शनिवार, 31 दिसंबर 2011

कहने को ही साल नया है

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ तत्सम में इस बार आपनी ही एक ग़ज़ल दे रहा रहा हूँ|




कहाँ हमारा हाल नया है

कहने को ही साल नया है

कहता है हर बेचने वाला
दाम पुराना माल नया है

बड़े हुए हैं छेद नाव में
माझी कहता पाल नया है

इन्तज़ार है रोटी का बस
हाथ हमारे थाल नया है

लोग बेसुरे समझाते हैं
नवयुग का सुर-ताल नया है

नहीं सहेगा मार दुबारा
गाँधी जी का गाल नया है


- प्रदीप कान्त

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

बृजेश कानूनगो की कविताएँ


बृजेश कानूनगो
25 सितम्बर 1957 को मध्य प्रदेश के देवास में बृजेश रसायन विज्ञान तथा हिन्दी साहित्य मे स्नातकोत्तर हैं और 1976 से देश की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओँ मेँ आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो रही है।
अब तक आपके प्रकाशनों में एक व्यंग्य संग्रह-पुन: पधारेँ (1995), एक कविता पुस्तिका-धूल और धुएँ के परदे मेँ (1999), बाल कथाओँ की पुस्तक- फूल शुभकामनाओँ के (2003) बाल गीतोँ की पुस्तिका- चाँद की सेहत (2007) शामिल है।
बृजेश की कविताएँ पाठकों को गहरे तक झकझोरने की क्षमता रखती हैं। एक और उनके पास रेडियो की स्मृति जैसी स्मृति की कविता है दूसरी और किवज जैसी वर्तमान की कविता। भूकम्प के बाद कविता में वे कविता की हमेशा की प्रासंगिकता पर बात करते हैं – कविता ही है/जो खिलाती है मलबे पर फूल/बिछुड़ गये बच्चों के चेहरे पर/लौटाती है मुस्कान। यह आश्वस्ति है कि कविता है तो कुछ सार्थक कहेगी ही। तत्सम में इस बार बृजेश कानूनगो की तीन कविताएँ......।
-प्रदीप कांत
1
रेडियो की स्मृति


गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों
बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह

कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर

फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें


न जाने क्या सुनते रहते हैं
छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका
जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश

आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही


स्मृति मे सुनाई पडता है
पायदानों पर चढता
अमीन सयानी का बिगुल
न जाने किस तिजोरी में कैद है
देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक
हॉकियों पर सवार होकर

मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह

स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं
फसलों के बचाव के तरीके
माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता
अपने समय का महत्वपूर्ण कवि
सारंगी रोती रहती है अकेली

कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू

याद आता है रेडियो
सुनसान देवालय की तरह
मुख्य मन्दिर मे प्रवेश पाना
जब सम्भव नही होता आसानी से
और तब आता है याद

जब मारा गया हो बडा आदमी

वित्त मंत्री देश का भविष्य
निश्चित करने वाले हों संसद के सामनें
परिणाम निकलने वाला हो दान किए अधिकारों की संख्या का
धुएँ के बवंडर के बीच बिछ गईं हों लाशें
फैंकी जाने वाली हो क्रिकेट के घमासान में फैसलेवाली अंतिम गेंद
और निकल जाए प्राण टेलीविजन के
सूख जाए तारों में दौडता हुआ रक्त
तब आता है याद
कबाड में पडा बैटरी से चलनेवाला

पुराना रेडियो

याद आती है जैसे वर्षों पुरानी स्मृति
जब युवा पिता
इमरती से भरा दौना लिए

दफ्तर से घर लौटते थे।

2
भूकंप के बाद कविता

भूकंप के बाद
एक और भूकंप आता है हमारे अंदर।

विश्वास की चट्‌टानें

बदलती है अपना स्थान
खिसकने लगती है विचारों की आंतरिक प्लेटें
मन के महासागर में उमड़ती है संवेदनाओं की सुनामी लहरें
तब होता है जन्म कविता का।

भाषा, शिल्प और शैली का
नही होता कोई विवाद
मात्राओं की संख्या
और शब्दों के वजन का कोई मापदंड
नहीं बनता बाधक
विधा के अस्तित्व पर नहीं होता कोई प्रश्नचिन्ह्‌
चिन्ता नहीं होती सृजन के स्वीकार की।

अनपढ़ किसान हो या गरीब मछुआरा
या फिर चमकती दुनिया का दैदीप्य सितारा
रचने लगते हैं कविता।

कविता ही है जो
मलबे पर खिलाती है फूल
बिछुड़ गये बच्चों के चेहरों पर
लौटाती है मुस्कान
बिखर जाती है नई बस्ती की हवाओं मे
सिकते हुए अन्न की खुशबू।

अंत के बाद
अंकुरण की घोषणा करतीं
पुस्तकों में नहीं
जीवन में बसती है कविताएँ।

3
क्विज

प्रतियोगिता में होने के लिये सफल
इतना मालूम होना चाहिए
कि पूरब से निकलकर सूरज डूब जाता है पश्चिम में,
किस देश की धरती पर पडती है पहली किरणें
और कहाँ होता है सबसे बाद में अंधकार।

ठीक-ठीक क्रम देना है आपको
कि कौन किसके बाद आया इस संसार में,
गाँधी, मार्क्स, लेनिन और बुद्ध को खडा करना है
एक के पीछे एक

कतई आग्रह नहीं है यहाँ कि पढा जाए इनके दर्शन को
बडी सुविधा है कि जीवनी की पुस्तकों में
सबसे पहले छपी होतीं हैं जन्म तिथियाँ।

किसने लगाया था निशाना मछली की आँख में
तेल से भरी हुई परात में देखते हुए,
पत्नी को जुए में लगाने वाले किस युवराज को कहा गया था धर्मराज,

जरूरी तो नहीं कि सीखें आप भी धनुर्विद्या
और जीत कर लाएँ कोई पदक खेल महोत्सव से,
कोई ठेका नही ले रखा प्रायोजकों ने
कि सिखाते फिरें सत्य बोलने का सबक,

दौड-दौडकर बनाई जा सकती है भले ही सेहत
लेकिन पलट सकती है जीती हुई बाजी
विस्मृत है यदि
दुनिया के सबसे तेज धावक का नाम
आपकी स्मृति से।
पुस्तकों के महासागर में गोता लगाकर
मोती निकालने की आवश्यकता नहीं है अब,
मालिक हो सकते हैं आप खजाने के
यदि बता सकेँ पुस्तक के लेखक का सही नाम,

रवीन्द्रनाथ नोबेल पुरस्कार से जाने जाते हैं,
प्रेमचंद कथाकार हैं जो हो गए अमर 'गोदान ' लिखकर
'गोदान' के मर्म को समझने का कष्ट नहीं है अब,
पुरस्कार के चेक का वजन काफी अधिक होता है
उपन्यास की आत्मा के वजन से।

घोषित हो सकते हैं विजेता
बगैर लडे कोई युद्ध,
अगर बता सके विश्वयुद्ध के खलनायकों के नाम।

किसने जाना भाप की ताकत को सबसे पहले,
किसने बनाया टेलीफोन,
किसने किया आविष्कार पहिये का
किसने देखा गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त जमीन पर गिरते सेब में
कौन भटकता रहा समुद्र की छाती पर नई दुनिया की खोज में,

किसको मिला सम्मान और कहलाया राष्ट्ररत्न
कौन बना करोडपति अपनी मेहनत से,
कोई जरूरी तो नहीं कि हम भी करें कोशिश
कर दिखाएँ कोई करिश्मा
व्यर्थ की खोज में
यूँहीं गँवा दें यह प्यारा जीवन।

जरा से खर्च में खरीदी जा सकती है कुंजी
जो करवा सकती है दुनिया भर की सैर
तोडकर लाए जा सकते हैं
आसमान के चमकते सितारे
जीतने के लिए जान लें सिर्फ इतना कि
सुनहरी चिडिया के आखेट के लिए
कौन से शिकारी और चिडिमार कब-कब आए,
क्या करेंगे जानकर कि चिडिया के आकाश में
कैसी सुहानी हवा बहा करती थी उन दिनों।

जरूरी नही कि आप भी बहाएँ पसीना
और बनाएँ कोई यादगार,
पुरस्कार पाने के लिये रखें याद केवल इतना
दुनिया के अजूबे की रचना के बाद
किस शहंशाह ने कटवा दिये थे हाथ कुशल कारीगरों के ।

कब किया गया विध्वंस आस्था की इमारतों का ,
किसने गिराई प्रलय की बारूद धरती पर
किस तारीख को जहरीली हो गई
घनी गरीब बस्तियों की हवा,
इतना ही काफी है आपकी याददाश्त के लिए
मत करिए चिन्ता
कि किस घडी में समाप्त होगा
प्रकृति और मानवता से यह खिलवाड ?

छोटी सी पगडंडी जाती है इस चमकदार नए बाजार में,
वस्तुओं की तरह जानकारियों का हो रहा है लेन-देन
ज्ञान का लेबल लगे खाली कनस्तरों के इस व्यापार में
बेच रहें हैं चतुर सौदागर अपना माल
पूरे सलीके के साथ,

एक भीड है बाजार में आँखों पर पट्‌टी बाँधे
जो ठगे जाने के बावजूद बजा रही है तालियाँ
बार-बार लगाताऱ !
बृजेश कानूनगो
503, गोयल रिजेंसी, कनाड़िया रोड़, इन्दौर-18

मो. नं. 09893944294

(चित्र: गूगल सच से साभार)

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

सरलता के बहाने....

पिछले दिनों राजभाषा के नीतिनिर्देशों को लेकर गृह मंत्रालय का एक जो नया 'परिपत्र' प्रकाश में आया है। इस परिपत्र के बिन्दु 5 (IV) व 6 गौर से पढे जाएँ जिनमें हिन्दी के कठिन शब्दों के उपयोग के बज़ाय आंग्ल भाषा के सरल शब्दों के उपयोग का अनुरोध (या आदेश.....?) किया गया है और वाक्य रचना के कुछ उदाहरण भी दिये गये हैं - जैसे जल संरक्षण के बजाय वाटर हार्वेस्टिंग, खुदरा प्रबन्धन के बजाय रिटेल मेनेजमेंट....। और तो और विद्यार्थी या छात्र के बजाय स्टूडेंट लिखा जाए। क्या यह हमारी भाषा के शब्दों को इंगलिश के शब्दों से बदल कर उन शब्दों की हत्या नहीं कर देगा? तत्सम में इस बार इसी सन्दर्भ में प्रसिद्ध साहित्यकार, चित्रकार व चिंतक प्रभु जोशी का एक गंभीर टिप्पणी

- प्रदीप कान्त
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भारत-सरकार के गृह-मंत्रालय की सेवा-निवृत्त होने जा रही एक सचिव सुश्री वीणा उपाध्याय ने जाते-जाते राजभाषा संबंध नीति-निर्देशों के बारे में एक ताजा-परिपत्र जारी किया कि बस अंग्रेजी अखबारों की तो पौ-बारह हो गयी। उनसे उनकी खुशी संभाले नहीं संभल पा रही है। क्योंकि, वे बखूबी जानते हैं कि बाद ऐसे फरमानों के लागू होते ही हिन्दी, अंग्रेजी के पेट में समा जायेगी। दूसरी तरफ हिन्दी के वे समाचार-पत्र, जिन्होंने स्वयं को 'अंग्रेजी-अखबारों के भावी पाठकों की नर्सरी' बनाने का संकल्प ले रखा है, उनकी भी बांछें खिल गयीं और उन्होंने धड़ाधड़ परिपत्र का स्वागत करने वाले सम्पादकीय लिख डाले। वे खुद उदारीकरण के बाद से आमतौर पर और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल करने के बाद से खासतौर पर अंग्रेजी की भूख बढ़ाने का ही काम करते चले आ रहे हैं।
ऐसे में 'अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष' के अघोषित एजेण्डे को लागू करने वाले दलालों के लिए तो इस परिपत्र से 'जश्न-ए-कामयाबी'( Vijay Samoroh) का ठीक ऐसा ही समां बंध गया होगा, जब अमेरिका का भारत से परमाणु-संधि का सौदा सुलट गया था। दरअस्ल, देखने में बहुत सदाशयी-से जान पड़ने वाले इस संक्षिप्त से परिपत्र के निहितार्थ नितान्त दूसरे हैं, जिसके परिणाम लगे-हाथ सरकारी दफ्तरों में दिखने लगेंगे। बहरहाल यह किसी सरकारी कारिन्दे का रोजमर्रा निकलने वाला 'कागद' नहीं, भाषा सम्बन्धी एक बड़े 'गुप्त-एजेण्डे' को पूरा करने का प्रतिज्ञा-पत्र है।
दरअस्ल, चीन की भाषा 'मंदारिन' के बाद दुनिया की 'सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा-हिन्दी' से डरी हुई, अपना 'अखण्ड उपनिवेश बनाने वाली अंग्रेजी' ने, 'जोशुआ फिशमेन' की बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए, 'उदारीकरण' के शुरू किये जाने के बस कुछ ही समय पहले एक 'सिद्धान्तिकी' तैयार की थी, जो ढाई-दशक से 'गुप्त' थी, लेकिन 'इण्टरनेटी-युग' में वह सामने आ गयी। इसका नाम था, 'रि-लिंग्विफिकेशन'

अंग्रेज शुरू से भारतीय भाषाओं को भाषाएँ न मान कर उनके लिए 'वर्नाकुलर' शब्द कहा करते थे। वे अपने बारे में कहा करते थे, 'वी आर अ नेशन विथ लैंग्विज, व्हेयरएज दे आर ट्राइब्स विद डॉयलेक्ट्स।' फिर हिन्दी को तो तब खड़ी 'बोली' ही कहा जा रहा था। लेकिन, दुर्भाग्यवश एक गुजराती-भाषी मोहनदास करमचंद गांधी ने इसे अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई में 'प्रतिरोध' की भाषा बना दिया और नतीजतन, गुलाम भारत के भीतर एक 'जन-इच्छा' पैदा हो गयी कि इसे हम 'राष्ट्रभाषा' बनाएँ और कह सकें 'वी आर अ नेशन विद लैंग्विज'। लेकिन, 'राष्ट्रभाषा' के बजाय वह केवल 'राजभाषा' बनकर रह गयी। यह भी एक काँटा बन गया।
बहरहाल, चौंसठ वर्षों से सालते रहने वाले काँटे को कहीं अब जाकर निकालने का साहस बटोरा जा सका है। यह एक बहुत ही दिलचस्प बात है कि अभी तक, पिछले पचास बरस से हिन्दी में जो शब्द चिर-परिचित बने चले आ रहे थे, पिछले कुछ वर्षों में उभरे 'उदारीकरण' के चलते अचानक 'कठिन' 'अबोधगम्य' और टंग-ट्व्स्टिर हो गये। परिपत्र में पता नहीं हिन्दी की किस पत्रिका के उदाहरण से समझाया गया है, कि 'भोजन' के बजाय 'लंच', 'क्षेत्र' के बजाय 'एरिया', 'छात्र' के बजाय 'स्टूडेण्ट', 'परिसर' के बजाय 'कैम्पस', 'नियमित' की जगह 'रेगुलर', 'आवेदन' के बजाय 'अप्लाई', 'महाविद्यालय' के बजाय 'कॉलेज', 'क्षेत्र' की जगह 'एरिया' आदि-आदि हैं, जो 'बोधगम्य' है ?

हिन्दी के 'सरकारी हितैषियों का मुखौटा' लगाने वाले लोग निश्चय ही पढ़े-लिखे लोग हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि भाषाएँ कैसे मरती हैं और उन्हें कैसे मारा जाता हैं। बीसवीं शताब्दी में अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं का खात्मा करके उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित करने की रणनीति उन्हें भी बेहतर ढंग से पता होगी। उसको कहते हैं, 'थिअरी ऑव ग्रेजुअल एण्ड स्मूथ-लैंग्विज शिफ्ट'। इसके तहत सबसे पहले 'चरण' में शुरू किया जाता है- 'डिस्लोकेशन ऑव वक्युब्लरि'। अर्थात 'स्थानीय-भाषा' के शब्दों को 'वर्चस्ववादी-भाषा' के शब्दों से विस्थापित करना । बहरहाल, परिपत्र में सरलता के बहाने सुझाया गया रास्ता उसी 'स्मूथडिस्लोकेशन ऑफ वक्युब्लरि ऑफ नेटिव लैंग्विजेज' वाली सिध्दान्तिकी का अनुपालन है। क्योंकि, 'विश्व व्यापार संघ के द्वारा बार-बार भारत सरकार को कहा जाता रहा है कि 'रोल ऑफ गव्हर्मेण्ट आर्गेनाइजेशन्स शुड बी इन्क्रीज्ड इन प्रमोशन ऑव इंग्लिश'। इसी के अप्रकट निर्देश के चलते हमारे 'ज्ञान-आयोग' ने गहरे चिन्तन-मनन का नाटक कर के कहा कि 'देश के केवल एक प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी जानते हैं, अतः शेष को अंग्रेजी सिखाने के लिए पहली कक्षा से अंग्रेजी विषय की तरह शुरू कर दी जाये।' यह 'एजुकेशन फॉर ऑल' के नाम पर विश्व-बैंक द्वारा डॉलर में दिये गये ऋण का दबाव है, जो अपने निहितार्थ में 'इंग्लिश फॉर ऑल' का ही एजेण्डा है। अतः 'सर्वशिक्षा-अभियान' एक चमकीला राजनैतिक झूठ है। यह नया पैंतरा है, और जो 'भाषा की राजनीति' जानते हैं, वह बतायेंगे कि यह वही 'लिंग्विसिज्म' है, जिसके तहत भाषा को वर्चस्वी बनाया जाता है। दूसरा झूठ होता है, स्थानीय भाषा को 'फ्रेश-लिविंस्टिक लाइफ' देने के नाम पर उसे भीतर से बदल देना। पूरी बीसवीं शताब्दी में उन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप की तमाम भाषाओं को इसी तरह खत्म किया।
एक और दिलचस्प बात यह कि हम 'राजभाषा के अधिकारियों की भर्त्सना' में बहुत आनन्द लेते हैं, जबकि हकीकतन वह सरकारी केन्द्रीय कार्यालयों का सर्वाधिक लतियाया जाता रहने वाला नौकर होता है। कार्यालय प्रमुख की कुर्सी पर बैठा अधिकारी उसे सिर्फ हिन्दी पखवाड़े के समय पूछता है और जब 'संसदीय राजभाषा समिति' (जो दशकों से खानापूर्ति के लिए) आती-जाती है, के सामने बलि का बकरा बना दिया जाता है। यह परिपत्र भी उन्हीं के सिर पर ठीकरा फोड़ते हुए बता रहा है कि हिन्दी के शब्द कठिन, दुरूह और असंप्रेष्य हैं। जबकि, इतने वर्षों में कभी पारिभषिक-शब्दावलि का मानकीकरण' सरकार से खुद ही नहीं किया गया।
कहने की जरूरत नहीं कि यह इस तथाकथित 'भारत-सरकार' (जबकि, इनके अनुसार तो 'गव्हर्मेण्ट ऑफ इण्डिया' ही सरल शब्द है) का इस आधी-शताब्दी का सबसे बड़ा दोगलापन है, जो देश के एक अरब बीस करोड़ लोगों को वह अंग्रेजी सिखाने का संकल्प लेती है, लेकिन 'साठ साल में मुश्किल से हिन्दी के हजार-डेढ़ हजार शब्द' नहीं सिखा पायी ? यह सरल-सरल का खेल खेलती हुई किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है ?

यह बहुत नग्न-सचाई है कि देश की मौजूदा सरकार ने 'उदारीकरण के उन्माद' में अपने 'कल्याणकारी राज्य' की गरदन कभी की मरोड़ चुकी है और 'कार्पोरेटी-संस्कृति' के सोच' को अपना अभीष्ट मानने वाले सत्ता के कर्णधारों को केवल 'घटती बढ़ती दर' के अलावा कुछ नहीं दिखता। 'भाषा' और 'भूगोल' दोनों ही उनकी चिंता के दायरे से बाहर हैं। निश्चय ही इस अभियान में हमारा समूचा मीडिया भी शामिल है, जिसने देश के सामने 'यूथ-कल्चर' का राष्ट्रव्यापी मिथ खड़ा किया और 'अंग्रेजी और पश्चिम के सांस्कृतिक उद्योग' में ही उन्हें अपना भविष्य बताने में जुट गया। यह मीडिया द्वारा अपनाई गई दृष्टि उसी 'रायल-चार्टर' की नीति का कार्यान्वयन है, जो कहता है, 'दे शुड नॉट रिजेक्ट अवर लैंग्विज एण्ड कल्चर इन फेवर आफ 'देअर' ट्रेडिशनल वेल्यूज। देअर स्ट्रांग एडहरेन्स टू मदर टंग हैज टू बी रप्चर्ड।'

कहना न होगा कि 'लैंग्विजेज शुड बी किल्ड विथ काइण्डनेस' की धूर्त रणनीति का प्रतिफल है, यह परिपत्र। बेशक इसे बकौल राहुल देव के 'हिन्दी के ताबूत में आखिरी कील' समझा जाना चाहिए। बहरहाल, हिन्दी को सरल और बोधगम्य बनाये जाने की सद्-इच्छा का मुखौटा धारण करने वाले इस चालाक नीति-निर्देश की चौतरफा आलोचना की जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि इसे वे अविलम्ब वापस लें। निश्चय ही आप-हम-सब इस लांछन के साथ इस संसार से बिदा नहीं होना चाहेंगे कि 'प्रतिरोध' की सर्वाधिक चिंतनशील भाषा का, एक सांस्कृतिक रूप से अपढ़ सत्ता का कोई कारिन्दा हमारे सामने गला घोंटे और हम चुप बने रहे। यह घोषित रूप से जघन्य सांस्कृतिक अपराध है और हिन्दी के हत्यारों की फेहरिस्त में हमारा भी नाम रहेगा।
यह सरकार का हिन्दी को 'आमजन' की भाषा बनाने का पवित्र इरादा नहीं है, बल्कि खास लोगों की भाषा के जबड़े में उसकी गरदन फंसा देने की सुचिंतित युक्ति है। यह शल्यक्रिया के बहाने हत्या की हिकमत है। यह बिना लाठी टूटे साँप की तरह समझी जाने वाली भाषा को मारने की तरकीब है, क्योंकि यह अंग्रेजी के वर्चस्ववाद को डंसती है।
क्या कभी कोई कहता है कि अंगेजी का फलाँ शब्द कठिन है ? 'परिचय-पत्र' के बजाय 'आइडियेण्टिटी कार्ड' कठिन शब्द है ? ऐसा कहते हुए वह डरता है। इस सोच से तो 'राष्ट्र' शब्द कठिन है और अंततः तो उनके लिये पूरी हिन्दी ही कठिन हैं । बस अन्त में यही कहना है कि अङ्ग्रेज़ी की दाढ़ में भारतीय-भाषाओं का खून लग चुका है। उसके मुँहह से खून की बू आ रही है और इस 'भाषाखोर' के सामने हमारी भाषाओं के गले में इसी तरह फंदा डाल कर धक्का दिया जा रहा है। यही वह समय है कि हम संभलें और हिंसा की इस कार्रवाई का पुरजोर विरोध करें।

- प्रभु जोशी
303, गुलमोहर निकेतन, वसंत-विहार, (शांति निकेतन के पास)
इन्दौर-10

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ के गीत

न्म:: ०९ सितम्बर १९७०

शिक्षा: बी कॉम

सम्पर्क: S-49, सचिन स्वीट्स के पीछे, दीनदयाल नगर फेज़-I,

काँठ रोड, मुरादाबाद-244001 (उ०प्र०)

ई-मेल: vyom70@yahoo.in
मोबाइल: 94128 05981,

94570 38652, 93597 11291

योगेन्द्र वर्मा व्योमनवगीत के एक युवा ह्स्ताक्षर हैं। इनके नवगीतों में माँ, बच्चा, बहू, मुनिया सभी आसानी से चले आते हैं। इन नवगीतों में भले आपको शिल्प का कुछ खास नयापन न दिखे किंतु इनकी सरल भाषा ही इनकी खासियत है जिसके कारण ये पाठक को कहीं गहरे तक कचोटने की क्षमता रखते हैं। माँ की उपेक्षा के लिये धूल चढ़ी सरकारी फाइल जैसी है अब माँ जैसा प्रयोग या उपेक्षित होते रिश्तों के लिये मुनिया ने पीहर में आना-जाना छोड़ दिया जैसा वाक्यांश कवि की इस क्षमता का सीधा सा उदाहरण है। अब तक योगेन्द्र का एक काव्य संग्रह इस कोलाहल में प्रकाशित हो चुका है। तत्सम में इस बार योगेन्द्र के कुछ गीत...

1

कैसी है अब माँ


किसको चिन्ता किस हालत में
कैसी है अब माँ


सूनी आँखों में पलती हैं

धुंधली आशाएँ

हावी होती गईं फ़र्ज़ पर

नित्य व्यस्तताएँ


जैसे खालीपन काग़ज़ का
वैसी है अब माँ


नाप-नापकर अंगुल-अंगुल

जिनको बड़ा किया

डूब गए वे सुविधाओं में

सब कुछ छोड़ दिया


ओढ़े-पहने बस सन्नाटा
ऐसी है अब माँ


फ़र्ज़ निभाती रही उम्र-भर

बस पीड़ा भोगी

हाथ-पैर जब शिथिल हुए तो

हुई अनुपयोगी


धूल चढ़ी सरकारी फाइल
जैसी है अब माँ


2

छोटा बच्चा पूछ रहा है कल के बारे में


छोटा बच्चा पूछ रहा है

कल के बारे में


साज़िश रचकर भाग्य समय ने
कुछ ऐसे बाँटा
कृष्ण-पक्ष है, आँधी भी है
पथ पर सन्नाटा


कौन किसे अब राह दिखाए

इस अँधियारे में


अन्र्तर्ध्यान हुए थाली से
रोटी दाल सभी
कहीं खो गए हैं जीवन के
सुर-लय-ताल सभी


लगता ढूँढ रहे आशाएँ

ज्यों इकतारे में


नई उमंगें नये सृजन भी
कुछ तो बोलेंगे
शनै-शनै आशंकाओं की
पर्तें खोलेंगे


एक नई दुनिया है शायद
मिट्टी गारे में


3

मुनिया ने पीहर में आना-जाना छोड़ दिया


मुनिया ने पीहर में आना-
जाना छोड़ दिया


ना पहले जैसा अपनापन

ना ही प्यार दिखा

फ़र्ज़ कहीं ना दिखा; दिखा तो

बस अधिकार दिखा


चिट्ठी ने भी माँ का हाल
बताना छोड़ दिया


वृद्ध पिता का बरगद-सा जब

साया नहीं रहा

मिट्ठू ने भी राम-राम तक

मन से नहीं कहा


ममता ने भी भावों को
दुलराना छोड़ दिया


बीते कल को सोच-सोचकर

नयन हुए गीले

कच्चे धागे के बंधन भी

पड़े आज ढीले


चावल ने रोली का साथ
निभाना छोड़ दिया


4

धीरे-धीरे सूख रही है तुलसी आँगन में


सामग्री वाला पन्ना देखें [c]">पन्ना

धीरे-धीरे सूख रही है
तुलसी आँगन में


पछुवा चली शहर से, पहुँची

गाँवों में घर-घर

एक अजब सन्नाटा पसरा

फिर चौपालों पर


मिट्टी से जुड़कर बतियाना
रहा न जन-जन में


स्वांग, रासलीला, नौटंकी,

नट के वो करतब

एक-एक कर हुए गाँव से

आज सभी गायब


कहाँ जा रहे हैं हम, ननुआ
सोच रहा मन में


नये आधुनिक परिवर्तन ने

ऐसा भ्रमित किया

जीन्स टॉप में नई बहू ने

सबको चकित किया


छुटकी भी घूमा करती नित
नूतन फ़ैशन में


5

नई बहू घर में आई है बन्दनवार लगे


नई बहू घर में आई है
बन्दनवार लगे


चीज़ों से जुड़ना बतियाना

पीछे छूट गया

पहली बारिश की बूँदों-सा

सब कुछ नया-नया


कुछ महका-सा कुछ बहका-सा
यह संसार लगे


संकेतों की भाषा नूतन

अर्थ गढ़े पल-पल

मूक-बधिर अँखियाँ भी करतीं

कभी-कभी बेकल


गंध नहाई हवा सुबह की
भी अंगार लगे


परीलोक की किसी कथा-सा

आने वाला कल

ऊबड़-खाबड़ धरा कहीं पर

और कहीं समतल


कोमल मन में आशंकाओं
के अंबार लगे