शनिवार, 3 अप्रैल 2010

खत्म नहीं होती बात - बोधिसत्व की कविताएँ


बोधिसत्व

जन्मः 11 दिसंबर, 1968 को उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के ग्राम भिखारी रामपुर में।


शिक्षाः प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की ही पाठशाला से। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम।ए. और वहीं से तारसप्तक के कवियों के काव्य-सिद्घान्त पर पीएच.डी. की उपाधि ली। यूजीसी के रिसर्च फैलो रहे।


प्रकाशन : पहले से प्रकाशित तीन कविता संग्रह सिर्फ कवि नहीं (1991), हम जो नदियों का संगम हैं (2000) और दुख तंत्र (2004)। लम्बी कहानी वृषोत्सर्ग (2005) तथा कुछ और लम्बी कहानियाँ । अपने गाँव का एक इतिहास लिखा है।


सम्मानः कविता के लिए भारतभूषण अग्रवाल सम्मान, गिरिजाकुमार माथुर सम्मान, संस्कृति अवार्ड तथा हेमन्त स्मृति सम्मान।


अन्यः कुछ कविताएँ देशीविदेशी भाषाओं में अनूदित हैं। दो कविताएँ मास्को विश्वविद्यालय के एम।ए. के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती हैं। दो कविताएँ गोवा विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम में शामिल थीं।


फिलहालः पिछले 8 साल से मुम्बई में सिनेमा और टेलीविजन के लिए लिखाई का काम।


सम्पर्कः श्रीगणेश को.हा.सो, स्वातंत्रय वीर सावरकर मार्ग, सेक्टर नं.3, प्लॉट नं. 233, फ्लैट नं. 3, चारकोप, कांदीवली (पश्चिम) मुम्बई - 400067


मो. : 098202 12573

ई- मेल: abodham@gmail.com


समकालीन हिन्दी कविता में युवा कवि बोधिसत्व एक चिर परिचित महत्वपूर्ण नाम है। हाल ही में राजकमल प्रकाशन से बोधिसत्व की कविताओं का चौथा संकलन ख़त्म नहीं होती बात प्रकाशित हुआ है। संकलन के शीर्षक ख़त्म नहीं होती बात की तरह ही बोधिसत्व की कविताओं की विविधता ख़त्म ही नहीं होती। कहीं आम आदमी के जीवन की कुछ त्रासदियाँ तो कहीं रिश्तों की स्मृतियाँ, कहीं गाँव तो कहीं नदी के घाट, कहीं प्रेम तो कहीं उहापोह में डूबा मन, बोधिसत्व की कविता में सभी सहजता से चले आते हैं। दीदी, पिता, नानी आदि सभी रिश्तों पर बोधिसत्व के यहाँ बेहतरीन कविताएँ होती हैं। इन कविताओं में गहन संवेदनाओं की अनुभूति एक कवि की ज़िम्मेदार दृष्टि को बखूबी बताती है। बोधिसत्व के यहाँ ऐसे विषयों पर भी बड़ी सहजता से कविता होती है जिन पर आसानी से कलम नहीं चलती, जैसे कोहली स्टूडियो, हैंडिल पर नाम, ग्राम वधू, लाल भात आदि। कुल मिलाकर ख़त्म नहीं होती बात एक ऐसी पुस्तक है जो अपने भाव-सातत्य और वैचारिक नैरंतर्य के लिए महत्त्वपूर्ण है। तत्सम में इस बार बोधिसत्व के इसी संकलन से कुछ कविताएँ.....।

प्रदीप कान्त


1

छोटा आदमी


छोटी-छोटी बातों पर

नाराज़ हो जाता हूँ,

भूल नहीं पाता हूँ, कोई उधार,

जोड़ता रहता हूँ

पाई-पाई का हिसाब

छोटा आदमी हूँ

बड़ी बातें कैसे करुँ?


माफ़ी माँगने पर भी

माफ़ नहीं कर पाता हूँ

छोटे-छोटे दुखों से

उबर नहीं पाता हूँ।

पाव भर दूध बिगड़ने पर

कई दिन फटा रहता है मन,

क़मीज़ पर नन्ही खरोंच

देह के घाव से ज़्यादा

देती है दुख।


एक ख़राब मूली

बिगाड़ देती है खाने का स्वाद

एक चिट्ठी का ज़वाब नहीं

देने को

याद रखता हूँ उम्र भर


छोटा आदमी

और कर ही क्या सकता हूँ

सिवाय छोटी-छोटी बातों को

याद रखने के।


सौ ग्राम हल्दी, पचास ग्राम जीरा, छींट

जाने से

तबाह नहीं होती ज़िन्दगी,

पर क्या करुँ

छोटे-छोटे नुक़सानों को गाता रहता हूँ,

हर अपने बेगाने को

सुनाता रहता हूँ

अपने छोटे-छोटे दुख।


आदमी हूँ क्षुद्र

इंकार नहीं करता,

एक छोटा-सा ताना,

एक मामूली बात,

एक छोटी-सी गाली

एक जरासी घात

काफ़ी है मुझे मिटाने के लिए

मैं बहुत कम तेल वाला दीया हूँ

हलकी हवा में

बहुत है मुझे बुझाने के लिए।


छोटा हूँ, पर रहने दो

छोटी-छोटी बातें

कहता हूँ कहने दो।


2

बताना कभी


पौधों ने कब पूछा

पानी नल का है या

बादल का है।


चींटियों ने कब पूछा

किस खेत के गन्ने का है गुड़

चीनी किस देश के मिल से बनी है

चॉकलेट किस कम्पनी की है।


रुई ने कब पूछा

धागा बनाओगे,

दीए में जलाओगे या

घाव पर धरोगे।


आग ने कब पूछा

उसमें क्या जलाओगे

क्या गलाओगे।


ये कुछ ऐसे सवाल हैं

जो उठे हैं अभी

इसका कोई उत्तर हो.

तो बताना कभी।


3

कोहली स्टूडियो


भाई बहुत सुन्दर नहीं था

पर चाहता था दिखना सुन्दर

शादी के लिए भेजनी थी फोटो

उसे सुन्दर बनाया

कोहली स्टूडियो ने

ब्लैक एंड ह्नाइट फोटो से।


कुछ दिनों बाद

भाई के लिए आई एक

सुन्दर फोटो देखने के लिए,

जिसे सबने सराहा देर तक।


शादी तय हुई भाई की

उसी फोटो वाली सुन्दर लड़की से।


भाई की असुन्दरता पकड़ी गई

फेरे पड़ने के बाद,

भाभी भी बस थी ठीक-ठाक

नाक की जगह ही थी नाक।


कोहबर में दोनों ने एक-दूसरे को फोटो से

कम सुन्दर पाया

दोनों को बहुत सुन्दर दिखना था

दोनों ने कोहली स्टूडियो से

फोटो खिंचवाया

दोनों को कोहली स्टूडियो ने

सुन्दर दिखाया

ब्लैक एंड ह्नाइट फोटो से।


आज सब कुछ रंगीन है

फिर भी भाभी के कमरे में

टँगी है वही शादी के बाद

कोहली स्टूडियो से खिंचवाई

ब्लैक एंड ह्नाइट फोटो।


कोहली ने न जाने कितनों को

सुन्दर बनाया है

न जाने कितनों को बसाया है

अपने ब्लैक एंड ह्नाइट फोटो से।


4

हम दोनों


हम दोनों,

रात-रात-भर, जाग-जागकर

खेत सींचते थे

मैं और पिता।


वे मुझे सींचना सिखाते थे...

सिखाते थे वह सब कुछ

जो उन्हें आता था।


सब कुछ सीखकर मैं निकल भागा

और पिता भी...नहीं रहे,


रोना चलता रहा दिनों तक

हम भी रोए -

तब से परती हैं खेत, अब

कौन जोते बोए।


5

शान्ता


दशरथ की एक बेटी थी शान्ता

लोग बताते हैं

जब वह पैदा हुई

अयोध्या में अकाल पड़ा

बारह वर्षों तक...

धरती धूल हो गई...।


चिन्तित राजा को सलाह दी गई कि

उनकी पुत्री शान्ता ही अकाल का

कारण है।


राजा दशरथ ने अकाल दूर करने के

लिए शृंग ऋषि को पुत्री दान दे दी...।


उसके बाद शान्ता

कभी नहीं आई अयोध्या...

लोग बताते हैं

दशरथ उसे बुलाने से डरते थे...।


बहुत दिनों तक सूना रहा अवध का आँगन

फिर उसी शान्ता के पति

शृंग ऋषि ने

दशरथ का पुत्रोष्टि यज्ञ कराया...

दशरथ चार पुत्रों के पिता बन गए...


सन्तति का अकाल मिट गया...।

शान्ता राह देखती रही

अपने भाइयों की...

पर कोई नहीं गया उसे आनने

हाल जानने कभी।


मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं,

शायद वे भी रामराज्य में अकाल

पड़ने से डरते थे। जबकि वन जाते समय

राम, शान्ता के आश्रम से होकर गुज़रे थे...। पर मिलने नहीं गए।


शान्ता जब तक रही

राह देखती रही भाइयों की

आएँगे राम-लखन

आएँगे भरत-शत्रुघ्न।


बिना बुलाए आने को

राजी नहीं थी शान्ता...

सती की कथा सुन चुकी थी बचपन में,

दशरथ से...।


गुरुवार, 11 मार्च 2010

नवगीत से फिल्मी गानों को चुनौती मिलेगी

डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र
डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र हिन्दी और मैथिली के नवगीतकार व कवि हैं। 'जाल फेंक रे मछेरे' 'नोहर के नाहर' (जीवनी) 'जाड़े में पहाड ' और 'शिखरिणी' उनके अब तक प्रकाशित महत्वपूर्ण नवगीत संग्रह हैं। 'आज' के सम्पादक साहित्य पद (१९७१ से ८०) को सुशोभित करने के बाद विभिन्न सरकारी उपक्रमों में राजभाषा के पद पर आसीन रहे। वर्तमान में वे मुख्य राजभाषा प्रबंधक तेल और प्राकृतिक गैस आयोग देहरादून के पद से सेवा-निवृत्त हो चुके हैं। डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र से नवगीत के विविध संदर्भों पर बातचीत की है जयकृष्ण राय तुषार ने| पूरा पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक से जयकृष्ण राय तुषार के ब्लॉग पर जाएँ|

नवगीत से फिल्मी गानों को चुनौती मिलेगी

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

होली की शुभकामनाओं के साथ जयकृष्ण राय तुषार की गज़ल


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जयकृष्ण राय तुषार ग्राम-पसिका, जिला आज़मगढ़, (उत्तर प्रदेश) में जन्म।
नवगीत, हिन्दी गजल, लेख, साक्षात्कार आदि का लेखन।
दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, आज, अमर उजाला नया ज्ञानोदय, आजकल, आधारशिला, अक्षर पर्व, जनसत्ता वार्षिकांक, गजल के बहाने आदि अनेक पत्र पत्रिकाओं में लेख, कविताएं, गजल आदि प्रकाशित। आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं अन्य प्राइवेट चैनलों से कविताओं का प्रसारण।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में राज्य विधि अधिकारी।
सम्पर्क: जयकृष्ण राय तुषार
63 जी/7, बेली कॉलोनी
स्टैनली रोड, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
मोबाइल:09415898913
भाई लोगों..., होली फिर से आ गई है। हमारी परम्परा में लगभग हर त्यौंहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। होली के साथ भी इसी तरह की कथा है। खैर..., हमारे यहाँ इन कथाओं के नाना प्रकार के ज्ञाता, महाज्ञाता बैठे हुए हैं और भूल ना जाए..., जनता उनसे समय समय पर इस बारे में सुनती रहती है। इसलिये इन कथाओं को बार बार बाँचने और सुनाने से कोई मतलब नहीं है। किंतु सुरसा के मुख की तरह बढती महँगाई के इस दौर में होली कैसी मनाई जाए? और अभी तो कोई हनुमान जी भी उपलब्ध नहीं हो रहे हैं जो अपनी चतुराई से महँगाई रूपी सुरसा को बस में कर ले। फिर भी..., लाख दौर बुरा हो, अच्छे की उम्मीद बनी रहती है। इसलिये होली की शुभकामनाओं के साथ तत्सम में इस बार – हालात का तीखा बयान करती जयकृष्ण राय तुषार की एक गज़ल...
- प्रदीप कांत
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यह वर्ष बेमिसाल है होली मनाइये
हर शख्स फटेहाल है होली मनाइये
मनमोहनी हॅंसी ने रुला करके रख दिया
सौ रुपये में दाल है होली मनाइये
कुर्सी महल पवार के हिस्से में दोस्तों
अपने लिए पुआल है होली मनाइये
घर में नहीं है चीनी तो गुझिया न खाइये
अफसर के घर में माल है होली मनाइये


रंगों में घोटाला है मिलावट अबीर में
मौसम भी ये दलाल है होली मनाइये
हाथों में ले अबीर अमर सिंह न बैठिए
घर में भले बवाल है होली मनाइये
राहुल भी ठाकरे से हैं होली के मूड में
सादा बस एक गाल है होली मनाइये
जनता का जिस्म पड़ गया नीला तो क्या हुआ
सत्ता का चेहरा लाल है होली मनाइये
पाले में नंगा जिस्म ले मरता रहे किसान
मस्ती में लेखपाल है होली मनाइये
पी करके भंग सो रही संसद विधायिका
अपना किसे खयाल है होली मनाइये
बहुमत में बहिन जी हैं विरोधी शिकस्त में
हाथी का सब कमाल है होली मनाइये
कैसा है इन्कलाब कोई शोर तक नहीं
बुझती हुई मशाल है होली मनाइये
-जयकृष्ण राय तुषार
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छाया - प्रदीप कान्त

यह मेरे दोस्त अरुण शर्मा की बिटिया चुनमुन (विभा) का फोटो है जो मैंने होली के अवसर पर अपने ही घर पर लिया था|

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

यश मालवीय के गीत


यश मालवीय

जन्म: 18 जुलाई 1962 कानपुर, उत्तर प्रदेश

कुछ प्रमुख कृतियाँ: कहो सदाशिव, उड़ान से पहले, एक चिडिया अलगनी पर एक मन में, राग-बोध के 2 भाग

संपर्क: रामेश्वरम, ए - 111, मेंह्दौरी कालोनी, इलाहाबाद -211 004, उ प्र

मो: 098397 92402


साठोत्तरी गीतकारों में जिन गीतकारों ने अपनी पहचान बनाई है उनमे यश मालवीय का नाम महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के निराला सम्मान, मुम्बई के मोदी कला भारती और ऋतुराज सम्मान से सम्मानित यश जी के गीतों में आज की कविता का कथ्य देखा जा सकता है। आम आदमी की समस्याओं और समाज की विसंगतियों का चित्रण करते यश जी के गीत पाठक को गहरे तक कचोटते चले जाते हैं। यश जी के गीत अपनी एक अलग और सहज भाषा गढते हैं – एक ऎसी भाषा, जो राजा की नहीं, परजा की है। उनके गीतों में आम आदमी अपने को तलाशने लगता है और किसी भी रचना की यही सबसे बडी सफलता भी है। तत्सम में इस बार यश मालवीय के कुछ गीत...

- प्रदीप कांत


1

चला गया वो साल...


एक याद सिरहाने रखकर
एक याद पैताने रखकर
चला गया वो साल, साल वो चला गया
ख़ाली से पैमाने रखकर
भरे-भरे अपफ़साने रखकर
चला गया वो साल, साल वो चला गया


लम्बी छोटी हिचकी रखकर
थोड़े आँसू सिसकी रखकर
टूटे सपनों के बारे में
बातें इसकी उसकी रखकर


चिड़ियों वाले दाने रखकर
गुड़ घी ताल मखाने रखकर
चला गया वो साल, साल वो चला गया


उजियारे, कुछ स्याही रखकर
कल की नयी गवाही रखकर
लाल गुलाबी हरे बैगनी
रंग कत्थई काही रखकर


भूले बिसरे गाने रखकर
गानों में कुछ माने रखकर
चला गया वो साल, साल वो चला गया


नीली आँखों, चिठ्ठी रखकर
इमली कुछ खटमिठ्ठी रखकर
मुँह में शुभ संकेतों वाली
बस थोड़ी सी मिट्टी रखकर


सच के सोलह आने रखकर
बच्चों के दस्ताने रखकर
चला गया वो साल, साल वो चला गया


2

लोग कि अपने सिमटेपन में बिखरे-बिखरे हैं,

राजमार्ग भी, पगडंडी से ज्यादा संकरे हैं ।


हर उपसर्ग हाथ मलता है प्रत्यय झूठे हैं,

पता नहीं हैं, औषधियों को दर्द अनूठे हैं,

आँखें मलते हुए सबेरे केवल अखरे हैं ।


पेड़ धुएं का लहराता है अँधियारों जैसा,

है भविष्य भी बीते दिन के गलियारों जैसा

आँखों निचुड़ रहे से उजियारों के कतरे हैं ।


उन्हें उठाते जो जग से उठ जाया करते हैं,

देख मज़ारों को हम शीश झुकाया करते हैं,

सही बात कहने के सुख के अपने ख़तरे हैं ।


3

सिंहासन के आगे-पीछे
जी भर डोलेगी
जब जैसा राजा बोलेगा
परजा बोलेगी

राजा अगर हँसेगा
तो परजा भी हँस देगी
समझ न पाएगी अपनी
गर्दन ही कस लेगी
जागी-सी आँखों देखेगी सपना,
सो लेगी

ख़ून चूसते जो
उन पर ही वारी जाएगी
हर उड़ान, उड़ने से पहले
मारी जाएगी
उम्मीदों के नुचे हुए से
पर ही तोलेगी

अंधियारों के ज़ख़्म
रोशनी के प्यासे होंगे
हर बिसात पर
उल्टे-सीधे से पाँसे होंगे
सिसक-सिसककर हवा चलेगी
आँख भिगो लेगी

तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो
गाती जाएगी
आँगन होगा, आँगन से
सँझवाती जाएगी
दुनिया अपनी साँस गिनेगी
नब्ज टटोलेगी

राजभवन के आगे भी
कुछ भिखमंगे होंगे
तीन रंग वाले किस्से भी
सतरंगे होंगे
धूप जल रही सी पेशानी
फिर-फिर धो लेगी


4

भीड़ से भागे हुओं ने
भीड़ कर दी
एक दुनिया कई हिस्सों में


कुतर ली

सिर्फ़ ऎसी और

तैसी में रहे


रहे होकर


ज़िन्दगी भर असलहे


जब हुई ज़रूरत,


आँख भर ली

रोशनी की आँख में

भरकर अंधेरा

आइनों में स्वयं को

घूरा तरेरा


वक़्त ने हर होंठ पर


आलपिन धर दी

उम्र बीती बात करना

नहीं आया

था कहीं का गीत,

जाकर कहीं गया


दूसरों ने ख़बर ली,


अपनी ख़बर दी