादा है। हमें कविता से प्राप्त होने वाले दुष्कर सत्य की जरूरत है। हमें उस अप्रत्यक्ष आग्रह की जरूरत है, जो सुने जाने के जादूके प्रति कविता करती है।

उस दुनिया में, जहाँ बंदूकों की होड़ लगी हुई है, बम-बारूदों की बहसें जारी हैं, और इस उन्माद को पोसता हुआ विश्वास फैला है कि सिर्फ हमारा पक्ष, हमारा धर्म, हमारी राजनीति ही सही है, दुनिया युद्ध की ओर एक घातक अंश पर झुकी हुई है - हमें उस आवाज की जरूरत है, जो हमारे भीतर के सर्वोच्च को संबोधित हो।

हमें उस आवाज की जरूरत है, जो हमारी खुशियों से बात कर सके, हमारे बचपन और निजी-राष्ट्रीय स्थितियों के बंधन से बात कर सके। वह आवाज जो हमारे संदेहों, हमारे भय से बात कर सके; और उन सभी अकल्पित आयामों से भी जो न केवल हमें मनुष्य बनाते हैं, बल्कि हमारा होना भी बनाते हैं - हमारा होना, जिस होने को सितारे अपनी फुसफुसाहटों से छुआ करते हैं।

2
राजनीति की अपेक्षा कविता हमारे कहीं करीब है। वह हमारे लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितना चलना और खाना।

जब हम जन्म लेते हैं, तो दरअसल श्वास और कविता की स्थितियों में ही जन्म लेते हैं। जन्म लेना एक काव्यात्मक स्थिति है - आत्मा का देह में बदल जाना। मृत्यु भी एक काव्यात्मक स्थिति है - देह का आत्मा में बदल जाना। यह एक चक्र के पूरा हो जाने का चमत्कार है - यह जीवन की न सुनी गई मधुरता का एक अपरिमेय चुप्पी में लौट जाना है।

जीवन और मृत्यु के बीच जो भी कुछ हमारा दैनंदिन क्षण होता है, वह भी प्राथमिक तौर पर काव्यात्मक ही होता है : यानी भीतरी और बाहरी का संधि-स्थल, कालहीनता के आंतरिक बोध और क्षणभंगुरता के बाह्यबोध के बीच।  

3
राजनेता राज्य के हालात के बारे में बात करते हैं, कवि जीवन की बुनियादी धुनों में गूँजते रहने में हमारी मदद करते हैं, चलने के छंद में, बोलने की वृत्ताकार रुबाइयों में, जीने के रहस्यमयी स्पंदनों में।

कविता हमारे भीतर एक अंतर्संवाद पैदा करती है। यह हमारे अपने सत्य के प्रति एक निजी यात्रा का प्रस्थान होती है।

हम पूरी दुनिया से कविता की आवाजों को एक साथ ले आएँ, और अपने हृदयों को एक उत्सव में तब्दील कर दें, एक ऐसी जगह जहाँ स्वप्न पलते हों। और हमारा दिमाग सितारों की छाँव में अनिवार्यताओं की अकादमी बन जाए।

4
कविता सिर्फ वही नहीं होती जो कवि लिख देते हैं। कविता आत्मा की फुसफुसाहटों से बनी वह महानदी भी है, जो मनुष्यता के भीतर बहती है। कवि सिर्फ इसके भूमिगत जल को क्षण-भर के लिए धरातल पर ले आता है, अपनी खास शैली में, अर्थों और ध्वनियों के प्रपात में झराता हुआ।

5
संभव है कि प्राचीन युगों के त्रिकालदर्शी मौन हों, और अब हम उन विभिन्न तरीकों में कदाचित विश्वास न करते हों, जिनसे ईश्वर हमसे या हमारे माध्यम से बोला करता था। लेकिन जिंदा रहने का अर्थ है कि हम कई सारे दबावों के केंद्र में उपस्थित हैं - समाज की माँग के दबाव, अपने होने के बिल्कुल अजीब ही दबाव, इच्छाओं के दबाव, अकथ मनःस्थितियों और स्वप्नों के दबाव और इस नश्वर जीवन के हर प्रवाह के बीच शक्तिशाली हो जाने की अनुभूतियों के दबाव।

6
हम अपने मतभेदों पर बहुत ज्यादा ध्यान देते हैं। कविता हमें, हमारे यकसाँपन के अचंभे की ओर ले आती है। यह हमारे भीतर विलीन हो चुके उस बोध को फिर से जगा देती है कि अंततः हम सब एक अनंत परिवार के ही हिस्से हैं और उन अनुभूतियों को एक-दूसरे से साझा कर रहे हैं, जो नितांत हमारे लिए अद्वितीय हैं, और उन अनुभूतियों को भी, जो सिर्फ हमारी नहीं, दरअसल हर किसी की हैं।

हमें राजनीति की अपेक्षा कविता की अधिक आवश्यकता है, लेकिन हमें कविता की संभावनाओं में वृद्धि भी करते रहना होगा। कविता अनिवार्यतः दुनिया को बदल नहीं देगी। (अत्याचारी भी कई बार कवि-रूप में जाने जाते हैं, कहना चाहिए कि बुरे कवि के रूप में।) जब तक कविता हमारी बुद्धि को सवालों के दायरे में भेजती रहेगी, हमारी मुलायम मनुष्यता को गहरे से छूती रहेगी, तब तक वह हमेशा सौंदर्य का तेज बनी रहेगी, भलाई का वेग बनी रहेगी, तमंचों और नफरतों के शोर को धीरे-धीरे शून्य करती हुई।

7
कविता की असाधारणता का कारण बहुत स्पष्ट है। कविता उस मूल शब्द का वंशज है, जिसे हमारे संतों ने सृष्टि की उत्पत्ति का कारक माना है।

कविता, अपने उच्चांक पर, सृष्टि की सर्जनात्मक शक्ति को अपने भीतर जीवित रखती है। वे सभी चीज़ें, जिनके पास आकार होता है, जो परिवर्तित होती हैं, जो अपना कायांतरण कर लेती हैं - कविता उन सभी चीजों का सशरीर अवतार है। शब्द भी कैसी मिथ्या है न! शब्द का वजन कौन माप सकता है, भले एक पलड़े में आप सत्य का हल्का पंख रख दें, दूसरे में शब्द - क्या वैसा संभव है? फिर भी हृदय के भीतर शब्दों का कितना वजन होता है, हमारी कल्पनाओं, स्वप्नों में, युगों-युगों से चली आ रही अनुगूँजों में, उतने ही टिकाऊ जितने कि पिरामिड। हवा से भी हल्के होते हैं शब्द, फिर भी उतने ही रहस्यमयी तरीके से चिरस्थायी, जितना कि जिया गया जीवन। कविता हमारे भीतर की देवतुल्य उपस्थितियों के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूँज में बदल जाने का कारण बनती है।

8
कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें। वे राजनेताओं की तरह आपसे वोट नहीं माँगते।
 
सच्चे कवि सिर्फ यही चाहते हैं कि आप इस पूरी सृष्टि के साथ किए गए उस अनुबंध का सम्मान करें, जो आपने इसकी वायु के अदृश्य जादू से अपनी पहली साँस खींचते समय किया था।  
 
हिन्दी समय (hindisamay.com) से साभार
 

रविवार, 21 सितंबर 2014

वीनस केसरी की ग़ज़लें

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले, 
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे बैठे हैं हम |

ये है हमारा आज का आम आदमी, जो रोजी रोटी के लिये इस कदर काम करता है कि घर परिवार के लिये उसे घर में भी फुर्सत नहीं। आज भी, जहाँ ग़ज़लों में अधिकांशत: प्यार मुहब्बत की बातें करके ख़ुश हुआ जा सकता है, वहाँ युवा शायर वीनस कहते हैं-

हर कोई अच्छे दिनों के ख़ाब में डूबा तो है,
पर बुरे दिन के मुक़ाबिल ख़ुद खड़ा कोई नहीं|
 
मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है
काट ली जायेगी ज़बान भी क्या

इन्तिहा-ए-ज़ुल्म ये है, इन्तिहा कोई नहीं! 
घुट गई है हर सदा या बोलता कोई नहीं ?

कुछ व्यस्त्तताओं के चलते की अनियमितता के लिये माफ़ी के साथ तत्सम में इस बार वीनस केसरी की कुछ ग़ज़लें...

प्रदीप कांत


वीनस केसरी 
जन्म तिथि:1 मार्च 1985 , शिक्षा: स्नातक
विधा: ग़ज़ल, गीत छन्द कहानी आदि 

प्रकाशन: प्रगतिशील वसुधा, कथाबिम्ब, अभिनव प्रयास, गर्भनाल, अनंतिम, गुफ्तगू, विश्वगाथा आदि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़ल, गीत व दोहे का प्रकाशन हरिगंधा, ग़ज़लकार, वचन आदि में ग़ज़ल पर शोधपरक लेख प्रकाशित
प्रसारण: आकाशवाणी इलाहाबाद व स्थानीय टीवी चैनलों से रचनाओं का प्रसारण
पुस्तक: अरूज़ पर पुस्तक ग़ज़ल की बाबत प्रकाशनाधीन

विशेष: उप संपादक, त्रैमासिक 'गुफ़्तगू', इलाहाबाद (अप्रैल २०१२ से सितम्बर २०१३ तक), सह संपादक नव्या आनलाइन साप्ताहिक पत्रिका (जनवरी २०१३ से अगस्त २०१३ तक) 
संप्रति: पुस्तक व्यवसाय व प्रकाशन (अंजुमन प्रकाशन)
सम्पर्क: जनता पुस्तक भण्डार,
942, आर्य कन्या चौराहा,  मुट्ठीगंज,इलाहाबाद  211003
मो: 094530 04398


इन्तिहा-ए-ज़ुल्म ये है, इन्तिहा कोई नहीं!
घुट गई है हर सदा या बोलता कोई नहीं ?

बाद-ए- मुद्दत आइना देखा तो उसमें मैं न था,
जो दिखा, बोला वो मुझसे मैं तेरा कोई नहीं |

हर कोई अच्छे दिनों के ख़ाब में डूबा तो है,
पर बुरे दिन के मुक़ाबिल ख़ुद खड़ा कोई नहीं |

हम अगर चुप हैं तो हम भी बुज़दिलों में हैं शुमार,
हम अगर बोलें तो हम सा बेहया कोई नहीं |

बरगला रक्खा है हमने खुद को उस सच्चाई से,
अस्ल में दुनिया का जिससे वास्ता कोई नहीं

अपनी बाबत क्या है उनकी राय, फरमाते हैं जो,
राहजन चारों तरफ हैं रहनुमा कोई नहीं |
000   

पत्थरों में खौफ़ का मंज़र भरे बैठे हैं हम |
आईना हैं, खुद में अब पत्थर भरे बैठे हैं हम |

हम अकेले ही सफ़र में चल पड़ें तो फ़िक्र क्या,
अपनी नज़रों में कई लश्कर भेरे बैठे हैं हम |

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले,
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे बैठे हैं हम | 

हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,
इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम |
000
उलझनों में गुम हुआ फिरता है दर-दर आइना |
झूठ को लेकिन दिखा सकता है ख़ंजर आइना |

शाम तक खुद को सलामत पा के अब हैरान है,
पत्थरों के शहर में घूमा था दिन भर आइना |

गमज़दा हैं, खौफ़ में हैं, हुस्न की सब देवियाँ,
कौन पागल बाँट आया है ये घर-घर आइना |

आइनों ने खुदकुशी कर ली ये चर्चा आम है,
जब ये जाना था की बन बैठे हैं पत्थर, आइना |

मैंने पल भर झूठ-सच पर तब्सिरा क्या कर दिया,
रख गए हैं लोग मेरे घर के बाहर आइना |

अपना अपना हौसला है, अपना अपना फ़ैसला,
कोई पत्थर बन के खुश है कोई बन कर आइना |
000 

अब हो रहे हैं देश में बदलाव व्यापक देखिये
शीशे के घर में लग रहे लोहे के फाटक देखिये

जो ढो चुके हैं इल्म की गठरी, अदब की बोरियां
वह आ रहे हैं मंच पर बन कर विदूषक देखिये

जिनके सहारे जीत ली हारी हुई सब बाजियां
उस सत्य के बदले हुए प्रारूप भ्रामक देखिये

जब आप नें रोका नहीं खुद को पतन की राह पर
तो इस गिरावट के नतीजे भी भयानक देखिये

इक उम्र जो गंदी सियासत से लड़ा, लड़ता रहा
वह पा के गद्दी खुद बना है क्रूर शासक देखिये

किसने कहा था क्या विमोचन के समय, सब याद है
पर खा रही हैं वह किताबें, कब से दीमक देखिये

जनता के सेवक थे जो कल तक, आज राजा हो गए
अब उनकी ताकत देखिये उनके समर्थक देखिये
000 

छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या
इल्म लेगा ये इम्तेहान भी क्या

ख़ुद से कर देगा बदगुमान भी क्या
कोई ठहरेगा मेह्रबान भी क्या

है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या
इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या 

मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है
काट ली जायेगी ज़बान भी क्या

धूप से लुट चुके मुसाफ़िर को
लूट लेंगे ये सायबान भी क्या

इस क़दर जीतने की बेचैनी
दाँव पर लग चुकी है जान भी क्या

अब के दावा जो है मुहब्बत का
झूठ ठहरेगा ये बयान भी क्या

मेरी नज़रें तो पर्वतों पर हैं
मुझको ललचायेंगी ढलान भी क्या

रविवार, 14 सितंबर 2014

बिन तले के जूते - सुखबीर विश्वकर्मा की लघुकथा


हमेशा से यही होता था गांव में कभी कोई मौत होती या खुशी का मौका होता तो उन्हें जरूर बुलाया जाता वह खुद न जाकर चमरौंधे जूतों का एक जोडा भेज देते जो उनके शामिल होने का प्रतीक था

वे सैकडों बीघा जमीन के मालिक थे। गांव का एक हिस्सा उनकी जमीन जोत-बो कर पलता था।उनकी किलेनुमा आलीशान हवेली में हर वक्त मोटे-तगडे नौकर मौजूद रहते।

भला किसमें हिम्मत थी कि उनकी हरकत के खिलाफ़ मुंह खोल सकता।

अचानक एक दिन उनकी मां मर गई।परम्परा के मुताबिक गांव में खबर पहुंचा दी गयी कि हरेक घर से एक-एक आदमी को शवयात्रा में शामिल होना है। जबाब मिला आयेंगे

अर्थी बनकर तैयार हो गई लेकिन एक भी आदमी वहां नहीं पहुंचा । वे हैरान थे। झल्लाकर वे नौकरों पर बरसने लगे।

तभी दो बैलगाडियां हवेली की तरफ़ आती दिखाई पडी । वे चादरों से ढकी थी । पास आने पर उन्होंने गाडीवालों से पूछा,"लोग कहां है ? और ये क्या तमाशा है ?

गाडीवान बगैर कुछ कहे वापस लौट गये ।इधर उन्होंने आगे बढकर बैलग़ाडियों पर से चादरें हटायी ।वह ठगे रह गये । ग़ाडियों में बिन तलों के वही जूते भरे थे जो उन्होंने समय-समय पर गांव वालों के यहां भिजवाये थे ।

("तनी हुई मुट्ठियां" सम्पादक मधुदीप/ मधुकांत-1980)
ज्ञानसिंधु से साभार (http://gyansindhu.blogspot.in) 

बुधवार, 3 सितंबर 2014

बुनाई का गीत - केदारनाथ सिंह

वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की कविता का एक पोस्टर बनाने का एक प्रयास किया है जिसे तत्सम पर लगा रहा हूँ। 

- प्रदीप कांत
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कविता: कविताकोश से साभार                                                                               चित्र: गुगल सर्च से साभार