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गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

एक नवगीत

ख़्वाब वक्त ने जिनके कुतरे 

हमसे पूछो
तत्सम पर इस बार भी अपना ही एक नवगीत...,

प्रदीप कान्त 
कैसे उबरे 

ख़्वाब वक़्त ने
जिनके कुतरे

बन्द खिड़कियाँ
भीतें बदरंग
चुप्पी में हो जैसे जंग
चित्र: प्रदीप कान्त

बेचेहरा - वीरान गली है
आप इधर से
कैसे गुज़रे

रखे हुए
बाज़ारों में
बिकते हमी उधारों में

हुई नुमाइश या फरमाइश
उनकी मर्ज़ी
अपने मुजरे 

- प्रदीप कान्त 

आभार: वेब मेग्ज़ीन अनुभूति  (http://www.anubhuti hindi.org) 

रविवार, 8 मार्च 2015

एक नवगीत

बहुत दिन हुए, अपनी कोई रचना को अपने ही ब्लॉग पर स्थान दिये। तो इस बार तत्सम पर अपना ही एक नवगीत...,


प्रदीप कांत 
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उठो जमूरे

उठो जमूरे कर लें पूरे
खेल अधूरे

राजा का दरबार लगाएँ
निर्दोषों का दोष बताएँ
अन्यायी को
न्याय दिलाएँ
पूरे पूरे

भले जले ना उनके चूल्हे
भूखों से चालान वसूलें
मस्त रहें फिर
गुगल चित्र से साभार 
खाकर सोयें
भाँग धतूरे

लोग बिजूके आज सड़क पर
कौन लड़ेगा इनके हक पर
दर्शक बहरे
हम क्यों अपना
राग बिसूरें

आभार: वेब मेग्ज़ीन अनुभूति  (http://www.anubhuti hindi.org) 

रविवार, 30 मार्च 2014

रेत में अब तो गड़े हुए हैं लोग


कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी/यूँ कोई बेवफा नहीं होता कि तर्ज पर मान लीजिये कि मैं भी किसी कारण से बहुत दिनो से कोई पोस्ट नहीं डाल पाया। इस बार जनवरी 2010 की पाखी में छपा अपना ही एक नवगीत डाल रहा हूँ। अब ये नवगीत आपके हवाले .................

- प्रदीप कांत
किसी फ्रेम में जड़े हुऐ हैं लोग
कब से यूँ ही खड़े हुऐ हैं लोग
 

              कहीं पेड़ पर टंगा हुआ बेताल
               कथा बाँचता करता कई सवाल
सुनते गुनते बड़े हुऐ हैं लोग

 
             कड़ी धूप में ठूँठ हुऐ पीपल
              आऐ भी तो टुकड़ों में बादल
 रेत में अब तो गड़े हुए हैं लोग 
- प्रदीप कांत

शनिवार, 3 अगस्त 2013

कुछ ग़ज़लें


कहते हैं मार्केटिंग का ज़माना है। और जब प्रमोटर न मिले तो अपनी मार्केटिंग ख़ुद ही कर लें। सच मत समझ लीजियेगा... क्योंकि मार्केटिंग वार्केटिंग हमें आती नहीं... इसलिये बिना किसी भूमिका के तत्सम पर इस बार अपनी ही कुछ ग़ज़लें....

-         प्रदीप कांत

1
भले राह में बदली थी जी
वही  चाँदनी  उजली थी जी

वहीं टोंकते तो अच्छा था
बात  जहाँ  से  बदली थी जी

थोड़ा डर तो लगता ही है
बिटिया घर से निकली थी जी

स्वांग ज़रा सा कमतर निकला
हँसी ज़रा सी नकली थी जी

वहीं मगर भी मिला टहलता
जहाँ नदी में मछली थी  जी

2
 दरिया मैं, ग़र सागर तू
मेंरे ही जल से भर तू
छाया- प्रदीप कांत 
ले डूबेगा वज़्न तुझे
शांत झील मैं, पत्थर तू

भली लगेगी छाँव सदा
बैठेगा ग़र थक कर तू

सीधा सा मैं प्रश्न अगर
क्यूँ उलझा सा उत्तर तू

अपने बारे क्या बोलूं?
खुश होगा बस मिलकर तू

(त्रिसुगंधि – गीत-गज़ल-कविता -
बोधि प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक)

3
 हाथ हमारे जितने आऐ
घर के टूटे हिस्से आऐ

बच्चों को खुश करना था
याद न लेकिन किस्से आऐ

और खुशी क्या थी माँ की
बच्चे घर पर हँसते आऐ

सुन्दर हैं कालीन तो क्या
पैरों में ही बिछते आऐ

(हरिगंधा – नव-छन्द विशेषांक, अप्रेल-मई 2013)

4
 जाने कितनी बार हुआ है
सदा पीठ पर वार हुआ है

पढ़ा  हमारा चेहरा उसने
ज्यूँ कोई अख़बार हुआ है

साज़िश में शामिल था वो ही
जिसका ये आभार हुआ है

डरते क्या हो, छूकर देखो
लोहा कितना धार हुआ है

(सम्बोधन – जुलाई-सितम्बर 2013)