शनिवार, 28 मार्च 2015

हमारे समय को लगातार परखती हुई शहंशाह आलम की कविताएँ


शहंशाह आलम हमारे समय के एक महत्वपूर्ण कवि हैं जिनके कविताई में हमारा समकाल धड़कता है। तत्सम पर इस बार शहंशाह आलम की कुछ कविताएँ, युवा कवि प्रदीप मिश्र की टिप्पणी के साथ....
प्रदीप कांत  
शहंशाह आलम हमारे समय पर लगातार रचनात्मक दस्तक देते हुए, ऐसे कवि हैं, जिनके सामने हिन्दी कविता ने कई करवट बदले हैं। कई दशकों से हम शहंशाह आलम को पढ़ रहे हैं और उनकी कविताओं से अपने समय के धुंध को समझने में मदद ले रहे हैं। उनकी कविताओं एक बेचैनी है, जो मनुष्य को कद्दावर और समर्थ देखना चाहती है। वे कवि के सरोकारों और जिम्मेदारियों को बखूब समझते हैं और कहते हैं - कवि झूठ नहीं बोलता अँगूठा कविता की इस पंक्ति को पर्व में प्रेम है। प्रेम की विश्वसनीयता में यह स्थापना कि कवि झूठ नहीं बोलता है, पाठक के अंदर कविता एक मजबूती का संचार करती है। अगली कविता अन्न में हमारे समय की राजनीतिक चेतना को खंगालते हुए कवि कहता है - हम तो गवाह भर हैं स्वयं के लूटे जाने के क्या यह हमारे समय का कठोर सच नहीं है, सचमुच हम सब गवाह भर हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोक की सहभागिता को समेटकर गवाह में बदल दिया गया है। शहँशाह आलम की कविताओं में प्रेम बहुत सारे रंगों में बिखरता है, उसकी सारी छवियों को वे दर्ज करते हैं। अपना सबकुछ प्रेम में ही तलाशते हैं जैसे - हम मिलते ऐसे जैसे /कुम्हार से चाक/बढ़ई से रंदा  या फिर - प्रेम के शंख को /अंधे कुएँ में फेंक आने से । अंत मैं उनकी एक पंक्ति जिसे चंद्रकांत देवताले के मुँह से बार-बार सुना हूँ कि - मैं जो एक कवि हूं वनवासी काश कवि के इस स्वप्न की तरह, हम सब वनवासी रहते, प्रकृति के गोद में रमते-जमते खालिस मनुष्य की तरह बचे हुए।
                        
प्रदीप मिश्र
094253 14126
जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार।

शिक्षा : एम. . (हिन्दी)
प्रकाशन : गर दादी की कोई ख़बर आए, अभी शेष है पृथ्वी-राग, अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरसवितान चार कविता-संग्रह प्रकाशितचर्चित। 'गर दादी की कोई ख़बर आए' कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। 'इस समय की पटकथा' कविता-संग्रह शीघ्र प्रकाश्य। 'बारिश मेरी खिड़की है' बारिश विषयक कविताओं का चयन-संपादन शीघ्र प्रकाश्य। 'स्वर-एकादश' कविता-संकलन में कविताएं संकलित। 'वितान' (कविता-संग्रह) पर पंजाब विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य।
हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। बातचीत, लेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित।

पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार के अलावे दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।

संप्रति, बिहार विधान परिषद के प्रकाशन विभाग में सहायक हिन्दी प्रकाशन।
संपर्क : नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारी शरीफ़, पटना-801505, बिहार।
मोबाइल :  09835417537

1
अँगूठा

उसने अँगूठा दिखाया नज़ाकत से अत्यंत
घर की खिड़की में खड़े होकर

इस बारिश में उसका अँगूठा दिखाना
बहुत मायने रखता है मेरे लिए

उसने अँगूठा प्रेम को दिखाया था मेरे
या मेरी कठिनाइयों को चिढ़ाया था प्रखर
यह अबूझ है पूरी तरह बुरी तरह

धीमी आवाज़ में तितलियाँ भी बोलती हैं कुछ
उसके प्रेम के इस अंदाज़ पर
उसके प्रेम की इस मातृभाषा पर

उसका प्रेम शंख की तरह गूँजता है
जैसे सच गूँजता है एकाग्र
चाक पर आकार ले-लेकर

मैं ठेठ देहाती कहाँ-कहाँ भटकूँ
प्रेम के इस अरण्य में
किस कछुए की पीठ पर सवार होऊँ
किस अन्तरिक्ष किस आकाश में जीऊँ
किस उपग्रह की किस ऊपरी कक्षा में बैठूँ

जबकि प्रेम का बाघ दौड़ता है देह के पूरे जल में
पूरी तरह डूबता सारे पट खोलता
निष्फल को फल में बदलता

लो, प्रेम के बाघ को मैंने भी साधा
लो, मेरा सब कुछ तेरा ही हुआ
इसलिए कि कवि झूठ नहीं बोलता।
2
अन्न

रचे जाने की प्रक्रिया में जहाँ जल है
वहीं अन्न है रचा जा रहा इस संचयन में

मुझे मालूम नहीं इस रचे जाने की आवाज़
चित्र: प्रदीप कान्त 
किस-किस तक पहुँच रही है बिना आहट

इसलिए कि बेआवाज़ जो कुछ भी रचा जा रहा है
सत्ता के गलियारे में मेरे-तुम्हारे लिए
वह कम-अज़-कम अन्न तो नहीं ही है जल है

अभी तो अनंत-अनंत युगों तक
हमारे हिस्से के अन्न की उन्हें ही दरकार है
जो मेरी-तेरी सरकार है

हम तो गवाह भर हैं स्वयं के लूटे जाने के
स्वयं के पीटे जाने के
स्वयं के घसीटे जाने के

स्वयं के गूँगे बना दिए जाने के साक्षी भी हमीं हैं

यही वजह है मैं और तुम अन्न-अन्न बोलना चाहते हैं
जबकि उनका फ़रमान झट देके जाता है
अभी कुछ मत बोलो
अभी कुछ मत सोचो
अभी कुछ मत मांगो|

3
कभी चाँद के सिरहाने


कभी चाँद के सिरहाने
कभी पतंग की छाया में
झील को निहारते

दरिया के किनारे
बारिश के बीच
ढलान पर पीठ से पीठ टिकाए

हम मिलते ऐसे जैसे
कुम्हार से चाक
बढ़ई से रंदा

हम मिलते एकाग्र
एक-दूजे को सुनते-गुनते
एक-दूजे को चुनते-बुनते

आख़िरकार ज़माने ने
इस मुहब्बत को
गुनाह का नाम दिया
और हमारा मिलना-जुलना
एक-दूसरे से जैसे गुम गया

अब आसमान में एक कक्षा थी
जो टूटी हुई थी बुरी तरह

समुंदर में एक कश्ती थी
जो निर्जीव-सी पड़ी थी

शिखर पर एक पेड़ था
जो ठूँठ हुआ जा रहा था

एक घर था परिदृश्य में
जिसमें भय था शिकस्त थी

एक लोक था पृथ्वी पर
जिसमें हमारे अल्फ़ाज़
किसी खंडहर की मानिंद थे

अब तुम्हीं बताओ कबीर
अब तुम्हीं बताओ ग़ालिब
जब कहीं कुछ नहीं था
तब भी तो प्रेम था
एकदम मस्त हाथी-सा
अपने समूचे वजूद के साथ

परंतु वे बाज़ आते कहाँ हैं
परंतु वे मानते कहाँ हैं
प्रेम की हत्या से

प्रेम के शंख को
अंधे कुएँ में फेंक आने से।

4
कोलकाता

जब भी पहुंचा कोलकाता
पूर्व के दिवसों को संचित करता
इस संचय में
मुझे आहट सुनाई दी
कुछ अनूठे-अद्भुत की
कुछ नए इतिहास
कुछ नए मिथक की

मैंने जो देखा
मैंने जो सुना
मैंने जो गुना

इस देखे सुने गुने में
यहां के अपने परिजन थे
यहां के अपने मित्र थे
यहां का अपना मुहावरा था
यहां का महाकाश था
यहां का बीता-अनबीता था

इस बीते-अनबीते में
अपना वर्तमान खंगालता
अपने समय को चाक पर धरता
अपनी धार को नई धार देता
चलता मैं

मैं जो एक कवि हूं वनवासी
मैं जो एक मनुष्य हूं साधारण
मैं जो एक आदमी हूं परिचित
इस अपरिचित-अबूझे समय में

मैं अब जो कोलकाता का हुआ
यहां आकर जनम-जनम का।

5
दाँव

आज उस ठूँठ पेड़ पर बैठी चिड़िया पर
लगाया गया था दाँव शिकारियों द्वारा प्रत्याशित-अप्रत्याशित एकदम व्यग्र

दुर्दिन में ऐसा होते देखा था बारंबार
बर्बर दिनों में ऐसा होते देखा था लगातार

परन्तु अब तो दिन भी अच्छे थे
हमारी रातें भी अच्छी थीं
उनके भाषणों में
उनकी भाषाओं में

अब सूखा था
अब भूखा था

अब अकाल था
अब भयकाल था

अब जो भी था
हर्ष था
सहर्ष था

फिर यह कैसा और कौन-सा दाँव
खेला जा रहा था शिकारियों द्वारा
इस अथाह जलराशि-से आकाश के नीचे

जबकि सायकिल का पंक्चर बनाते फ़हीम चाचा
आज भी पंक्चर बना रहे थे

जबकि चंपा के बाबूजी आज भी चाय बेच रहे थे

कुम्हार कुम्हार ही थे
बढ़ई बढ़ई
कबाड़ी कबाड़ी ही थे
सब्ज़ी वाला सब्ज़ी वाला ही था

फिर उनके भाषणों
उनकी भाषाओं में
हम सबके दिन अच्छे कैसे हो रहे थे

अब समझा अब जाना
अच्छे दिनों के इस दाँव में
इस जाल में
हमें ही फँसाया जा रहा था
हमें ही भरमाया जा रहा था
पूरी चालाकी-चतुराई से।

6
जो मेरी खिड़की पर बरस रही

मैं मुरीद हुआ इस बारिश का
जो मेरी खिड़की पर बरस रही है
झमाझम मीठे संगीत की तरह निरंतर
चंद्रोदय की इस बेला को
नई प्रकाश-आभा में समेटती हुई
मेरी प्रेम-इच्छाओं को अनायास बढ़ाती हुई।

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

इस दुनिया को रहने लायक कर मौला - आनन्द कुमार द्विवेदी की ग़ज़लें


ताकत की सत्ता का नियम बना जबसे
उस दिन को मनहूस मुकर्रर कर मौला

ताकत की सत्ता से सारी दुनिया परेशान है। आनन्द कुमार द्विवेदी का ग़ज़लकार भी परेशान है और ऐसा शेर लिख देता है। अब ग़ज़ल महबूबा की ज़ुल्फें नहीं सुलझाती, मुफलिसों, मज़लूमों के हक़ की बात करती है। यहाँ तक कि एक सच्चे स्त्री विमर्श की भी-

आधी आबादी दुश्मन है आधी की
थोड़ा इन मर्दों को काबू कर मौला

तत्सम पर इस बार आनन्द कुमार द्विवेदी...

प्रदीप कान्त  
1
काँप रहे हैं बच्चे थर थर थर मौला
इस दुनिया को रहने लायक कर मौला

जो ताक़त के पलड़े में कुछ हलके हैं
उनको भी करने दे गुज़र-बसर मौला

पहले मज़हब में बाँटा इंसानों को
देख बैठकर अब खूनी मंज़र मौला

आधी आबादी दुश्मन है आधी की
थोड़ा इन मर्दों को काबू कर मौला


 ना तुझसे डरते न तेरी दुनिया से
तू खुद ही अपने बंदों से डर मौला

ताकत की सत्ता का नियम बना जबसे
उस दिन को मनहूस मुकर्रर कर मौला

ऐसा ही इंसान रचा था क्या तूने?
ऊपर मीठा, अंदर भरा ज़हर मौला

आनंद कुमार द्विवेदी

जन्म: 22 नवम्बर 1968, ग्राम कसरावाँ, जिला: रायबरेली, (उत्तर प्रदेश में)

लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक 

२०१३ में ग़ज़ल संग्रह ';फ़ुर्सत में आज'; बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओ और ई-पत्रिकाओं में यदाकदा प्रकाशित।

सम्प्रति: दिल्ली में एक निजी फर्म में मैनेजर
संपर्क : anandkdwivedi@gmail.com

जब जीवन ठगविद्या हो 'आनंद' नहीं
मुझको फिर छोटे बच्चे सा कर मौला

2
दो चार रोज ही तो मैं तेरे शहर का था
वरना तमाम उम्र तो मैं भी सफ़र का था

जब भी मिला कोई न कोई चोट दे गया
बंदा वो यकीनन बड़े पक्के जिगर का था


हमने भी आज तक उसे भरने नहीं दिया
रिश्ता हमारा आपका बस ज़ख्म भर का था

तेरे उसूलतेरे  फैसले,   तेरा  निजाम
मैं किससे उज्र करता, कौन मेरे घर का था

जन्नत में भी कहाँ सुकून मिल सका मुझे
ओहदे पे वहाँ भी, कोई...तेरे असर का था

मंजिल पे पहुँचने की तुझे लाख दुआएं
'आनंद' बस पड़ाव तेरी रहगुज़र का था

3
मुश्किल से, जरा देर को सोती हैं लड़कियाँ
जब भी किसी के प्यार में होती हैं लड़कियाँ

'पापा' को कोई रंज न हो, बस ये सोंचकर,
अपनी हयात ग़म में डुबोती हैं लड़कियाँ


फूलों की तरह खुशबू बिखेरें सुबह से शाम
किस्मत भी गुलों सी लिए होती हैं लड़कियाँ

'उनमें'...किसी मशीन में, इतना ही फर्क है
सूने  में  बड़े  जोर  सेरोती  हैं  लड़कियाँ

टुकड़ों में बांटकर कभीखुद को निहारिये
फिर कहिये, किसी की नही होती हैं लड़कियाँ

फूलों का हार होकभी बाँहों का हार हो
धागे की जगह खुद को पिरोती हैं लड़कियाँ

'आनंद' अगर अपने तजुर्बे  कि  कहे तो
फौलाद हैंफौलाद ही होती हैं लड़कियाँ

4
इतना तो जाना है हमने सबकी कथा-कहानी से
सबके जीवन में आते हैं कुछ पल राजा-रानी से

जुदा नहीं कर पाती जिनको दुनिया भर की दुश्वारी
अहम जुदा कर देता उनको चुटकी में आसानी से

धरती-अम्बर जैसी दूरी हो पर प्रेम न कम होता
कम होता है प्रेम हमेशा बंधन से मनमानी से

उम्मीदों से सींचा पौधा नाउम्मीदी सह न सका
ऐसे रिश्ते बन जाते हैं अक्सर पावक-पानी से

या तो अपने में ही डूबो या फिर उसके हो जाओ
थोड़ा थोड़ा सबमें रहना, होता है बेइमानी से

मीठा-मीठा गप्प यहाँ है कड़वा-कड़वा थू थू है
परमारथ कह स्वारथ बेचें, सोच-कर्म से वानी से

रहने दो 'आनंद' अकेला, चलने दो तनहा इसको
इसकी आँखें गीली हैं तो,  खुद इसकी नादानी से

चित्र: प्रदीप कान्त 

रविवार, 8 मार्च 2015

एक नवगीत

बहुत दिन हुए, अपनी कोई रचना को अपने ही ब्लॉग पर स्थान दिये। तो इस बार तत्सम पर अपना ही एक नवगीत...,


प्रदीप कांत 
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उठो जमूरे

उठो जमूरे कर लें पूरे
खेल अधूरे

राजा का दरबार लगाएँ
निर्दोषों का दोष बताएँ
अन्यायी को
न्याय दिलाएँ
पूरे पूरे

भले जले ना उनके चूल्हे
भूखों से चालान वसूलें
मस्त रहें फिर
गुगल चित्र से साभार 
खाकर सोयें
भाँग धतूरे

लोग बिजूके आज सड़क पर
कौन लड़ेगा इनके हक पर
दर्शक बहरे
हम क्यों अपना
राग बिसूरें

आभार: वेब मेग्ज़ीन अनुभूति  (http://www.anubhuti hindi.org) 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

डॉ मोहसिन खान 'तन्हा' की ग़ज़लें

जब भी सदा आई ज़हन तक अज़ानों की,
मस्जिदों की ऊँची मीनारों से डर लगा।

डर को इस तरह से अपने शेर में बयान करते हैं डॉ मोहसिन खान 'तन्हा' । आप लाख तकनीक को गरियाऐं पर फेसबुक पर इनकी ग़ज़लों से मुठभेड़ हुई तो मुझे इनसे अनुरोध करना पड़ा कि भाई कुछ मेरे ब्लॉग के लिए भी। और मुझे तुरंत और बड़ी सरलता से गज़लें मिल गई। ये कितनी आसानी से कह देते हैं-

बड़ी महीन चुभन है इस नैज़े की,
क़लम कम नहीं किसी औज़ार से।

और सचमुच कलम किसी औज़ार से कम नहीं। मोहसिन अपने समय और उसके ख़तरों से वाकिफ हैं और इसीलिए कहते हैं-

मुझको पता है ये उसको ख़बर है,
झाँक रहा था कौन उस दरार से।

देर से ही सही पर तत्सम पर इस बार डॉ मोहसिन खानतन्हा’…

- प्रदीप कान्त
डॉ. मोहसिन ख़ान (लेफ़्टिनेंट), जन्म 01-06-1975

प्रकाशन - प्रकाशित शोध-पत्र, आलेख, कहानी, कविताएँ एवं ग़ज़लें
35 से अधिक शोध-पत्र एवं आलेख राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। कथाक्रम में पहली कहानी प्रकाशित। वर्तमान में कहानी लेखन में सक्रिय। अपनी माटी, रचनाकार डॉट कॉम, सृजनगाथा वेब पत्रिका पर कहानियाँ,कविताएँ एवं ग़ज़लें प्रकाशित।

प्रकाशित पुस्तकें
प्रगतिवादी समीक्षक और डॉ. रामविलास शर्मा’ , ‘दिनकर का कुरुक्षत्र और मानवतावाद’ , पुस्तक (सह-सम्पादक) – ‘देवनागरी विमर्श

उपन्यास त्रितयग़ज़ल संग्रह-सैलाबपरिदृश्य प्रकाशन (शीघ्र प्रकाश्य)

प्रेमचंद की तीन कहानियों का नाट्य रूपान्तरण एवं मंचन हेतु निर्देशन। अक्षर वार्ताअंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में सम्पादन सहयोग 

कुलाबा गौरव समान, डॉ. अम्बेडकर फ़ेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान 2014 (दलित साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा प्रदत्त) आदि कई पुरूस्कार व सम्मान

Blog-www.sarvahara.blogspot.com

संप्रति
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं शोध निर्देशक
जे.एस.एम. महाविद्यालय, अलीबाग – 402 201, जिला रायगड़ (महाराष्ट्र)   
ई-मेल–khanhind01@gmail.com, मोबाईल:-+919860657970, 8793816539

1
कभी दरिया से, कभी किनारों से डर लगा।
तो कभी अपने घर की दीवारों से डर लगा।

जाने क्यों सुना दिया अपने दिल का हाल,
मुझे अपने ही सारे राज़दारों से डर लगा।

जब भी सदा आई ज़हन तक अज़ानों की,
मस्जिदों की ऊँची मीनारों से डर लगा।

जो कहा, सामने कहा और सहीं तोहमतें।
पीठ के पीछे चल रहे इशारों से डर लगा।

तनहा रखा जब बुलंदियों पे क़दम मैंने तो,
आसमानों से टूटते सितारों से डर लगा।

2
न दिलों में रहा, न निगाहों में रहा।
उम्र भर मैं गैरों की पनाहों में रहा।

मस्जिद सामने थी,फ़ितरत न थी,
साथ आवारगी के गुनाहों में रहा।

मेरी मुश्किल खुद मैं ही बन गया,
न जाने मैं किन भुलावों में रहा।

ख़ामोश तबीअत ने किया बदनाम,
हर वक़्त मैं झूठी अफ़वाहों में रहा।

तनहा बिछड़ा जबसे अपने घर से,
जैसे टूटा कोई पत्ता हवाओं में रहा।

3
गिरा के मुझको वो मुस्कुरा रहा है।
औक़ात अपनी अब बता रहा है।

मैदान भी उसका, खेल भी उसका,
चालें नई-नई मुझको दिखा रहा है।

टूटे उनके हौसले जो कमज़ोर थे,
काँच से पत्थर को डरा रहा है।

क़ायम रखना है गर ऊंचाई तुझे,
तो क़द मेरा तू क्यों घटा रहा है।

तनहातप के बनी शख़्सीयत,
सलीक़ा तू मुझे सिखा रहा है।

4
रिश्ते ख़रीदे नहीं जाते बाज़ार से।
एक डोर बाँधे हुए है, एतबार से।

आईने शराफ़त छोड़ दें तो अच्छा,
नीयत नज़र आ जाएगी दीदार से।

बड़ी महीन चुभन है इस नैज़े की,
क़लम कम नहीं किसी औज़ार से।

मुझको पता है ये उसको ख़बर है,
झाँक रहा था कौन उस दरार से।

'तनहा'  हूँ, बेसहारा हूँ, बेचारा हूँ,
बिछड़ा हुआ हूँ कूच-ए-दयार से।

5
ये हुनर है, इसे छुपा रहने दो।
ज़रा मुझमें मेरी अदा रहने दो।

बड़ी नाज़ुक हैं, काँच की चीज़ें,
छुओ नहीं, इन्हें सजा रहने दो।

बाँट लो तुम ज़मीं-आसमाँ सारे,
बस मेरे हक़ में दुआ रहने दो।

राख़ कुरेदो नहीं, सुलग जाएगी,
इस आग को अब बुझा रहने दो।

'तनहा' जी लूँगा पर झुकूँगा नहीं,
मेरे हिस्से में मेरी ख़ता रहने दो।

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

मैं कहानीकार नहीं, जेबकतरा हूँ - सआदत हसन मंटो

मंटो का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं, इसलिए बिना किसी परिचय और भूमिका के मंटो का यह दिलचस्प आत्म कथ्य, या जो भी आप इसे कह लें| हालाँकि आपने इसे पहले पढ़ा हो सकता है पर फिर भी... तत्सम पर इस बार मंटो...

- प्रदीप कांत

मेरी जिंदगी में तीन बड़ी घटनाएँ घटी हैं। पहली मेरे जन्म की। दूसरी मेरी शादी की और तीसरी मेरे कहानीकार बन जाने की।

लेखक के तौर पर राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। लीडरों और दवाफरोशों को मैं एक ही नजर से देखता हूँ। लीडर और दवाफरोशी दोनों पेशे हैं। राजनीति से मुझे उतनी ही दिलचस्पी है, जितनी गांधीजी को सिनेमा से थी। गांधीजी सिनेमा नहीं देखते थे, और मैं अखबार नहीं पढ़ता। दरअसल हम दोनों गलती करते हैं। गांधीजी को फिल्में जरूर देखनी चाहिए थीं, और मुझे अखबार जरूर पढ़ने चाहिए।

मुझसे पूछा जाता है कि मैं कहानी कैसे लिखता हूँ। इसके जवाब में मैं कहूँगा कि अपने कमरे में सोफे पर बैठ जाता हूँ, कागज-कलम लेता हूँ और 'बिस्मिल्ला' कहकर कहानी शुरू कर देता हूँ। मेरी तीनों बेटियाँ शोर मचा रही होती हैं। मैं उन से बातें भी करता हूँ। उनके लड़ाई-झगड़े का फैसला भी करता हूँ। कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, पर कहानी भी लिखता रहता हूँ। सच पूछिए तो मैं वैसे ही कहानी लिखता हूँ, जैसे खाना खाता हूँ, नहाता हूँ, सिगरेट पिता हूँ और झक मारता हूँ।

अगर पूछा जाए कि मैं कहानी क्यों लिखता हूँ, तो कहूँगा कि शराब की तरह कहानी लिखने की भी लत पड़ गई है। मैं कहानी न लिखूँ, तो मुझे ऐसा लगता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या गुसल नहीं किया है या शराब नहीं पी है। दरअसल मैं कहानी नहीं लिखता हूँ, बल्कि कहानी मुझे लिखती है। मैं बहुत कम-पढ़ा लिखा आदमी हूँ। वैसे तो मैंने दो दर्जन किताबें लिखी हैं और जिस पर आए दिन मुकदमे चलते रहते हैं। जब कलम मेरे हाथ में न हो, तो मैं सिर्फ सआदत हसन होता हूँ!

कहानी मेरे दिमाग में नहीं, मेरी जेब में होती है, जिसकी मुझे कोई खबर नहीं होती। मैं अपने दिमाग पर जोर देता हूँ कि कोई कहानी निकल आए। कहानी लिखने की बहुत कोशिश करता हूँ, पर कहानी दिमाग से बाहर नहीं निकलती। आखिर थक-हारकर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ। अनलिखी कहानी की कीमत पेशगी वसूल कर चुका हूँ, इसलिए बड़ी झुँझलाहट होती है। करवट बदलता हूँ। उठकर अपनी चिड़ियों को दाने डालता हूँ। बच्चियों को झूला झुलाता हूँ। घर का कूड़ा-करकट साफ करता हूँ, घर में इधर-उधर बिखरे नन्हें-मुन्ने जूते उठाकर एक जगह रखता हूँ, पर कमबख्त कहानी जो मेरी जेब में पड़ी होती है, मेरे दिमाग में नहीं आती और मैं तिलमिलाता रहता हूँ।

जब बहुत ही ज्यादा कोफ्त होती है, तो गुसलखाने में चला जाता हूँ, पर वहाँ से भी कुछ मिलता नहीं। सुना है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है। मुझे अपने तजुर्बे से पता लगा है कि मैं बड़ा आदमी नहीं हूँ, पर हैरानी है कि फिर भी मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बहुत बड़ा कहानीकार हूँ। इस बारे में मैं यही कह सकता हूँ कि या तो मेरे आलोचकों को खुशफहमी है या फिर मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ।

ऐसे मौकों पर, जब कहानी नहीं ही लिखी जाती, तो कमी यह होता है कि मेरी बीवी मुझसे कहती है, 'आप सोचिए नहीं, कलम उठाइए और लिखना शुरू कर दीजिए!' मैं उसके कहने पर लिखना शुरू कर देता हूँ। उस समय दिमाग बिल्कुल खाली होता है, पर जेब भरी हुई होती है। तब अपने आप ही कोई कहानी उछलकर बाहर आ जाती है। उस नुक्ते से मैं खुद को कहानीकार नहीं, बल्कि जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद काटता है और लोगों के हवाले कर देता है।

मैंने रेडियो के लिए जो नाटक लिखे, वे रोटी के उस मसले की पैदावार हैं, जो हर लेखक के सामने उस समय तक रहता है, जब तक वह पूरी तरह मानसिक तौर पर अपाहिज न हो जाए। मैं भूखा था, इसलिए मैंने यह नाटक लिखे। दाद इस बात की चाहता हूँ कि मेरे दिमाग ने मेरे पेट में घुसकर ऐसे हास्य-नाटक लिखे हैं, जो दूसरों को हँसाते हैं, पर मेरे होठों पर हल्की-सी मुस्कराहट भी पैदा नहीं कर सके।

रोटी और कला का रिश्ता कुछ अजीब-सा लगता है, पर क्या किया जाए! खुदाबंदताला को यही मंजूर है। यह गलत है कि खुदा हर चीज से खुद को निर्लिप्त रखता है और उसको किसी चीज की भूख नहीं है। दरअसल उसे भक्ति चाहिए और भक्ति बड़ी नर्म और नाजुक रोटी है, बल्कि चुपड़ी हुई रोटी है, जिस से ईश्वर अपना पेट भरता है। सआदत हसन मंटो लिखता है, क्योंकि वह ईश्वर जितना कहानीकार और कवि नहीं है। उसे रोटी की खातिर लिखना पड़ता है।

मैं जानता हूँ कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बहुत बड़ा नाम है। अगर यह खुशफहमी न हो तो जिंदगी और भी मुश्किल बन जाए। पर मेरे लिए यह एक तल्ख हकीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूँढ़ नहीं पाया हूँ। यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है। मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ।

मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता? मैं अपनी जिंदगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेजियों की भेंट चढ़ा चुका हूँ। अब तो यह हालत है कि परहेज शब्द ही मेरे लिए डिक्शनरी से गायब हो गया है।

मैं समझता हूँ कि जिंदगी अगर परहेज से गुजारी जाए, तो एक कैद है। अगर वह बदपरहेजियों में गुजारी जाए, तो भी कैद है। किसी-न-किसी तरह हमें इस जुर्राब के धागे का एक सिरा पकड़कर उसे उधेड़ते जाना है और बस!
(हिन्दी समय से साभार)