आपकी प्रमुख किताबों में सियाह बर सफ़ेद, आवाज़ का ज़िस्म, सबरंग, आते-जाते लम्हों की सदा, बाँस के जंगलों से गुज़रती हवा, 'पेड़ गिरता हुआ' और 'दीवारो-दर के दरमियाँ' और एक दर्जन से अधिक आलोचनात्मक पुस्तकें भी लिखीं।
आपने उर्दू साहित्यक पत्रिका तहरीक, गुलफिशां और निगार का संपादन किया। वे एवाने उर्दू और उमंग के संपादक औरनखलिस्तान के भी प्रधान संपादक रहे।
अपनी शायरी से भाईचारे और इंसानियत का पैगाम फैलाने वाले मशहूर शायर मखमूरसईदी का मूल नाम सुल्तान मोहम्मदखाँ था, लेकिन साहित्य की दुनिया में उन्होंने उपनाम 'मखमूर' से शोहरतहासिल की। लगभग 50 साल तक अदबी दुनिया में काम करने वाले मख़्मूर को साहित्य अकादमी अवार्ड, मिर्जा गालिब अवार्ड के साथ और भी कई सम्मानों से सम्मानित किया गया।
सीधी सादी ज़बान में शायरी करने वाले इस शायर का 76 साल की उम्र में 2 मार्च 2010 को जयपुर में इंतकाल हो गया। तत्सम में इस बार मरहूम मख़्मूर सईदीकीकुछ ग़ज़लें.....
साअते-क़ुर्ब: सामीप्य का लक्षण; मुख़्तसर: संक्षिप्त; शौक़े-शहरगर्दी: नगर में घूमने का शौक़।
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न रास्ता न कोई डगर है यहाँ मगर सब की क़िस्मत सफ़र है यहाँ सुनाई न देगी दिलों की सदा, दिमाग़ों में वो शोर-ओ-शर है यहाँ
हवाओं की उँगली पकड़ कर चलो, वसिला इक यही मोतबर है यहाँ न इस शहर-ए-बेहिस को सेहरा कहो, सुनो इक हमारा भी घर है यहाँ पलक भी झपकते हो "मख्मूर" क्यूँ, तमाशा बहुत मुख़्तसर है यहाँ
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भीड़ में है मगर अकेला है
उस का क़द दूसरों से ऊँचा है
अपने-अपने दुखों की दुनिया में
मैं भी तन्हा हूँ वो भी तन्हा है
मंज़िलें ग़म की तय नहीं होतीं
रास्ता साथ-साथ चलता है
साथ ले लो सिपर मौहब्बत की
उस की नफ़रत का वार सहना है
तुझ से टूटा जो इक तअल्लुक़ था
अब तो सारे जहाँ से रिश्ता है
ख़ुद से मिलकर बहुत उदास था आज
वो जो हँस-हँस के सबसे मिलता है
उस की यादें भी साथ छोड़ गईं
इन दिनों दिल बहुत अकेला है
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चल पड़े हैं तो कहीं जा के ठहरना होगा
ये तमाशा भी किसी दिन हमें करना होगा
रेत का ढेर थे हम, सोच लिया था हम ने
जब हवा तज़ चलेगी तो बिखरना होगा
हर नए मोड़ प' ये सोच क़दम रोकेगी
जाने अब कौन सी राहों से गुज़रना होगा
ले के उस पार न जाएगी जुदा राह कोई
भीड़ के साथ ही दलदल में उतरना होगा
ज़िन्दगी ख़ुद ही इक आज़ार है जिस्मो-जाँ का
जीने वालों को इसी रोग में मरना होगा
क़ातिले-शहर के मुख़बिर दरो-दीवार भी हैं
अब सितमगर उसे कहते हुए डरना होगा
आए हो उसकी अदालत में तो 'मख़्मूर' तुम्हें
अब किसी जुर्म का इक़रार तो करना होगा
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आंखों के सब ख़्वाब कहीं खो जाते हैं आईने इक दिन पत्थर हो जाते हैं ऐसा क्यूं होता है, मौसम दरमां के दिल में ताज़ा दर्द भी कुछ बो जाते हैं तुझसे वाबस्ता हर मंज़र की पहचान तुझसे बिछड़ कर सब मंज़र खो जाते हैं ख्वाबे-सफ़र इन आंखों में जाग उठता है चांद, सितारे थक कर जब सो जाते हैं कौन सी दुनियाओं का तसव्वुर ज़ेहन में है बैठे - बैठे हम ये कहां खो जाते हैं किस मौसम के बादल हैं जो कभी-कभी दिल के मर्क़द पर आ कर रो जाते हैं आईनों से पूछ के देखो ऐ 'मख्मूर' चेहरे क्या होते हैं, क्या हो जाते हैं
दरमां : चिकित्सा, मर्क़द : समाधि-भवन
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सुन ली सदा-ए-कोहे-निदा और चल पड़े हमने किसी से कुछ न कहा और चल पड़े
ठहरी हुई फिजा में उलझने लगा था दम हमने हवा का गीत सुना और चल पड़े
तारीक रास्तों का सफर सहल था हमें रोशन किया लहू का दिया और चल पड़े
घर में रहा था कौन कि रुखसत करे हमें चौखट को अलविदा कहा और चल पड़े
'मख्मूर' वापसी का इरादा न था मगर घर को खुला ही छोड़ दिया और चल पड़े
२७ नवम्बर २०१० (शनिवार) को देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर के तुलनात्मक भाषा अध्ययनशाला में कविता का वैश्विक परिदृष्य और आज की कवितापर केन्द्रित साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में भाषा अध्ययनशाला की निदेशक व सुप्रसिद्ध लेखिका पद्मा सिंह ने हिन्दी व सिन्धी भाषा की कवयित्री श्रीमती रश्मि रमानी की नई काव्यकृति स्मृति एक प्रेम की का विमोचन कर उन्हे शाल व श्रीफल से सम्मानित किया। पुस्तक पर केट के युवा वैज्ञानिक व सुप्रसिद्ध युवा कवि प्रदीप मिश्र व पत्रकार रजनी रमण शर्मा ने इस संग्रह में सम्मिलित प्रेम कविताओं को रेखांकित करते हुऐ विस्तार से चर्चा की।
मुख्य वक्ता डॉ सुब्रतो गुहाने विश्व कविता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बताते हुऐ विश्व कविता के आधुनिक परिदृष्य पर विस्तार से चर्चा की। भारतीय कविता के लक्षण व पारम्पारिक कविता से भिन्नता बताते हुए गेटे (जर्मन), शू जिन (चीन), होमर (यूरोप), वर्जिल राबर्ट फ्रस्ट, फिलिप लार्किन आदि की कविताओं की विशेषताओं पर भी प्रकाश डाला। साथ ही संस्कृत, हिन्दी, उर्दू व बांग्ला आदि भाषाओं काव्य रचनाओं का उदाहरण देते हुए आज की कविताओं के विभिन्न आयामों की भी चर्चा की।
इस अवसर पर श्रीमती रश्मि रमानी ने अपनी रचना प्रक्रिया पर केन्द्रित वक्तव्य के साथ अपनी कविताओं का पाठ किया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ पुष्पेन्द्र दुबे ने किया व आभार जयभीम बौद्ध ने माना।
लगभगएकसालपहलेतत्समपरआपनेयुवतम पीढ़ी के कविअमेय कांतकीकविताएँपढ़ीहोंगी।इसबारफिरसेअमेयकीकुछकविताएँ...।
हालांकिइन छोटी-छोटी कविताओंकाशिल्पअनगढ़सानजरआता है और यहाँ बहुत बड़ा वैचारिक फलक भी नहीं है किंतु भावों की गहनता कवि के सरोकारों के प्रति आश्वस्त करती है।
उत्तर आधुनिकता के कदम बढ़े आ रहे हैं। रिश्तों के खत्म होने की घोषणाएँ शुरू हो गई हैं और पूंजी कमाने की व्यस्तता और होड़ के सामने प्रेम व्रेम के लिये वक़्त कहाँ बच रहा है? ऐसे में भी कोई प्रेम कर रहा हो, कोई प्रेम कविता लिख रहा हो और कोई प्रेम कविता पढ़ कर ही प्रेम के बचे रहने की आस कर रहा हो। प्रेम - जिसके होने से ही बैर न होने का अहसास बचता है।
तत्सम में इस बार प्रेम की इसी शास्वत अनुभूति को दर्ज करती उत्पल बेनर्जी की कुछ प्रेम कविताएँ...
- प्रदीप कांत
1
लड़की
लड़की को बोलने दो लड़की की भाषा में
सुदूर नीलाकाश में खोलने दो उसे
मन की खिड़कियाँ,
उस पार शिरीष की डाल पर बैठा है
भोर का पहला पक्षी
पलाश पर उतर आई है प्रेमछुई धूप
उसे गुनगुनाने दो कोई प्रेमगीत
सजाने दो सपनों के वन्दनवार
बुनने दो कविता
भाषा के सूर्योदय में मन की बात कहने दो उसे
अन्तहीन पीड़ा के नेपथ्य से फूठने दो
निशिगन्धा की किलकारियाँ,
सदियों से बँधी नाव को जाने दो
सागर की उत्ताल तरंगों में
आदर्श शिखरों से उतर आना चाहती है लड़की
भविष्य की पगडंडियों पर
उसे रोको मत
उसे चुनने दो झरबेरी सीप और मधुरिमा
करने दो उसे उपवास और प्रार्थनाएँ
रखने दो देहरी पर दीप
उसे मत रोको प्रेम करने से,
अगर सचमुच बचाना चाहते हो
सृष्टि की सबसे सुन्दर कविता को
तो ... आग की ओर जाती लड़की को रोको
रोको -- उसके जीवन में दोस्त की तरह प्रवेश करते
दुःख और विवशता को
रोको उसे दिशाहीन होकर नदी में डूबने से
रोको – ‘सब कुछ’ को ‘कुछ नही’हो जाने से!
०००००
2
कविता से बाहर
एक दिन अचानक हम चले जाएँगे
तुम्हारी इच्छा और घृणा से भी दूर
किसी अनजाने देश में
और शायद तुम जानना भी न चाहो
हमारी विकलता और अनुपस्थिति के बारे में!
हो सकता है इस सुन्दर पृथ्वी को छोड़कर
हम चले जाएँ दूर .... नक्षत्रों के देश में
फिर किसी शाम जब आँख उठाकर देखो
चमकते नक्षत्रों के बीच तुम शायद पहचान भी न पाओ
कि तुम्हारी खिड़की के ठीक सामने हम ही हैं
अपने वरदानों और अभिशापों में बँधे...
हम वहीं दूर से तुम्हें देखते रहेंगे
अपना वर्तमान और अतीत लेकर
अपने उदास अकेलेपन में
भाषा और कविता से बाहर
सृष्टि की अंतिम रात तक
चाहत के आकाश में
उदास और अकेले!!
०००००
3
वह प्रेम करेगी
वह प्रेम करेगी -
और चाँद खिल उठेगा आकाश में
सुनाई देगा बादलों का कोरस,
वह प्रेम करेगी -
और मैं भेज दूँगा बादलों को
जलते हुए रेगिस्तानों में,
वह प्रेम करेगी -
और आकाश में दिखाई देंगे इंद्रधनुष के सातों रंग
वह प्रेम करेगी -
और थम जाएगा हिरोशिमा का ताण्डव
लातूर का भूकम्प
अफ्रीका के अरण्य में पहली बार उगेगा सूरज
सागर की छाती पर फिर कोई जहाज नहीं डूबेगा
फिर विसुवियस के पहाड़ आग नहीं उगलेंगे,
वह प्रेम करेगी -
और मैं देखूँगा अनन्त में डूबा आकाश
देखूँगा -- मोर के पंखों का रंग,
प्यार करुँगा -- जिन्हें कभी किसी ने प्यार नहीं किया,